प्रासाद-संलग्न मण्डपोंके नाम, स्वरूप, भेद और उनके निर्माणकी विधि

सूत उवाच

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि मण्डपानां तु लक्षणम्।

मण्डपप्रवरान् वक्ष्ये प्रासादस्यानुरूपतः॥ १

विविधा मण्डपा: कार्या ज्येष्ठमध्यकनीयसः।

नामतस्तान् प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमः॥ २

पुष्पकः पुष्पभद्रश्च सुव्रतोऽमृतनन्दनः।

कौसल्यो बुद्धिसंकीर्णो गजभद्रो जयावहः॥ ३

श्रीवत्सो विजयश्चैव वास्तुकीर्तिः श्रुतिञ्जयः ।

यज्ञभद्रो विशालश्च सुश्लिष्टः शत्रुमर्दनः॥ ४

भागपञ्चो नन्दनश्च मानवो मानभद्रकः।

सुग्रीवो हरितश्चैव कर्णिकारः शतर्धिकः॥ ५

सिंहश्च श्यामभद्रश्च सुभद्रश्च तथैव च।

सप्तविंशतिराख्याता लक्षणं शृणुत द्विजाः॥ ६

स्तम्भा यत्र चतुःषष्टिः पुष्पकः समुदाहृतः।

द्विषष्टिः पुष्पभद्रस्तु षष्टिः सुव्रत उच्यते॥ ७

अष्टपञ्चाशकस्तम्भः कथ्यतेऽमृतनन्दनः।

कौसल्यः षट् च पञ्चाशच्चतुष्पञ्चाशता पुनः॥ ८

नाम्ना तु बुद्धिसंकीर्णो द्विहीनो गजभद्रकः।

जयावहस्तु पञ्चाशच्छ्रीवत्सस्तद् विहीनकः॥ ९

विजयस्तद्विहीनः स्याद् वास्तुकीर्तिस्तथैव च।

द्वाभ्यामेव प्रहीयेत ततः श्रुतिञ्जयोऽपरः॥१०

सूतजी कहते हैं- श्रेष्ठ ऋषिगण ! अब मैं प्रासादोंके अनुरूप मण्डपोंका लक्षण बतला रहा हूँ। इस प्रसङ्गमें श्रेष्ठ मण्डपोंका भी वर्णन करूँगा। ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ-भेदोंसे विविध मण्डपोंकी रचना करनी चाहिये। मैं उन सभीका आनुपूर्वी नाम-निर्देशपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। द्विजगण! पुष्पक, पुष्पभद्र, सुव्रत, अमृतनन्दन, कौसल्य, बुद्धिसंकीर्ण, गजभद्र, जयावह, श्रीवत्स, विजय, वास्तुकीर्ति, श्रुतिञ्जय, यज्ञभद्र, विशाल, सुश्लिष्ट, शत्रुमर्दन, भागपञ्च, नन्दन, मानव, मानभद्रक, सुग्रीव, हरित, कर्णिकार, शतर्धिक, सिंह, श्यामभद्र तथा सुभद्र-ये सत्ताईस प्रकारके मण्डप कहे गये हैं। अब आपलोग इनके लक्षणोंको सुनिये। जिस मण्डपमें चौंसठ स्तम्भ लगे हों, उस मण्डपको 'पुष्पक' कहते हैं। इसी प्रकार बासठ स्तम्भवालेको 'पुष्पभद्र' और साठ स्तम्भवालेको 'सुव्रत' कहा गया है। अट्ठावन स्तम्भवाला मण्डप 'अमृतनन्दन' कहा जाता है। छप्पन स्तम्भोंवाले मण्डपको 'कौसल्य', चौवन स्तम्भवालेको बुद्धिसंकीर्ण, उससे दो स्तम्भ कम अर्थात् बावन स्तम्भवालेको 'गजभद्रक', पचास स्तम्भवालेको 'जयावह', अड़तालीस स्तम्भोंवाले मण्डपको 'श्रीवत्स' तथा छियालीस स्तम्भोंवालेको 'विजय' कहते हैं। उसी प्रकार छियालीस स्तम्भोंवाला मण्डप वास्तुकीर्ति' कहलाता है। चौवालीस स्तम्भोंवाले मण्डपको 'श्रुतिञ्जय' कहते हैं ॥१-१०॥

