मत्स्य महा पुराण
प्रयाग-स्थित विविध तीर्थोंका वर्णन
मार्कण्डेय उवाच
शृणु राजन् प्रयागस्य माहात्म्यं पुनरेव तु।
यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥१
मानसं नाम तीर्थं तु गङ्गाया उत्तरे तटे।
त्रिरात्रोपोषितो स्नात्वा सर्वकामानवाप्नुयात्॥२
गोभूहिरण्यदानेन यत् फलं प्राप्नुयान्नरः ।
स तत्फलमवाप्नुति तत् तीर्थं स्मरते पुनः॥३
अकामो वा सकामो वा गङ्गायां यो विपद्यते।
मृतस्तु लभते स्वर्ग नरकं च न पश्यति॥४
अप्सरोगणसंगीतैः सुप्तोऽसौ प्रतिबुद्ध्यते।
हंससारसयुक्तेन विमानेन स गच्छति।
बहुवर्षसहस्राणि स्वर्गं राजेन्द्र भुञ्जते॥५
ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।
सुवर्णमणिमुक्ताढ्ये जायते विपुले कुले॥६
षष्टितीर्थसहस्त्राणि षष्टितीर्थशतानि च।
माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायमुनसंगमम्॥७
मार्कण्डेयजीने कहा-राजन्! पुनः प्रयागका ही माहात्म्य श्रवण करो, जिसे सुनकर मनुष्य निस्संदेह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। गङ्गाके उत्तरी तटपर मानस नामक तीर्थ है, जहाँ तीन राततक निराहार रहकर निवास करनेसे मनुष्य अपनी सारी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। गौ, पृथ्वी और सुवर्ण दान करनेसे मनुष्यको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल उसे मानस-तीर्थके स्मरणसे प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य निष्कामभावसे अथवा किसी कामनाको लेकर गङ्गाकी धारामें डूबकर मर जाता है, वह स्वर्गमें चला जाता है। उसे नरकका दर्शन नहीं करना पड़ता; वह हंस और सारससे युक्त विमानपर चढ़कर देवलोकको जाता है। वहाँ वह अप्सरासमूहके सुमधुर गान-शब्दोंद्वारा नींदसे जगाया जाता है। राजेन्द्र ! इस प्रकार वह अनेकों हजार वर्षांतक स्वर्ग-सुखका उपभोग करता है। पुनः पुण्य- कर्मके क्षीण हो जानेपर जब उसका स्वर्गसे पतन हो जाता है, तब वह सुवर्ण, मणि और मोतियोंसे सम्पन्न विशाल कुलमें जन्म लेता है। माघमासमें गङ्गा- यमुनाके संगमपर छाछठ हजार तीर्थ एकत्र होते हैं।
गवां शतसहस्त्रस्य सम्यग् दत्तस्य यत् फलम्।
प्रयागे माघमासे तु त्र्यहःस्नानात्तु तत् फलम्॥ ८
गङ्गायमुनयोर्मध्ये कर्षाग्निं यस्तु साधयेत्।
अहीनाङ्गो ह्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसमन्वितः॥ ९
यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु देहिनः।
तावद् वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥१०
ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्।
स भुक्त्वा विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं स्मरते पुनः॥११
जलप्रवेशं यः कुर्यात् सङ्गमे लोकविश्रुते।
राहुग्रस्ते तथा सोमे विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः ॥ १२
सोमलोकमवाप्नोति सोमेन सह मोदते।
षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥१३
स्वर्गे च शक्रलोकेऽस्मिनृषिगन्धर्वसेविते।
परिभ्रष्टस्तु राजेन्द्र समृद्धे जायते कुले॥१४
अधःशिरास्तु यो ज्वालामूर्ध्वपादः पिबेन्नरः।
शतवर्ष सहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥१५
परिभ्रष्टस्तु राजेन्द्र सोऽग्निहोत्री भवेन्नरः ।
भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥१६
यः स्वदेहं तु कर्तित्वा शकुनिभ्यः प्रयच्छति।
विहगैरुपभुक्तस्य शृणु तस्यापि यत् फलम्॥१७
शतं वर्षसहस्त्राणां सोमलोके महीयते।
तस्मादपि परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः॥१८
गुणवान् रूपसम्पन्नो विद्वांश्च प्रियवाचकः।
भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः ।।१९
यामुने चोत्तरे कूले प्रयागस्य तु दक्षिणे।
ऋणप्रमोचनं नाम तत् तीर्थं परमं स्मृतम् ॥ २०
एकरात्रोषित: स्नात्वा ऋणैः सर्वैः प्रमुच्यते।
स्वर्गलोकमवाप्नोति ह्यनृणश्च सदा भवेत्॥ २१
इसलिये विधिपूर्वक एक लाख गौओंका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल माघमासमें प्रयाग-तीर्थमें तीन दिनतक स्नान करनेसे मिलता है। जो मनुष्य गङ्गा-यमुनाके संगमपर कर्षाग्नि (कंडा जलाकर पञ्चाग्नि)- की साधना करता है, वह सभी अङ्गोंसे सम्पन्न, नीरोग और पाँचों कर्मेन्द्रियोंसे स्वस्थ हो जाता है। उस प्राणीके अङ्गोंमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पुण्य क्षीण हो जानेपर वह स्वर्गसे च्युत होकर भूतलपर जम्बूद्वीपका अधिपति होता है और यहाँ प्रचुर भोगोंका उपभोग करके पुनः प्रयागतीर्थका स्मरण करता तथा वहाँ पहुँचता है॥१-११ ।।
राहुद्वारा चन्द्रमाको ग्रस्त कर लिये जानेपर अर्थात् चन्द्रग्रहणके अवसरपर जो मनुष्य इस लोकप्रसिद्ध संगमके जलमें प्रवेश करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सोमलोकको प्राप्त होता है और वहाँ चन्द्रमाके साथ आनन्द मनाता है। पुनः साठ हजार वर्षांतक स्वर्गलोक तथा ऋषियों एवं गन्धर्वोद्वारा सेवित इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। राजेन्द्र ! स्वर्गसे च्युत होनेपर वह समृद्ध कुलमें जन्म धारण करता है। राजेन्द्र ! जो मनुष्य प्रयागमें पैरोंको ऊपर और सिरको नीचे कर अग्निकी ज्वालाका पान करता है, वह एक लाख वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा स्वर्गसे च्युत होनेपर भूतलपर अग्निहोत्री होता है। यहाँ प्रचुर भोगोंका उपभोग कर वह पुन: प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है। जो मनुष्य प्रयागतीर्थमें अपने शरीरके मांसको काटकर पक्षियोंको खानेके लिये दे देता है, पक्षियोंद्वारा खाये गये शरीरवाले उस प्राणीको जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो। वह एक लाख वर्षोंतक सोमलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वहाँसे च्युत होनेपर वह इस लोकमें धर्मात्मा, गुणसम्पन्न, सौन्दर्यशाली, विद्वान् और प्रियभाषी राजा होता है तथा यहाँ प्रचुर भोगोंका उपभोग कर पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है। प्रयागके दक्षिण और यमुनाके उत्तर तटपर ऋणप्रमोचन नामक तीर्थ है, जो परम श्रेष्ठ कहा जाता है। वहाँ एक रात निवास कर स्नान करनेसे मनुष्य सभी ऋणोंसे मुक्त हो जाता है और सदाके लिये ऋणरहित होकर स्वर्गलोकमें चला जाता है । १२-२१॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये सप्ताधिकशततमोऽध्यायः॥१०७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्यमें एक सौ सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०७॥
Summary of chapter 107 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya narrates the sacred discourse highlighting the celestial origins and spiritual virtues of Goddess Gaṅgā and Goddess Yamunā. Bhagavān Matsya enumerates various sanctified bathing ghats and sub-tīrthas established along the banks of these holy rivers, including Haṁsaprapatana, Urvaśītīrtha, Sandhyāvaṭa, and Bhogavatī. Bathers who perform ancestral Śrāddha and offer sesame seeds and water oblations at these specific locations satisfy their ancestors for thousands of years, securing health, prosperity, and spiritual liberation for their descendants.