मत्स्य महा पुराण
देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप
शौनक उवाच
कृतविद्ये कचे प्राप्ते हृष्टरूपा दिवौकसः।
कचादवेत्य तां विद्यां कृतार्था भरतर्षभ॥ १
सर्व एव समागम्य शतक्रतुमथाब्रुवन्।
कालस्त्वद्विक्रमस्याद्य जहि शत्रून् पुरंदर॥ २
एवमुक्तस्तु सह तैस्त्रिदशैर्मघवांस्तदा।
तथेत्युक्त्वोपचक्राम सोऽपश्यद् विपिने स्त्रियः॥ ३
क्रीडन्तीनां तु कन्यानां वने चैत्ररथोपमे।
वायुर्भूतः स वस्त्राणि सर्वाण्येव व्यमिश्रयत्॥ ४
ततो जलात् समुत्तीर्य ताः कन्याः सहितास्तदा।
वस्त्राणि जगृहुस्तानि यथा संस्थान्यनेकशः॥ ५
तत्र वासो देवयान्या: शर्मिष्ठा जगृहे तदा।
व्यतिक्रममजानन्ती दुहिता वृषपर्वणः॥ ६
ततस्तयोमिथस्तत्र विरोधः समजायत।
देवयान्याश्च राजेन्द्र शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते॥ ७
देवयान्युवाच
कस्माद् गृह्णासि मे वस्त्रं शिष्या भूत्वा ममासुरि।
समुदाचारहीनाया न ते श्रेयो भविष्यति॥ ८
शर्मिष्ठोवाच
आसीनं च शयानं च पिता ते पितरं मम।
स्तौति पृच्छति चाभीक्ष्णं नीचस्थः सुविनीतवत्॥ ९
याचतस्त्वं च दुहिता स्तुवतः प्रतिगृह्णतः।
सुताहं स्तूयमानस्य ददतो न तु गृह्णतः॥१०
शौनकजी कहते हैं-भरतर्षभ! जब कच मृतसंजीविनी-विद्या सीखकर आ गये, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे कचसे उस विद्याको पढ़कर कृतार्थ हो गये। फिर सबने मिलकर इन्द्रसे कहा- 'पुरंदर! अब आपके लिये पराक्रम करनेका समय आ गया है, अपने शत्रुओंका संहार कीजिये।' संगठित होकर आये हुए देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर भूलोकमें आये। वहीं एक वनमें उन्होंने बहुत-सी स्त्रियोंको देखा। वह वन चैत्ररथ* नामक देवोद्यानके समान मनोहर था। उसमें वे कन्याएँ जलक्रीड़ा कर रही थीं। इन्द्रने वायुका रूप धारण करके उनके सारे कपड़े परस्पर मिला दिये। तब वे सभी कन्याएँ एक साथ जलसे निकलकर अपने-अपने अनेक प्रकारके वस्त्र, जो निकट ही रखे हुए थे, लेने लगीं। उस सम्मिश्रणमें शर्मिष्ठाने देवयानीका वस्त्र ले लिया। शर्मिष्ठा वृषपर्वाकी पुत्री थी। दोनोंके वस्त्र मिल गये हैं, इस बातका उसे पता न था। राजेन्द्र! वस्त्रोंकी उस अदला-बदलीको लेकर देवयानी और शर्मिष्ठा-दोनोंमें वहाँ परस्पर बड़ा भारी विरोध खड़ा हो गया॥१-७॥ देवयानी बोली-अरी दानवकी बेटी! मेरी शिष्या होकर तू मेरा वस्त्र कैसे ले रही है? तू सज्जनोंके उत्तम आचारसे शून्य है, अतः तेरा भला न होगा॥८॥
शर्मिष्ठाने कहा-अरी! मेरे पिता बैठे हों या सो रहे हों, उस समय तेरा पिता विनयशील सेवकके समान नीचे खड़ा होकर बार-बार वन्दीजनोंकी भाँति उनकी स्तुति करता है। तू भिखमंगेकी बेटी है, तेरा बाप स्तुति करता और दान लेता है। मैं उनकी बेटी हूँ, जिनकी स्तुति की जाती है, जो दूसरोंको दान देते हैं और स्वयं किसीसे कुछ भी नहीं लेते।
* जैसे इन्द्रके वनका नाम नन्दन है, वैसे वरुणका उद्यान चैत्ररथ है।
अनायुधा सायुधायाः किं त्वं कुप्यसि भिक्षुकि।
लप्स्यसे प्रतियोद्धारं न च त्वां गणयाम्यहम्॥११
शौनक उवाच
सा विस्मयं देवयानीं गतां सक्तां च वाससि।
शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् कूपे ततः स्वपुरमाविशत्॥१२
हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्ठा पापनिश्चया।
