पुराण-श्रवण-कालमें पालनीय धर्म

श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसाः।

वाग्यताः शुचयोऽव्यग्राः श्रोतारः पुण्यभागिनः॥ १

अभक्त्या ये कथांपुण्यां शृण्वन्ति मनुजाधमाः।

तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखं स्याज्जन्मजन्मनि॥ २

पुराणं ये च सम्पूज्य ताम्बूलाद्यैरुपायनैः ।

शृण्वन्ति च कथां भक्त्याऽदरिद्राः स्युर्न संशयः॥ ३

कथायां कीय॑मानायां ये गच्छन्त्यन्यतो नराः।

भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः॥ ४

जो लोग श्रद्धा और भक्तिसे सम्पन्न, अन्य कार्योंकी लालसासे रहित, मौन, पवित्र और शान्तचित्तसे (पुराणकी कथाको) श्रवण करते हैं, वे ही पुण्यके भागी होते हैं। जो अधम मनुष्य भक्तिरहित होकर पुण्यकथाको सुनते हैं, उन्हें पुण्यफल तो मिलता नहीं, उलटे प्रत्येक जन्ममें दुःख भोगना पड़ता है। जो लोग ताम्बूल, पुष्प, चन्दन आदि पूजन-सामग्रियोंद्वारा पुराणकी भलीभाँति पूजा करके भक्तिपूर्वक कथा सुनते हैं, वे नि:संदेह दरिद्रतारहित अर्थात् धनवान् होते हैं। जो मनुष्य कथा होते समय अन्य कार्यके लिये वहाँसे उठकर अन्यत्र चले जाते हैं, उनकी पत्नी और

सोष्णीषमस्तका येच कथां शृण्वन्ति पावनीम्।

ते बलाकाः प्रजायन्ते पापिनो मनुजाधमाः॥ ५

ताम्बूलं भक्षयन्तो ये कथां शृण्वन्ति पावनीम्।

श्वविष्ठां खादयन्त्येतान्नयन्ति यमकिङ्कराः॥ ६

ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः।

अक्षय्यनरकान् भुक्त्वा ते भवन्त्येव वायसाः॥ ७

ये वै वरासनारूढा ये च मध्यासनस्थिताः।

शृण्वन्ति सत्कथां ते वै भवन्त्यर्जुनपादपाः॥ ८

असम्प्रणम्य शृण्वन्ति विषभक्षा भवन्ति ते।

तथा शयानाः शृण्वन्ति भवन्त्यजगरा नराः॥ ९

यः शृणोति कथां वक्तुः समानासनसंस्थितः।

गुरुतल्पसमं पापं सम्प्राप्य नरकं व्रजेत्॥१०

ये निन्दन्ति पुराणज्ञान् कथां वै पापहारिणीम्।

ते वै जन्मशतं मर्त्याः सूकराः सम्भवन्ति हि॥११

कथायां कीर्त्यमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम्।

ते गर्दभाः प्रजायन्ते कृकलासास्तथैव च॥१२

कदाचिदपि ये पुण्यां न शृण्वन्ति कथां नराः।

ते भुक्त्वा नरकान् घोरान् भवन्ति वनसूकराः॥१३

ये कथामनुमोदन्ते कीर्त्यमानां नरोत्तमाः।

अशृण्वन्तोऽपि ते यान्ति शाश्वतं परमं पदम्॥१४

कथायां कीय॑मानायां विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः।

कोट्यब्दं नरकान् भुक्त्वा भवन्ति ग्रामसूकराः॥१५

ये श्रावयन्ति मनुजान् पुण्यां पौराणिकी कथाम्।

कल्पकोटिशतं साग्रं तिष्ठन्ति ब्रह्मण: पदे॥१६

आसनार्थं प्रयच्छन्ति पुराणज्ञस्य ये नराः।

कम्बलाजिनवासांसि मञ्चं फलकमेव च ॥१७

स्वर्गलोकं समासाद्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्।

स्थित्वा ब्रह्मादिलोकेषु पदं यान्ति निरामयम्॥१८

पुराणस्य प्रयच्छन्ति ये वरासनमुत्तमम्।

भोगिनो ज्ञानसम्पन्ना भवन्ति च भवे भवे॥१९

सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। जो पापी अधम मनुष्य मस्तकपर पगड़ी बाँधकर (या टोपी लगाकर) पवित्र कथाको सुनते हैं, वे (दूसरे जन्ममें) बगुला होकर उत्पन्न होते हैं। जो लोग पान चबाते हुए पवित्र कथाको सुनते हैं, उन्हें कुत्तेका मल खाना पड़ता है और यमदूत उन्हें यमपुरीमें ले जाते हैं। जो ढोंगी मनुष्य (व्यासासनसे) ऊँचे आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे ही अक्षय नरकोंका भोग करके कौआ होते हैं। जो लोग (व्यासासनसे) श्रेष्ठ आसनपर अथवा मध्यम आसनपर बैठकर उत्तम कथाको श्रवण करते हैं, वे अर्जुन नामक वृक्ष होते हैं। जो मनुष्य (पुराणकी पुस्तक और व्यासको) बिना प्रणाम किये ही कथा सुनते हैं, वे विषभक्षी होते हैं तथा जो लोग सोते हुए कथा सुनते हैं, वे अजगर साँप होते हैं॥१-९॥

