मत्स्य महा पुराण
पञ्चमहाभूतोंका प्राकट्य तथा नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति
मत्स्य उवाच
आपवः स विभुर्भूत्वा चारयामास वै तपः ।
छादयित्वाऽऽत्मनो देहं यादसां कुलसम्भवम्॥ १
ततो महात्मातिबलो मतिं लोकस्य सर्जने।
महतां पञ्चभूतानां विश्वो विश्वमचिन्तयत्॥ २
तस्य चिन्तयमानस्य निर्वाते संस्थितेऽर्णवे।
निराकाशे तोयमये सूक्ष्मे जगति गह्वरे॥ ३
ईषत् संक्षोभयामास सोऽर्णवं सलिलाश्रयः।
अनन्तरोर्मिभिः सूक्ष्ममथ च्छिद्रमभूत् पुरा॥ ४
शब्दं प्रति तदोद्भूतो मारुतश्छिद्रसम्भवः।
स लब्ध्वान्तरमक्षोभ्यो व्यवर्धत समीरणः॥ ५
विवर्धता बलवता वेगाद् विक्षोभितोऽर्णवः।
तस्यार्णवस्य क्षुब्धस्य तस्मिन्नम्भसि मन्थिते।
कृष्णवा समभवत् प्रभुर्वैश्वानरो महान्॥ ६
ततः स शोषयामास पावकः सलिलं बहु।
क्षयाज्जलनिधेश्छिद्रमभवद्विस्तृतं नभः॥ ७
आत्मतेजोद्भवाः पुण्या आपोऽमृतरसोपमाः।
आकाशं छिद्रसम्भूतं वायुराकाशसम्भवः॥८
आभ्यां सङ्घर्षणोद्भूतं पावकं वायुसम्भवम्।
दृष्ट्वा प्रीतो महादेवो महाभूतविभावनः॥ ९
दृष्ट्वा भूतानि भगवाँल्लोकसृष्ट्यर्थमुत्तमम्।
ब्रह्मणो जन्मसहितं बहुरूपो व्यचिन्तयत्॥१०
चतुर्युगाभिसंख्याते सहस्रयुगपर्यये।
बहुजन्मविशुद्धात्मा ब्रह्मणेह निरुच्यते॥११
यत्पृथिव्यां द्विजेन्द्राणां तपसा भावितात्मनाम्।
ज्ञानं दृष्टं तु विश्वार्थे योगिनां याति मुख्यताम्॥१२
मत्स्यभगवान्ने कहा-राजन्! तदनन्तर वे सर्वव्यापी नारायण जल-जन्तुओंके कुलमें उत्पन्न अपने शरीरको छिपाकर जलमें निवास करते हुए तपस्यामें संलग्न हो गये। कुछ समयके पश्चात् उन महाबली महात्माने जगत्की सृष्टि करनेका विचार किया। तब उन विश्वात्माने पञ्चमहाभूतोंकी समष्टिरूप विश्वका चिन्तन किया। उनके चिन्तन करते समय महासागर वायुरहित होनेके कारण शान्त था। आकाशका विनाश हो गया था, सर्वत्र जल-ही-जल व्याप्त था, उसके गह्वरमें सूक्ष्म जगत् विद्यमान था, उस समय जलके मध्यमें स्थित नारायणने उस एकार्णवको थोड़ा संक्षुब्ध कर दिया। तदनन्तर उससे उठी हुई लहरोंसे सर्वप्रथम सूक्ष्म छिद्र प्रकट हुआ। छिद्रसे शब्द-गुणवाला आकाश उत्पन्न हुआ। उस छिद्राकाशसे वायुकी उत्पत्ति हुई। वह दुर्धर्ष पवन अवसर पाकर वृद्धिको प्राप्त हुआ। तब वेगपूर्वक बढ़ते हुए उस बलवान् पवनने महासागरको विक्षुब्ध कर दिया। उस क्षुब्ध हुए महासागरके जलके मथित होनेपर महान् प्रभावशाली कृष्णवा वैश्वानर (अग्नि) प्रकट हुए। तब उस अग्निने अधिकांश जलको सोख लिया। समुद्र-जलके संकुचित हो जानेसे वह छिद्र विस्तृत आकाशके रूप में परिणत हो गया। इस प्रकार अपने तेजसे उत्पन्न हुए एवं अमृत-रसके समान स्वादिष्ट पुण्यमय जल, छिद्रसे उत्पन्न हुए आकाश, आकाशसे प्रकट हुए पवन तथा आकाश और पवनके संघर्षसे उद्भूत हुए वायुजनित अग्निको देखकर महाभूतोंको उत्पन्न करनेवाले वे महान् देव प्रसन्न हो गये। तब विविध रूप धारण करनेवाले भगवान् उन महाभूतोंको उपस्थित देखकर लोककी सृष्टिके लिये ब्रह्माके जन्मसहित अन्यान्य उत्तम साधनोंके विषयमें विशेषरूपसे विचार करने लगे॥१-१०॥