अनवेक्ष्य ययौ तस्मात् क्रोधवेगपरायणा॥१३
अथ तं देशमध्यागाद् ययातिर्नहुषात्मजः।
श्रान्तयुग्यः श्रान्तरूपो मृगलिप्सुः पिपासितः॥१४
नाहुषिः प्रेक्षमाणो हि स निपाते गतोदके।
ददर्श कन्यां तां तत्र दीप्तामग्निशिखामिव॥१५
तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्याममरवर्णिनीम्।
सान्त्वयित्वा नृपश्रेष्ठः साम्ना परमवल्गुना॥१६
का त्वं चारुमुखी श्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला।
दीर्घ ध्यायसि चात्यर्थं कस्माच्छ्वसिषि चातुरा॥१७
कथं च पतिता ह्यस्मिन् कूपे वीरुत्तृणावृते।
दुहिता चैव कस्य त्वं वद सर्वं सुमध्यमे ॥१८
देवयान्युवाच
योऽसौ देवैर्हतान् दैत्यानुत्थापयति विद्यया।
तस्य शुक्रस्य कन्याहं त्वं मां नूनं न बुध्यसे॥१९
एष मे दक्षिणो राजन् पाणिस्ताननखाङ्गुलिः।
समुद्धर गृहीत्वा मां कुलीनस्त्वं हि मे मतः॥२०
जानामि त्वां च संशान्तं वीर्यवन्तं यशस्विनम्।
तस्मान्मां पतितामस्मात्कूपादुद्धर्तुमर्हसि ॥२१
शौनक उवाच
तामथ ब्राह्मणी स्त्री च विज्ञाय नहुषात्मजः।
गृहीत्वा दक्षिणे पाणावुजहार ततोऽवटात्॥ २२
उद्धृत्य चैनां तरसा तस्मात् कूपान्नराधिपः।
आमन्त्रयित्वा सुश्रोणी ययातिः स्वपुरं ययौ॥ २३
अरी भिक्षुकि! तू खाली हाथ है, तेरे पास कोई अस्त्र-शस्त्र भी नहीं है। और देख ले, मेरे पास हथियार है। इसलिये तू मेरे ऊपर व्यर्थ ही क्रोध कर रही है। यदि लड़ना ही चाहती है तो इधरसे भी डटकर सामना करनेवाली मुझ-जैसी योद्धी तुझे मिल जायगी। मैं तुझे कुछ भी नहीं गिनती॥९-११॥
शौनकजी कहते हैं-शतानीक! यह सुनकर देवयानी आश्चर्यचकित हो गयी और शर्मिष्ठाके शरीरसे अपने वस्त्रको खींचने लगी। यह देख शर्मिष्ठाने उसे कुएँमें ढकेल दिया और अब वह (डूबकर) मर गयी होगी-ऐसा समझकर पापमय विचारवाली शर्मिष्ठा नगरको लौट आयी। वह क्रोधके आवेशमें थी, अत: देवयानीकी ओर देखे बिना घर लौट गयी। तदनन्तर नहुषपुत्र ययाति उस स्थानपर आये। उनके रथके वाहन तथा अन्य घोड़े भी थक गये थे।वे भी थकावटसे चूर हो गये थे। वे एक हिंसक पशुको पकड़नेके लिये उसके पीछे-पीछे आये थे और प्याससे कष्ट पा रहे थे। ययाति उस जलशून्य कूपको देखने लगे। वहाँ उन्हें अग्निशिखाके समान तेजस्विनी एक कन्या दिखायी दी, जो देवाङ्गनाके समान सुन्दरी थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही नृपश्रेष्ठ ययातिने पहले परम मधुर वचनोंद्वारा शान्तभावसे उसे आश्वासन दिया और पूछा-'सुमध्यमे! तुम कौन हो? तुम्हारा मुख परम मनोहर है। तुम्हारी अवस्था भी अभी बहुत अधिक नहीं दीखती। तुम्हारे कानोंके मणिमय कुण्डल अत्यन्त सुन्दर और चमकीले हैं। तुम किसी अत्यन्त घोर चिन्तामें पड़ी हो। आतुर होकर लम्बी साँस क्यों ले रही हो? तृण और लताओंसे ढके हुए इस कुएँमें कैसे गिर पड़ी? तुम किसकी पुत्री हो? सब ठीक-ठीक बताओ'॥ १२-१८॥
देवयानी बोली-जो देवताओंद्वारा मारे गये दैत्योंको अपनी विद्याके बलसे जिलाया करते हैं, उन्हीं शुक्राचार्यकी मैं पुत्री हूँ। निश्चय ही आप मुझे पहचानते नहीं हैं। महाराज! लाल नख और अङ्गुलियोंसे युक्त यह मेरा दाहिना हाथ है। इसे पकड़कर आप इस कुएँसे मेरा उद्धार कीजिये। मैं जानती हूँ, आप उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए नरेश हैं। मुझे यह भी ज्ञात है कि आप परम शान्त स्वभाववाले, पराक्रमी तथा यशस्वी वीर हैं। इसलिये इस कुएँमें गिरी हुई मुझ अबलाका आप यहाँसे उद्धार कीजिये॥१९-२१॥
