मत्स्यावतार-कथा-प्रसंग

स्रुतिनि हित हरि मच्छ रूप धारयौ।सदा ही भक्त-संकट निवास्यौ॥

चतुरमुख कह्यौ, सँख असुर स्रुति लै गयो, सत्यब्रत कह्यौ परलय दिखायौ।

भक्त-बत्सल, कृपाकरन, असरन-सरन, मत्स्यकौ रूप तब धारि आयौ।।

स्नान करि अंजली जल जबै नृप लियौ, मत्स्य जौ देखि कह्यो डारि दीजै।

मत्स्य कह्यौ, मैं गही आइ तुम्हरी सरन, करि कृपा मोहिं अब राखि लीजै॥

नृप सुनत बचन, चकित प्रथम है रह्यौ, कह्यौ, मछ बचन किहिं भाँति भाष्यौ।

पुनि कमंडल धस्यौ, तहाँ सो बढि गयौ, कुंभ धरि बहुरि पुनि माट राख्यौ।

पुनि धस्यौ खाड़, तालाब मैं पुनि धर्यो, नदी मैं बहुरि पुनि डारि दीन्हौ।

बहुरि जब बढ़ि गयौ, सिंधु तब लै• गयौ, तहाँ हरि-रूप नृप चीन्हि लीन्हौ।

कह्यौ करि बिनय तुम ब्रह्म जो अनंत हौ, मत्स्यको रूप किहिं काज कीन्हौ।

बेद-बिधि चहत, प्रलय देखन कहत, तुम दुहुँनि हेत अवतार लीन्हौ॥

कबहुँ बाराह, नरसिंह कबहूँ भयौ, कबहुँ मैं कच्छकौ लीन्हौ।

कबहुँ भयौ राम, बसुदेव-सुत कबहुँ भयौ, और बहु रूप हित-भक्त कीन्हौ।

सातवें दिवस दिखराइहौं प्रलय तोहिं सप्त-रिषि नाव मैं बैठि

तोहिं बैठारिहों नावमैं हाथ गहि, बहुरि हम ज्ञान तोहिं कहि सुनावै॥

इक आइहै बहुरि तुम्हरे निकट, ताहि सौं मम सुंग बाँधौ।

यहै कहि भए अंतरधान तब मत्स्य प्रभु, बहुरि नृप आपनौ कर्म साधौ॥

सातवें दिवस आयौ निकट जलधि जब, नृप कह्यौ अब कहाँ नाव पावै।

आइ गइ नाव, रिषिन तासौं कह्यौ, हम नृपति तुमकौं बचावै॥

पुनि कयौ, मत्स्य हरि अब कहाँ पाइय, रिषिन कह्यौ, ध्यान चित माहिं धारौ।

मत्स्य अरु सर्प तिहिं ठौर परगट भए, बाँधि नृप नाव यौं कहि उचारौ॥

ज्यौं महाराज या जलधितैं पार कियौ, भव-जलधि पार त्यों करो स्वामी।

अहं-ममता हमैं सदा लागी रहै, मोह-मद-क्रोध-जुत मंद कामी।।

कर्म सुख-हित करत, होत तहँ दुःख नित, तऊ नर मूढ नाहीं सँभारत।

करन-कारन महराज हैं आप हो,  ध्यान प्रभुको न मन माहिं धारत॥

बिन तुम्हारी कृपा गति नहीं नरनिकी, जानि मोहिं आपनौ कृपा कीजै।

जनम अरु मरनमैं सदा दुःखित देहु मोहिं ज्ञान जिहिं सदा जीजै॥

मत्स्य भगवान कह्यौ ज्ञान पुनि नृपति सौं, भयो सो पुरान सब जगत जान्यौ।

लह्यो नृप ज्ञान, कह्यौ आँखि अब मीचि तू, मत्स्य कह्यौ सो नृपति मान्यौ॥

आँखिकौं खोलि जब नृपति देख्यौ बहुरि, कह्यौ, हरि प्रलय-माया दिखाई।

कह्यौ जो ज्ञान भगवान, सो आनि उर, नृपति निज आपु इहिं बिधि बिताई॥

बहुरि सँखासुरहि मारि, बेद आनि दिए, चतुरमुख बिबिध अस्तुति सुनाई।

सूरके प्रभूकी नित्य लीला नई, सकै कहि कौन, यह कछुक गाई।।

                                                                                                            ('सूरदास' १६। ४४३)