पूरुवंशी नरेशोंका विस्तृत इतिहास

सूत उवाच

अजमीढस्य नीलिन्यां नीलः समभवन्नृपः।

नीलस्य तपसोग्रेण सुशान्तिरुदपद्यत॥ १

पुरुजानुः सुशान्तेस्तु पृथुस्तु पुरुजानुतः ।

भद्राश्वः पृथुदायादो भद्राश्वतनयाञ्छृणु॥ २

मुद्गलश्च जयश्चैव राजा बृहदिषुस्तथा।

जवीनरश्च विक्रान्तः कपिलश्चैव पञ्चमः॥ ३

पञ्चानां चैव पञ्चालानेताञ्जनपदान् विदुः ।

पञ्चालरक्षिणो ह्येते देशानामिति नः श्रुतम्॥ ४

मुद्गलस्यापि मौद्गल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः।

एते ह्यङ्गिरसः पक्षं संश्रिताः काण्वमुद्गलाः॥ ५

मुद्गलस्य सुतो जज्ञे ब्रह्मिष्ठः सुमहायशाः।

इन्द्रसेनः सुतस्तस्य विन्ध्याश्वस्तस्य चात्मजः॥ ६

विन्ध्याश्वान्मिथुनं जज्ञे मेनकायामिति श्रुतिः।

दिवोदासश्च राजर्षिरहल्या च यशस्विनी॥ ७

शरद्वतस्तु दायादमहल्या सम्प्रसूयत

शतानन्दमृषिश्रेष्ठं तस्यापि सुमहातपाः॥ ८

सुतः सत्यधृतिर्नाम धनुर्वेदस्य पारगः।

आसीत् सत्यधृतेः शुक्रममोघं धार्मिकस्य तु॥ ९

स्कन्नं रेतः सत्यधृतेर्दृष्ट्वा चाप्सरसं जले।

मिथुनं तत्र सम्भूतं तस्मिन् सरसि सम्भृतम्॥१०

ततः सरसि तस्मिंस्तु क्रममाणं महीपतिः।

दृष्ट्वा जग्राह कृपया शन्तनुर्मंगयां गतः॥११

एते शरद्वतः पुत्रा आख्याता गौतमा वराः।

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दिवोदासस्य वै प्रजाः॥१२

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! अजमीढकी नीलिनी नामकी पत्नीके गर्भसे राजा नीलको जन्म हुआ। नीलकी उग्र तपस्याके परिणामस्वरूप सुशान्तिकी उत्पत्ति हुई। सुशान्तिसे पुरुजानुका और पुरुजानुसे पृथुका जन्म हुआ। पृथुका पुत्र भद्राश्व हुआ। अब भद्राश्वके पुत्रोंके विषयमें सुनिये-मुद्गल, जय, राजा बृहदिषु, पराक्रमी जवीनर और पाँचवाँ कपिल-ये पाँचों भद्राश्वके पुत्र थे। इन पाँचोंके द्वारा शासित जनपद पञ्चाल' नामसे प्रसिद्ध हुए। ये सभी पञ्चाल देशोंके रक्षक थे-ऐसा हमलोगोंने सुना है। मुद्गलके पुत्रगण, जो क्षत्रियांशसे युक्त द्विजाति थे, मौद्गल्य नामसे प्रसिद्ध हुए। ये कण्व और मुद्गलके गोत्रमें उत्पन्न होनेवाले द्विजाति अङ्गिराके पक्षमें सम्मिलित हो गये। महायशस्वी ब्रह्मिष्ठने मुद्गलके पुत्ररूपमें जन्म लिया। उसका पुत्र इन्द्रसेन और उसका पुत्र विन्ध्याश्व हुआ। विन्ध्याश्वके संयोगसे मेनकाके गर्भसे जुड़वीं संतान उत्पन्न हुई थी-ऐसा सुना जाता है। उनमें एक तो राजर्षि दिवोदास थे और दूसरी यशस्विनी अहल्या थी। अहल्याने शरद्वान् गौतमके पुत्र ऋषिश्रेष्ठ शतानन्दको उत्पन्न किया था। शतानन्दका पुत्र महातपस्वी एवं धनुर्वेदका पारंगत विद्वान् सत्यधृति हुआ। धर्मात्मा सत्यधृतिका वीर्य अमोघ था। एक बार एक अप्सराको देखकर सत्यधृतिका वीर्य (सरोवरमें स्नान करते समय) जलमें स्खलित हो गया। उस वीर्यसे उस सरोवरमें जुड़वीं संतान उत्पन्न हो गयी। वे उसी सरोवरमें पल रहे थे। एक बार महाराज शंतनु शिकारके लिये निकले हुए थे। वे उस सरोवरमें घूमते हुए उन बच्चोंको देखकर कृपा-परवश हो उन्हें उठा लाये। इस प्रकार मैंने शरद्वान्के उन पुत्रोंका जो गौतम (गोत्र) नामसे विख्यात हैं, वर्णन कर दिया। अब इसके आगे दिवोदासकी संततिका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनिये॥ १-१२॥

