मत्स्य महा पुराण
शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझना और देवयानीका असंतोष
शुक्र उवाच
यः परेषां नरो नित्यमतिवादांस्तितिक्षति।
देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥१
यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा।
स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते॥२
यः समुत्पतितं क्रोधमक्रोधेन नियच्छति।
देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥३
यः समुत्पतितं कोपं क्षमयैव निरस्यति ।
यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते॥४
यस्तु भावयते धर्म योऽतिमात्रं तितिक्षति।
यस्य तप्तो न तपति भृशं सोऽर्थस्य भाजनम्॥५
यो यजेदश्वमेधेन मासि मासि शतं समाः।
यस्तु कुप्येन्न सर्वस्य तयोरक्रोधनो वरः॥६
ये कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युरचेतसः।
नैतत् प्राज्ञस्तु कुर्वीत विदुस्ते न बलाबलम्॥७
शुक्राचार्यने कहा-बेटी देवयानी! तुम इसे निश्चय जानो, जो मनुष्य सदा दूसरोंके कठोर वचन (दूसरोंद्वारा की हुई अपनी निन्दा)-को सह लेता है, उसने मानो इस सम्पूर्ण जगत्पर विजय प्राप्त कर ली। जो उभरे हुए क्रोधको घोड़ेके समान वशमें कर लेता है, वही सत्पुरुषोंद्वारा सच्चा सारथि कहा गया है। जो केवल बागडोर या लगाम पकड़कर लटकता रहता है, वह नहीं। देवयानी! जो उत्पन्न हुए क्रोधको अक्रोध (क्षमाभाव)-द्वारा मनसे निकाल देता है, समझ लो, उसने सम्पूर्ण जगत्को जीत लिया। जैसे साँप पुरानी केंचुल छोड़ता है, उसी प्रकार जो मनुष्य उभड़नेवाले क्रोधको वहीं क्षमाद्वारा त्याग देता है, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा गया है। जो श्रद्धापूर्वक धर्माचरण करता है, कड़ी-से-कड़ी निन्दा सह लेता है और दूसरेके सतानेपर भी दुःखी नहीं होता, वही सब पुरुषार्थोंका सुदृढ़ पात्र है। एक व्यक्ति, जो सौ वर्षोंतक प्रत्येक मासमें अश्वमेधयज्ञ करता जाता है और दूसरा जो किसीपर भी क्रोध नहीं करता, उन दोनोंमें क्रोध न करनेवाला ही श्रेष्ठ है। अबोध बालक और बालिकाएँ अज्ञानवश आपसमें जो वैर-विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे नादान बालक दूसरोंके बलाबलको नहीं जानते॥१-७॥
देवयान्युवाच
वेदाहं तात बालापि कार्याणां तु गतागतम्।
क्रोधे चैवातिवादे वा कार्यस्यापि बलाबले॥ ८
शिष्यस्याशिष्यवृत्तं हि न क्षन्तव्यं बुभूषुणा।
असत्संकीर्णवृत्तेषु वासो मम न रोचते॥ ९
पुंसो ये नाभिनन्दन्ति वृत्तेनाभिजनेन च।
न तेषु निवसेत् प्राज्ञः श्रेयोऽर्थी पापबुद्धिषु॥१०
ये नैनमभिजानन्ति वृत्तेनाभिजनेन च।
तेषु साधुषु वस्तव्यं स वासः श्रेष्ठ उच्यते॥११
तन्मे मनाति हृदयमग्निकल्पमिवारणिम्।
वाग्दुरुक्तं महाघोरं दुहितुर्वृषपर्वणः॥१२
न ह्यतो दुष्करं मन्ये तात लोकेष्वपि त्रिषु।
यः सपत्नश्रियं दीप्तां हीनश्री: पर्युपासते॥१३
देवयानी बोली-पिताजी! यद्यपि मैं अभी (नादान) बालिका हूँ, फिर भी धर्म-अधर्मका अन्तर समझती हूँ। क्षमा और निन्दाकी सबलता और निर्बलताका भी मुझे ज्ञान है; परंतु जो शिष्य होकर भी शिष्योचित बर्ताव नहीं करता, अपना हित चाहनेवाले गुरुको उसकी धृष्टता क्षमा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इन संकीर्ण आचार-विचारवाले दानवोंके बीच निवास करना अब मुझे अच्छा नहीं लगता। जो पुरुष दूसरोंके सदाचार और कुलकी निन्दा करते हैं, उन पापपूर्ण विचारवाले मनुष्योंमें कल्याणकी इच्छावाले विद्वान् पुरुषको नहीं रहना चाहिये। जो लोग आचार, व्यवहार अथवा कुलीनताको प्रशंसा करते हों, उन साधु पुरुषों में ही निवास करना चाहिये और वही निवास श्रेष्ठ कहा जाता है । तात! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने जो अत्यन्त भयंकर दुर्वचन कहा है, वह मेरे हृदयको ठीक उसी तरह मथ रहा है, जैसे अग्नि प्रकट करनेकी इच्छावाला पुरुष अरणीकाष्ठका मन्थन करता है। इससे बढ़कर महान् दुःखकी बात मैं तीनों लोकोंमें और कुछ नहीं मानती, जो स्वयं श्रीहीन होकर शत्रुओंकी चमकती हुई (सातिशय) लक्ष्मीकी उपासना करता है (उस दुःखी मनुष्यका तो मर जाना ही अच्छा है।) ॥८-१३॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे ययातिचरितेऽष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ययातिचरितविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥२८॥
Summary of chapter 28 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya narrates the event that transformed the life of Devayānī. While sporting in a royal pleasure garden with Śarmishṭhā, who was the daughter of the Asura King Vṛshaparvan, and her maiden companions, a strong wind disturbed their garments left by a riverbank. In their hurry to dress, Princess Śarmishṭhā inadvertently put on Devayānī's royal robe. A fiery argument ensued, wherein Devayānī boasted of her father's supreme position as guru to the Asura king, while Princess Śarmishṭhā retorted arrogantly that Devayānī's father was merely a chanting beggar dependent on her royal father's charity. In a fit of rage, Princess Śarmishṭhā pushed Devayānī into a dry well and returned to the palace, believing her to be dead.