सप्तमीस्नपन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

नारद उवाच

किमुद्वेगाद्भुते कृत्यमलक्ष्मी: केन हन्यते।

मृतवत्साभिषेकादिकार्येषु च किमिष्यते॥१

श्रीभगवानुवाच

पुरा कृतानि पापानि फलन्त्यस्मिंस्तपोधन।

रोगदौर्गत्यरूपेण तथैवेष्टवधेन च॥ २

तद्विघाताय वक्ष्यामि सदा कल्याणकारकम्।

सप्तमीस्नपनं नाम जनपीडाविनाशनम्॥३

बालानां मरणं यत्र क्षीरपाणां प्रदृश्यते।

तद्वद् वृद्धातुराणां च यौवने चापि वर्तताम्॥४

शान्तये तत्र वक्ष्यामि मृतवत्साभिषेचनम्।

एतदेवाद्भुतोद्वेगचित्तभ्रमविनाशनम्

नारदजीने पूछा-प्रभो! किसी आकस्मिक एवं वेगशाली कष्टके प्राप्त होनेपर उसकी निवृत्तिके लिये तथा अद्भुत शान्तिके लिये कौन-सा व्रत करना चाहिये? किस व्रतके अनुष्ठानसे दरिद्रताका विनाश किया जा सकता है तथा जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हैं, उस मृतवत्सा स्त्रीके स्नान आदि कार्यों में उसकी शान्तिके लिये किस व्रतका विधान है?॥ १॥

श्रीभगवान्ने कहा-तपोधन! पूर्वजन्ममें किये हुए पाप इस जन्ममें रोग, दुर्गति तथा इष्टजनोंकी मृत्युके रूपमें फलित होते हैं। उनके विनाशके लिये मैं सदा कल्याणकारी सप्तमीस्नपन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, यह लोगोंकी पीडाका विनाश करनेवाला है। जहाँ दुधमुंहे शिशुओं, वृद्धों, आतुरों और नवयुवकोंकी आकस्मिक मृत्यु देखी जाती है वहाँ उसकी शान्तिके लिये मैं इस 'मृतवत्साभिषेक' को बतला रहा हूँ। यही समस्त अद्भुत नामक उत्पातों, उद्वेगों और चित्तभ्रमका भी विनाशक है॥२-५॥

* सामवेदीय 'अद्भुतब्राह्मण' (ताण्डव २६) तथा अथर्वपररिशिष्ट ७२ में अद्भुत शान्तिका विस्तारसे उल्लेख है।

