मत्स्य महा पुराण
त्रिपुर-दाहका वृत्तान्त
मार्कण्डेय उवाच
यन्मां पृच्छसि कौन्तेय तन्मे कथयतः शृणु।
एतस्मिन्नन्तरे रुद्रो नर्मदातटमास्थितः॥ १
नाम्ना माहेश्वरं स्थानं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।
तस्मिन् स्थाने महादेवोऽचिन्तयत् त्रिपुरक्षयम्॥ २
गाण्डीवं मन्दरं कृत्वा गुणं कृत्वा च वासुकिम्।
स्थानं कृत्वा तु वैशाखं विष्णुं कृत्वा शरोत्तमम्॥ ३
शल्ये चाग्निं प्रतिष्ठाप्य पुढे वायुं समर्पयत्।
हयांश्च चतुरो वेदान् सर्वदेवमयं रथम्॥ ४
अभीषवोऽश्विनौ देवावक्षो वज्रधरः स्वयम्।
स तस्याज्ञां समादाय तोरणे धनदः स्थितः॥ ५
यमस्तु दक्षिणे हस्ते वामे कालस्तु दारुणः।
चक्रे त्वमरकोट्यस्तु गन्धर्वा लोकविश्रुताः॥ ६
प्रजापतिरथ श्रेष्ठो ब्रह्मा चैव तु सारथिः।
एवं कृत्वा तु देवेशः सर्वदेवमयं रथम्॥ ७
सोऽतिष्ठत् स्थाणुभूतस्तु सहस्रपरिवत्सरान्।
यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षे स्थितानि वै॥ ८
त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तदा तानि व्यभेदयत्।
शरः प्रचोदितस्तेन रुद्रेण त्रिपुरं प्रति॥ ९
भ्रष्टतेजाः स्त्रियो जाता बलं तासां व्यशीर्यत।
उत्पाताश्च पुरे तस्मिन् प्रादुर्भूताः सहस्रशः॥१०
त्रिपुरस्य विनाशाय कालरूपाभवंस्तदा।
अट्टहासं प्रमुञ्चन्ति हयाः काष्ठमयास्तदा ॥११
निमेषोन्मेषणं चैव कुर्वन्ति चित्ररूपिणः।
स्वप्ने पश्यन्ति चात्मानं रक्ताम्बरविभूषितम्॥ १२
स्वप्ने तु सर्वे पश्यन्ति विपरीतानि यानि तु।
एतान् पश्यन्ति उत्पातांस्तत्र स्थाने तु ये जनाः॥१३
मार्कण्डेयजीने कहा-कुन्तीनन्दन! आपने जो मुझसे पूछा है, उसे मैं कह रहा हूँ, सुनिये! इसी बीच रुद्रदेव नर्मदा-तटपर आये। वहाँ जो तीनों लोकोंमें विख्यात माहेश्वर नामक स्थान है, उस स्थानपर बैठकर महादेव त्रिपुर-संहारके विषयमें सोचने लगे। उन्होंने मन्दराचलको गाण्डीव धनुष, वासुकि सर्पको धनुषकी प्रत्यञ्चा, कार्तिकेयको तरकस, विष्णुको श्रेष्ठ बाण, बाणके अग्रभागमें अग्निको और पुच्छ भागमें वायुको प्रतिष्ठित करके चारों वेदोंको घोड़ा बनाया। इस प्रकार उन्होंने सर्वदेवमय रथका निर्माण किया। दोनों अश्विनीकुमारोंको वागडोर और रथकी धुरीके रूपमें साक्षात् वज्रधारी इन्द्रको नियुक्त किया। उनकी आज्ञाको स्वीकार कर कुबेर तोरणके स्थानपर स्थित हुए। दाहिने हाथपर यम और बायें हाथपर भयंकर काल स्थित हुए। करोड़ों देवगण और लोकविश्रुत गन्धर्वगण रथके चक्के हुए तथा श्रेष्ठ प्रजापति ब्रह्मा सारथि बने। इस प्रकार शिवजी सर्वदेवमय रथका निर्माण कर उसपर स्थाणुरूपमें एक हजार वर्षांतक स्थित रहे। जब तीनों पुर अन्तरिक्षमें एक साथ सम्मिलित हुए, तब उन्होंने तीन पर्वोवाले तीन बाणोंसे उनका भेदन किया। जिस समय भगवान् रुद्रने उस बाणको त्रिपुरके ऊपर चलाया, उस समय वहाँकी स्त्रियाँ तेजोहीन हो गयीं और उनका पातिव्रत्य-बल नष्ट हो गया तथा उस नगरमें हजारों प्रकारके उपद्रव उत्पन्न होने लगे॥ १-१०॥
उस समय वे स्त्रियाँ भी त्रिपुर-नाशके लिये कालस्वरूप हो गयीं। काष्ठमय घोड़े अट्टहास करने लगे। चित्ररूपमें निर्मित जीव आँखको खोलने और बंद करने लगे। वहाँके निवासी स्वप्नमें अपनेको लाल वस्त्रसे अलंकृत देखने लगे। उन्हें स्वप्नमें सभी वस्तुएँ विपरीत दिखायी पड़ने लगीं। वे इस प्रकार इन उत्पातोंको देखने