१. यह नील राजाकी चर्चा गत अध्यायके अन्तमें ७८ वें श्लोकमें भी है। ये उनसे भिन्न हैं।

२. यह रुहेलखण्ड है, जो दिल्लीसे पूर्व गङ्गाके उत्तर तथा दक्षिणमें चम्बल नदीके तटतक फैला है। ये दक्षिण और उत्तर पञ्चालके नामसे प्रसिद्ध हैं। उत्तर पञ्चालकी राजधानी अहिच्छत्र (रामनगर) तथा दक्षिण पञ्चालकी राजधानी कम्पिल और माकंद थी। (द्रष्टव्य- महाभारत आदि० १४०, उद्योग० १९३, गर्गसंहिता १३९ आदि) गौतमबुद्धके समय उत्तर पञ्चालकी राजधानी कन्नौज भी रहा। राइस् डैविड्स। 'Buddhist India'

दिवोदासस्य दायादो धर्मिष्ठो मित्रयुर्नृपः।

मैत्रायणावर: सोऽथ मैत्रेयस्तु ततः स्मृतः ॥१३

एते वंश्या यतेः पक्षाः क्षत्रोपेतास्तु भार्गवाः ।

राजा चैद्यवरो नाम मैत्रेयस्य सुतः स्मृतः॥१४

अथ चैद्यवराद् विद्वान् सुदासस्तस्य चात्मजः ।

अजमीढः पुनर्जातः क्षीणे वंशे तु सोमकः॥१५

सोमकस्य सुतो जन्तुर्हते तस्मिशतं बभौ।

पुत्राणामजमीढस्य सोमकस्य महात्मनः॥१६

महिषी त्वजमीढस्य धूमिनी पुत्रवर्धिनी।

पुत्राभावे तपस्तेपे शतं वर्षाणि दुश्चरम्॥१७

हुत्वाग्निं विधिवत् सम्यक् पवित्रीकृतभोजना।

अग्निहोत्रक्रमेणैव सा सुष्वाप महाव्रता॥१८

तस्यां वै धूमवर्णायामजमीढः समीयिवान्।

ऋक्षं सा जनयामास धूमवर्णं शताग्रजम्॥ १९

ऋक्षात् संवरणो जज्ञे कुरुः संवरणात् ततः।

यः प्रयागमतिक्रम्य कुरुक्षेत्रमकल्पयत्॥२०

कृष्यतस्तु महाराजो वर्षाणि सुबहून्यथ।

कृष्यमाणस्ततः शक्रो भयात् तस्मै वरं ददौ॥२१

पुण्यं च रमणीयं च कुरुक्षेत्रं तु तत् स्मृतम्।

तस्यान्ववायः सुमहान् यस्य नाम्ना तु कौरवाः॥२२

कुरोस्तु दयिताः पुत्राः सुधन्वा जहुरेव च।

परीक्षिच्च महातेजाः प्रजनश्चारिमर्दनः ॥ २३

सुधन्वनस्तु दायादः पुत्रो मतिमतां वरः।

च्यवनस्तस्य पुत्रस्तु राजा धर्मार्थतत्त्ववित्॥२४

च्यवनस्य कृमिः पुत्र ऋक्षाजज्ञे महातपाः।

कृमेः पुत्रो महावीर्यः ख्यातस्त्विन्द्रसमो विभुः॥ २५

चैद्योपरिचरो वीरो वसुर्नामान्तरिक्षगः।

चैद्योपरिचराजज्ञे गिरिका सप्त वै सुतान्॥ २६

