रोहिणीचन्द्रशयन-व्रतकी  विधि और उसका माहात्म्य

नारद उवाच

दीर्घायुरारोग्यकुलाभिवृद्धि-

युक्तः पुमान् भूपकुलान्वितः स्यात्।

मुहुर्मुहुर्जन्मनि येन सम्यग्

व्रतं समाचक्ष्व तदिन्दुमौले॥ १

श्रीभगवानुवाच

त्वया पृष्टमिदं सम्यगुक्तं चाक्षय्यकारकम्।

रहस्यं तव वक्ष्यामि यत्पुराणविदो विदुः॥ २

रोहिणीचन्द्रशयनं नाम व्रतमिहोत्तमम्।

तस्मिन् नारायणस्या_मर्चयेदिन्दुनामभिः॥ ३

यदा सोमदिने शुक्ला भवेत् पञ्चदशी क्वचित्।

अथवा ब्रह्मनक्षत्रं पौर्णमास्यां प्रजायते॥ ४

तदा स्नानं नरः कुर्यात् पञ्चगव्येन सर्षपैः।

आप्यायस्वेति च जपेद् विद्वानष्ट शतं पुनः॥ ५

शूद्रोऽपि परया भक्त्या पाखण्डालापवर्जितः।

सोमाय वरदायाथ विष्णवे च नमो नमः॥ ६

कृतजप्यः स्वभवनमागत्य मधुसूदनम्।

पूजयेत् फलपुष्पैश्च सोमनामानि कीर्तयन्॥ ७

सोमाय शान्ताय नमोऽस्तुपादा-

वनन्तधाम्नेति च जानुजचे।

ऊरुद्वयं चापि जलोदराय

सम्पूजयेन्मेमनन्तबाहोः॥ ८

नमो नमः कामसुखप्रदाय

कटिः शशाङ्कस्य सदार्चनीया।

अथोदरं चाप्यमृतोदराय

नाभिः शशाङ्काय नमोऽभिपूज्या॥ ९

नमोऽस्तु चन्द्राय प्रपूज्य कण्ठं

दन्ता द्विजानामधिपाय पूज्याः।

आस्यं नमश्चन्द्रमसेऽभिपूज्य-

मोष्ठौ कुमुद्वन्तवनप्रियाय॥१०

नारदजीने पूछा-चन्द्रभाल! जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य प्रत्येक जन्ममें दीर्घायु, नीरोगता, कुलीनता और अभ्युदयसे युक्त हो राजाके कुलमें जन्म पाता है, उस व्रतका सम्यक् प्रकारसे वर्णन कीजिये॥१॥

श्रीभगवान्ने कहा-नारद! तुमने बड़ी उत्तम बात पूछी है। अब मैं तुम्हें वह गोपनीय व्रत बतलाता हूँ, जो अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है तथा जिसे पुराणवेत्ता विद्वान् ही जानते हैं। इस लोकमें 'रोहिणीचन्द्रशयन' नामक व्रत बड़ा ही उत्तम है। इसमें चन्द्रमाके नामोंद्वारा भगवान् नारायणकी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये। जब कभी सोमवारके दिन पूर्णिमा-तिथि हो अथवा पूर्णिमाको रोहिणीनक्षत्र हो, उस दिन मनुष्य सबेरे पञ्चगव्य और सरसोंके दानोंसे युक्त जलसे स्नान करे तथा विद्वान् पुरुष आप्यायस्व०' इत्यादि मन्त्रको एक सौ आठ बार जपे। यदि शूद्र भी इस व्रतको करे तो अत्यन्त भक्तिपूर्वक 'सोमाय नमः', 'वरदाय नमः', 'विष्णवे नम:'-इन मन्त्रोंका जप करे और पाखण्डियों-विधर्मियोंसे बातचीत न करे। जप करनेके पश्चात् अपने घर आकर फल- फूल आदिके द्वारा भगवान् श्रीमधुसूदनकी पूजा करे। साथ ही चन्द्रमाके नामोंका उच्चारण करता रहे। सोमाय नमः' से भगवान्के दक्षिण चरण और 'शान्ताय नमः से वाम चरणका, 'अनन्तधाम्ने नमः' का उच्चारण करके उनके घुटनों और पिंडलियोंका, 'जलोदराय नमः' से दोनों जाँघोंका और 'अनन्तबाहवे नमः' से जननेन्द्रियका पूजन करे। 'कामसुखप्रदाय नमो नमः' से चन्द्रस्वरूप भगवान्के कटिभागकी सदा अर्चना करनी चाहिये। इसी प्रकार 'अमृतोदराय नमः' से उदरका और 'शशाङ्काय नमः' से नाभिका पूजन करे। 'चन्द्राय नमोऽस्तु' से कण्ठका और 'द्विजानामधिपाय नमः' से दाँतोंका पूजन करना चाहिये। 'चन्द्रमसे नमः' से मुँहका पूजन करे। 'कुमुद्वन्तवनप्रियाय नमः' से