तेषां बलं च बुद्धिश्च हरकोपेन नाशिते।
ततः सांवर्तको वायुयुगान्तप्रतिमो महान्॥१४
समीरितोऽनलस्तेन उत्तमानेन धावति।
ज्वलन्ति पादपास्तत्र पतन्ति शिखराणि च॥१५
सर्वतो व्याकुलीभूतं हाहाकारमचेतनम्।
भग्नोद्यानानि सर्वाणि क्षिप्रं तत् प्रत्यभज्यत॥१६
तेनैव पीडितं सर्वं ज्वलितं त्रिशिखैः शरैः।
द्रुमाश्चारामखण्डानि गृहाणि विविधानि च ॥१७
दशदिक्षु प्रवृत्तोऽयं समृद्धो हव्यवाहनः ।
मनःशिलापुञ्जनिभो दिशो दश विभागशः॥१८
शिखाशतैरनेकैस्तु प्रजज्वाल हुताशनः ।
सर्वं किंशुकवर्णाभं ज्वलितं दृश्यते पुरम्॥ १९
गृहाद् गृहान्तरं नैव गन्तुं धूमेन शक्यते।
हरकोपानलैर्दग्धं क्रन्दमानं सुदुःखितम्॥२०
प्रदीप्तं सर्वतो दिक्षु दह्यते त्रिपुरं पुरम्।
प्रासादशिखराग्राणि व्यशीर्यन्त सहस्रशः॥२१
नानामणिविचित्राणि विमानान्यप्यनेकधा।
गृहाणि चैव रम्याणि दह्यन्ते दीप्तवह्निना ॥ २२
धावन्ति द्रुमखण्डेषु वलभीषु तथा जनाः।
देवागारेषु सर्वेषु प्रज्वलन्तः प्रधाविताः॥२३
क्रन्दन्ति चानलप्लुष्टा रुदन्ति विविधैः स्वरैः ।
गिरिकूटनिभास्तत्र दृश्यन्तेऽङ्गारराशयः॥ २४
गजाश्च गिरिकूटाभा दह्यमाना यतस्ततः।
स्तुवन्ति देवदेवेशं परित्रायस्व नः प्रभो।
अन्योऽन्यं च परिष्वज्य हुताशनप्रधर्षिताः ॥ २५
स्नेहात् प्रदह्यमानाश्च तथैव वलयंगताः।
दह्यन्ते दानवास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः॥ २६
हंसकारण्डवाकीर्णा नलिन्यः सहपङ्कजाः।
दृश्यन्तेऽनलदग्धानि पुरोद्यानानि दीपिकाः॥२७
अम्लानपङ्कजच्छन्ना विस्तीर्णा योजनायताः।
गिरिकूटनिभास्तत्र प्रासादा रत्नभूषिताः ॥ २८
पतन्त्यनलनिर्दग्धा निस्तोया जलदा इव।
वरस्त्रीबालवृद्धेषु गोषु पक्षिषु वाजिषु॥२९
लगे। शंकरजीके कोपसे उनके बल और बुद्धि नष्ट हो गये। तदनन्तर प्रलयकालके समान प्रचण्ड सांवर्तक वायु बहने लगा। वायुसे प्रेरित आगकी भयंकर लपटें भी इधर-उधर व्याप्त होने लगीं। जिससे वहाँ वृक्ष-समूह जलने लगे और पर्वतके शिखर गिरने लगे। सभी ओर लोग व्याकुल होकर चेतनारहित हो गये। चतुर्दिक् भयंकर हाहाकार मच गया। सभी उद्यान नष्ट हो गये। वहाँ सब कुछ शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गया। शंकरजीद्वारा सभी दुःखमग्न कर दिये गये। तीन शिखाओंवाले बाणोंसे वृक्ष, वाटिकाएँ और विविध प्रासाद जलने लगे। यह प्रदीप्त अग्नि दसों दिशाओंमें फैल गया। उस समय दसों दिशाएँ मैनशिलसमूहके समान दीखने लगीं। अग्निदेव अनेकों प्रकारकी सैकड़ों शिखाओंसे युक्त प्रज्वलित हो उठे, जिससे जला हुआ वह सम्पूर्ण त्रिपुर पलाशपुष्पके समान लाल रंगका दिखायी पड़ रहा था॥११-१९॥
उस समय धुएँके कारण एक घरसे दूसरे घरमें जाना सम्भव नहीं था। सभी लोग शंकरजीकी क्रोधाग्निसे जलते हुए अत्यन्त दु:खके कारण चीत्कार कर रहे थे। इस प्रकार सभी दिशाओंमें धधकता हुआ त्रिपुरनगर जल रहा था। राजभवनोंके शिखरोंके अग्रभाग हजारों टुकड़ोंमें टूटकर गिर रहे थे। विविध मणियोंसे जटित अनेकों विमान और रमणीय घर उद्दीप्त आगसे जल रहे थे। वहाँक निवासी वृक्षोंके समूहोंमें, घरोंके छज्जोंके नीचे तथा सभी देवगृहोंमें जलते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे। आगकी चपेटमें आकर वे सभी विविध स्वरोंमें क्रन्दन कर रहे थे। वहाँ पर्वतशिखरके समान अङ्गारसमूह दिखायी दे रहे थे। पर्वतशिखरके समान विशाल गजराज इधर-उधर जल रहे थे। सभी देवाधिदेव शंकरकी यों स्तुति कर रहे थे-'प्रभो! हमलोगोंकी रक्षा कीजिये।' वे अग्निसे जलते हुए स्नेहके कारण एक-दूसरेका आलिङ्गन कर उसी प्रकार जलते हुए नष्ट हो रहे थे। इस प्रकार वहाँ सैकड़ों-हजारों दानव जल रहे थे॥ २०-२६ ॥
