भगवान् विष्णुका एकार्णवके जलमें शयन, मार्कण्डेयको आश्चर्य तथा भगवान् विष्णु और मार्कण्डेयका संवाद

मत्स्य उवाच

एवमेकार्णवीभूते शेते लोके महाद्युतिः ।

प्रच्छाद्य सलिलेनोर्वी हंसो नारायणस्तदा॥ १

महतो रजसो मध्ये महार्णवसरःसु वै।

विरजस्कं महाबाहुमक्षयं ब्रह्म यं विदुः॥ २

आत्मरूपप्रकाशेन तमसा संवृतः प्रभुः ।

मनः सात्त्विकमाधाय यत्र तत्सत्यमासत॥ ३

याथातथ्यं परं ज्ञानं भूतं तद् ब्रह्मणा पुरा।

रहस्यारण्यकोद्दिष्टं यच्चौपनिषदं स्मृतम्॥ ४

पुरुषो यज्ञ इत्येतद्यत्परं परिकीर्तितम्।

यश्चान्यः पुरुषाख्यः स्यात् स एष पुरुषोत्तमः॥ ५

ये च यज्ञकरा विप्रा ये चविज इति स्मृताः।

अस्मादेव पुरा भूता यज्ञेभ्यः श्रूयतां तथा॥ ६

ब्रह्माणं प्रथमं वक्त्रादुद्गातारं च सामगम्।

होतारमपि चाध्वर्युः बाहुभ्यामसृजत् प्रभुः॥ ७

ब्रह्मणो ब्राह्मणाच्छंसि प्रस्तोतारं च सर्वशः।

तौ मित्रावरुणौ पृष्ठात् प्रतिप्रस्तारमेव च॥ ८

उदरात् प्रतिहर्तारं पोतारं चैव पार्थिव।

अच्छावाकमथोरुभ्यां नेष्टारं चैव पार्थिव॥ ९

पाणिभ्यामथ चाग्नीधं सुब्रह्मण्यं च जानुतः।

ग्रावस्तुतं तु पादाभ्यामुन्नेतारं च याजुषम्॥१०

एवमेवैष भगवान् षोडशैव जगत्पतिः।

प्रवक्तृन् सर्वयज्ञानामृत्विजोऽसृजदुत्तमान्॥११

तदेष वै वेदमयः पुरुषो यज्ञसंस्थितः ।

वेदाश्चैतन्मयाः सर्वे साङ्गोपनिषदक्रियाः॥१२

स्वपित्येकार्णवे चैव यदाश्चर्यमभूत् पुरा।

श्रूयन्तां तद्यथा विप्रा मार्कण्डेयकुतूहलम्॥१३

गीर्णो भगवतस्तस्य कुक्षावेव महामुनिः।

बहुवर्षसहस्रायुस्तस्यैव वरतेजसा ॥१४

मत्स्यभगवान्ने कहा-राजर्षे! इस प्रकार जगत्के एकार्णवके जलमें निमग्न हो जानेपर परम कान्तिमान् हंसस्वरूपी नारायण पृथ्वीको जलसे भलीभाँति आच्छादित कर विशाल रेतीले टापूके मध्यमें स्थित उस महार्णवके सरोवरमें शयन करते हैं। उन्हीं महाबाहुको रजोगुणरहित अविनाशी ब्रह्म कहा जाता है। अन्धकारसे आच्छादित हुए भगवान् अपने स्वरूपके प्रकाशसे प्रकाशित हो मनको सत्त्वगुणमें स्थापितकर वहाँ विराजित होते हैं। वे ही सत्यस्वरूप हैं। यथार्थ परम ज्ञान भी वे ही हैं, जिसका पूर्वकालमें ब्रह्माने अनुभव किया था। वे ही आरण्यकोंद्वारा उपदिष्ट रहस्य और उपनिषत्प्रतिपादित ज्ञान हैं। उन्हींको परमोत्कृष्ट यज्ञपुरुष कहा गया है। इसके अतिरिक्त जो दूसरा पुरुष नामसे विख्यात है, वह पुरुषोत्तम भी वे ही हैं। जो यज्ञपरायण ब्राह्मण और जो ऋत्विज् कहे गये हैं, वे सभी पूर्वकालमें इन्हींसे उत्पन्न हुए थे। अब यज्ञोंके विषयमें सुनिये। राजन्! उन प्रभुने सर्वप्रथम मुखसे ब्रह्मा और सामगान करनेवाले उद्गाताको, दोनों भुजाओंसे होता और अध्वर्युको, ब्रह्मासे ब्राह्मणाच्छंसी और प्रस्तोताको, पृष्ठभागसे मैत्रावरुण और प्रतिप्रस्तोताको, उदरसे प्रतिहर्ता और पोताको, ऊरुओंसे अच्छावाक् और नेष्टाको, हाथोंसे आग्नीध्रको, जानुओंसे सुब्रह्मण्यको तथा पैरोंसे ग्रावस्तुत और यजुर्वेदी उन्नेताको उत्पन्न किया॥१-१०॥