दिवोदासका ज्येष्ठ पुत्र धर्मिष्ठ राजा मित्रयु हुआ। तत्पश्चात् उससे छोटे मैत्रायण और उसके बाद मैत्रेयकी उत्पत्ति हुई। ये सभी पुत्र (ययातिके भाई) यतिके पक्षके थे और क्षत्रियांशसे युक्त भार्गव (भृगुवंशी) कहलाते थे। राजा चैद्यवर मैत्रेयके पुत्र कहे जाते हैं। चैद्यवरसे विद्वान् सुदासका जन्म हुआ। वंशके नष्ट हो जानेपर पुनः अजमीढ सुदासके पुत्र-रूपमें उत्पन्न हुए। इन्हींका दूसरा नाम सोमक भी है। सोमकका पुत्र जन्तु हुआ। उसके मारे जानेपर महात्मा अजमीढ सोमकके सौ पुत्र हुए। अजमीढकी धूमिनी नामकी पत्नी थी, जो पुत्रोंकी वृद्धि करनेवाली थी। जन्तुके मारे जानेसे पुत्रका अभाव हो जानेपर वह सौ वर्षोंतक दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गयी। एक समय भलीभाँति पवित्र किये हुए पदार्थोंको ही भोजन करनेवाली महान् व्रतपरायणा धूमिनी अग्निहोत्रके क्रमसे विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके नींदके वशीभूत हो गयी। निरन्तर अग्निहोत्र करनेके कारण उसके शरीरका रंग धूमिल पड़ गया था। उसी समय अजमीढने उसमें गर्भाधान किया। उस गर्भसे धूमिनीने ऋक्ष नामक पुत्रको जन्म दिया, जो अपने सौ भाइयोंमें ज्येष्ठ था तथा जिसके शरीरका रंग धूम-वर्णका था। ऋक्षसे संवरणकी और संवरणसे कुरुकी उत्पत्ति हुई, जिन्होंने प्रयागका अतिक्रमण कर कुरुक्षेत्रकी तीर्थरूपमें कल्पना की थी। महाराज कुरु अनेकों वर्षोंतक इस कुरुक्षेत्रको अपने हाथों जोतते रहे। उन्हें इस प्रकार जोतते देखकर इन्द्रने भयभीत हो उन्हें वर प्रदान किया। इसी कारण कुरुक्षेत्र पुण्यप्रद और रमणीय क्षेत्र कहा जाता है। उन महाराज कुरुका वंश अत्यन्त विशाल था, जो उन्हींके नामसे (आगे चलकर) कौरव कहलाया ॥१३-२२ ।।

कुरुके सुधन्वा, जळु, महातेजस्वी परीक्षित् और शत्रुविनाशक प्रजन-ये चार परम प्रिय पुत्र हुए। सुधन्वाका पुत्र राजा च्यवन हुआ, जो बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ एवं धर्म और अर्थके तत्त्वका ज्ञाता था। च्यवनका पुत्र कृमि हुआ, जो ऋक्षसे उत्पन्न हुआ था। (इन्हीं) कृमिके पुत्र महापराक्रमी चैद्योपरिचर वसु हुए। वे प्रभावशाली, शूरवीर, इन्द्रके समान विख्यात और (सदा विमानद्वारा) आकाशमें गमन करनेवाले थे। चैद्योपरिचरके संयोगसे गिरिकाने सात