हंसों और बतखोंसे परिपूर्ण एवं कमलोंसे युक्त पुष्करिणी, बगीचे तथा बावलियाँ, जो एक योजन लम्बी-चौड़ी और खिले हुए कमलोंसे व्याप्त थीं, अग्निसे जलती हुई दिखायी दे रही थीं। वहाँ रत्नोंसे विभूषित पर्वतशिखरके समान राजभवन अग्निके द्वारा भस्म होकर गिर रहे थे। वे जलशून्य मेघके समान दिखायी दे रहे थे। शंकरजीके क्रोधसे प्रेरित अग्नि श्रेष्ठ स्त्री, बालक, वृद्ध, गौ, पक्षी
निर्दयो व्यदहद् वह्निर्हरक्रोधेन प्रेरितः।
सहस्रशः प्रबुद्धाश्च सुप्ताश्च बहवो जनाः॥३०
पुत्रमालिङ्गय ते गाढं दह्यन्ते त्रिपुराग्निना।
निदाघोऽभून्महावर्तेरन्तकालो यथा तथा॥ ३१
केचिद् गुप्ताः प्रदग्धास्तु भार्योत्सङ्गगतास्तथा।
पित्रा मात्रा च सुश्लिष्टा दग्धास्वे त्रिपुराग्निना॥३२
अथ तस्मिन् पुरे दीप्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः॥३३
अग्निज्वालाहतास्तत्र ह्यपतन् धरणीतले।
काचिच्छ्यामा विशालाक्षी मुक्तावलिविभूषिता॥ ३४
धूमेनाकुलिता सा तु पतिता धरणीतले।
काचित् कनकवर्णाभा इन्द्रनीलविभूषिता॥ ३५
भर्तारं पतितं दृष्टा पतिता तस्य चोपरि।
काचिदादित्यसङ्काशा प्रसुप्ता च गृहे स्थिता॥३६
अग्निज्वालाहता सा तु पतिता गतचेतना।
उत्थितो दानवस्तत्र खड्गहस्तो महाबलः ।। ३७
वैश्वानरहतः सोऽपि पतितो धरणीतले।
मेघवर्णापरा नारी हारकेयूरभूषिता॥ ३८
श्वेतवस्त्रपरीधाना बालं स्तन्यं न्यधापयत्।
दह्यन्तं बालकं दृष्ट्वा रुदती मेघशब्दवत्॥ ३९
एवं स तु दहन्नग्निर्हरक्रोधेन प्रेरितः।
काचिच्चन्द्रप्रभा सौम्या वज्रवैडूर्यभूषिता॥४०
सुतमालिङ्गय वेपन्ती दग्धा पतति भूतले।
काचित् कुन्देन्दुवार्णाभा क्रीडन्ती स्वगृहे स्थिता॥ ४१
गृहे प्रज्वलिते सा तु प्रतिबुद्धा शिखार्दिता।
पश्यन्ती ज्वलितं सर्वं हा सुतो मे कथं गतः॥४२
सुतं संदग्धमालिङ्गय पतिता धरणीतले।
आदित्योदयवर्णाभा लक्ष्मीवदनशोभना॥४३
त्वरिता दह्यमाना सा पतिता धरणीतले।
काचित् सुवर्णवर्णाभा नीलरत्नैर्विभूषिता॥४४
और घोड़ोंमें फैलकर निर्दयतापूर्वक जला रहे थे। हजारों जागे हुए एवं अनेकों सोये हुए व्यक्ति, जो पुत्रका गाढ़ आलिङ्गन किये हुए थे, त्रिपुराग्निसे जल रहे थे। वहाँ प्रचण्ड अग्निके कारण प्रलयकालीन संताप परिव्याप्त था। उस त्रिपुराग्निसे कुछ लोग पत्नीकी गोदमें छिपे हुए ही भस्म हो गये तो कुछ लोग माँ-बापसे चिपके हुए ही जलकर भस्मसात् हो गये। उस प्रज्वलित त्रिपुरमें अप्सराओंके समान सुन्दरी स्त्रियाँ अग्निकी ज्वालाओंसे झुलसकर पृथ्वीपर गिर रही थीं। कोई मोतीकी मालाओंसे अलंकृत विशाल नेत्रोंवाली षोडशवर्षीया नायिका धूएँसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। कोई इन्द्रनील मणिसे अलंकृत स्वर्णके समान कान्तिवाली स्त्री पतिको गिरा हुआ देखकर उसीके ऊपर गिर पड़ी। कोई सूर्यके समान तेजस्विनी नारी घरमें ही स्थित रहकर सो रही थी, वह अग्निकी ज्वालासे चेतनारहित होकर धराशायी हो गयी। उसी समय अतिशय बलशाली एक दानव हाथमें तलवार लेकर उठ खड़ा हुआ, किंतु अग्निसे जलकर वह भी पृथ्वीपर गिर पड़ा। मेघके समान श्यामवर्णकी दूसरी स्त्री, जो हार और केयूरसे अलंकृत तथा श्वेतवस्त्र पहने हुए अपने दुधमुंहे बच्चेको सुलाये हुए थी, वह उस बच्चेको जलते हुए देखकर मेघके शब्दके समान रोने लगी। इस प्रकार शंकरजीके कोपसे प्रेरित वह अग्नि त्रिपुरको जला रही थी॥ २७–३९३ ॥