नासा च नाथाय  वनौषधीना-

मानन्दबीजाय पुनर्भुवौ च।

नेत्रद्वयं पद्मनिभं तथेन्दो-

रिन्दीवरव्यासकराय शौरेः॥११

समस्ताध्वरवन्दिताय

कर्णद्वयं दैत्यनिषूदनाय

ललाटमिन्दोरुदधिप्रियाय

केशाः सुषुम्नाधिपतेः प्रपूज्याः॥१२

शिरः शशाङ्काय नमो मुरारे-

विश्वेश्वरायेति नमः किरीटिने।

नमः श्रियै रोहिणिनामलक्ष्म्यै

सौभाग्यसौख्यामृतसागरायै ॥१३

देवीं च सम्पूज्य सुगन्धपुष्पै-

नैवेद्यधूपादिभिरिन्दुपत्नीम्

सुप्त्वाथ भूमौ पुनरुत्थितेन

स्नात्वा च विप्राय हविष्ययुक्तः॥१४

दद्यात् प्रभाते सहिरण्यवारि-

कुम्भं नमः पापविनाशनाय।

सम्प्राश्य गोमूत्रममांसमन्न-

मक्षारमष्टावथ विंशतिं च।

ग्रासान् पयःसर्पियुतानुपोष्य

भुक्त्वेतिहासं शृणुयान्मुहूर्तम्॥१५

कदम्बनीलोत्पलकेतकानि

जाती सरोजं शतपत्रिका च।

अम्लानकुब्जान्यथ सिन्धुवारं

पुष्पं पुनर्नारद मल्लिकायाः।

शुभ्रं च विष्णोः करवीरपुष्पं

श्रीचम्पकं चन्द्रमसे प्रदेयम्॥१६

श्रावणादिषु मासेषु क्रमादेतानि सर्वदा।

यस्मिन् मासे व्रतादिः स्यात् तत्पुष्पैरर्चयेद्धरिम्॥१७

एवं संवत्सरं यावदुपास्य विधिवन्नरः।

व्रतान्ते शयनं दद्याद् दर्पणोपस्करान्वितम्॥१८

रोहिणीचन्द्रमिथुनं कारयित्वाथ काञ्चनम्।

चन्द्रः षडङ्गुलः कार्यो रोहिणी चतुरङ्गुला॥१९

ओठोंका, 'वनौषधीनां नाथाय नमः' से नासिकाका, आनन्दबीजाय नमः' से दोनों भौंहोंका, 'इन्दीवरव्यासकराय नमः' से चन्द्रस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके कमल-सदृश दोनों नेत्रोंका, 'समस्ताध्वरवन्दिताय दैत्यनिषूदनाय नमः' से दोनों कानोंका, 'उदधिप्रियाय नमः' से चन्द्रमाके ललाटका, 'सुषुम्नाधिपतये नमः' से केशोंका पूजन करे। शशाङ्काय नमः' से मस्तकका और 'विश्वेश्वराय नमः' से भगवान् मुरारिके किरीटका पूजन करे। फिर रोहिणिनामलक्ष्म्यै सौभाग्यसौख्यामृतसागराय पद्मश्रियै नमः'-रोहिणी नाम धारण करनेवाली सौभाग्य और सुखरूप अमृतके समुद्र लक्ष्मीको नमस्कार है-इस मन्त्रका उच्चारण कर सुगन्धित पुष्प, नैवेद्य और धूप आदिके द्वारा इन्दुपत्नी रोहिणीदेवीका पूजन करे॥ २१३३ ॥

इसके बाद रात्रिके समय भूमिपर शयन करे और सबेरे उठकर स्नानके पश्चात् 'पापविनाशाय नमः' का उच्चारण करके ब्राह्मणको घृत और सुवर्णसहित जलसे भरा कलश दान करे। फिर दिनभर उपवास करनेके पश्चात् गोमूत्र पीकर मांसवर्जित एवं खारे नमकसे रहित अन्नके अट्ठाईस ग्रास, दूध और घीके साथ भोजन करे। तदनन्तर दो घड़ीतक इतिहास, पुराण आदिका श्रवण करे। नारद! चन्द्रस्वरूप भगवान् विष्णुको कदम्ब, नील कमल, केवड़ा, जाती-पुष्प, कमल, शतपत्रिका, बिना कुम्हलाये कुब्जके फूल, सिन्दुवार, चमेली, अन्यान्य श्वेत पुष्प, करवीर-पुष्प तथा चम्पा-ये ही फूल चढ़ाने चाहिये। उपर्युक्त फूलोंकी जातियोंमेंसे एक-एकको श्रावण आदि महीनोंमें क्रमश: अर्पण करे। जिस महीनेमें व्रत बारम्भ किया जाय, उस समय जो भी पुष्प सुलभ हों, उन्हींके द्वारा श्रीहरिका पूजन करना चाहिये॥१४-१७॥

इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतका विधिवत् अनुष्ठान करके समाप्तिके समय व्रतीको चाहिये कि वह दर्पण तथा शयनोपयोगी सामग्रियोंके साथ शय्यादान करे। रोहिणी और चन्द्रमा-दोनोंकी सुवर्णमयी मूर्ति बनवाये। उनमें चन्द्रमा छ: अङ्गुलके और रोहिणी चार अङ्गुलकी होनी चाहिये।