चत्वारिंशद्यज्ञभद्रस्तविहीनो विशालकः।

षट्त्रिंशच्चैव सुश्लिष्टो द्विहीनः शत्रुमर्दनः ॥११

द्वात्रिंशद्भागपञ्चस्तु त्रिंशद्भिर्नन्दनः स्मृतः।

अष्टाविंशमानवस्तु मानभद्रो द्विहीनकः॥१२

चतुर्विंशस्तु सुग्रीवो द्वाविंशो हरितो मतः।

विंशतिः कर्णिकारः स्यादष्टादश शतर्धिकः ।। १३

सिंहो भवेद् द्विहीनश्च श्यामभद्रो द्विहीनकः।

सुभद्रस्तु तथा प्रोक्तो द्वादशस्तम्भसंयुतः॥१४

मण्डपाः कथितास्तुभ्यं यथावल्लक्षणान्विताः।

त्रिकोणं वृत्तमर्धेन्दुमष्टकोणं द्विरष्टकम् ॥१५

चतुष्कोणं तु कर्तव्यं संस्थानं मण्डपस्य तु।

राज्यं च विजयश्चैव आयुर्वर्धनमेव च॥१६

पुत्रलाभः श्रियः पुष्टिस्त्रिकोणादिक्रमाद्भवेत्।

एवं तु शुभदाः प्रोक्ताश्चान्यथा त्वशुभावहाः ।। १७

चतुःषष्टिपदं कृत्वा मध्ये द्वारं प्रकल्पयेत्।

विस्ताराद् द्विगुणोच्छ्रायं तत्रिभागः कटिर्भवेत्॥१८

विस्तारा? भवेद् गर्भो भित्तयोऽन्याः समन्ततः।

गर्भपादेन विस्तीर्णं द्वारं त्रिगुणमायतम्॥१९

तथा द्विगुणविस्तीर्णमुखस्तद्वदुदुम्बरः।

विस्तारपादप्रतिमं बाहुल्यं शाखयोः स्मृतम्॥२०

त्रिपञ्चसप्तनवभिः शाखाभिारमिष्यते।

कनिष्ठमध्यमं ज्येष्ठं यथायोगं प्रकल्पयेत्॥ २१

अङ्गुलानां शतं सार्धं चत्वारिंशत्तथोन्नतम्।

त्रिंशद्विंशोत्तरं चान्यद्वान्यमुत्तममेव च॥ २२

शतं चाशीतिसहितं वातनिर्गमने भवेत्।

अधिकं दशभिस्तद्वत् तथा षोडशभिः शतम्॥ २३

शतमानं तृतीयं च नवत्याशीतिभिस्तथा।

दश द्वाराणि चैतानि क्रमेणोक्तानि सर्वदा॥२४

अन्यानि वर्जनीयानि मानसोद्वेगदानि तु ।

द्वारवेधं प्रयत्नेन सर्ववास्तुषु वर्जयेत्॥२५

वृक्षकोणभ्रमिद्वारस्तम्भकूपध्वजादिभिः ।

कुड्यश्वभ्रेण वा विद्धं द्वारं न शुभदं भवेत्॥ २६

'यज्ञभद्र'-मण्डपमें चालीस, विशालकमें उससे दो स्तम्भ न्यून अर्थात् अड़तीस, 'सुश्लिष्ट' में छत्तीस और 'शत्रुमर्दन' में उससे दो स्तम्भ न्यून अर्थात् चौंतीस, 'भागपञ्च' में बत्तीस और 'नन्दन' में तीस स्तम्भ माने गये हैं। अट्ठाईस स्तम्भोंका 'मानव', छब्बीसका 'मानभद्र', चौबीसका 'सुग्रीव', बाईसका 'हरित', बीसकी 'कर्णिका', अठारहका 'शतधिक', सोलहका 'सिंह', चौदहका 'श्यामभद्र' और बारहका "सुभद्र' कहा गया है। इस प्रकार मैंने लक्षणोंसहित मण्डपोंके नाम तुम्हें बतला दिया। इन मण्डपोंकी स्थापना त्रिकोण, गोलाकार, अर्धचन्द्राकार, अष्टकोण, दशकोण अथवा चतुष्कोणरूपमें करनी चाहिये। इन त्रिकोणादिकोंकी स्थापनासे क्रमश: राज्य, विजय, आयुकी वृद्धि, पुत्र-लाभ, लक्ष्मी और पुष्टिकी प्राप्ति होती है। इस प्रकारके मण्डप मङ्गलदायक तथा इनसे विपरीत अमङ्गलकारक होते हैं। गृहके मध्यमें चौंसठ पदोंकी कल्पनाकर मध्यमें द्वार बनाना चाहिये। चौड़ाईसे ऊँचाई दुगुनी होनी चाहिये और उसके कटिभागको तृतीयांशके बराबर बनाना चाहिये। चौड़ाईका आधा मध्यभाग होना चाहिये। उसके चारों ओर दूसरी दीवालें रहेंगी। मध्यभागके चतुर्थांशसे तिगुना लम्बा और दूना विस्तृत द्वार होना चाहिये, जो गूलरका बना हुआ हो। दोनों शाखाओंका विस्तार द्वारके विस्तारका चतुर्थांश हो॥११-२०॥

