ययाति और अष्टकका संवाद

ययातिरुवाच

अहं ययातिनहुषस्य पुत्रः

पूरोः पिता सर्वभूतावमानात्।

प्रभ्रंशितोऽहं सुरसिद्धलोकात्

परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः॥१

ययातिने कहा-महात्मन्! मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता ययाति हूँ। समस्त प्राणियोंका अपमान करनेसे मेरा पुण्य क्षीण हो गया है। इस कारण मैं देवताओं तथा सिद्धोंके लोकसे च्युत होकर नीचे गिर रहा हूँ।

अहं हि पूर्वो वयसा भवद्भय-

स्तेनाभिवादं भवतां न युञ्जे।

यो विद्यया तपसा जन्मना वा

वृद्धः स वै सम्भवति द्विजानाम्॥ २

अष्टक उवाच

अवादीस्त्वं वयसास्मि वृद्ध

इति वै राजन्नधिकः कथंचित्।

यो वै विद्वांस्तपसा च वृद्धः

स एव पूज्यो भवति द्विजानाम्॥ ३

ययातिरुवाच

प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहु-

स्तद्वर्तिनां प्रवणं पापलोकम्।

सन्तोऽसतो नानुवर्तन्त ते वै

यदात्मनैषां प्रतिकूलवादी॥ ४

अभूद् धनं मे विपुलं महद् वै

विचेष्टमानोऽधिगन्ता तदस्मि।

एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो

यो वर्तते स विजानाति धीरः॥ ५

नानाभावा बहवो जीवलोके

दैवाधीना नष्टचेष्टाधिकाराः।

तत् तत् प्राप्य न विहन्येत धीरो

दिष्टं बलीय इति मत्वात्मबुद्ध्या॥ ६

सुखं हि जन्तुर्यदि वापि दुःखं

दैवाधीनं विन्दति नात्मशक्त्या।

तस्माद् दिष्टं बलवन्मन्यमानो

न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कदाचित्॥ ७

दुःखे न तप्येत सुखे न हृष्येत्

समेन वर्तेत सदैव धीरः।

दिष्टं बलीय इति मन्यमानो

न संज्वरेनापि हृष्येत् कदाचित्॥ ८

भये न मुह्याम्यष्टकाहं कदाचित्

संतापे मे मानसो नास्ति कश्चित्।

धाता यथा मां विदधाति लोके

ध्रुवं तदाहं भवितेति मत्वा ॥ ९

संस्वेदजा ह्यण्डजा ह्युद्भिदश्च

सरीसृपाः कृमयोऽप्यप्सु मत्स्याः।

तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वं

दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते॥१०-

मैं आपलोगोंसे अवस्थामें बड़ा हूँ, अतः आपलोगोंको प्रणाम नहीं कर रहा हूँ। द्विजातियोंमें जो विद्या, तप और अवस्थामें बड़ा होता है वही पूजनीय माना जाता है॥ १-२॥

अष्टक बोले-राजन्! आपने जो यह कहा है कि मैं अवस्थामें बड़ा हूँ, इसलिये ज्येष्ठ हूँ, सो इसमें आप कुछ अधिक कह गये; क्योंकि द्विजोंमें जो विद्या और तपस्यामें बढ़ा-चढ़ा होता है, वही पूज्य माना जाता है ॥ ३॥