महारथो मगधराड् विश्रुतो यो बृहद्रथः।

प्रत्यश्रवाः कुशश्चैव चतुर्थो हरिवाहनः ॥२७

पञ्चमश्च यजुश्चैव मत्स्यः काली च सप्तमी।

बृहद्रथस्य दायादः कुशाग्रो नाम विश्रुतः॥ २८

कुशाग्रस्यात्मजश्चैव वृषभो नाम वीर्यवान्।

वृषभस्य तु दायादः पुण्यवान् नाम पार्थिवः॥ २९

पुण्यः पुण्यवतश्चैव राजा सत्यधृतिस्ततः।

दायादस्तस्य धनुषस्तस्मात् सर्वश्च जज्ञिवान्॥३०

सर्वस्य सम्भवः पुत्रस्तस्माद् राजा बृहद्रथः ।

द्वे तस्य शकले जाते जरया संधितश्च सः ।।३१

जरया संधितो यस्माज्जरासंधस्ततः स्मृतः।

जेता सर्वस्य क्षत्रस्य जरासंधो महाबलः ।। ३२

जरासंधस्य पुत्रस्तु सहदेवः प्रतापवान्।

सहदेवात्मजः श्रीमान् सोमवित् स महातपाः॥३३

श्रुतश्रवास्तु सोमाद् वै मागधाः परिकीर्तिताः।

जह्वस्त्वजनयत् पुत्रं सुरथं नाम भूमिपम्॥३४

सुरथस्य तु दायादो वीरो राजा विदूरथः।

विदूरथसुतश्चापि सार्वभौम इति स्मृतः॥३५

सार्वभौमाज्जयत्सेनो रुचिरस्तस्य चात्मजः।

रुचिरस्य सुतो भौमस्त्वरितायुस्ततोऽभवत्॥३६

अक्रोधनस्त्वायुसुतस्तस्माद् देवातिथिः स्मृतः।

देवातिथेस्तु दायादो दक्ष एव बभूव ह॥३७

भीमसेनस्ततो दक्षाद् दिलीपस्तस्य चात्मजः ।

दिलीपस्य प्रतीपस्तु तस्य पुत्रास्त्रयः स्मृताः॥ ३८

देवापिः शंतनुश्चैव बाह्लीकश्चैव ते त्रयः।

बाह्लीकस्य तु दायादाः सप्त बाह्लीश्वरा नृपाः।

देवापिस्तु ह्यपध्यातः प्रजाभिरभवन्मुनिः॥ ३९

ऋषय ऊचुः

प्रजाभिस्तु किमर्थं वै ह्यपध्यातो जनेश्वरः।

को दोषो राजपुत्रस्य प्रजाभिः समुदाहृतः ॥ ४०

सूत उवाच

किलासीद् राजपुत्रस्तु कुष्ठी तं नाभ्यपूजयन्।

भविष्यं कीर्तयिष्यामि शंतनोस्तु निबोधत ॥ ४१

संतानोंको जन्म दिया। इनमें पहला महारथी मगधराज था, जो बृहद्रथ नामसे विख्यात हुआ। उसके बाद दूसरा प्रत्यश्रवा, तीसरा कुश, चौथा हरिवाहन, पाँचवाँ यजुष् और छठा मत्स्य नामसे प्रसिद्ध हुआ। सातवीं संतान काली नामकी कन्या थी। बृहद्रथका पुत्र कुशाग्र नामसे विख्यात हुआ। कुशाग्रका पुत्र पराक्रमी वृषभ हुआ। वृषभका पुत्र राजा पुण्यवान् था। पुण्यवान्से पुण्य और उससे राजा सत्यधृतिका जन्म हुआ। उसका पुत्र धनुष हुआ और उससे सर्वकी उत्पत्ति हुई। सर्वका पुत्र सम्भव हुआ और उससे राजा बृहद्रथका जन्म हुआ। बृहद्रथका पुत्र दो टुकड़ेके रूपमें उत्पन्न हुआ, जिन्हें जरानामकी राक्षसीने जोड़ दिया था। जराद्वारा जोड़ दिये जानेके कारण वह जरासंध नामसे विख्यात हुआ। महाबली जरासंध अपने समयके समस्त क्षत्रियोंका विजेता था।जरासंधका पुत्र प्रतापी सहदेव हुआ। सहदेवका पुत्र लक्ष्मीवान् एवं महातपस्वी सोमवित् हुआ। सोमवित्से श्रुतश्रवाकी उत्पत्ति हुई। (मगधपर शासन करनेके कारण) ये सभी नरेश मागध नामसे विख्यात हुए ॥२३–३३३ ॥

जहुने सुरथ नामक भूपालको पुत्ररूपमें जन्म दिया। सुरथका पुत्र वीरवर राजा विदूरथ हुआ। विदूरथका पुत्र सार्वभौम कहा गया है। सार्वभौमसे जयत्सेन उत्पन्न हुआ और उसका पुत्र रुचिर हुआ। रुचिरसे भौमका और उससे त्वरितायुका जन्म हुआ। त्वरितायुका पुत्र अक्रोधन और उससे देवातिथिकी उत्पत्ति बतलायी जाती है। देवातिथिका एकमात्र पुत्र दक्ष ही था। दक्षसे भीमसेनका जन्म हुआ और उसका पुत्र (पुरुवंशी) दिलीप तथा दिलीपका पुत्र प्रतीप हुआ। प्रतीपके तीन पुत्र कहे जाते हैं, ये तीनों देवापि, शंतनु और बाह्रीक हैं। बाह्रीकके सात पुत्र थे, जो सभी राजा थे और बाह्रीक (बल्ख) देशके अधीश्वर थे। देवापिको प्रजाओंने दोषी ठहरा दिया था; इसलिये वह राजपाट छोड़कर मुनि हो गया ॥३४-३९ ॥

ऋषियोंने पूछा-सूतजी! प्रजाओंने राजा देवापिको किस कारण दोषी ठहराया था? तथा प्रजाओंने उस राजकुमारका कौन-सा दोष प्रकट किया था? ॥ ४०॥

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! राजकुमार देवापि कुष्ठ- रोगी था, इसीलिये प्रजाओंने उसका आदर-सत्कार नहीं किया। अब मैं शंतनुके भविष्यका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनिये।