भविष्यति च वाराहो यत्र कल्पस्तपोधन।

वैवस्वतश्च तत्रापि यदा तु मनुरुत्तमः॥ ६

भविष्यति च तत्रैव पञ्चविंशतिमं यदा।

कृतं नाम युगं तत्र हैहयान्वयवर्धनः।

भविता नृपतिर्वीरः कृतवीर्यः प्रतापवान्॥ ७

स सप्तद्वीपमखिलं पालयिष्यति भूतलम्।

यावद्वर्षसहस्राणि सप्तसप्तति नारद॥ ८

जातमात्रं च तस्यापि यावत् पुत्रशतं तथा।

च्यवनस्य तु शापेन विनाशमुपयास्यति॥ ९

सहस्रबाहुश्च यदा भविता तस्य वै सुतः।

कुरङ्गनयनः श्रीमान् सम्भूतो नृपलक्षणैः॥१०

कृतवीर्यस्तदाऽऽराध्य सहस्रांशुं दिवाकरम् ।

उपवासैतैर्दिव्यैर्वेदसूक्तैश्च नारद।

पुत्रस्य जीवनायालमेतत् स्नानमवाप्स्यति॥११

कृतवीर्येण वै पृष्ट इदं वक्ष्यति भास्करः।

अशेषदुष्टशमनं सदा कल्मषनाशनम्॥१२

सूर्य उवाच

अलं क्लेशेन महता पुत्रस्तव नराधिप।

भविष्यति चिरंजीवी किंतु कल्मषनाशनम्॥१३

सप्तमीस्नपनं वक्ष्ये सर्वलोकहिताय वै।

जातस्य मृतवत्सायाः सप्तमे मासि नारद।

अथवा शुक्लसप्तम्यामेतत् सर्वं प्रशस्यते॥१४

ग्रहताराबलं लब्ध्वा कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।

बालस्य जन्मनक्षत्रं वर्जयेत् तां तिथिं बुधः।

तद्वद् वृद्धातुराणां च कृत्यं स्यादितरेषु च॥१५

गोमयेनानुलिप्तायां भूमावेकाग्निवत् तदा।

तण्डुलै रक्तशालीयैश्चरुं गोक्षीरसंयुतम्।

निर्वपेत् सूर्यरुद्राभ्यां तन्मन्त्राभ्यां विधानतः॥१६

कीर्तयेत् सूर्यदैवत्यं सप्ताचि च घृताहुतीः।

जुहुयाद् रुद्रसूक्तेन तद्वद् रुद्राय नारद ॥१७

तपोधन! जब वाराह-कल्प आयेगा, उसमें भी जब श्रेष्ठ वैवस्वत मनुका कार्यकाल होगा, उसमें जब पचीसवाँ कृतयुग आयेगा तब कृतवीर्य नामका एक प्रतापी एवं शूरवीर नरेश उत्पन्न होगा जो हैहयवंशकी वृद्धि करनेवाला होगा। नारद! वह सतहत्तर हजार वर्षोंतक सातों द्वीपोंकी समस्त पृथ्वीका पालन करेगा। उसके सौ पुत्र होंगे, परंतु महर्षि च्यवनके शापसे वे सभी जन्मते ही नष्ट हो जायँगे। नारद! जब उसके सहस्र भुजाधारी, मृग-नेत्र-सरीखे नेत्रोंवाला, शोभाशाली एवं सम्पूर्ण राज-लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र उत्पन्न होगा तब राजा कृतवीर्य अपने उस पुत्रके दीर्घ जीवनकी प्राप्तिके निमित्त उपवास, व्रत तथा दिव्य वेद-सूक्तोंद्वारासहस्रकिरणधारी सूर्यकी आराधना करके इस विशेष स्नान (सपनव्रत)-को प्राप्त करेगा। उस समय कृतवीर्यद्वारा पूछे जानेपर भगवान् सूर्य अखिल दोषोंके शामक एवं पापनाशक इस व्रतको बतलायेंगे॥६-१२॥

भगवान् सूर्य कहेंगे-नरेश्वर! अब तुम अधिक कष्ट मत सहन करो, तुम्हारा पुत्र चिरंजीवी होगा, किंतु सम्पूर्ण लोकोंके हितके हेतु मैं जिस पापनाशक सप्तमीस्नपन- व्रतका वर्णन करूँगा, उसका अनुष्ठान तुम्हें भी करना चाहिये। नारद! मृतवत्सा स्त्रीके नवजात शिशुके लिये सातवें महीने में अथवा शुक्लपक्षकी किसी भी सप्तमी तिथिको यह सारा कार्य प्रशस्त माना गया है। यदि उस तिथिको बालकका जन्म-नक्षत्र पड़ता हो तो बुद्धिमान् कर्ताको उस तिथिका त्याग कर देना चाहिये। उसी प्रकार वृद्ध, रोगी अथवा अन्य लोगोंके लिये भी किये जानेवाले कार्यमें इसका विचार करना आवश्यक है। व्रतारम्भमें व्रती ग्रहबल एवं ताराबलको अपने अनुकूल पाकर ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराये और गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर एकाग्निक उपासककी भाँति गो- दुग्धके साथ लाल अगहनीके चावलोंसे हव्यान्न पकाये, फिर सूर्य और रुद्रको पृथक्-पृथक् उनके मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक वह हव्यान्न प्रदान करे। उस समय सूर्यसूक्तकी सात ऋचाओंका पाठ करे और अग्निमें घीकी सात आहुतियोंसे हवन करे। नारद! रुद्रके लिये भी उसी प्रकार