इस प्रकार इन जगदीश्वर भगवान्ने सम्पूर्ण यज्ञोंके प्रवक्ता सोलह श्रेष्ठ ऋत्विजोंको उत्पन्न किया। ये ही वेदमय पुरुष यज्ञोंमें भी स्थित रहते हैं। सभी वेद और उपनिषदोंकी साङ्गोपाङ्ग क्रियाएँ इन्हींके स्वरूप हैं। विप्रवरो! पूर्वकालमें एकार्णवके जलमें शयन करते समय मार्कण्डेय मुनिको कुतूहल उत्पन्न करनेवाली एक आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी। अब आप उसे सुनिये। भगवान्द्वारा निगले गये महामुनि मार्कण्डेय उन्हींकी कुक्षिमें उन्हींके श्रेष्ठ तेजसे कई हजार वर्षों की आयुतक भ्रमण करते

अटस्तीर्थप्रसङ्गेन पृथिवीं तीर्थगोचराम्।

आश्रमाणि च पुण्यानि देवतायतनानि च ॥१५

देशान् राष्ट्राणि चित्राणि पुराणि विविधानि च।

जपहोमपरः शान्तस्तपो घोरं समास्थितः ॥१६

मार्कण्डेयस्ततस्तस्य शनैर्वक्त्राद् विनिःसृतः।

स निष्क्रामन् न चात्मानं जानीते देवमायया॥१७

निष्क्रम्याप्यस्य वदनादेकार्णवमथो जगत्।

सर्वतस्तमसाच्छन्नं मार्कण्डेयोऽन्ववैक्षत ॥१८

तस्योत्पन्नं भयं तीव्र संशयश्चात्मजीविते।

देवदर्शनसंहृष्टो विस्मयं परमं गतः॥१९

चिन्तयन् जलमध्यस्थो मार्कण्डेयो विशङ्कितः।

किं नु स्यान्मम चिन्तेयं मोहः स्वप्नोऽनुभूयते॥२०

व्यक्तमन्यतमो भावस्तेषां सम्भावितो मम।

न हीदृशं जगत्क्लेशमयुक्तं सत्यमर्हति॥२१

नष्टचन्द्रार्कपवने नष्टपर्वतभूतले।

कतमः स्यादयं लोक इति चिन्तामवस्थितः॥ २२

ददर्श चापि पुरुषं स्वपन्तं पर्वतोपमम्।

सलिलेऽर्धमथो मग्नं जीमूतमिव सागरे॥२३

ज्वलन्तमिव तेजोभिर्गोयुक्तमिव भास्करम्।

शर्वर्या जाग्रतमिव भासन्तं स्वेन तेजसा ।।२४

देवं द्रष्टुमिहायातः को भवानिति विस्मयात्।

तथैव स मुनिः कुक्षिं पुनरेव प्रवेशितः॥२५

सम्प्रविष्टः पुनः कुक्षिं मार्कण्डेयोऽतिविस्मयः।

तथैव च पुनर्भूयो विजानन् स्वप्नदर्शनम्॥ २६

स तथैव यथापूर्वं यो धरामटते पुरा।

पुण्यतीर्थजलोपेतां विविधान्याश्रमाणि च॥ २७

रहे। वे तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे तीर्थोंको प्रकट करनेवाली पृथ्वी, पुण्यमय आश्रमों, देव-मन्दिरों, देशों, राष्ट्रों और अनेकों रमणीय नगरोंको देखते हुए जप और होममें तत्पर रहकर शान्तभावसे घोर तपस्यामें लगे हुए थे। तत्पश्चात् मार्कण्डेय मुनि धीरे-धीरे भ्रमण करते हुए भगवान्के मुखसे बाहर निकल आये, किंतु देवमायाके वशीभूत होनेके कारण वे अपनेको मुखसे निकला हुआ न जान सके। भगवान्के मुखसे बाहर निकलनेपर मार्कण्डेयजीने देखा कि सारा जगत् एकार्णवके जलमें निमग्न है और सब ओर अन्धकार छाया हुआ है। यह देखकर उनके मनमें महान् भय उत्पन्न हो गया और उन्हें अपने जीवनमें भी संशय दिखायी पड़ने लगा। इसी समय हृदयमें भगवान्का दर्शन होनेसे प्रसन्नता तो हुई, साथ ही महान् आश्चर्य भी हुआ॥११-१९॥

इस प्रकार जलके मध्यमें स्थित मार्कण्डेय मुनि शंकित चित्तसे विचार करने लगे कि यह मेरी आकस्मिक चिन्ता है या मेरी बुद्धिपर मोह छा गया है अथवा मैं स्वप्नका अनुभव कर रहा हूँ? परंतु यह तो स्पष्ट है कि मैं इनमेंसे किसी एक भावका अनुभव तो अवश्य कर रहा हूँ; क्योंकि इस प्रकार क्लेशसे रहित जगत् सत्य नहीं हो सकता। जब चन्द्रमा, सूर्य और वायु नष्ट हो गये तथा पर्वत और पृथ्वीका विनाश हो गया, तब यह कौन-सा लोक हो सकता है? वे इस प्रकारकी चिन्तासे ग्रस्त हो गये। इतनेमें ही उन्हें वहाँ एक पर्वत- सरीखा विशालकाय पुरुष शयन करता हुआ दीख पड़ा, जिसके शरीरका आधा भाग सागरमें बादलकी तरह जलमें डूबा हुआ था। वह अपने तेजसे किरणयुक्त सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। अपने तेजसे उद्भासित होता हुआ वह रात्रिके अन्धकारमें जाग्रत्-सा दीख रहा था। तब मार्कण्डेय मुनि आश्चर्ययुक्त हो उस देवको देखनेके लिये ज्यों ही उसके निकट जाकर बोले-'आप कौन हैं?' त्यों ही उसने पुनः उन्हें अपनी कुक्षिमें समेट लिया। पुनः कुक्षिमें प्रविष्ट हुए मार्कण्डेयको परम विस्मय हुआ। वे बाह्य जगत्को पूर्ववत् स्वप्नदर्शन ही वे मान रहे थे। वे उस कुक्षिके अन्तर्गत जैसे पहले पृथ्वीपर विचरण कर रहे थे, उसी प्रकार पुनः भ्रमण करने लगे। उन्होंने पुण्यमय तीर्थजलसे भरी हुई नदियों, अनेकों