ययातिने कहा-पापको पुण्यकर्मोका नाशक बताया जाता है। वह नरककी प्राप्ति करानेवाला है और वह उद्दण्ड पुरुषों में ही देखा जाता है। श्रेष्ठ पुरुष दुराचारी पुरुषोंके दुराचारका अनुसरण नहीं करते। पहलेके साधु पुरुष भी उन श्रेष्ठ पुरुषोंके ही अनुकूल आचरण करते थे। मेरे पास पुण्यरूपी बहुत धन था, किंतु दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण वह सब नष्ट हो गया। अब मैं चेष्टा करके भी उसे नहीं पा सकता। दुरवस्थाको समझ-बूझकर जो आत्मकल्याणमें संलग्न रहता है, वही ज्ञानी और धीर है। इस जीव-जगत्में भिन्न-भिन्न स्वभाववाले बहुत-से प्राणी हैं, वे सभी प्रारब्धके अधीन हैं, अत: उनके धनादि पदार्थों के लिये किये हुए उद्योग और अधिकार सभी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये धीर पुरुषको चाहिये कि वह अपनी बुद्धिसे 'प्रारब्ध ही बलवान् है'-यह जानकर दुःख या सुख जो भी मिले, उसमें विकारको न प्राप्त हो। जीव जो सुख अथवा दुःख पाता है, वह उसे प्रारब्ध (भाग्य)- से ही प्राप्त होता है, अपनी शक्तिसे नहीं; अतः प्रारब्धको ही बलवान् मानकर मनुष्य किसी प्रकार भी हर्ष अथवा शोक न करे। दुःखोंसे संतप्त न हो और सुखोंसे हर्षित न हो। धीर पुरुष सदा समभावसे ही रहे और भाग्यको ही प्रबल मानकर किसी प्रकार चिन्ता एवं हर्षके वशीभूत न हो। अष्टक! मैं कभी भयमें पड़कर मोहित नहीं होता, मुझे कोई मानसिक संताप भी नहीं होता; क्योंकि मैं समझता हूँ कि विधाता इस संसारमें मुझे जैसे रखेगा वैसे ही रहूँगा। स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, सरीसृप, कृमि, जलमें रहनेवाले मत्स्य आदि जीव तथा पर्वत, तृण और काष्ठ-ये सभी प्रारब्ध-भोगका सर्वथा क्षय हो जानेपर अपनी प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं।

अनित्यता सुखदुःखस्य बुद्ध्वा

कस्मात् संतापमष्टकाहं भजेयम्।

किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये

तस्मात् संतापं वर्जयाम्यप्रमत्तः॥११

शौनक उवाच

एवं ब्रुवाणं नृपतिं ययाति-

मथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छत् ।

मातामहं

सर्वगुणोपपन्नं

यत्र स्थितं स्वर्गलोके यथावत्॥१२

अष्टक उवाच

ये ये लोका: पार्थिवेन्द्र प्रधाना-

स्त्वया भुक्ता यं च कालं यथा च।

तन्मे राजन् ब्रूहि सर्वं यथावत्

क्षेत्रज्ञवद् भाषसे त्वं हि धर्मम्॥१३

ययातिरुवाच

राजाहमासं त्विह सार्वभौम-

स्ततो लोकान् महतश्चार्जयं वै।

तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं

ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥१४

ततः पुरी पुरुहूतस्य रम्यां

सहस्त्रद्वारा शतयोजनान्ताम् ।

अध्यावसं वर्षसहस्त्रमात्रं

ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥१५

ततो दिव्यमजरं प्राप्य लोकं

प्रजापतेर्लोकपतेर्दुरापम् ।

तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं

ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥१६

देवस्य देवस्य निवेशने

विजित्य लोकान् न्यवसं यथेष्टम्।

सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तै-

स्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम् ॥१७

तथावसं नन्दने कामरूपी

संवत्सराणामयुतं शतानाम्।

सहाप्सरोभिर्विचरन् पुण्यगन्धान्

पश्यन् नगान् पुष्पितांश्चारुरूपान्॥१८

अष्टक! मैं सुख तथा दु:ख-दोनोंकी अनित्यताको जानता हूँ, फिर मुझे संताप हो तो कैसे? मैं क्या करूँ और क्या करके संतप्त न होऊँ-इन बातोंकी चिन्ता छोड़ चुका हूँ, अत: सावधान रहकर शोक-संतापको अपनेसे दूर रखता हूँ॥४-११॥

शौनकजी कहते हैं-शतानीक! राजा ययाति समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे और नातेमें अष्टकके नाना लगते थे। वे अन्तरिक्षमें वैसे ही ठहरे हुए थे, जैसे मानो स्वर्गलोकमें हों। जब उन्होंने उपर्युक्त बातें कहीं तब अष्टकने उनसे पुनः प्रश्न किया ॥ १२॥

अष्टकने कहा-महाराज! आपने जिन-जिन प्रधान लोकोंमें रहकर जितने समयतक वहाँकै सुखोंका भली- भाँति उपभोग किया है, उन सबका मुझे यथार्थ परिचय दीजिये। राजन्! आप तो महात्माओंकी भाँति धर्मोंका उपदेश कर रहे हैं ॥ १३ ॥