कोई चन्द्रके समान कान्तिवाली एवं हीरक और वैदूर्यसे अलंकृत सज्जन नायिका अपने पुत्रको गोदमें लेकर काँपती हुई जलकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। कोई कुन्द-पुष्प एवं चन्द्रमाके समान कान्तिवाली स्त्री क्रीडा करती हुई अपने घरमें ही सो रही थी, वह घरके जलनेपर अग्निशिखासे पीड़ित हो जाग उठी और सबको जलता हुआ देखकर 'हा! मेरा पुत्र कहाँ चला गया?' ऐसा कहती हुई जलते हुए पुत्रका आलिङ्गन कर पृथ्वीपर गिर पड़ी। उदयकालीन सूर्यके समान कान्तिसे युक्त एवं लक्ष्मीके मुखके समान शोभायमान मुखवाली कोई स्त्री भागती हुई जलकर पृथ्वीपर गिर गयी। कोई स्वर्णके समान कान्तिवाली नीलरत्नोंसे अलंकृत स्त्री
धूमेनाकुलिता सा तु प्रसुप्ता धरणीतले।
अन्या गृहीतहस्ता तु सखि दह्यति बालिका ।। ४५
अनेकदिव्यरत्नाढ्या दृष्ट्वा दहनमोहिता।
शिरसि ह्यञ्जलिं कृत्वा विज्ञापयति पावकम्॥४६
भगवन् यदि वैरं ते पुरुषेष्वपकारिषु।
स्त्रियः किमपराध्यन्ते गृहपञ्जरकोकिलाः॥ ४७
पाप निर्दय निर्लज्ज कस्ते कोपः स्त्रियः प्रति।
न दाक्षिण्यं न ते लज्जा न सत्यं शौर्यवर्जितः॥४८
अनेन ह्यपसर्गेण तूपालम्भं शिखिन्यदात्।
किं त्वया न श्रुतं लोके ह्यवध्या: शत्रुयोषितः ।। ४९
किंतु तुभ्यं गुणा ह्येते दहनोत्सादनं प्रति।
न कारुण्यं भयं वापि दाक्षिण्यं न स्त्रियः प्रति॥५०
दयां कुर्वन्ति म्लेच्छापि दहन्तीं वीक्ष्य योषितम्।
म्लेच्छानामपि कष्टोऽसि दुर्निवारो ह्यचेतनः॥५१
एते चैव गुणास्तुभ्यं दहनोत्सादनं प्रति।
आसामपि दुराचार स्त्रीणां किं ते निपातने॥५२
दुष्ट निघृण निर्लज हुताशिन् मन्दभाग्यक।
निराशत्वं दुरावास बलाद् दहसि निर्दय ।। ५३
एवं विलपमानास्ता जल्पन्त्यश्च बहून्यपि।
अन्याः क्रोशन्ति संक्रुद्धा बालशोकेन मोहिताः॥५४
दहते निर्दयो वह्निः संक्रुद्धः पूर्वशत्रुवत्।
पुष्करिण्यां जलं दग्धं कूपेष्वपि तथैव च॥५५
अस्मान् संदह्य म्लेच्छ त्वं कां गतिं प्रापयिष्यसि।
एवं प्रलपितं तासां श्रुत्वा देवो विभावसुः।
मूर्तिमान् सहसोत्थाय वह्निर्वचनमब्रवीत्॥५६
अग्निरुवाच
स्ववशो नैव युष्माकं विनाशं तु करोम्यहम्।
अहमादेशकर्ता वै नाहं कर्तास्म्यनुग्रहम्॥५७
रुद्रक्रोधसमाविष्टो विचरामि यथेच्छया।
ततो बाणो महातेजास्त्रिपुरं वीक्ष्य दीपितम्॥५८
सिंहासनस्थः प्रोवाच ह्यहं देवैर्विनाशितः।
अल्पसत्त्वैराचारैरीश्वरस्य निवेदितम्॥५९
धुएँसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर सो गयी। अन्य स्त्री अपनी सखीका हाथ पकड़कर कह रही हैं-'सखि! बालिका जल रही है।' कोई अनेक दिव्य रत्नोंसे अलङ्कृत नारी अग्निको देखकर मोहित हो गयी, तब वह सिरपर हाथ जोड़कर अग्निसे प्रार्थना करने लगी-'भगवन्! यदि तुम्हारा अपकारी पुरुषोंसे वैर है तो घरके पिंजरेमें कोयलके समान आबद्ध स्त्रियोंने तुम्हारा क्या अपराध किया है ? अरे पापी ! तुम तो बड़े निर्दयी और निर्लज्ज हो। स्त्रियों के प्रति यह