शंतनुस्त्वभवद् राजा विद्वान् स वै महाभिषक् ।

इदं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं प्रति महाभिषम्॥४२

यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं रोगिणमेव च।

पुनर्युवा स भवति तस्मात् तं शंतनुं विदुः॥ ४३

तत् तस्य शंतनुत्वं हि प्रजाभिरिह कीर्त्यते।

ततोऽवृणुत भार्यार्थं शंतनुर्जाह्नवीं नृपः॥ ४४

तस्यां देवव्रतं नाम कुमारं जनयद् विभुः।

काली विचित्रवीर्यं तु दाशेयी जनयत् सुतम्॥ ४५

शंतनोदयितं पुत्रं शान्तात्मानमकल्मषम्।

कृष्णद्वैपायनो नाम क्षेत्रे वैचित्रवीर्यके ॥ ४६

धृतराष्ट्रं च पाण्डं च विदुरं चाप्यजीजनत् ।

धृतराष्ट्रस्तु गान्धार्यां पुत्रानजनयच्छतम्॥४७

तेषां दुर्योधनः श्रेष्ठः सर्वक्षत्रस्य वै प्रभुः।

माद्री कुन्ती तथा चैव पाण्डो र्ये बभूवतुः॥ ४८

देवदत्ताः सुताः पञ्च पाण्डोरर्थेऽभिजज्ञिरे।

धर्माद् युधिष्ठिरो जज्ञे मारुताच्च वृकोदरः॥४९

इन्द्राद् धनञ्जयश्चैव इन्द्रतुल्यपराक्रमः।

नकुलं सहदेवं च माद्र्यश्विभ्यामजीजनत्॥५०

पञ्चैते पाण्डवेभ्यस्तु द्रौपद्यां जज्ञिरे सुताः।

द्रौपद्यजनयच्छ्रेष्ठं प्रतिविन्ध्यं युधिष्ठिरात्॥५१

श्रुतसेनं भीमसेनाच्छुतकीर्तिं धनञ्जयात्।

चतुर्थ श्रुतकर्माणं सहदेवादजायत॥५२

नकुलाच्च शतानीकं द्रौपदेयाः प्रकीर्तिताः।

तेभ्योऽपरे पाण्डवेयाः षडेवान्ये महारथाः ।।५३

हैडम्बो भीमसेनात् तु पुत्रो जज्ञे घटोत्कचः।

काशी बलधराद् भीमाज्जज्ञे वै सर्वगं सुतम्॥५४

सुहोत्रं तनयं माद्री सहदेवादसूयत।

करेणुमत्यां चैद्यायां निरमित्रस्तु नाकुलिः॥५५

 (देवापिके वन चले जानेपर) शंतनु राजा हुए। ये विद्वान् तो थे ही, साथ ही महान् वैद्य भी थे। इनकी महावैद्यताके प्रति लोग एक श्लोक कहा करते हैं, जिसका आशय यह है कि 'महाराज शंतनु जिस-जिस रोगी अथवा वृद्धको अपने हाथोंसे स्पर्श कर लेते थे, वह पुनः नौजवान हो जाता था। इसी कारण लोग उन्हें शंतनु कहते थे।' उस समय प्रजागण उनके इस शंतनुत्व (रोगी और वृद्धको युवा बना देनेवाले) गुणका ही वर्णन करते थे। तदनन्तर प्रभावशाली राजा शंतनुने जहु-नन्दिनी गङ्गाको अपनी पत्नीके रूपमें वरण किया और उनके गर्भसे देवव्रत (भीष्म) नामक कुमारको पैदा किया। दाश-कन्या काली सत्यवतीने शंतनुके संयोगसे विचित्रवीर्य नामक पुत्रको जन्म दिया, जो पिताके लिये परम प्रिय, शान्तात्मा और निष्पाप था। महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यासने विचित्रवीर्यके क्षेत्रमें धृतराष्ट्र और पाण्डुको तथा (दासीसे) विदुरको उत्पन्न किया था। धृतराष्ट्रने गान्धारीके गर्भसे सौ पुत्रोंको उत्पन्न किया, उनमें दुर्योधन सबसे श्रेष्ठ था और वह सम्पूर्ण क्षत्रिय-वंशका स्वामी था। इसी प्रकार पाण्डुकी कुन्ती और माद्री नामकी दो पत्रियाँ हुईं। इन्हीं दोनोंके गर्भसे महाराज पाण्डुकी वंश-वृद्धिके लिये देवताओंद्वारा प्रदान किये गये पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। कुन्तीने धर्मके संयोगसे युधिष्ठिरको, वायुके संयोगसे वृकोदर (भीमसेन)-को और इन्द्रके संयोगसे इन्द्रसरीखे पराक्रमी धनञ्जय (अर्जुन)-को जन्म दिया। इसी प्रकार माद्रीने अश्विनीकुमारोंके संयोगसे नकुल और सहदेवको पैदा किया॥४१-५०॥

इन पाँचों पाण्डवोंके संयोगसे द्रौपदीके गर्भसे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें द्रौपदीने युधिष्ठिरके संयोगसे ज्येष्ठ पुत्र प्रतिविन्ध्यको, भीमसेनके संयोगसे श्रुतसेनको और अर्जुनके संयोगसे श्रुतकीर्तिको जन्म दिया था। चौथा पुत्र श्रुतकर्मा सहदेवसे और शतानीक नकुलसे उत्पन्न किया था। ये पाँचों द्रौपदेय अर्थात् द्रौपदीके पुत्र कहलाये। इनके अतिरिक्त पाण्डवोंके छः अन्य महारथी पुत्र भी थे। (उनका विवरण इस प्रकार है-) भीमसेनके संयोगसे हिडिम्बा नामकी राक्षसीके गर्भसे घटोत्कच नामक पुत्रका जन्म हुआ था। उनकी दूसरी पत्नी काशीने बलवान् भीमसेनके संयोगसे सर्वग नामक पुत्रको जन्म दिया था। मद्रराज-कुमारी सहदेव-पत्रीने सहदेवके संयोगसे सुहोत्र नामक पुत्रको पैदा किया था। नकुल-पुत्र निरमित्र चेदिराज-कुमारी करेणुमतीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था।