होतव्याः समिधश्चात्र तथैवार्कपलाशयोः ।

यवकृष्णतिलै.मः कर्तव्योऽष्टशतं पुनः॥१८

व्याहृतिभिस्तथाऽऽज्येन तथैवाष्टशतं पुनः।

हुत्वा स्नानं च कर्तव्यं मङ्गलं येन धीमता॥१९

विप्रेण वेदविदुषा विधिवद् दर्भपाणिना।

स्थापयित्वा तु चतुरः कुम्भान्कोणेषु शोभनाम्॥२०

पञ्चमं च पुनर्मध्ये दध्यक्षतविभूषितम्।

स्थापयेदवणं कुम्भं सप्तर्चेनाभिमन्त्रितम्॥२१

सौरेण तीर्थतोयेन पूर्णं रत्नसमन्वितम्।

सर्वान् सर्वोषधैर्युक्तान् पञ्चगव्यसमन्वितान्।

पञ्चरत्नफलैः पुष्पैर्वासोभिः परिवेष्टयेत्॥ २२

गजाश्वरथ्यावल्मीकात् संगमाद्धदगोकुलात्।

संशुद्धां मृदमानीय सर्वेष्वेव विनिक्षिपेत् ।। २३

चतुर्ध्वपि च कुम्भेषु रत्नगर्भेषु मध्यमम्।

गृहीत्वा ब्राह्मणस्तत्र सौरान् मन्त्रानुदीरयेत्॥२४

नारीभिः सप्तसंख्याभिरव्यङ्गाङ्गीभिरत्र च।

पूजिताभिर्यथाशक्त्या माल्यवस्त्रविभूषणैः ।

सविप्राभिश्च कर्तव्यं मृतवत्साभिषेचनम्॥२५

दीर्घायुरस्तु बालोऽयं जीवत्पुत्रा च भामिनी।

आदित्यश्चन्द्रमाः सार्धं ग्रहनक्षत्रमण्डलैः ।। २६

सशक्रा लोकपाला वै ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।

ते ते चान्ये च देवौघाः सदा पान्तु कुमारकम्॥ २७

मित्रः शनिर्वा हुतभुग्ये च बालग्रहाः क्वचित्।

पीडां कुर्वन्तु बालस्य मा मातुर्जनकस्य वै॥ २८

ततः शुक्लाम्बरधरा कुमारपतिसंयुता।

सप्तकं पूजयेद् भक्त्या स्त्रीणामथ गुरुं पुनः ।। २९

काञ्चनीं च ततः कुर्यात् ताम्रपात्रोपरिस्थिताम्।

प्रतिमां धर्मराजस्य गुरवे विनिवेदयेत्॥ ३०

रुद्रसूक्तकी ऋचाओंका पाठ एवं उनके द्वारा हवन करना चाहिये। इस व्रतमें हवनके लिये मन्दार और पलाशकी समिधा होनी चाहिये। पुनः जौ और काले तिलद्वारा एक सौ आठ बार हवन करनेका विधान है। उसी प्रकार व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्)- के उच्चारणपूर्वक एक सौ आठ बार घीकी आहुति देनी चाहिये। इस प्रकार हवन करके बुद्धिमान् व्रती पुनः स्नान करे; क्योंकि इससे मङ्गलकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर हाथमें कुश लिये हुए वेदज्ञ ब्राह्मणद्वारा वेदीके चारों कोणोंमें चार सुन्दर कलश स्थापित कराये। पुनः उसके बीचमें छिद्ररहित पाँचवाँ कलश स्थापित करे। उसे दही अक्षतसे विभूषित करके सूर्यसम्बन्धिनी सात ऋचाओंसे अभिमन्त्रित कर दे। फिर उसे तीर्थ-जलसे भरकर उसमें रत्न या सुवर्ण डाल दे। इसी प्रकार सभी कलशोंमें सौषधि, पञ्चगव्य, पञ्चरत्न, फल और पुष्प डालकर उन्हें वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर हाथीसार, घुड़शाल, विमवट, नदीके संगम, तालाब, गोशाला और राजद्वारसे शुद्ध मिट्टी लाकर उन सभी कलशोंमें छोड़ दे॥१३-२३॥