तुम्हारा कैसा क्रोध है ! अरे कायर ! न तो तुममें कुशलता है, न लज्जा है और न सत्यता है।' वह ऐसे आक्षेपयुक्त वाक्योंसे अग्निको उलाहना देने लगी। (फिर दूसरी कहने लगी-) 'क्या तुमने यह नहीं सुना है कि शत्रुकी स्त्रियाँ भी अवध्य होती हैं? क्या जलाना और नाश करना ये ही तुम्हारे गुण हैं ? तुम्हारेमें स्त्रियोंके प्रति दया, भय अथवा उदारता नहीं है। म्लेच्छगण भी स्त्रियोंको जलती हुई देखकर उनपर दया करते हैं। तुम तो म्लेच्छोंसे भी बढ़कर हृदयशून्य दुर्निवार कष्ट हो। दुराचारिन्! इन स्त्रियोंको मारनेसे तुम्हें क्या मिलेगा? क्या जलाना और मारना ये ही तुम्हारे गुण हैं? दुष्ट हुताशिन्! तुम बड़े दयाहीन, निर्लज्ज, अभागा, कठोर और कपटी हो। अरे निर्दय! तुम क्यों बलपूर्वक स्त्रियोंको जला रहे हो?' इस प्रकार वे स्त्रियाँ अनेकों प्रकारसे विलाप करती हुई चीत्कार कर रही थीं? अन्य कुछ स्त्रियाँ बालशोकसे मोहित होकर विलाप कर रही थीं। यह निष्ठुर अग्नि क्रुद्ध होकर पुराने शत्रुके समान हमलोगोंको जला रहा है। पुष्करिणियों और कुओंके भी जल सूख गये। अरे म्लेच्छ! हमलोगोंको जलाकर तुम किस गतिको प्राप्त होगे? इस प्रकार उनका प्रलाप सुनकर अग्निदेव सहसा मूर्तिमान् होकर उठ खड़े हुए और इस प्रकार बोले ॥ ४०-५६॥
अग्निदेवने कहा-मैं अपनी इच्छाके अनुसार तुमलोगोंका विनाश नहीं कर रहा हूँ, अपितु मैं आदेशका पालक हूँ। मैं अनुग्रहका कर्ता नहीं हूँ। मैं रुद्रके क्रोधसे आविष्ट होकर इच्छानुसार विचरण कर रहा हूँ। तदनन्तर सिंहासनपर बैठा हुआ महातेजस्वी बाण त्रिपुरको जलता हुआ देखकर बोला-'मैं देवताओंद्वारा विनष्ट कर दिया गया। उस स्वल्पवलशाली दुराचारियोंने शंकरसे निवेदन
अपरीक्ष्य त्वहं दग्धः शंकरेण महात्मना।
नान्यः शक्तिस्तु मां हन्तुं वर्जयित्वा त्रिलोचनम्॥६०
उत्थितः शिरसा कृत्वा लिङ्ग त्रिभुवनेश्वरम्।
निर्गतः स पुरद्वारात् परित्यज्य सुहृत्सुतान्॥६१
रत्नानि यान्यनर्घाणि स्त्रियो नानाविधास्तथा।
गृहीत्वा शिरसा लिङ्गं गच्छन् गगनमण्डलम्॥६२
स्तुवंश्च देवदेवेशं त्रिलोकाधिपतिं शिवम्।
त्यक्ता पुरी मया देव यदि वध्योऽस्मि शंकर॥६३
त्वत्प्रसादान्महादेव मा मे लिङ्गं विनश्यतु।
अर्चितं हि मया देव भक्त्या परमया सदा॥ ६४
त्वत्कोपाद् यदि वध्योऽहं तदिदं मा विनश्यतु।
श्लाघ्यमेतन्महादेव त्वत्कोपाद् दहनं मम॥ ६५
प्रतिजन्म महादेव त्वत्पादनिरतो ह्यहम्।
तोटकच्छन्दसा देव स्तौमि त्वां परमेश्वर ॥६६
शिव शंकर शर्व हराय नमो
भव भीम महेश्वर सर्व नमः।
कुसुमायुधदेहविनाशकर
त्रिपुरान्तक अन्धकशूलधर ॥६७
प्रमदाप्रिय कान्त विरक्त नमः
ससुरासुरसिद्धगणैर्नमित ।
हयवानरसिंहगजेन्द्रमुखै-
रतिहस्वसुदीर्घविशालमुखैः ॥६८
उपलब्धुमशक्यतरैरसुरैः
प्रथितोऽस्मि च बाहुशतैर्बहुभिः ।
प्रणतोऽस्मि भवं भवभक्तिरत-
श्चलचन्द्रकलाङ्कुर देव नमः॥६९
न च पुत्रकलत्रहयादिधनं
मम तु त्वदनुस्मरणं शरणम्।
व्यथितोऽस्मि शरीरशतैर्बहुभि-
र्गमिता च महानरकस्य गतिः॥७०
न निवर्तति जन्म न पापमतिः
शुचिकर्म निबद्धमपि त्यजति।
अनुकम्पति विभ्रमति त्रसति
मम चैव कुकर्म निवारयति॥७१