इसी प्रकार जो वक्ताके समान आसनपर बैठकर कथा सुनता है, वह गुरु-शय्या-गमनके समान पापका भागी होकर नरकगामी होता है। जो मनुष्य पुराणोंके ज्ञाता (व्यास) और पापोंको हरण करनेवाली कथाकी निन्दा करते हैं, वे सौ जन्मोंतक सूकर-योनिमें उत्पन्न होते हैं। कथा होते समय जो लोग वक्ताको बुरा उत्तर देते  हैं, वे गदहा तथा गिरगिटकी योनिमें पैदा होते हैं। जो मनुष्य इस पुण्य कथाको कभी भी नहीं सुनते, वे घोर नरकोंका भोग करके बनैले सूअर होते हैं। जो नरश्रेष्ठ कही जाती हुई कथाका अनुमोदन करते हैं, वे कथा न सुननेपर भी अविनाशी परम पदको प्राप्त होते हैं। जो दुष्ट कही जाती हुई कथामें विघ्न पैदा करते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरकोंका भोग करके अन्तमें ग्रामीण सूअर होते हैं। जो लोग साधारण मनुष्योंको पुराणसम्बन्धिनी पुण्य कथा सुनाते हैं, वे सौ करोड़ कल्पोंसे भी अधिक समयतक ब्रह्मलोकमें निवास करते हैं। जो मनुष्य पुराणके ज्ञाता वक्ताको आसनके लिये कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, सिंहासन और चौकी प्रदान करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाकर अभीष्ट भोगोंका उपभोग करनेके बाद ब्रह्मा आदिके लोकोंमें निवास कर अन्तमें निरामय पदको प्राप्त होते हैं ॥१०-१८॥

इसी तरह जो लोग पुराणकी पुस्तकके लिये उत्तम श्रेष्ठ आसन प्रदान करते हैं, वे प्रत्येक जन्ममें भोगोंका उपभोग करनेवाले एवं ज्ञानी होते हैं।

ये महापातकैर्युक्ता उपपातकिनश्च ये।

पुराणश्रवणादेव ते प्रयान्ति परं पदम्॥२०

एवंविधविधानेन पुराणं शृणुयान्नरः।

भुक्त्वा भोगान् यथाकामं विष्णुलोकं प्रयाति सः॥२१

पुस्तकं पूजयेत् पश्चाद् वस्त्रालङ्करणादिभिः ।

वाचकं विप्रसंयुक्तं पूजयीत प्रयत्नवान्॥२२

गोभूमिहेमवस्त्राणि वाचकाय निवेदयेत्।

ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चान्मण्डलड्डुकपायसैः॥ २३

त्वं व्यासरूपी भगवन् बुद्ध्या चाङ्गिरसोपमः ।

पुण्यवाशीलसम्पन्नः सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥२४

प्रसन्नमानसं कुर्याद् दानमानोपचारतः।

त्वत्प्रसादादिमान् धर्मान् सम्पूर्णाश्रुतवानहम्॥ २५

एवं प्रार्थनकं कृत्वा व्यासस्य परमात्मनः ।

यशस्वी च भवेन्नित्यं यः कुर्यादेवमादरात्॥ २६

नारदोक्तानिमान् धर्मान् यः कुर्यान्नियतेन्द्रियः।

कृत्स्नं फलमवाप्नोति पुराणश्रवणस्य वै॥२७

सूत उवाच

मत्स्यरूपी स भगवान् मनवे बुद्धिशालिने।

अवापोद्घातसहितमुक्त्वा ह्यन्तर्दधौ तदा ॥२८॥

जो महापातकोंसे युक्त होते हैं अथवा जो उपपातकी होते हैं, वे सभी पुराणकी कथा सुननेसे ही परम पदको प्राप्त हो जाते हैं। जो मनुष्य इस प्रकारके नियम-विधानसे पुराणकी कथा सुनता है, वह स्वेच्छानुसार भोगोंको भोगकर विष्णुलोकको चला जाता है। कथा समाप्त होनेपर श्रोता पुरुष प्रयत्नपूर्वक वस्त्र और अलंकार आदिद्वारा पुस्तककी पूजा करे। तत्पश्चात् सहायक ब्राह्मणसहित वाचककी पूजा करे। उस समय वाचकको गौ, पृथ्वी, सोना और वस्त्र देना चाहिये। तदुपरान्त ब्राह्मणोंको मलाई, लड्डू और खीरका भोजन कराना चाहिये। तदनन्तर परमात्मा व्याससे प्रार्थना करे-'आप व्यासरूपी भगवान् ! बुद्धिमें बृहस्पतिके समान, पुण्यवान्, शीलसम्पन्न, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हैं, आपकी कृपासे मैंने इन सम्पूर्ण धर्मोको सुना है।' इस प्रकार प्रार्थना कर दान, मान और सेवासे उनके मनको प्रसन्न करना चाहिये। जो मनुष्य इस प्रकार आदरपूर्वक करता है, वह सदा यशस्वी होता है। जो जितेन्द्रिय मनुष्य देवर्षि नारदद्वारा कहे गये इन धर्मोंका पालन करता है, वह पुराण-श्रवणका सम्पूर्ण फल पाता है॥ १९-२७॥

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! समय मत्स्यरूपी भगवान् बुद्धिशाली मनुसे आदि-अन्त- सहित इस पुराणको कहकर अन्तर्हित हो गये ॥ २८ ॥

इति पुराणश्रवणकालीनधर्माः।

इति श्रीमद्वैपायनमुनिप्रणीतं मत्स्यपुराणं समाप्तम्।

इस प्रकार श्रीमद्वैपायनमुनिप्रणीत मत्स्यपुराण समाप्त हुआ।