मुक्ताफलाष्टकयुतं सितनेत्रपटावृतम्।

क्षीरकुम्भोपरि पुनः कांस्यपात्राक्षतान्वितम्।

दद्यान्मन्त्रेण पूर्वाह्ने शालीक्षुफलसंयुतम्॥२०

श्वेतामथ सुवर्णास्यां खुरै रौप्यैः समन्विताम्।

सवस्त्रभाजनां धेनुं तथा शङ्ख च शोभनम्॥ २१

भूषणैर्द्विजदाम्पत्यमलङ्कृत्य गुणान्वितम्।

चन्द्रोऽयं द्विजरूपेण सभार्य इति कल्पयेत्॥ २२

यथा न रोहिणी कृष्ण शय्यां सन्त्यज्य गच्छति।

सोमरूपस्य ते तद्वन्ममाभेदोऽस्तु भूतिभिः॥२३

यथा त्वमेव सर्वेषां परमानन्दमुक्तिदः।

भुक्तिर्मुक्तिस्तथा भक्तिस्त्वयि चन्द्रास्तु ते सदा॥२४

इति संसारभीतस्य मुक्तिकामस्य चानघ।

रूपारोग्यायुषामेतद्विधायकमनुत्तमम् ॥२५

इदमेव पितॄणां च सर्वदा वल्लभं मुने।

त्रैलोक्याधिपतिर्भूत्वा सप्तकल्पशतत्रयम्।

चन्द्रलोकमवाप्नोति विद्युद् भूत्वा विमुच्यते॥ २६

नारी वा रोहिणीचन्द्रशयनं या समाचरेत्।

सापि तत्फलमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ २७

इति पठति शृणोति वा य इत्थं

मधुमथनार्चनमिन्दुकीर्तने नित्यम्।

मतिमपि ददाति सोऽपि

शौरेभवनगतः परिपूज्यतेऽमरौधैः॥ २८

आठ मोतियोंसे युक्त तथा दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित उन प्रतिमाओंको अक्षतसे भरे हुए काँसेके पात्रमें रखकर दुग्धपूर्ण कलशके ऊपर स्थापित कर दे और पूर्वाह्नके समय अगहनी चावल, ईंख और फलके साथ उसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक दान कर दे। फिर जिसका मुख (थूथुन) सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों, ऐसी वस्त्र और दोहिनीके साथ दूध देनेवाली श्वेत रंगकी गौ तथा सुन्दर शङ्ख प्रस्तुत करे। फिर उत्तम गुणोंसे युक्त ब्राह्मण-दम्पतिको बुलाकर उन्हें आभूषणोंसे अलङ्कृत करे तथा मनमें यह भावना रखे कि ब्राह्मण-दम्पतिके रूपमें ये रोहिणीसहित चन्द्रमा ही विराजमान हैं। तत्पश्चात् इनकी इस प्रकार प्रार्थना करे-'श्रीकृष्ण! जिस प्रकार रोहिणी देवी चन्द्रस्वरूप आपकी शय्याको छोड़कर अन्यत्र नहीं जाती हैं, उसी तरह मेरा भी इन विभूतियोंसे कभी विछोह न हो। चन्द्रदेव! आप ही सबको परम आनन्द और मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं। आपकी कृपासे मुझे भोग और मोक्ष-दोनों प्राप्त हों तथा आपमें मेरी सदा अनन्य भक्ति बनी रहे।' (इस प्रकार विनय कर शय्या, प्रतिमा तथा धेनु आदि सब कुछ ब्राह्मणको दान कर दे।) ॥१८-२४॥

निष्पाप नारद! जो संसारसे भयभीत होकर मोक्ष पानेकी इच्छा रखता है, उसके लिये यही एक व्रत सर्वोत्तम है। यह रूप, आरोग्य और आयु प्रदान करनेवाला है। मुने! यही पितरोंको सर्वदा प्रिय है। जो पुरुष इसका अनुष्ठान करता है, वह त्रिभुवनका अधिपति होकर इक्कीस सौ कल्पोंतक चन्द्रलोकमें निवास करता है। उसके बाद विद्युत् होकर मुक्त हो जाता है। अथवा जो स्त्री इस रोहिणीचन्द्रशयन नामक व्रतका अनुष्ठान करती है, वह भी उसी पूर्वोक्त फलको प्राप्त होती है। साथ ही वह आवागमनसे मुक्त हो जाती है। चन्द्रमाके नामकीर्तनद्वारा भगवान् श्रीमधुसूदनकी पूजाका यह प्रसङ्ग जो नित्य पढ़ता अथवा सुनता है, उसे भगवान् उत्तम बुद्धि प्रदान करते हैं तथा वह भगवान् श्रीविष्णुके धाममें जाकर देवसमूहके द्वारा पूजित होता है॥ २५-२८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे रोहिणीचन्द्रशयनव्रतं नाम सप्तपञ्चाशोऽध्यायः॥५७॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें रोहिणीचन्द्रशयन-व्रत नामक सत्तावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५७॥