किया और महात्मा शंकरने भी बिना विचारे ही मुझे जला दिया। उन त्रिलोचनको छोड़कर अन्य कोई भी मेरा विनाश नहीं कर सकता। तब वह सिंहासनसे उठ खड़ा हुआ और त्रिभुवनपति शंकरके लिङ्गको सिरपर धारणकर मित्र, पुत्र, बहुमूल्य रत्नों, स्त्रियों और अन्यान्य अनेक प्रकारके पदार्थोंको छोड़कर नगरद्वारसे बाहर निकला। वह लिङ्गको सिरपर धारण कर गगनमण्डलमें जा पहुँचा और देवदेवेश त्रिभुवनपति शिवकी स्तुति करते हुए कहने लगा-'देव! मैंने अपनी पुरीका परित्याग कर दिया है। शंकर! यदि मैं वस्तुतः वध करने योग्य हूँ तो महादेव! आपकी कृपासे मेरा यह लिङ्ग विनष्ट न हो। देव! मैंने परमभक्तिके साथ सदा इसकी पूजा की है, अतः यदि मैं आपके कोपके कारण वध्य हूँ तो यह लिङ्ग विनष्ट न हो। महादेव! आपके कोपसे मेरा यह जल जाना प्रशस्त ही है। महादेव! प्रत्येक जन्ममें मैं आपके चरणोंमें ही लीन हूँ, अतः देवाधिदेव परमेश्वर ! मैं तोटक- छन्दद्वारा आपकी स्तुति कर रहा हूँ॥ ५७-६६॥
आप शिव, शंकर, शर्व और हरको नमस्कार है। भव, भीम, महेश्वर और सर्वभूतमयको प्रणाम है। आप कामदेवके शरीरके नाशक, त्रिपुरान्तक, अन्धक, त्रिशूलधर, आनन्दप्रिय, कान्त, विरक्त और सुर-असुर-सिद्धगणोंसे नमस्कृत हैं, आपको नमस्कार है। मैं अश्व, वानर, सिंह और गजेन्द्रके-से मुखोंवाले, अतिशय छोटे, विस्तृत विशालमुखोंसे युक्त और सैकड़ों भुजाओंसे सम्पन्न बहुत-से अजेय असुरोंद्वारा प्राप्त करनेके लिये अशक्यरूपसे विख्यात हूँ। शिवजीकी भक्तिमें लीन रहनेवाला वही मैं भवके चरणोंमें प्रणिपात कर रहा हूँ। चञ्चल चन्द्रकलासे सुशोभित देव! आपको नमस्कार है। ये पुत्र, स्त्री, अश्वादि वैभव मेरे नहीं हैं, मेरे लिये तो आपका चिन्तन ही एकमात्र शरण है। मैं सैकड़ों शरीर (जन्म) धारण कर पीड़ित हो चुका हूँ। आगे महानरकमें पड़नेकी सम्भावना है। न जन्मसे छुटकारा मिलेगा, न पापबुद्धि ही निवृत्त होगी, शुद्ध कर्ममें लगा हुआ भी मन उसे छोड़ देता है, काँपता है, भ्रमित होता है और भयभीत होता है। मेरे ही कुकर्म अच्छे कर्मोंसे मुझे हटाते हैं।
यः पठेत् तोटकं दिव्यं प्रयतः शुचिमानसः ।
बाणस्येव यथा रुद्रस्तस्यापि वरदो भवेत्॥७२
इमं स्तवं महादिव्यं श्रुत्वा देवो महेश्वरः।
प्रसन्नस्तु तदा तस्य स्वयं वचनमब्रवीत्।।७३
महेश्वर उवाच
न भेतव्यं त्वया वत्स सौवर्णे तिष्ठ दानव।
पुत्रपौत्रसुहृद्वन्धुभार्याभृत्यजनैः सह॥७४
अद्यप्रभृति बाण त्वमवध्यस्त्रिदशैरपि।
भूयस्तस्य वरो दत्तो देवदेवेन पाण्डव॥७५
अक्षयश्चाव्ययो लोके विचरस्वाकुतोभयः ।
ततो निवारयामास रुद्रः सप्तशिखं तदा॥७६
तृतीयं रक्षितं तस्य शंकरेण महात्मना।
भ्रमत्तु गगने दिव्यं रुद्रतेजःप्रभावतः ।। ७७
एवं तु त्रिपुरं दग्धं शंकरेण महात्मना।
ज्वालामालाप्रदीप्तं तत् पतितं धरणीतले॥७८
एकं निपतितं तत्र श्रीशैले त्रिपुरान्तके।
द्वितीयं पतितं तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके॥७९
दग्धेषु तेषु राजेन्द्र रुद्रकोटि: प्रतिष्ठिता।
ज्वलत्तदपतत् तत्र तेन ज्वालेश्वरः स्मृतः।। ८०
ऊर्बेन प्रस्थितास्तस्य दिव्यज्वाला दिवं गताः।
हाहाकारस्तदा जातो देवासुरकृतो महान्॥८१
शरमस्तम्भयद् रुद्रो माहेश्वरपुरोत्तमे।
एवं वृत्तं तदा तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके॥८२
चतुर्दशाख्यं भुवनं स भुक्त्वा पाण्डुनन्दन।
वर्षकोटिसहस्रं तु त्रिंशत्कोट्यस्तथापराः ॥८३
ततो महीतलं प्राप्य राजा भवति धार्मिकः।
पृथिवीमेकच्छत्रेण भुङ्क्ते स तु न संशयः॥८४