क्रतुभिर्यजमानांश्च समाप्तवरदक्षिणान्।

अपश्यद्देवकुक्षिस्थान्याजकाञ्छतशो द्विजान्॥ २८

सवृत्तमास्थिताः सर्वे वर्णा ब्राह्मणपूर्वकाः।

चत्वारश्चाश्रमाः सम्यग्यथोद्दिष्टा मया तव॥२९

एवं वर्षशतं साग्रं मार्कण्डेयस्य धीमतः।

चरतः पृथिवीं सर्वां न कुक्ष्यन्तः समीक्षितः॥३०

ततः कदाचिदथ वै पुनर्वक्त्राद्विनिःसृतः ।

गुप्तं न्यग्रोधशाखायां बालमेकं निरक्षत॥ ३१

तथैवैकार्णवजले नीहारेणावृताम्बरे।

अव्यग्रः क्रीडते लोके सर्वभूतविवर्जिते॥ ३२

स मुनिर्विस्मयाविष्टः कौतूहलसमन्वितः।

बालमादित्यसंकाशं नाशक्नोदभिवीक्षितुम्॥ ३३

स चिन्तयंस्तथैकान्ते स्थित्वा सलिलसन्निधौ।

पूर्वदृष्टमिदं मन्ये शङ्कितो देवमायया॥३४

अगाधसलिले तस्मिन् मार्कण्डेयः सुविस्मयः।

प्लवंस्तथार्तिमगमद् भयात् संत्रस्तलोचनः॥३५

स तस्मै भगवानाह स्वागतं बालयोगवान्।

बभाषे मेघतुल्येन स्वरेण पुरुषोत्तमः ॥ ३६

मा भैर्वत्स न भेतव्यमिहैवायाहि मेऽन्तिकम्।

मार्कण्डेयो मुनिस्त्वाह बालं तं श्रमपीडितः॥३७

मार्कण्डेय उवाच

को मां नाम्ना कीर्तयति तपः परिभवन्मम।

दिव्यं वर्षसहस्राख्यं धर्षयन्निव मे वयः॥३८

न ह्येष वः समाचारो देवेष्वपि ममोचितः।

मां ब्रह्मापि हि देवेशो दीर्घायुरिति भाषते॥३९

कस्तमो घोरमासाद्य मामद्य त्यक्तजीवितः।

मार्कण्डेयेति मामुक्त्वा मृत्युमीक्षितुमर्हति॥ ४०

सूत उवाच

एवमाभाष्य तं क्रोधान्मार्कण्डेयो महामुनिः।

तथैव भगवान् भूयो बभाषे मधुसूदनः ॥ ४१

आश्रमों तथा कुक्षिके भीतर स्थित सैकड़ों याजक ब्राह्मणोंको देखा, जो कहीं यज्ञोंद्वारा यजन कर रहे थे और कहीं यज्ञ समाप्त होनेके पश्चात् उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त थे। जैसा मैंने तुम्हें पहले बतलाया है, उसके अनुसार ब्राह्मण आदि सभी वर्गों तथा चारों आश्रमोंके लोग सम्यक् प्रकारसे सदाचारका पालन करते थे। २०-२९॥

इस प्रकार बुद्धिमान् मार्कण्डेयके सौ वर्षोंसे भी अधिक कालतक समूची पृथ्वीपर भ्रमण करते रहनेपर भी उन्हें उस कुक्षिका अन्त न दीख पड़ा। तत्पश्चात् किसी समय वे पुनः उस पुरुषके मुखसे बाहर निकल आये। उस समय उन्होंने बरगदकी शाखामें छिपे हुए एक बालकको देखा, जो उसी प्रकारके एकार्णवके जलमें, यद्यपि आकाश नीहारसे आच्छादित था तथा जगत् समस्त प्राणियोंसे शून्य हो गया था, तथापि निश्चिन्तभावसे खेल रहा था। यह देखकर मार्कण्डेय मुनि आश्चर्यचकित हो गये। उनके मनमें उसे जाननेके लिये कुतूहल उत्पन्न हो गया, किंतु वे सूर्यके समान तेजस्वी उस बालककी ओर देखनेमें असमर्थ हो गये। तव जलके निकट एकान्त स्थानमें स्थित होकर विचार करते हुए मार्कण्डेयजी देवमायाके प्रभावसे सशङ्कित हो उसे पहले देखा हुआ मानने लगे। परम विस्मित हुए मार्कण्डेय उस अथाह जलमें तैरते हुए कष्टका अनुभव करने लगे तथा भयके कारण उनके नेत्र कातर हो गये। तब बालयोगी भगवान् पुरुषोत्तम मेघ-सदृश गम्भीर स्वरसे मार्कण्डेयसे स्वागतपूर्वक बोले-'वत्स! डरो मत, तुम्हें डरना नहीं चाहिये। यहाँ मेरे निकट आओ।' तदुपरान्त थके-माँदे मार्कण्डेय मुनि उस बालकसे बोले॥ ३०-३७॥