सुभद्रायां रथी पार्थादभिमन्युरजायत।

यौधेयं देवकी चैव पुत्रं जज्ञे युधिष्ठिरात्॥५६

अभिमन्योः परीक्षित् तु पुत्रः परपुरञ्जयः।

जनमेजयः परीक्षितः पुत्रः परमधार्मिकः॥ ५७

ब्रह्माणं कल्पयामास स वै वाजसनेयकम्।

स वैशम्पायनेनैव शप्तः किल महर्षिणा॥५८

न स्थास्यतीह दुर्बुद्धे तवैतद् वचनं भुवि।

यावत् स्थास्यसि त्वं लोके तावदेव प्रपत्स्यति॥५९

क्षत्रस्य विजयं ज्ञात्वा ततः प्रभृति सर्वशः।

अभिगम्य स्थिताश्चैव नृपं च जनमेजयम्॥६०

ततः प्रभृति शापेन क्षत्रियस्य तु याजिनः ।

उत्सन्ना याजिनो यज्ञे ततः प्रभृति सर्वशः॥६१

क्षत्रस्य याजिनः केचिच्छापात् तस्य महात्मनः।

पौर्णमासेन हविषा इष्ट्वा तस्मिन् प्रजापतिम्।

स वैशम्पायनेनैव प्रविशन् वारितस्ततः॥६२

परीक्षितः सुतोऽसौ वै पौरवो जनमेजयः।

द्विरश्वमेधमाहृत्य महावाजसनेयकः॥६३

प्रवर्तयित्वा तं सर्वमृषिं वाजसनेयकम्।

विवादे ब्राह्मणैः सार्धमभिशप्तो वनं ययौ॥६४

जनमेजयाच्छतानीकस्तस्माज्जज्ञे स वीर्यवान्।

जनमेजयः शतानीकं पुत्रं राज्येऽभिषिक्तवान्॥६५

अथाश्वमेधेन ततः शतानीकस्य वीर्यवान्।

जज्ञेऽधिसीमकृष्णाख्यः साम्प्रतं यो महायशाः॥६६

तस्मिशासति राष्टं तु युष्माभिरिदमाहृतम्।

दुरापं दीर्घसत्रं वै त्रीणि वर्षाणि पुष्करे।

वर्षद्वयं कुरुक्षेत्रे दृषद्वत्यां द्विजोत्तमाः॥६७

ऋषय ऊचुः

भविष्यं श्रोतुमिच्छामः प्रजानां लोमहर्षणे।

पुरा किल यदेतद् वै व्यतीतं कीर्तितं त्वया॥ ६८

पृथा-पुत्र अर्जुनके संयोगसे सुभद्राके गर्भसे महारथी अभिमन्यु पैदा हुआ था। युधिष्ठिर-पत्नी देवकीने युधिष्ठिरके संयोगसे यौधेय नामक पुत्रको जन्म दिया था। अभिमन्युके पुत्र शत्रुओंकी नगरीको जीतनेवाले परीक्षित् हुए। परीक्षित्के पुत्र परम धर्मात्मा जनमेजय (तृतीय) हुए॥५१-५७॥

जनमेजयने अपने यज्ञमें वाजसनेय (शुक्लयजुर्वेदके आचार्य) ऋषिको ब्रह्माके पदपर नियुक्त किया। यह देखकर वैशम्पायन (कृष्णयजुर्वेदके आचार्य)-ने उन्हें शाप देते हुए कहा-'दुर्बुद्धे ! तुम्हारा यह (नवीन) वचन अर्थात् (संहिता-ग्रन्थ) भूतलपर स्थायी नहीं हो सकेगा। जबतक तुम लोकमें जीवित रहोगे, तभीतक यह भी ठहर सकेगा।' तभीसे क्षत्रियजातिकी विजय जानकर बहुत-से लोग चारों ओरसे (शुक्लयजुर्वेदके प्रवर्धक) राजा जनमेजयके पास आकर रहने लगे। परंतु महात्मा वैशम्पायनके शापके कारण उस यज्ञमें बहुत-से यज्ञानुष्ठान करनेवाले क्षत्रिय तथा कुछ याजक भी नष्ट हो गये। तब उस यज्ञमें जब जनमेजय पौर्णमास हविद्वारा ब्रह्माका यजन कर यज्ञशालामें प्रवेश करनेके लिये प्रयत्नशील हुए, उसी समय महर्षि वैशम्पायनने उन्हें भीतर जानेसे रोक दिया। तदनन्तर परीक्षित्पुत्र पूरुवंशी जनमेजयने दो अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उनमें उन्होंने अपने द्वारा प्रवर्तित महावाजसनेय (शौक्लयाजुष) विधिका ही प्रयोग किया। वह सारा कार्य वाजसनेय ऋषिकी अध्यक्षतामें ही सम्पन्न हो रहा था। उसी समय ब्राह्मणोंके साथ विवाद हो जानेपर ब्राह्मणोंने उन्हें शाप दे दिया, जिससे वे वनमें चले गये।* उन जनमेजयसे पराक्रमी शतानीकका जन्म हुआ। जनमेजयने (वन-गमन करते समय) अपने पुत्र शतानीकको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया था। शतानीकद्वारा अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किये जानेपर उसके फलस्वरूप शतानीकके एक महायशस्वी एवं पराक्रमी अधिसीमकृष्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो इस (पुराणप्रवचनके) समय सिंहासनासीन है। द्विजवरो! उसीके राज्यशासन करते समय आपलोगोंने अभी-अभी पुष्करक्षेत्रमें तीन वर्षोंतक तथा कुरुक्षेत्रमें दृषद्वतीके तटपर दो वर्षोंतक इस दुर्लभ दीर्घ सत्रका अनुष्ठान सम्पन्न किया है।५८-६७॥