एवं पुण्यो महाराज पर्वतोऽमरकण्टकः।
चन्द्रसूर्योपरागे तु गच्छेद् योऽमरकण्टकम्॥८५
अश्वमेधाद् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः ।
स्वर्गलोकमवाप्नोति दृष्ट्वा तत्र महेश्वरम्॥८६
ब्रह्महत्या गमिष्यन्ति राहुग्रस्ते दिवाकरे।
तदेवं निखिलं पुण्यं पर्वतेऽमरकण्टके ॥ ८७
जो मनुष्य संयत होकर पवित्र मनसे इस दिव्य तोटकछन्दमें रचित स्तोत्रको पढ़ता है, उसके लिये भी रुद्र बाणके समान वरदायक होते हैं। उस समय स्वयं महेश्वरदेव इस महादिव्य स्तोत्रको सुनकर उसपर प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले॥६७-७३ ।।
भगवान् महेश्वरने कहा-वत्स! तुम्हें डरना नहीं चाहिये। दानव! तुम पुत्र, मित्र, बन्धु, पत्नी और भृत्यजनोंके साथ सुवर्णनिर्मित नगरमें निवास करो। बाण! आजसे तुम देवताओंद्वारा अवध्य हो गये। अब तुम लोकमें सर्वथा निर्भय, अव्यय और अक्षय होकर विचरण करो। पाण्डुनन्दन! इस प्रकार देवाधिदेवने बाणको पुनः वर प्रदान किया। तदनन्तर रुद्रने अग्निको जलानेसे मना कर दिया। इस प्रकार महात्मा शंकरने बाणासुरके तृतीय पुरकी रक्षा की। वह पुर रुद्रके तेजके प्रभावसे गगनमण्डलमें घूमने लगा। इस प्रकार महात्मा शंकरने त्रिपुरको जलाया। वह ज्वालामालासे प्रदीप्त होकर पृथ्वीतलपर गिर पड़ा। उनमेंसे एक पुर त्रिपुरान्तकके श्रीशैलपर गिरा और द्वितीय उस अमरकण्टक पर्वतपर गिरा। राजेन्द्र! उनके जल जानेपर उसपर करोड़ों रुद्र प्रतिष्ठित हुए। वह जलता हुआ गिरा था, इस कारण ज्वालेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसकी दिव्य ज्वालाएँ ऊपरको उठती हुई स्वर्गलोकतक जा पहुँचीं। उस समय देवों और असुरोंके द्वारा किया गया भयंकर हाहाकार व्याप्त हो गया। तब रुद्रने अमरकण्टक पर्वतपर उत्तम माहेश्वरपुरमें शरको स्तम्भित कर दिया। पाण्डुनन्दन ! (इस प्रकार अमरकण्टकपर्वतपर जो व्यक्ति रुद्रकोटिकी अर्चना करता है) वह तीस करोड़ एक हजार वर्षपर्यन्त चौदहों भुवनोंका उपभोग कर अन्तमें पृथ्वीपर जन्म लेकर धार्मिक राजा होता है। वह एकच्छत्र सम्राट् होकर पृथ्वीका उपभोग करता है-इसमें संदेह नहीं है॥ ७४-८४ ॥
महाराज! यह अमरकण्टक पर्वत ऐसा पुण्यजनक है। जो व्यक्ति चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय अमरकण्टक पर्वतपर जाता है, वह अश्वमेध-यज्ञसे दसगुना फल प्राप्त करता है और वहाँ महेश्वरका दर्शन करके स्वर्गलोकको प्राप्त करता है-ऐसा मनीषियोंने कहा है। सूर्यग्रहणके अवसरपर अमरकण्टकपर जानेसे ब्रह्महत्याएँ निवृत्त हो जाती हैं। इस प्रकार अमरकण्टक पर्वतपर अशेष पुण्य
मनसापि स्मरेद् यस्तं गिरिं त्वमरकण्टकम्।
चान्द्रायणशतं साग्रं लभते नात्र संशयः॥८८
त्रयाणामपि लोकानां विख्यातोऽमरकण्टकः।
एष पुण्यो गिरिश्रेष्ठः सिद्धगन्धर्वसेवितः॥८९
नानाद्रुमलताकीर्णो नानापुष्पोपशोभितः ।
मृगव्याघ्रसहौस्तु सेव्यमानो महागिरिः॥९०
यत्र संनिहितो देवो देव्या सह महेश्वरः।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा चेन्द्रो विद्याधरगणैः सह ॥९१
ऋषिभिः किन्नरैर्यक्षैर्नित्यमेव निषेवितः।
वासुकिः सहितस्तत्र क्रीडते पन्नगोत्तमैः॥ ९२
प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् पर्वतेऽमरकण्टके।
पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥९३
