सप्तसागर-दानकी विधि

मत्स्य उवाच

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।

सप्तसागरकं नाम सर्वपापप्रणाशनम्॥ १

पुण्यं दिनमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।

तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः॥ २

ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ।

कारयेत् सप्त कुण्डानि काञ्चनानि विचक्षणः॥ ३

प्रादेशमात्राणि तथारलिमात्राणि वै पुनः।

कुर्यात् सप्तपलादूर्ध्वमासहस्राच्च शक्तितः॥ ४

संस्थाप्यानि च सर्वाणि कृष्णाजिनतिलोपरि।

प्रथमं पूरयेत् कुण्डं लवणेन विचक्षणः॥ ५

द्वितीयं पयसा तद्वत् तृतीयं सर्पिषा पुनः ।

चतुर्थं तु गुडेनैव दना पञ्चममेव च॥ ६

षष्ठं शर्करया तद्वत् सप्तमं तीर्थवारिणा।

स्थापयेल्लवणस्थं तु ब्रह्माणं काञ्चनं शुभम्॥ ७

केशवं क्षीरमध्ये तु घृतमध्ये महेश्वरम्।

भास्करं गुडमध्ये तु दधिमध्ये निशाधिपम्॥ ८

शर्करायां न्यसेल्लक्ष्मी जलमध्ये तु पार्वतीम्।

सर्वेषु सर्वरतानि धान्यानि च समन्ततः॥ ९

मत्स्यभगवान्ने कहा-अब मैं सम्पूर्ण पापोंके विनाशक परमोत्तम सप्तसागर नामक महादानकी विधि बतला रहा हूँ। बुद्धिमान् पुरुष तुलापुरुष-दानकी तरह किसी पवित्र दिनके आनेपर पुण्याहवाचन करके लोकपालोंका आवाहन करे। तथा ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण, आच्छादन आदिका प्रबन्ध भी उसी तरह करे। विचक्षण पुरुष स्वर्णनिर्मित सात स्वतन्त्र कुण्डोंका निर्माण करे। ये कुण्ड एक बित्ता चौड़े तथा एक अरनि अर्थात् बँधी हुई मुट्ठीवाले हाथ-जितने लम्बे होने चाहिये। इन्हें अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार सात पल सोनेसे ऊपर एक हजार पलतकका बनवाना चाहिये। इन सभी कुण्डोंको कृष्णमृगके चर्मपर रखे गये तिलोंके ऊपर स्थापित करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको प्रथम कुण्डको लवणसे, द्वितीय कुण्डको दुग्धसे, तृतीयको घृतसे, चतुर्थको गुड़से, पञ्चमको दहीसे, छठेको चीनीसे तथा सातवेंको तीर्थोके पवित्र जलसे पूर्ण करना चाहिये। फिर लवण कुण्डमें सुवर्ण-निर्मित ब्रह्माकी, दुग्धकुण्डके मध्यमें भगवान् विष्णुकी, घृतकुण्डमें भगवान् शिवकी, गुड़कुण्डमें भगवान् भास्करकी, दधिकुण्डमें चन्द्रमाकी, शर्कराकुण्डमें लक्ष्मीकी और जलकुण्डमें पार्वतीकी स्थापना करनी चाहिये। सभी कुण्डोंको सभी ओरसे रत्नों तथा अन्नोंद्वारा अलंकृत करना

तुलापुरुषवच्छेषमत्रापि परिकल्पयेत्।

ततो वारुणहोमान्ते स्नापितो वेदपुङ्गवैः॥१०

त्रिः प्रदक्षिणमावृत्य मन्त्रानेतानुदीरयेत्।

नमो वः सर्वसिन्धूनामाधारेभ्यः सनातनाः।

जन्तूनां प्राणदेभ्यश्च समुद्रेभ्यो नमो नमः ॥ ११

क्षीरोदकाज्यदधिमाधुरलावणेक्षु-

सारामृतेन भुवनत्रयजीवसंघान्।

आनन्दयन्ति वसुभिश्च यतो भवन्त-

स्तस्मान्ममाप्यघविघातमलं विशन्तु॥१२

यस्मात् समस्तभुवनेषु भवन्त एव

तीर्थामरासुरसुबद्धमणिप्रदानम्

पापक्षयामृतविलेपनभूषणाय

लोकस्य बिभ्रति तदस्तु ममापिलक्ष्मीः॥१३

इति ददाति रसामृतसंयुता-

छुचिरविस्मयवानिह सागरान्।

अमलकाञ्चनवर्णमयानसौ

पदमुपैति हरेरमरार्चितः ॥१४

सकलपापविधौतविराजितः

पितृपितामहपुत्रकलत्रकम्

नरकलोकसमाकुलमप्ययं

झटिति सोऽपि नयेच्छिवमन्दिरम्॥१५

चाहिये। शेष कार्य तुलापुरुषदानकी भाँति सम्पन्न करना चाहिये। तत्पश्चात् महावारुणी आहुतियाँ प्रदानकर वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा अभिषिक्त यजमान इन कुण्डोंकी तीन बार प्रदक्षिणा कर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे॥१-१०॥

'सनातन सागरगण! आपलोग समस्त जीवोंके प्राणदाता तथा सम्पूर्ण नदियोंके आधार हो, आपको बारंबार नमस्कार है। चूंकि आपलोग दुग्ध, जल, घृत, दही, मधु, लवण, शक्कररूप अमृत तथा रत्नादि सम्पत्तियोंद्वारा त्रिभुवनके जीवसमूहोंको आनन्दित करते हैं, अतः मेरे भी पापपुञ्जोंका विनाश करें। चूँकि आपलोग ही समस्त भुवनोंमें लोकके पापक्षय, अमृतविलेपन और भूषणके निमित्त तीर्थों, देवताओं, असुरों और सुन्दर मणिके प्रदान-कार्यको धारणवाले हैं, अतः वह लक्ष्मी मुझे भी प्राप्त हो।' इस प्रकार जो मनुष्य पवित्र एवं विस्मयरहित होकर इस लोकमें रस एवं अमृतसे युक्त निर्मल सोनेके बने सागरोंका दान करता है, वह देवताओंद्वारा पूजित होकर भगवान् विष्णुके पदको प्राप्त करता है। सम्पूर्ण पापोंके धुल जानेसे विशुद्ध हुआ यह पुरुष नरकलोकमें व्याकुल हुए पिता, पितामह, पुत्र और पत्नी आदिको भी शीघ्र ही शिवलोकमें ले जाता है॥११-१५ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने सप्तसागरप्रदानविधिर्नाम सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥२८७॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानवर्णन-प्रसङ्गमें सप्तसागरदान-विधि नामक दो सौ सतासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८७ ॥