ऋषियोंने पूछा-लोमहर्षणके पुत्र सूतजी! पूर्वकालमें जो बातें बीत चुकी हैं, उनका वर्णन तो आपने कर दिया। अब हमलोग प्रजाओंके भविष्यके विषयमें सुनना चाहते हैं।

*द्रष्टव्य-हरिवंशपु०, भविष्यपु०, अ०५ ।

येषु वै स्थास्यते क्षत्रमुत्पत्स्यन्ते नृपाश्च ये।

तेषामायुःप्रमाणं च नामतश्चैव तान् नृपान्॥६९

कृतयुगप्रमाणं त्रेताद्वापरयोस्तथा।

कलियुगप्रमाणं च युगदोषं युगक्षयम्॥७०

सुखदुःखप्रमाणं च प्रजादोषं युगस्य तु।

एतत् सर्वं प्रसंख्याय पृच्छतां ब्रूहि नः प्रभो॥७१

सूत उवाच

यथा मे कीर्तितं पूर्वं व्यासेनाक्लिष्टकर्मणा।

भाव्यं कलियुगं चैव तथा मन्वन्तराणि च॥७२

अनागतानि सर्वाणि ब्रुवतो मे निबोधत।

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि भविष्या ये नृपास्तथा॥७३

ऐडेक्ष्वाक्वान्वये चैव पौरवे चान्वये तथा।

येषु संस्थास्यते तच्च ऐडेक्ष्वाकुकुलं शुभम्।

तान् सर्वान् कीर्तयिष्यामि भविष्ये कथितान् नृपान्॥७४

तेभ्योऽपरेऽपि ये त्वन्ये ह्युत्पत्स्यन्ते नृपाः पुनः ।

क्षत्राः पारशवाः शूद्रास्तथान्ये ये बहिश्चराः॥७५

अन्धाः शकाः पुलिन्दाश्च चूलिका यवनास्तथा।

कैवर्ताभीरशबरा ये चान्ये म्लेच्छसम्भवाः।

पर्यायतः प्रवक्ष्यामि नामतश्चैव तान् नृपान्॥७६

अधिसीमकृष्णश्चैतेषां प्रथमं वर्तते नृपः।

तस्यान्ववाये वक्ष्यामि भविष्ये कथितान् नृपान्॥७७

अधिसीमकृष्णपुत्रस्तु विवक्षुर्भविता नृपः।

गङ्गया तु हृते तस्मिन् नगरे नागसाह्वये॥७८

त्यक्त्वा विवक्षुर्नगरं कौशाम्ब्यां तु निवत्स्यति।

भविष्याष्टौ सुतास्तस्य महाबलपराक्रमाः॥७९

भूरियेष्ठः सुतस्तस्य तस्य चित्ररथः स्मृतः।

शुचिद्रवश्चित्ररथाद् वृष्णिमांश्च शुचिद्रवात्॥८०

वृष्णिमतः सुषेणश्च भविष्यति शुचिर्नृपः।

तस्मात् सुषेणाद्भविता सुनीथो नाम पार्थिवः॥८१

नृपात् सुनीथाद् भविता नृचक्षुः सुमहायशाः।

नृचक्षुषस्तु दायादो भविता वै सुखीबलः॥८२

सुखीबलसुतश्चापि भावी राजा परिष्णवः।

परिष्णवसुतश्चापि भविता सुतपा नृपः॥८३

मेधावी तस्य दायादो भविष्यति न संशयः।

मेधाविनः सुतश्चापि भविष्यति पुरञ्जयः॥८४

यह क्षत्रिय-जाति जिन-जिन वंशोंमें स्थित रहेगी और उनमें जो-जो नरेश उत्पन्न होंगे, उनके क्या नाम होंगे तथा उनकी आयुका प्रमाण कितना होगा? कृतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग-इन चारों युगोंकी कितनी-कितनी अवधि होगी? प्रत्येक युगमें क्या-क्या दोष होंगे? तथा उन युगोंका विनाश कैसे होगा? सुख और दुःखका प्रमाण क्या होगा? तथा प्रत्येक युगकी प्रजाओंमें क्या-क्या दोष उत्पन्न होंगे? प्रभो! यह सब क्रमशः हमें बतलाइये; क्योंकि हमलोग इसे जानना चाहते हैं॥ ६८-७१ ॥