मार्कण्डेयजीने कहा-यह कौन है, जो मेरी तपस्याका तिरस्कार करता हुआ मेरा नाम लेकर पुकार रहा है? यह एक हजार दिव्य वर्षोंवाली मेरी आयुका भी अपमान- सा कर रहा है। देवताओंमें भी किसीको मेरे प्रति ऐसा व्यवहार करना उचित नहीं है; क्योंकि देवेश्वर ब्रह्मा भी मुझे 'दीर्घायु' कहकर ही पुकारते हैं। जीवनसे हाथ धोनेवाला ऐसा कौन है, जो घोर अज्ञानान्धकारका आश्रय लेकर आज मुझे 'मार्कण्डेय' ऐसा कहकर मृत्युका मुख देखना चाहता है? ॥ ३८-४०॥

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! महामुनि मार्कण्डेय क्रोधवश उस बालकसे ऐसा कहकर चुप हो गये। तब भगवान् मधुसूदन पुनः उसी प्रकार बोले॥ ४१॥

श्रीभगवानुवाच

अहं ते जनको वत्स हृषीकेशः पिता गुरुः।

आयुष्प्रदाता पौराणः किं मां त्वं नोपसर्पसि॥४२

मां पुत्रकामः प्रथमं पिता तेऽङ्गिरसो मुनिः।

पूर्वमाराधयामास तपस्तीवं समाश्रितः॥४३

ततस्त्वां घोरतपसा प्रावृणोदमितौजसम्।

उक्तवानहमात्मस्थं महर्षिममितौजसम्॥ ४४

कः समुत्सहते चान्यो यो न भूतात्मकात्मजः ।

द्रष्टुमेकार्णवगतं क्रीडन्तं योगवर्त्मना॥४५

ततः प्रहृष्टवदनो विस्मयोत्फुल्ललोचनः ।

मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिपुटो मार्कण्डेयो महातपाः॥ ४६