तत्र ज्वालेश्वरं नाम तीर्थं सिद्धनिषेवितम्।
तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः ।। ९४
ज्वालेश्वर महाराज यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।
चन्द्रसूर्योपरागेषु तस्यापि शृणु यत्फलम्॥ ९५
सर्वकर्मविनिर्मुक्तो ज्ञानविज्ञानसंयुतः।
रुद्रलोकमवाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम्॥९६
अमरेश्वरदेवस्य पर्वतस्य उभे तटे।
तत्र ता ऋषिकोट्यस्तु तपस्तप्यन्ति सुव्रत॥९७
समंताद् योजनक्षेत्रो गिरिश्चामरकण्टकः॥९८
अकामो वा सकामो वा नर्मदायां शुभे जले।
स्नात्वा मुच्येत पापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति॥ ९९
प्राप्त होता है। जो मनसे भी उस अमरकण्टकपर्वतका स्मरण करता है, उसे नि:संदेह सौ चान्द्रायणव्रतसे भी अधिक फल मिलता है। अमरकण्टक पर्वत तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। यह पुण्यमय श्रेष्ठ पर्वत सिद्धों और गन्धर्वोसे सेवित, विविध वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा अनेक प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित है। यह महान् पर्वत हजारों मृगों और व्याघ्रोंसे सेवित है। जहाँ देवी पार्वतीके साथ महादेव, ब्रह्मा, विष्णु तथा विद्याधरोंके साथ इन्द्र सदा उपस्थित रहते हैं, वह अमरकण्टक पर्वत ऋषियों, किन्नरों और यक्षोंके द्वारा सदा सेवित रहता है। श्रेष्ठ सर्पोके साथ वासुकि वहाँ क्रीड़ा करते रहते हैं। जो मनुष्य अमरकण्टक पर्वतकी प्रदक्षिणा करता है, वह पौण्डरीक यज्ञका फल प्राप्त करता है। वहाँ सिद्धोंद्वारा सेवित ज्वालेश्वर नामक तीर्थ है, उसमें स्नानकर मानव स्वर्गलोकको प्राप्त करते हैं और जो वहाँ शरीरका त्याग करते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। महाराज! चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर जो व्यक्ति ज्वालेश्वरमें प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनिये। वह व्यक्ति सभी कर्मोंसे विनिर्मुक्त तथा ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न हो प्रलयकालपर्यन्त रुद्रलोकको प्राप्त करता है। सुव्रत! अमरकण्टकपर्वतके दोनों तटोंपर करोड़ों ऋषिगण तपस्यामें रत रहते हैं। यह अमरकण्टकपर्वत चारों ओरसे एक योजनमें विस्तृत है। अकाम हो या सकाम, जो मनुष्य नर्मदाके शुभदायक जलमें स्नान करता है, वह सभी पापोंसे छुटकारा पा लेता है और रुद्रलोकको प्राप्त करता है॥ ८५-९९ ॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥१८८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यवर्णनमें एक सौ अठासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८८॥
Summary of chapter 190 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya expounds upon the supreme sanctity of Maheshvara-tīrtha and Jamadagni-tīrtha along the Narmadā river course. Maheshvara-tīrtha is celebrated as the site where Mahādeva performed intense meditation, while Jamadagni-tīrtha marks the hermitage where Maharshi Jamadagni achieved spiritual perfection through severe austerities. Performing charity and meditation at these sites grants deep mental peace and spiritual power.