सूतजी कहते हैं- ऋषियो! पूर्वकालमें अक्लिष्टकर्मा व्यासजीने मुझसे भावी कलियुग तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरोंके विषयमें जैसा वर्णन किया था, वही मैं आपलोगोंको बतला रहा हूँ: सुनिये। इसके बाद अब मैं उन्हीं राजाओंका वर्णन करने जा रहा हूँ, जो भविष्यमें ऐड (ऐल) और इक्ष्वाकुके वंशमें तथा पौरववंशमें उत्पन्न होनेवाले हैं। जिन राजाओंमें ये मङ्गलमय ऐड और इक्ष्वाकुवंश स्थित रहेंगे, भविष्यमें होनेवाले उन सभी तथाकथित नरेशोंका मैं वर्णन करूँगा। इनके अतिरिक्त भी जो अन्य नृपतिगण क्षत्रिय, पारशव, शूद्र, बहिश्चर, अंध, शक, पुलिन्द, चूलिक, यवन, कैवर्त, आभीर और शबर जातियोंमें उत्पन्न होंगे तथा दूसरे जो म्लेच्छ-जातियोंमें पैदा होंगे, उन सभी नरेशोंका पर्याय क्रमसे नामनिर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ। इन सबमें सर्वप्रथम राजा अधिसोमकृष्ण हैं, जो सम्प्रति वर्तमान हैं। इनके वंशमें भविष्यमें उत्पन्न होनेवाले राजाओंका वर्णन कर रहा हूँ। अधिसीमकृष्णका पुत्र राजा विवक्षु होगा। गङ्गाद्वारा हस्तिनापुर नगरके डुबो (बहा) दिये जानेपर विवक्षु उस नगरका परित्याग कर कौशाम्बी नगरीमें निवास करेगा। उसके महान् बलपराक्रमसे सम्पन्न आठ पुत्र होंगे। उसका ज्येष्ठ पुत्र भूरि होगा और उसका पुत्र चित्ररथ नामसे विख्यात होगा। चित्ररथसे शुचिद्रव, शुचिद्रवसे वृष्णिमान् और वृष्णिमान्से परम पवित्र राजा सुषेण उत्पन्न होगा। उस सुषेणसे सुनीथ नामका राजा होगा। राजा सुनीथसे महायशस्वी नृचक्षुकी उत्पत्ति होगी। नृचक्षुका पुत्र सुखीबल होगा। सुखीबलका पुत्र भावी राजा परिष्णव और परिष्णवका पुत्र राजा सुतपा होगा। उसका पुत्र निस्संदेह मेधावी होगा। मेधावीका पुत्र पुरञ्जय होगा।

उर्वो भाव्यः सुतस्तस्य तिग्मात्मा तस्य चात्मजः।

तिग्माद् बृहद्रथो भाव्यो वसुदामा बृहद्रथात्॥८५

वसुदाम्नः शतानीको भविष्योदयनस्ततः।

भविष्यते चोदयनाद् वीरो राजा वहीनरः॥८६

वहीनरात्मजश्चैव दण्डपाणिर्भविष्यति।

दण्डपाणेर्निरमित्रो निरमित्रात्तु क्षेमकः॥ ८७

अत्रानुवंशश्लोकोऽयं गीतो विप्रैः पुरातनैः।

ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशो देवर्षिसत्कृतः।

क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थास्यति कलौ युगे॥८८

इत्येष पौरवो वंशो यथावदिह कीर्तितः।

धीमतः पाण्डुपुत्रस्य चार्जुनस्य महात्मनः॥८९

उसका भावी पुत्र उर्व और उसका पुत्र तिग्मात्मा होगा। तिग्मात्मासे बृहद्रथ और बृहद्रथसे वसुदामाका जन्म होगा। वसुदामासे शतानीक और उससे उदयनकी उत्पत्ति होगी। उदयनसे वीरवर राजा वहीनर उत्पन्न होगा। वहीनरका पुत्र दण्डपाणि होगा। दण्डपाणिसे निरमित्र और निरमित्रसे क्षेमकका जन्म होगा। इस वंशपरम्पराके विषयमें प्राचीनकालिक विप्रोद्वारा एक श्लोक गाया गया है, जिसका आशय यह है कि ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी योनिस्वरूप यह वंश, जो देवर्षियोंद्वारा सत्कृत है, कलियुगमें राजा क्षेमकको प्राप्त कर समाप्त हो जायगा।' इस प्रकार पुरु-वंशका तथा पाण्डुपुत्र परम बुद्धिमान् महात्मा अर्जुनके वंशका वर्णन मैंने यथार्थरूपसे कर दिया॥७२-८९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे पुरुवंशानुकीर्तनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥५०

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें पूरुवंशानुकीर्तन नामक पचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥५०॥