राजा पुरूरवाकी तपस्या, गन्धर्वो और अप्सराओंकी क्रीडा, महर्षि अत्रिका  आगमन तथा राजाको वरप्राप्ति

सूत उवाच

स त्वाश्रमपदे रम्ये त्यक्ताहारपरिच्छदः ।

क्रीडाविहारं गन्धर्वैः पश्यत्यप्सरसां सह ॥१

कृत्वा पुष्पोच्चयं भूरि ग्रथयित्वा तथा स्रजः ।

अर्घ्य निवेद्य देवाय गन्धर्वेभ्यस्तदा ददौ॥२

पुष्पोच्चयप्रसक्तानां क्रीडन्तीनां यथासुखम्।

चेष्टा नानाविधाकाराः पश्यन्नपि न पश्यति ॥३

काचित् पुष्पोच्चये सक्ता लताजालेन वेष्टिता।

सखीजनेन संत्यक्ता कान्तेनाभिसमुज्झिता॥४

काचित् कमलगन्धाभा निःश्वासपवनाहृतः ।

मधुपैराकुलमुखी कान्तेन परिमोचिता॥५

मकरन्दसमाक्रान्तनयना काचिदङ्गना।

कान्तनिःश्वासवातेन नीरजस्ककृतेक्षणा॥६

काचिदुच्चीय पुष्पाणि ददौ कान्तस्य भामिनी।

कान्तसंग्रथितैः पुष्पै रराज कृतशेखरा॥७

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! इस प्रकार राजकीय सामग्रियों तथा आहारका परित्याग कर राजा पुरूरवा उस रमणीय आश्रममें निवास करने लगे। वहाँ उन्हें गन्धर्वोके साथ अप्सराओंका क्रीडाविहार भी देखनेको मिलता था। राजा बहुत-से फूलोंको तोड़कर उसकी माला गूंथते थे और उन्हें अर्घ्यसहित पहले भगवान् विष्णुको निवेदित कर पुनः गन्धर्वोको दे देते थे। वे वहाँ पुष्प-चयनमें लगी हुई एवं सुखपूर्वक क्रीडा करती हुई अप्सराओंकी विभिन्न प्रकारकी चेष्टाओंको देखकर भी अनदेखी कर जाते थे। वहाँ पुष्प-चयनमें निरत कोई अप्सरा लता-समूहमें उलझ गयी और सखियाँ उसे उसी दशामें छोड़कर चलती बनीं, तब उसके पतिने आकर उसे बन्धन-मुक्त किया। किसी अप्सराके शरीरसे कमलकी-सी गन्ध निकल रही थी। इस कारण उसकी निःश्वासवायुसे आकृष्ट होकर भ्रमर उसके ऊपर मँडरा रहे थे। उन भ्रमरोंसे उसका मुख ढक-सा गया था तब उसके पतिने उसे उस कष्टसे मुक्त किया। किसी अप्सराकी आँखें पुष्प-रजसे आक्रान्त हो गयीं, तब उसके पतिने अपनी श्वासवायुसे फूंककर उन्हें धूलरहित कर दिया। किसी सुन्दरीने पुष्पोंको एकत्रकर अपने पतिको दे दिया। तत्पश्चात् वह अपने पतिद्वारा गूंथी गयी पुष्पमालाको अपने मस्तकपर रखकर सुशोभित

*इस अध्यायके अनेक शब्दार्थालंकारोंसे उद्दीपित अधिकांश श्लोक भागवत १० । ३३ से मिलते हैं। कोई एक-दूसरेसे अवश्य प्रभावित है। वैसे इस प्रकारका वर्णन गर्गसंहिता, ब्रह्मवैवर्तपुराणके रासप्रकरणोंमें तथा भागवतके रामनारायणकृत भावविभाविक तथा किशोरीदासकृता विशुद्धरसदीपिकामें इनकी भी पूरी व्याख्या है।