इस प्रकार चारों युगोंकी संख्यासे युक्त एक हजार युग बीत जानेपर बारम्बार जन्म लेनेपर भी जिसका आत्मा विशुद्ध होता है, उसे ब्रह्मा कहा जाता है। योगवेत्ता भगवान् भूतलपर जिसे तपस्यासे पवित्र आत्मावाले महर्षियोंके ज्ञान और योगियोंकी मुख्यतासे युक्त देखते
तं योगवन्तं विज्ञाय सम्पूर्णैश्वर्यमुत्तमम्।
पदे ब्रह्मणि विश्वेशं न्ययोजयत योगवित्॥ १३
ततस्तस्मिन् महातोये महीशो हरिरच्युतः।
स्वयं क्रीडंश्च विधिवन्मोदते सर्वलोककृत्॥१४
पद्मं नाभ्युद्भवं चैकं समुत्पादितवांस्तदा।
सहस्रपर्णं विरजं भास्कराभं हिरण्मयम्॥ १५
हुताशनज्वलितशिखोज्वलत्प्रभ-
मुपस्थितं शरदमलार्कतेजसम्।
विराजते कमलमुदारवर्चसं
ममात्मनस्तनुरुहचारुदर्शनम् ॥१६
हैं, उसे योगसम्पन्न सम्पूर्ण उत्तम ऐश्वर्योंसे युक्त और विश्वके शासनकी क्षमतासे पूर्ण जानकर ब्रह्माके पदपर नियुक्त कर देते हैं। तत्पश्चात् जो सम्पूर्ण लोकोंके रचयिता, पृथ्वीके स्वामी और अपनी महिमासे कभी भी च्युत होनेवाले नहीं हैं, वे श्रीहरि उस महार्णवके जलमें स्वयं विधिपूर्वक क्रीडा करते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं। उस समय वे अपनी नाभिसे एक कमल उत्पन्न करते हैं। उस स्वर्णमय कमलमें एक हजार पत्ते होते हैं। वह परागरहित और सूर्यके समान कान्तिमान् होता है। उस समय अग्निकी जलती हुई शिखाओंकी उज्ज्वल कान्तिके समान देदीप्यमान, शरत्कालीन निर्मल सूर्यके सदृश तेजस्वी, भगवान्की रोमावलि-सरीखे परम दर्शनीय तथा उत्तम कान्तिमान् उस प्रकट हुए कमलकी विशेष शोभा होती है ॥११-१६॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे पद्योद्भवो नामाष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१६८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसंगमें पद्मोभव नामक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६८॥
Summary of chapter 170 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya provides a detailed philosophical explanation of the emergence of the cosmic lotus from the navel of Bhagavān Nārāyaṇa. The text explains that the lotus stalk represents the cosmic axis, its petals symbolize the mountain ranges and continents of the universe, and its pericarp contains the divine throne of Bhagavān Brahmā. Understanding this cosmic lotus symbol reveals the intimate relationship between the physical universe and the Supreme Unmanifest Source.