नामगोत्रे ततः प्रोच्य दीर्घायु.कपूजितः ।

तस्मै भगवते भक्त्या नमस्कारमथाकरोत्॥४७

मार्कण्डेय उवाच

इच्छेयं तत्त्वतो मायामिमां ज्ञातुं तवानघ।

यदेकार्णवमध्यस्थः शेषे त्वं बालरूपवान्।। ४८

किं संज्ञश्चैव भगवाँल्लोके विज्ञायसे प्रभो।

तर्कये त्वां महात्मानं को ह्यन्यः स्थातुमर्हति ॥ ४९

श्रीभगवानुवाच

अहं नारायणो ब्रह्मन् सर्वभूः सर्वनाशनः ।

अहं सहस्त्रशीर्षाख्यैर्यः पदैरभिसंज्ञितः ।।५०

आदित्यवर्णः पुरुषो मखे ब्रह्ममयो मखः ।

अहमग्निहव्यवाहो यादसां पतिरव्ययः॥५१

अहमिन्द्रपदे शक्रो वर्षाणां परिवत्सरः ।

अहं योगी युगाख्यश्च युगान्तावर्त एव च॥५२

अहं सर्वाणि सत्त्वानि दैवतान्यखिलानि तु।

भुजङ्गानामहं शेषस्तायो वै सर्वपक्षिणाम्॥५३

कृतान्तः सर्वभूतानां विश्वेषां कालसंज्ञितः।

अहं धर्मस्तपश्चाहं सर्वाश्रमनिवासिनाम्॥५४

अहं चैव सरिद्दिव्या क्षीरोदश्च महार्णवः।

यत्तत्सत्यं च परममहमेकः प्रजापतिः॥५५

श्रीभगवान्ने कहा-'वत्स! मैं पुराणप्रसिद्ध हृषीकेश ही तुम्हें जन्म देनेवाला तुम्हारा पिता और गुरु हूँ। मैंने ही तुम्हें दीर्घायु प्रदान किया है, तुम मेरे निकट क्यों नहीं आ रहे हो? तुम्हारे पिता अङ्गिरा मुनिने पहले पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे कठोर तपका आश्रय ले मेरी आराधना की थी और उस घोर तपस्याके परिणामस्वरूप तुम्हारे-जैसे अमित ओजस्वी पुत्रका वरदान माँगा था, तब मैंने उन आत्मज्ञानमें लीन एवं अमित पराक्रमी महर्षिको वरदान दिया था। अन्यथा तुम्हारे अतिरिक्त पञ्चभूतात्मक शरीरधारीका पुत्र दूसरा कौन है, जो एकार्णवके जलमें योगमार्गका आश्रय लेकर क्रीडा करते हुए मुझे देखनेका साहस कर सकता है ? यह सुनकर महातपस्वी मार्कण्डेयका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उनके नेत्र विस्मयसे उत्फुल्ल हो गये। तब वे लोकपूजित दीर्घायु मुनि मस्तकपर हाथ जोड़कर नाम और गोत्रका उच्चारण करके भक्तिपूर्वक उन भगवान्को नमस्कार करते हुए बोले ॥४२-४७॥