शौनकजी कहते हैं-शतानीक! तदनन्तर नहुषपुत्र राजा ययातिने देवयानीको ब्राह्मण-कन्या जानकर उसका दाहिना हाथ अपने हाथमें ले उसे उस कुएँसे बाहर निकाला। इस प्रकार वेगपूर्वक उसे कुएँसे बाहर निकालकर राजा ययाति सुन्दरी देवयानीकी अनुमति लेकर अपने
गते तु नाहुषे तस्मिन् देवयान्यप्यनिन्दिता।
उवाच शोकसंतप्ता घूर्णिकामागतां पुनः ॥ २४
देवयान्युवाच
त्वरितं घूर्णिके गच्छ सर्वमाचक्ष्व मे पितुः ।
नेदानीं तु प्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः॥२५
शौनक उवाच
सा तु वै त्वरितं गत्वा घूर्णिकासुरमन्दिरम्।
दृष्ट्वा काव्यमुवाचेदं कम्पमाना विचेतना ॥२६
आचख्यौ च महाभागा देवयानी वने हता।
शर्मिष्ठया महाप्राज्ञ दुहित्रा वृषपर्वणः॥२७
श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तदा शर्मिष्ठया हताम् ।
त्वरया निर्ययौ दुःखान्मार्गमाणः सुतां वने ॥ २८
दृष्ट्वा दुहितरं काव्यो देवयानीं ततो वने।
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत्॥२९
आत्मदोषैर्नियच्छन्ति सर्वे दुःखसुखे जनाः।
मन्ये दुश्चरितं तस्मिंस्तस्येयं निष्कृतिः कृता॥ ३०
देवयान्युवाच
निष्कृतिर्वास्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम।
शर्मिष्ठया यदुक्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः॥३१
सत्यं किलैतत् सा प्राह दैत्यानामस्मि गायना।
एवं हि मे कथयति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी॥३२
वचनं तीक्ष्णपरुषं क्रोधरक्तेक्षणा भृशम्।
स्तुवतो दुहितासि त्वं याचतः प्रतिगृह्णतः॥३३
सुताहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः।
इति मामाह शर्मिष्ठा दुहिता वृषपर्वणः।
क्रोधसंरक्तनयना दर्पपूर्णानना ततः॥३४
यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्णतः।
प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता हि सखी मया॥३५
नगरको चले गये। नहुषनन्दन ययातिके चले जानेपर सती-साध्वी देवयानी शोकसे संतप्त हो अपने सामने आयी हुई धाय घूर्णिकासे बोली ।। २२-२४॥
देवयानीने कहा-घूर्णिके! तुम तुरंत वेगपूर्वक यहाँसे जाओ और शीघ्र मेरे पिताजीसे सब वृत्तान्त कह दो। अब मैं (राजा) वृषपर्वाके नगरमें प्रवेश नहीं करूँगी- उस नगरमें पैर नहीं रखूगी॥ २५ ॥
शौनकजी कहते हैं-शतानीक! देवयानीकी बात सुनकर घूर्णिका तुरंत असुरराजके महलमें गयी और वहाँ शुक्राचार्यको देखकर काँपती हुई उसने सम्भ्रमपूर्ण चित्तसे वह बात बतला दी। उसने कहा-'महाप्राज्ञ! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाके द्वारा देवयानी वनमें मार डाली (मृततुल्य कर दी) गयी है।' अपनी पुत्रीको शर्मिष्ठाद्वारा मृततुल्य की गयी सुनकर शुक्राचार्य बड़ी उतावलीके साथ निकले और दुःखी होकर उसे वनमें ढूँढ़ने लगे। तदनन्तर वनमें अपनी बेटी देवयानीको देखकर शुक्राचार्यने दोनों भुजाओंसे उठाकर उसे हृदयसे लगा लिया और दुःखी होकर कहा-'बेटी! सब लोग अपने ही दोष और गुणोंसे-अशुभ या शुभ कर्मोंसे दु:ख एवं सुखमें पड़ते हैं। मालूम होता है, तुमसे कोई बुरा कर्म बन गया था, जिसका तुमने इस रूपमें प्रायश्चित्त किया है' ॥२६-३०॥