उच्चीय स्वयमुद्ग्रथ्य कान्तेन कृतशेखरा।

कृतकृत्यमिवात्मानं मेने मन्मथवर्धिनी॥८

अस्त्यस्मिन् गहने कुळे विशिष्टकुसुमा लता।

काचिदेवं रहो नीता रमणेन रिंसुना॥९

कान्तसंनामितलता कुसुमानि विचिन्वती।

सर्वाभ्यः काचिदात्मानं मेने सर्वगुणाधिकम्॥१०

काश्चित्पश्यन्ति भूपालं नलिनीषु पृथक्पृथक्।

क्रीडमानास्तु गन्धर्वैर्देवरामा मनोरमाः॥११

काचिदाताडयत् कान्तमुदकेन शुचिस्मिता।

ताड्यमानाथ कान्तेन प्रीतिं काचिदुपाययौ ॥१२

कान्तं च ताडयामास जातखेदा वराङ्गना।

अदृश्यत वरारोहा श्वासनृत्यत्पयोधरा॥१३

कान्ताम्बुताडनाकृष्टकेशपाशनिबन्धना

केशाकुलमुखी भाति मधुपैरिव पद्मिनी॥१४

स्वचक्षुःसदृशैः पुष्पैः संच्छन्ने नलिनीवने।

छन्ना काचिच्चिरात् प्राप्ता कान्तेनान्विष्य यत्नतः॥१५

स्नाता शीतापदेशेन काचित् प्राहाङ्गना भृशम्।

रमणालिङ्गनं चक्रे मनोऽभिलषितं चिरम्॥१६

जलार्द्रवसनं सूक्ष्ममङ्गलीनं शुचिस्मिता।

धारयन्ती जनं चक्रे काचित् तत्र समन्मथम्॥१७

कण्ठमाल्यगुणैः काचित् कान्तेन कृष्यताम्भसि।

त्रुट्यत्त्रग्दामपतितं रमणं प्राहसच्चिरम्॥१८

काचिद्भुग्ना सखीदत्तजानुदेशे नखक्षता।

सम्भ्रान्ता कान्तशरणं मग्ना काचिद् गता चिरम् ॥ १९

काचित् पृष्ठकृतादित्या केशनिस्तोयकारिणी।

शिलातलगता भर्ना दृष्टा कामार्तचक्षुषा॥ २०

कृत्तमाल्यं विलुलितं संक्रान्तकुचकुङ्कुमम्।

रतिक्रीडितकान्तेव रराज तत् सरोदकम्॥२१

सुस्नातदेवगंधर्वदेवरामागणेन च।

पूज्यमानं च ददृशे देवदेवं जनार्दनम् ॥ २२

होने लगी। तभी किसीके पतिने पुष्प-चयन करके अपने ही हाथों माला गूंथकर उसे अपनी पत्नीके मस्तकपर रखकर उसे सुसज्जित कर दिया, इससे उसने अपनेको कृतकृत्य मान लिया ॥१-८॥

कोई पतिद्वारा झुकायी गयी लतासे फूल तोड़ रही थी, जिससे वह अपनेको सभी सखियोंसे सम्पूर्ण गुणोंमें बढ़-चढ़कर मान रही थी। कुछ सुन्दरी देवाङ्गनाएँ गन्धर्वो के साथ पृथक्-पृथक् क्रीडा करती हुई कमलसमूहोंके बीचसे राजाकी ओर देख रही थीं। कोई सुन्दरी अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी और किसीके ऊपर उसका पति जल फेंक रहा था, जिससे उसे बड़ी प्रसन्नता हो रही थी। कोई देवाङ्गना खिन्न मनसे अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी। पतिके ऊपर जल फेंकनेसे किसीकी चोटी खुल गयी थी, जिससे उसका मुख बालोंसे ढक गया था। उस समय वह ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो भ्रमरोंसे घिरी हुई कमलिनी हो। कोई अपने नेत्रोंके समान कमल-पुष्पोंसे ढके हुए उस कमलिनीके वनमें छिप गयी थी, जिसे उसके पतिने बड़ी देरके बाद प्रयत्नपूर्वक खोजकर प्राप्त किया। किसीको उसका पति गलेमें पड़ी हुई मालाके धागेको पकड़कर जलमें खींच रहा था, किंतु उस धागेके टूट