मार्कण्डेयजीने कहा-अनघ! मैं आपकी इस मायाको तत्त्वपूर्वक जानना चाहता हूँ, जो आप बालकका रूप धारण करके इस एकार्णवके जलके मध्यमें स्थित होकर शयन करते हैं। ऐश्वर्यशाली प्रभो! आप लोकमें किस नामसे विख्यात होते हैं? मैं आपको एक महान् आत्मबल-सम्पन्न पुरुष मानता हूँ, अन्यथा दूसरा कौन इस प्रकार स्थित रह सकता है॥ ४८-४९॥

श्रीभगवान् बोले-ब्रह्मन्! मैं सभी प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला तथा सबका विनाशक नारायण हूँ। जो सहस्रशीर्ष आदि नामोंसे अभिहित होता है, वह मैं ही हूँ। मैं ही आदित्यवर्ण पुरुष और यज्ञमें ब्रह्ममय यज्ञ हूँ। मैं ही हव्यको वहन करनेवाला अग्नि और जल-जन्तुओंका अविनाशी स्वामी हूँ। इन्द्रपदपर स्थित रहनेवाला इन्द्र तथा वर्षोंमें परिवत्सर मैं हूँ। मैं ही योगी, युग नामसे प्रसिद्ध और युगोंका अन्त करनेवाला हूँ। समस्त प्राणी और सम्पूर्ण देवता मेरे ही स्वरूप हैं। मैं सोमें शेषनाग और सम्पूर्ण पक्षियोंमें गरुड हूँ। मैं सभी प्राणियोंका अन्त करनेवाला तथा लोकोंका काल हूँ। चारों आश्रमोंमें निवास करनेवाले मनुष्योंका धर्म और तप मैं ही हूँ। मैं दिव्य नदी गङ्गा और दूधरूपी जलसे भरा हुआ महासागर हूँ। जो परम सत्य है, वह मैं हूँ। मैं ही एकमात्र प्रजापति हूँ।

अहं सांख्यमहं योगोऽप्यहं तत्परमं पदम्।

अहमिज्याक्रिया चाहमहं विद्याधिपः स्मृतः॥५६

अहं ज्योतिरहं वायुरहं भूमिरहं नभः।

अहमापः समुद्राश्च नक्षत्राणि दिशो दश॥५७

अहं वर्षमहं सोमः पर्जन्योऽहमहं रविः।

क्षीरोदसागरे चाहं समुद्रे वडवामुखः॥५८

वह्निः संवर्तको भूत्वा पिबंस्तोयमयं हविः।

अहं पुराणः परमं तथैवाहं परायणम्॥५९

अहं भूतस्य भव्यस्य वर्तमानस्य सम्भवः ।

यत्किञ्चित् पश्यसे विप्र यच्छृणोषि च किञ्चन॥६०

यल्लोके चानुभवसि तत्सर्वं मामनुस्मर।

विश्वं सृष्टं मया पूर्वं सृज्यं चाद्यापि पश्य माम्॥६१

युगे युगे च स्रक्ष्यामि मार्कण्डेयाखिलं जगत्।

तदेतदखिलं सर्वं मार्कण्डेयावधारय॥६२

शुश्रूषुर्मम धर्मांश्च कुक्षौ चर सुखं मम।

मम ब्रह्मा शरीरस्थो देवैश्च ऋषिभिः सह॥६३

व्यक्तमव्यक्तयोगं मामवगच्छासुरद्विषम्।

अहमेकाक्षरो मन्त्रस्त्र्यक्षरश्चैव तारकः॥६४

परस्त्रिवर्गादोंकारस्त्रिवर्गार्थनिदर्शन:

एवमादिपुराणेशो वदन्नेव महामतिः।। ६५

वक्त्रमाहृतवानाशु मार्कण्डेयं महामुनिम्।

ततो भगवतः कुक्षिं प्रविष्टो मुनिसत्तमः।

स तस्मिन् सुखमेकान्ते शुश्रूषुहँसमव्ययम्॥६६

योऽहमेव विविधतर्नु परिश्रितो

महार्णवे व्यपगतचन्द्रभास्करे।

शनैश्चरन् प्रभुरपि हंससंज्ञितो-

ऽसृजज्जगद्विरहितकालपर्यये ॥६७

मैं ही सांख्य, मैं ही योग और मैं ही वह परमपद हूँ। मैं ही यज्ञकी क्रिया और मैं ही विद्याका अधिपति कहलाता हूँ। मैं ही अग्नि, मैं ही वायु, मैं ही पृथ्वी, मैं ही आकाश, मैं ही जल, समुद्र, नक्षत्र और दसों दिशाएँ हूँ। मैं ही वर्ष, मैं ही चन्द्रमा, मैं ही बादल तथा मैं ही रवि हूँ। क्षीरसागरमें शयन करनेवाला मैं ही हूँ। मैं ही समुद्रमें बडवाग्नि हूँ॥५०-५८॥

मैं ही संवर्तक अग्नि बनकर जलरूप हविका पान करता हूँ। जैसे मैं पुराण-पुरुष हूँ, उसी प्रकार मैं सबके लिये आश्रयदाता भी हूँ। भूत, भविष्य और वर्तमानका उत्पत्तिस्थान मैं हूँ। विप्रवर! तुम जो कुछ देख रहे हो, जो कुछ सुन रहे हो और लोकमें जिसका अनुभव कर रहे हो, उस सबमें मेरा ही स्मरण करो। मार्कण्डेय! पूर्वकालमें मैंने ही विश्वकी सृष्टि की थी और इस समय भी सृष्टिकर्ता मुझे ही समझो। मार्कण्डेय! प्रत्येक युगमें मैं ही सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करता हूँ, अतः तुम इन सबका रहस्य इस प्रकार जानो। यदि तुम मेरे धर्मोको सुनना चाहते हो तो मेरी कुक्षिमें प्रवेश करके सुखपूर्वक विचरण करो। देवताओं और ऋषियोंके साथ ब्रह्मा मेरे शरीरमें ही विद्यमान हैं। मुझे ही व्यक्त (प्रकट) और अव्यक्त (अप्रकट) योगवाला तथा असुरोंका शत्रु समझो। मैं ही एक अक्षर तथा तीन अक्षरोंवाला तारक मन्त्र हूँ। त्रिवर्गसे परे तथा त्रिवर्गके अभिप्रायको निर्दिष्ट करनेवाला ओंकार मैं ही हूँ। आदि पुराणेश महाबुद्धिमान् भगवान् इस प्रकार कह ही रहे थे कि उन्होंने शीघ्र ही महामुनि मार्कण्डेयको अपने मुखमें समेट लिया। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय भगवान्की कुक्षिमें प्रविष्ट हो गये और उस एकान्त स्थानमें अविनाशी हंसधर्मको सुननेकी इच्छासे सुखपूर्वक विचरण करने लगे। (इतनेमें ही ऐसी ध्वनि सुनायी पड़ी-) मैं ही वह हूँ, जो चन्द्रमा और सूर्यसे रहित महार्णवके जलमें विविध शरीर धारण कर समर्थ होते हुए भी शनैः-शनैः विचरण करता हूँ और हंस नामसे पुकारा जाता हूँ तथा काल-परिवर्तनके समाप्त होनेपर पुनः जगत्की सृष्टि करता हूँ॥ ५९-६७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥१६७॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६७ ॥