तदनन्तर कार्यकर्ता ब्राह्मण रत्नगर्भित चारों कलशोंके मध्यमें स्थित पाँचवें कलशको हाथमें लेकर सूर्य-मन्त्रोंका पाठ करे तथा सात ऐसी स्त्रियोंद्वारा, जो किसी अङ्गसे हीन न हों तथा जिनकी यथाशक्ति पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषणोंद्वारा पूजा की गयी हो, ब्राह्मणके साथ-साथ उस घड़ेके जलसे मृतवत्सा स्त्रीका अभिषेक कराये। (अभिषेकके समय इस प्रकार कहे-) 'यह बालक दीर्घायु और यह स्त्री जीवत्पुत्रा (जीवित पुत्रवाली) हो। सूर्य, ग्रहों और नक्षत्र-समूहोंसहित चन्द्रमा, इन्द्रसहित लोकपालगण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, इनके अतिरिक्त अन्यान्य जो देव-समूह हैं, वे सभी इस कुमारकी सदा रक्षा करें। सूर्य, शनि, अग्नि अथवा अन्यान्य जो कोई बालग्रह हों वे सभी इस बालकको तथा इसके माता-पिताको कहीं भी कष्ट न पहुँचायें।' अभिषेकके पश्चात् वह स्त्री श्वेत वस्त्र धारण करके अपने बच्चे और पतिके साथ उन सातों स्त्रियोंकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पुनः गुरुकी पूजा करके धर्मराजकी स्वर्णमयी प्रतिमाको ताम्रपात्रके ऊपर स्थापित करके गुरुको निवेदित कर दे।