क्वचिच्च ददृशे राजा लतागृहगताः स्त्रियः ।

मण्डयन्तीः स्वगात्राणि कान्तसंन्यस्तमानसाः॥२३

काचिदादर्शनकरा व्यग्रा दूतीमुखोद्गतम्।

शृण्वती कान्तवचनमधिका तु तथा बभौ ॥ २४

काचित् सत्वरिता दूत्या भूषणानां विपर्ययम्।

कुर्वाणा नैव बुबुधे मन्मथाविष्टचेतना ॥ २५

वायुनुन्नातिसुरभिकुसुमोत्करमण्डिते

काचित् पिबन्ती ददृशे मैरेयं नीलशाद्वले॥२६

पाययामास रमणं स्वयं काचिद् वराङ्गना।

काचित् पपौ वरारोहा कान्तपाणिसमर्पितम्॥ २७

काचित् स्वनेत्रचपलनीलोत्पलयुतं पयः।

पीत्वा पप्रच्छ रमणं व गतौ तौ ममोत्पलौ॥ २८

त्वयैव पीतौ तौ नूनमित्युक्ता रमणेन सा।

तथा विदित्वा मुग्धत्वाद् बभूव वीडिता भृशम्॥२९

काचित् कान्तार्पितं सुभ्रः कान्तपीतावशेषितम्।

सविशेषरसं पानं पपौ मन्मथवर्धनम्॥३०

आपानगोष्ठीषु तथा तासां स नरपुङ्गवः।

शुश्राव विविधं गीतं तन्त्रीस्वरविमिश्रितम् ।। ३१

प्रदोषसमये ताश्च देवदेवं जनार्दनम् ।

राजन् सदोपनृत्यन्ति नानावाद्यपुरःसराः॥ ३२

याममात्रे गते रात्रौ विनिर्गत्य गुहामुखात्।

आवसन् संयुताः कान्तैः परर्धिरचितां गुहाम्॥ ३३

नानागन्धान्वितलतां नानागन्धसुगन्धिनीम्।

नानाविचित्रशयनां कुसुमोत्करमण्डिताम्॥३४

एवमप्सरसां पश्यन् क्रीडितानि स पर्वते।

तपस्तेपे महाराजन् केशवार्पितमानसः॥ ३५

तमूचुर्नृपतिं गत्वा गन्धर्वाप्सरसां गणाः।

राजन् स्वर्गोपमं देशमिमं प्राप्तोऽस्यरिंदम ॥३६

वयं हि ते प्रदास्यामो मनसः काक्षितान् वरान्।

तानादाय गृहं गच्छ तिष्ठेह यदि वा पुनः॥३७

राजोवाच

अमोघदर्शनाः सर्वे भवन्तस्त्वमितौजसः।

वरं वितरताद्यैव प्रसादं मधुसूदनात्।। ३८

जानेपर जब वह गिर पड़ा, तब वह बड़ी देरतक हँसती रही। इस प्रकार राजाने स्नानसे निवृत्त हुई सभी देव-देवियों एवं गन्धर्व-अप्सराओंद्वारा भगवान् जनार्दनको पूजित होते हुए देखा ॥ ९-२५ ॥

राजन्! वे अप्सराएँ सदा प्रदोषकालमें देवाधिदेव भगवान् जनार्दनके समक्ष नाना प्रकारके बाजोंके साथ नृत्य करती थीं। एक पहर रात बीत जानेपर वे गुफाके मुखद्वारसे बाहर निकलकर अपने पतियोंके साथ ऐसी सजी-सजायी गुफामें निवास करती थीं, जिसपर अनेकों प्रकारके गन्धोंवाली लताएँ फैली हुई थी, जिसमेंसे विभिन्न प्रकारकी सुगन्ध निकल रही थी, जो पुष्पसमूहसे सुशोभित थी तथा जिसमें अनेकों विचित्र शय्याएँ बिछी थीं। महाराज! इस प्रकार उस पर्वतपर अप्सराओंकी क्रीडाका अवलोकन करते हुए राजा पुरूरवा भगवान् केशवमें मनको एकाग्र करके तपस्या करते रहे। एक दिन यूथ-के-यूथ गन्धर्व और अप्सराएँ राजाके निकट जाकर उनसे बोली-'शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! (बड़े सौभाग्यसे) आप इस स्वर्गतुल्य देशमें आ गये हैं, अतः हमलोग आपको मनोऽभिलषित वर प्रदान करेंगी। उन्हें ग्रहणकर यदि आपकी इच्छा हो तो घर चले जाइये अथवा यहीं रहिये' ॥ २६-३७॥

राजाने कहा-गन्धर्वो एवं अप्सराओ! आपलोग अमित तेजस्वी हैं, इससे आपलोगोंका दर्शन कभी निष्फल नहीं होता, इसलिये आपलोग आज ही मुझे ऐसा वरदान दें, जिससे भगवान् मधुसूदनकी कृपा प्राप्त हो जाय। यह

