मत्स्य महा पुराण
प्रयागमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवके निवासका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
कथं सर्वमिदं प्रोक्तं प्रयागस्य महामुने।
एतन्नः सर्वमाख्याहि यथा हि मम तारयेत्॥१
मार्कण्डेय उवाच
शृणु राजन् प्रयागे तु प्रोक्तं सर्वमिदं जगत्।
ब्रह्मा विष्णुस्तथेशानो देवताः प्रभुरव्ययः॥२
ब्रह्मा सृजति भूतानि स्थावरं जङ्गमं च यत्।
तान्येतानि परं लोके विष्णुः संवर्धते प्रजाः॥३
कल्पान्ते तत् समग्रं हि रुद्रः संहरते जगत्।
तदा प्रयागतीर्थं च न कदाचिद् विनश्यति॥४
ईश्वरं सर्वभूतानां यः पश्यति स पश्यति।
यत्नेनानेन तिष्ठन्ति ते यान्ति परमां गतिम्॥५
युधिष्ठिर उवाच
आख्याहि मे यथातथ्यं यथैषा तिष्ठति श्रुतिः।
केन वा कारणेनैव तिष्ठन्ते लोकसत्तमाः॥६
मार्कण्डेय उवाच
प्रयागे निवसन्त्येते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।
कारणं तत् प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं युधिष्ठिर॥७
पञ्चयोजनविस्तीर्णं प्रयागस्य तु मण्डलम्।
तिष्ठन्ति रक्षणायात्र पापकर्मनिवारणात्॥८
उत्तरेण प्रतिष्ठानाच्छद्मना ब्रह्म तिष्ठति।
वेणीमाधवरूपी तु भगवांस्तत्र तिष्ठति॥९
युधिष्ठिरने पूछा-महामुने! आपने तो यह सारा महत्त्व प्रयागका ही बतलाया है, इसका क्या कारण है? यह सब मुझे बतलाइये, जिससे मेरा तथा मेरे कुटुम्बका उद्धार हो जाय ॥ १॥
मार्कण्डेयजीने कहा-राजन्! इसका कारण सुनो। प्रयागमें इस सारे जगत्का निवास बतलाया जाता है। यहाँ अविनाशी एवं सामर्थ्यशाली ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा सम्पूर्ण देवता वास करते हैं, ब्रह्मा जिन स्थावर- जङ्गमरूप प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं, उन सभी प्रजाओंका इस लोकमें भगवान् विष्णु पालन करते हैं तथा कल्पान्तमें रुद्र इस सारे जगत्का संहार कर देते हैं, किंतु इस प्रयागतीर्थका कभी विनाश नहीं होता। सम्पूर्ण प्राणियोंका जो ईश्वर है, उसे जो देखता है, वही सचमुच देखनेवाला है। इस प्रयत्नसे जो लोग प्रयागमें निवास करते हैं, वे परमगतिको प्राप्त होते हैं ॥२-५॥
युधिष्ठिरने पूछा-मुने! ये लोकश्रेष्ठ देवगण किस कारणवश प्रयागमें निवास करते हैं, इस विषयमें जैसा श्रुति-वचन हो, उसके अनुसार मुझे यथार्थरूपसे बतलाइये ॥ ६॥
मार्कण्डेयजीने कहा-युधिष्ठिर ! ये ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिस प्रयोजनसे प्रयागमें निवास करते हैं, वह कारण बतला रहा हूँ; उसके तत्त्वको श्रवण करो। प्रयागका मण्डल पाँच योजनमें फैला हुआ है। यहाँ पापकर्मका निवारण तथा प्राणियोंकी रक्षा करनेके लिये उपर्युक्त देवगण निवास करते हैं। प्रतिष्ठानपुरसे उत्तरकी ओर गुप्तरूपसे ब्रह्माजी निवास करते हैं। भगवान् विष्णु प्रयागमें वेणीमाधवरूपसे विद्यमान हैं
महेश्वरो वटो भूत्वा तिष्ठते परमेश्वरः ।
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।
रक्षन्ति मण्डलं नित्यं पापकर्मनिवारणात्॥१०
यस्मिञ्जुह्वन् स्वकं पापं नरकं च न पश्यति।
एवं ब्रह्मा च विष्णुश्च प्रयागे समहेश्वरः॥११
सप्तद्वीपाः समुद्राश्च पर्वताश्च महीतले। ।
रक्षमाणाश्च तिष्ठन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥१२
ये चान्ये बहवः सर्वे तिष्ठन्ति च युधिष्ठिर।
पृथिवीं तत्समाश्रित्य निर्मिता दैवतैस्त्रिभिः ॥१३
प्रजापतेरिदं क्षेत्रं प्रयागमिति विश्रुतम्।
एतत् पुण्यं पवित्रं वै प्रयागं च युधिष्ठिर।
स्वराज्यं कुरु राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितोऽनघ॥१४
तथा परमेश्वर शिव अक्षयवटके रूपमें स्थित हैं। इनके अतिरिक्त गन्धर्वोसहित देवगण, सिद्धसमूह तथा यूथ-के-यूथ परमर्षि पाप-कर्मसे निवारण करनेके निमित्त नित्य प्रयागमण्डलकी रक्षा करते हैं, जिस मण्डलमें अपने पापोंका हवन करके प्राणी नरकका दर्शन नहीं करता, इस प्रकार प्रयागमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, सातों द्वीप, सातों समुद्र और भूतलपर स्थित सभी पर्वत उसकी रक्षा करते हुए प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। युधिष्ठिर! इनके अतिरिक्त अन्य जो बहुत-से देवता पृथ्वीका आश्रय लेकर निवास करते हैं, उनके निवासस्थानका निर्माण इन्हीं तीनों देवताओंद्वारा हुआ है। यह प्रयाग प्रजापति ब्रह्माका क्षेत्र है-ऐसी प्रसिद्धि है। युधिष्ठिर! यह प्रयाग पुण्यप्रद एवं परम पवित्र है। निष्पाप राजेन्द्र! तुम अपने भाइयोंके साथ अपना राज्य-कार्य सँभालो॥७-१४॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये एकादशाधिकशततमोऽध्यायः॥१११॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्यमें एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ।॥१११ ॥
Summary of chapter 111 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya glorifies the extraordinary spiritual potency of immersing the sacred ashes and bones of departed relatives into the confluence of Gaṅgā and Yamunā at Prayāga. Bhagavān Matsya reveals that for as many years as a departed soul's bones remain touched by the holy waters of the Saṅgama, that soul resides joyfully in heaven, enjoying celestial opulences and receiving the worship of Devas. The chapter underscores that even souls suffering in lower realms are instantly elevated to higher spiritual spheres when their mortal remains are consecrated in these sanctified waters by loving descendants.