ययातिने कहा-अष्टक! मैं पहले समस्त भूमण्डलमें प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा था। तदनन्तर सत्कर्मोद्वारा बड़े-बड़े लोकोंपर मैंने विजय प्राप्त की और उनमें एक हजार वर्षोंतक (सुखपूर्वक) निवास किया। इसके बाद उनसे भी उच्चतम लोकमें जा पहुँचा। वहाँ सौ योजन विस्तृत और एक हजार दरवाजोंसे युक्त इन्द्रकी रमणीय पुरी प्राप्त हुई। उसमें मैंने केवल एक हजार वर्षोंतक निवास किया और उसके बाद उससे भी ऊँचे लोकमें गया। तदनन्तर लोकपालोंके लिये भी दुर्लभ प्रजापतिके उस दिव्यलोकमें जा पहुंचा, जहाँ जरावस्थाका प्रवेश नहीं है। वहाँ एक हजार वर्षतक रहा, फिर उससे भी उत्तम लोकमें चला गया। वह देवाधिदेव ब्रह्माजीका धाम था। वहाँ मैं अपनी इच्छाके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें विहार करता हुआ सम्पूर्ण देवताओंसे सम्मानित होकर रहा। उस समय मेरा प्रभाव और तेज देवेश्वरोंके समान था। इसी प्रकार मैं नन्दनवनमें इच्छानुसार रूप धारण करके अप्सराओंके साथ विहार करता हुआ दस लाख वर्षों तक रहा। वहाँ मुझे पवित्र गन्ध और मनोहर रूपवाले वृक्ष देखनेको मिले, जो फूलोंसे लदे हुए थे।

तत्र स्थितं मां देवसुखेषु सक्तं

कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम्।

दूतो देवानामब्रवीदुग्ररूपो

ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण॥१९

एतावन्मे विदितं राजसिंह

ततो भ्रष्टोऽहं नन्दनात् क्षीणपुण्यः ।

वाचोऽऔषं चान्तरिक्षे सुराणा-

मनुक्रोशाच्छोचतां मां नरेन्द्र । २०

अकस्माद् वै क्षीणपुण्यो ययाति:

पतत्यसौ पुण्यकृत् पुण्यकीर्तिः।

तानब्रुवं पतमानस्तदाहं

सतां मध्ये निपतेयं कथं नु॥२१

तैराख्यातां भवतां यज्ञभूमि

समीक्ष्य चैनामहमागतोऽस्मि।

हविर्गन्धैर्दर्शितां यज्ञभूमिं

धूमापाङ्गं परिगृह्य प्रतीताम्॥ २२

वहाँ रहकर मैं देवलोकके सुखोंमें आसक्त हो गया। तदनन्तर बहुत अधिक समय बीत जानेपर एक भयंकर रूपधारी देवदूत आकर मुझसे ऊँची आवाजमें तीन बार बोला-'गिर जाओ, गिर जाओ, गिर जाओ।' राजशिरोमणे! मुझे इतना ही ज्ञात हो सका है। तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं नन्दनवनसे नीचे गिर पड़ा। नरेन्द्र! उस समय मेरे लिये शोक करनेवाले देवताओंकी अन्तरिक्षमें यह दयाभरी वाणी सुनायी पड़ी-'अहो! बड़े कष्टकी बात है कि पवित्र कीर्तिवाले ये पुण्यकर्मा महाराज ययाति पुण्य क्षीण होनेके कारण नीचे गिर रहे हैं!' तब नीचे गिरते हुए मैंने उनसे पूछा-'देवताओ! मैं साधु पुरुषोंके बीच गिरूँ, इसका क्या उपाय है?' तब देवताओंने मुझे आपकी यज्ञभूमिका परिचय दिया। मैं इसीको देखता हुआ तुरंत यहाँ आ पहुँचा हूँ। यज्ञभूमिका परिचय देनेवाली हविष्यकी सुगन्धका अनुभव तथा धूम्रप्रान्तका अवलोकन कर मुझे बड़ी प्रसन्नता और सान्त्वना मिली है ॥ १४-२२ ।।

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरितेऽष्टात्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३८॥