एवमस्त्वित्यथोक्तस्तैः स तु राजा पुरूरवाः।

तत्रोवास सुखी मासं पूजयानो जनार्दनम्॥३९

प्रिय एव सदैवासीद् गन्धर्वाप्सरसां नृपः।

तुतोष स जनो राज्ञस्तस्यालौल्येन कर्मणा॥ ४०

मासस्य मध्ये स नृपः प्रविष्ट-

स्तदाश्रम रत्नसहनचित्रम्।

तोयाशनस्तत्र ह्युवास मासं

यावत्सितान्तो नृप फाल्गुनस्य ।। ४१

फाल्गुनामलपक्षान्ते राजा स्वप्ने पुरूरवाः ।

तस्यैव देवदेवस्य श्रुतवान् गदितं शुभम्॥४२

रात्र्यामस्यां व्यतीतायामत्रिणा त्वं समेष्यसि।

तेन राजन् समागम्य कृतकृत्यो भविष्यसि ॥४३

स्वप्नमेवं स राजर्षिर्दृष्ट्वा देवेन्द्रविक्रमः।

प्रत्यूषकाले विधिवत् स्नातः स प्रयतेन्द्रियः॥४४

कृतकृत्यो यथाकामं पूजयित्वा जनार्दनम्।

ददर्शात्रिं मुनिं राजा प्रत्यक्षं तपसां निधिम्॥ ४५

स्वप्नं तु देवदेवस्य न्यवेदयत धार्मिकः।

ततः शुश्राव वचनं देवतानां समीरितम् ॥ ४६

एवमेतन्महीपाल नात्र कार्या विचारणा।

एवं प्रसादं सम्प्राप्य देवदेवाजनार्दनात्॥ ४७

कृतदेवार्चनो राजा तथा हुतहुताशनः ।

सर्वान् कामानवाप्तोऽसौ वरदानेन केशवात्॥ ४८

सुनकर वे 'एवमस्तु-ऐसा ही होगा'-ऐसा कहकर वहाँसे चले गये। तत्पश्चात् राजा पुरूरवा वहाँ एक मासतक भगवान् जनार्दनकी पूजा करते हुए सुखपूर्वक निवास करते रहे। वे सदा गन्धों एवं अप्सराओंके प्रेमपात्र बने रहे। वे लोग राजाके निर्लोभ कर्मसे परम संतुष्ट थे। राजन् ! उस मासके बीचमें ही राजा पुरूरवाने हजारों रत्नोंसे चित्रित उस आश्रममें प्रवेश किया। वहाँ वे एक मासतक केवल जल पीकर तबतक निवास करते रहे, जबतक फाल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथि नहीं आ गयी। राजा पुरूवाने फाल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिकी रातमें स्वप्नमें उन्हीं देवाधिदेव भगवान् विष्णुद्वारा कहे जाते हुए इस प्रकारके मङ्गलमय शब्दोंको सुना-'राजन्! इस रात्रिके व्यतीत हो जानेपर अत्रिसे तुम्हारी भेंट होगी और उनसे मिलकर तुम कृतकृत्य हो जाओगे। देवराजके समान पराक्रमी राजर्षि पुरूरवाको जब इस प्रकारका स्वप्न दीख पड़ा, तब उन्होंने प्रात:काल उठकर इन्द्रियोंको संयत रखते हुए विधिपूर्वक स्नान किया और इच्छानुसार भगवान् जनार्दनकी पूजा की। तत्पश्चात् उन्हें तपोधन महर्षि अत्रिका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ, जिससे वे कृतकृत्य हो गये। तब धर्मात्मा राजाने महर्षि अत्रिसे देवाधिदेव भगवान्द्वारा दिखाये गये स्वप्नके वृत्तान्तको कह सुनाया। उसी समय उन्होंने देवताओंद्वारा कहे हुए इस वचनको फिर सुना- 'महीपाल! यह ऐसा ही होगा, इसमें तुम्हें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।' इस प्रकार देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी कृपा प्राप्तकर राजाने देवार्चन किया और अग्निमें आहुतियाँ डालीं। इस तरह भगवान् केशवके वरदानसे उनकी सारी कामनाएँ पूरी हो गयीं ॥३८-४८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे ऐलाश्रमवर्णनं नाम विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२०॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णनमें ऐलाश्रमवर्णन नामक एक सौ बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२० ॥