देवयानी बोली-पिताजी ! मुझे अपने कर्मोंके फलसे निस्तार हो या न हो, आप मेरी बात ध्यान देकर सुनिये। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने आज मुझसे जो कुछ कहा है, क्या यह सच है? वह कहती है-मैं भाटोंकी तरह दैत्योंके गुण गाया करती हूँ। वृषपर्वाकी लाड़िली शर्मिष्ठा क्रोधसे लाल आँखें करके आज मुझसे इस प्रकार अत्यन्त तीखे और कठोर वचन कह रही थी। 'देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, नित्य भीख माँगनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी है और मैं तो उन महाराजकी पुत्री हूँ, जिनकी तुम्हारे पिता स्तुति करते हैं, जो स्वयं दान देते हैं और लेते (किसीसे) एक अधेला भी नहीं हैं।' वृषपर्वाकी बेटी शर्मिष्ठाने आज मुझसे ऐसी बात कही है। कहते समय उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह भारी घमंडसे भरी हुई थी। तात! यदि सचमुच मैं स्तुति करनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी हूँ तो मैं शर्मिष्ठाको अपनी सेवाओंद्वारा प्रसन्न करूँगी। यह बात मैंने अपनी सखीसे कह दी थी। (मेरे ऐसा कहनेपर भी अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई शर्मिष्ठाने उस निर्जन वनमें मुझे पकड़कर कुएँमें ढकेल दिया। उसके बाद वह अपने घर चली गयी)॥ ३१-३५॥
शुक्र उवाच
स्तुवतो दुहिता न त्वं भद्रे न प्रतिगृह्णतः।
अतस्त्वं स्तूयमानस्य दुहिता देवयान्यसि॥३६
वृषपर्वैव तद् वेद शक्रो राजा च नाहुषः ।
अचिन्त्यं ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि बलं मम॥३७
शुक्राचार्यने कहा-देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, भीख माँगनेवाले या दान लेनेवालेकी बेटी नहीं है। तू उस पवित्र ब्राह्मणकी पुत्री है, जो किसीकी स्तुति नहीं करता और जिसकी सब लोग स्तुति करते हैं। इस बातको वृषपर्वा, देवराज इन्द्र तथा राजा ययाति जानते हैं। निर्द्वन्द्व अचिन्त्य ब्रह्म ही मेरा ऐश्वर्ययुक्त बल है॥ ३६-३७॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययातिचरित नामक सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७ ॥
Summary of chapter 27 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the aftermath of Kacha's successful acquisition of the Sañjīvanī Vidyā. As Kacha prepared to return to Svarga, Devayānī expressed her deep romantic love for him and requested that he marry her. Kacha gently declined her proposal, explaining that having emerged from the abdomen of her father Śukrāchārya, she was spiritually his sister, and marrying her would violate sacred Dharma. Angered by his refusal, Devayānī cursed Kacha that the Sañjīvanī Vidyā he had learned would fail to take effect when invoked by him directly. In response to her unjust curse, Kacha pronounced a counter-curse that though the lore would not manifest through his own hands, he would successfully impart it to others, and Devayānī herself would never be accepted in marriage by any Brāhmaṇa, forcing her to marry a Kshatriya king.