वस्त्रकाञ्चनरत्नौधैर्भक्ष्यैः सघृतपायसैः।

पूजयेद् ब्राह्मणांस्तद्वद् वित्तशाठ्यविवर्जितः॥३१

भुक्त्वा च गुरुणा चेयमुच्चार्या मन्त्रसन्ततिः।

दीर्घायुरस्तु बालोऽयं यावद्वर्षशतं सुखी॥३२

यत्किंञ्चिदस्य दुरितं तत् क्षिप्तं वडवानले।

ब्रह्मा रुद्रो वसुः स्कन्दो विष्णुः शक्रो हुताशनः॥३३

रक्षन्तु सर्वे दुष्टेभ्यो वरदाः सन्तु सर्वदा।

एवमादीनि वाक्यानि वदन्तं पूजयेद् गुरुम्॥३४

शक्तित: कपिलां दद्यात् प्रणम्य च विसर्जयेत्।

चरुं च पुत्रसहिता प्रणम्य रविशङ्करौ॥३५

हुतशेषं तदाश्नीयादादित्याय नमोऽस्त्विति।

इदमेवाद्भुतोद्वेगदुःस्वप्नेषु प्रशस्यते॥३६

कर्तुर्जन्मदिनौं च त्यक्त्वा सम्पूजयेत् सदा।

शान्त्यर्थं शुक्लसप्तम्यामेतत् कुर्वन् न सीदति॥३७

सदानेन विधानेन दीर्घायुरभवन्नरः।

संवत्सराणामयुतं शशास पृथिवीमिमाम् ॥ ३८

पुण्यं पवित्रमायुष्यं सप्तमीस्नपनं रविः।

कथयित्वा द्विजश्रेष्ठ तत्रैवान्तरधीयत॥३९

एतत् सर्वं समाख्यातं सप्तमीस्नानमुत्तमम् ।

सर्वदुष्टोपशमनं बालानां परमं हितम्॥४०

आरोग्यं भास्करादिच्छेद्धनमिच्छेद्भुताशनात्।

ईश्वराज्ज्ञानमन्विच्छेन्मोक्षमिच्छेजनार्दनात्॥४१

एतन्महापातकनाशनं स्यात्

परं हितं बालविवर्धनं च।

शृणोति यश्चैनमनन्यचेता-

स्तस्यापि सिद्धिं मुनयो वदन्ति॥४२

उसी प्रकार कृपणता छोड़कर अन्य ब्राह्मणोंका भी वस्त्र, सुवर्ण, रत्नसमूह आदिसे पूजन करके उन्हें घी और खीरसहित भक्ष्य पदार्थोंका भोजन कराये। भोजनोपरान्त गुरुदेवको इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये-'यह बालक दीर्घायु हो और सौ वर्षोंतक सुखका उपभोग करे। इसका जो कुछ पाप था उसे बडवानलमें डाल दिया गया। ब्रह्मा, रुद्र, वसुगण, स्कन्द, विष्णु, इन्द्र और अग्नि- ये सभी दुष्ट ग्रहोंसे इसकी रक्षा करें और सदा इसके लिये वरदायक हों।' इस प्रकारके वाक्योंका उच्चारण करनेवाले गुरुदेवका यजमान पूजन करे। अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें एक कपिला गौ प्रदान करे और फिर प्रणाम करके विदा कर दे। तत्पश्चात् मृतवत्सा स्त्री पुत्रको गोदमें लेकर सूर्यदेव और भगवान् शंकरको नमस्कार करे और हवनसे बचे हुए हव्यानको 'सूर्यदेवको नमस्कार है'- यह कहकर खा जाय। यही व्रत आश्चर्यजनक उद्विग्नता और दुःस्वप्न आदिमें भी प्रशस्त माना गया है॥ २४-३६ ॥

इस प्रकार कर्ताके जन्मदिनके नक्षत्रको छोड़कर शान्ति-प्राप्तिके हेतु शुक्ल-पक्षकी सप्तमी तिथिमें सदा (सूर्य और शंकरका) पूजन करना चाहिये; क्योंकि इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाला कभी कष्टमें नहीं पड़ता। जो मनुष्य सदा इस विधानके अनुसार इस व्रतका अनुष्ठान करता है वह दीर्घायु होता है। (इसी व्रतके प्रभावसे) कृतवीर्यने दस हजार वर्षांतक इस पृथ्वीपर शासन किया था। द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार सूर्यदेव इस पुण्यप्रद, परम पावन और आयुवर्धक सप्तमीस्नपन-व्रतका विधान बतलाकर वहीं अन्तर्हित हो गये। इस प्रकार मैंने इस सप्तमीस्नपन-व्रतका, जो सर्वश्रेष्ठ, समस्त दोषोंको शान्त करनेवाला और बालकोंके लिये परम हितकारक है, समग्ररूपसे वर्णन कर दिया। मनुष्यको सूर्यसे नीरोगता, अग्निसे धन, ईश्वर (शिवजी)-से ज्ञान और भगवान् जनार्दनसे मोक्षकी अभिलाषा करनी चाहिये। यह व्रत बड़े-से-बड़े पापोंका विनाशक, बाल-वृद्धिकारक तथा परम हितकारी है। जो मनुष्य अनन्यचित्त होकर इस व्रत-विधानको श्रवण करता है, उसे भी सिद्धि प्राप्त होती है, ऐसा मुनियोंका कथन है॥३७-४२॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सप्तमीस्नपनव्रतं नामाष्टषष्टितमोध्यायः॥६८॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सप्तमीनपन-व्रत नामक अड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६८॥