मण्डप-द्वार, तीन, पाँच, सात अथवा नौ शाखाओंसे युक्त बनते हैं, जो क्रमश: कनिष्ठ, मध्यम और ज्येष्ठ कहलाते हैं। एक सौ साढ़े चालीस अंगुल ऊँचा द्वार धनप्रद एवं उत्तम होता है। अन्य दो एक सौ तीस तथा एक सौ बीस अंगुलके होते हैं। शुद्ध वायुके आने-जानेके लिये एक सौ अस्सी अंगुल ऊँचा द्वार होना चाहिये। उसी प्रकार एक सौ दस, एक सौ सोलह, एक सौ नब्बे  तथा अस्सी अंगुलके द्वार होने चाहिये। सर्वदा क्रमशः ये दस प्रकारके द्वार कहे गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्य प्रकारके द्वार वर्जित हैं; क्योंकि वे चित्तको उद्विग्न करनेवाले होते हैं। सभी वास्तुओंमें प्रयत्नपूर्वक द्वारवेधसे बचना चाहिये। सामनेकी ओर वृक्ष, कोण, भ्रमि, द्वार, स्तम्भ, कूप, ध्वज, दीवाल और गड्डा-इन सबसे विद्ध किया हुआ द्वार मंगलकारी नहीं

क्षयश्च दुर्गतिश्चैव प्रवासः क्षुद्भयं तथा।

दौर्भाग्यं बन्धनं रोगो दारिद्र्यं कलहं तथा॥२७

विरोधश्चार्थनाशश्च सर्वं वेधाद् भवेत् क्रमात्।

पूर्वेण फलिनो वृक्षाः क्षीरवृक्षास्तु दक्षिणे॥ २८

पश्चिमेन जलं श्रेष्ठं पद्मोत्पलविभूषितम्।

उत्तरे सरलैस्तालैः शुभा स्यात् पुष्पवाटिका॥ २९

सर्वतस्तु जलं श्रेष्ठं स्थिरमस्थिरमेव च।

पार्श्वतश्चापि कर्तव्यं परिवारादिकालयम्॥३०

याम्ये तपोवनस्थानमुत्तरे मातृकागृहम्।

महानसं तथाऽऽग्नेये नैर्ऋत्येऽथ विनायकम्॥३१

वारुणे श्रीनिवासस्तु वायव्ये गृहमालिका।

उत्तरे यज्ञशाला तु निर्माल्यस्थानमुत्तरे॥ ३२

वारुणे सोमदैवत्ये बलिनिर्वपणं स्मृतम्।

पुरतो वृषभस्थानं शेषे स्यात् कुसुमायुधः॥ ३३

जलवापी तथेशाने विष्णुस्तु जलशाय्यपि।

एवमायतनं कुर्यात् कुण्डमण्डपसंयुतम्॥ ३४

घण्टावितानकसतोरणचित्रयुक्तं

नित्योत्सवप्रमुदितेन जनेन सार्धम्।

यः कारयेत् सुरगृहं विविधं ध्वजावं

श्रीस्तं न मुञ्चति सदा दिवि पूज्यते च॥ ३५

एवं गृहार्चनविधावपि शक्तितः स्यात्

संस्थापनं सकलमन्त्रविधानयुक्तम्।

गोवस्त्रकाञ्चनहिरण्यधराप्रदानं

देयं गुरुद्विजवरेषु तथान्नदानम्॥ ३६

होता। इन द्वारवेधसे क्रमशः क्षय, दुर्गति, प्रवास, क्षुधाका भय, दुर्भाग्य, बन्धन, रोग, दरिद्रता, कलह, विरोध, धनहानि-ये सब कुपरिणाम होते हैं। घरके पूर्व दिशामें फलदार वृक्ष, दक्षिण दिशामें दूधवाले वृक्ष, पश्चिम दिशामें विविध भाँतिके कमलोंसे सुशोभित जल तथा उत्तर दिशामें चीड़ और ताड़के वृक्षोंसे युक्त पुष्पवाटिका मङ्गलदायिनी होती है ।। २१-२९॥

जल सभी दिशाओंमें श्रेष्ठ है, चाहे वह (नदी आदिका) बहता हुआ हो अथवा (कूप, सरोवर आदिका) अचल । मुख्य भवनके दोनों पार्यों में परिवार-वर्गका निवासस्थान बनाना चाहिये। दक्षिणकी ओर तपोवन अथवा तपस्याका स्थान, उत्तरमें मातृकाओंका भवन, अग्निकोणमें पाकशाला, नैर्ऋत्यकोणमें गणेशका निवास, पश्चिममें लक्ष्मीका निवास, वायव्यकोणमें गृहमालिका, उत्तरमें यज्ञशाला और निर्माल्यका स्थान होना चाहिये। पश्चिमकी ओर चन्द्रादि देवताओंके लिये बलिदान देनेका स्थान, सामनेकी ओर वृषभका स्थान और शेष भागमें कामदेवके स्थानका निर्माण करना चाहिये। ईशानकोणमें जलयुक्त बावली रहे तथा वहीं जलशायी विष्णुभगवान्का भी स्थान रहे। इस प्रकार कुण्ड और मण्डपसे युक्त गृहका निर्माण करना चाहिये। जो मनुष्य घण्टा, वितान, तोरण तथा चित्रसे सुशोभित, नित्य महोत्सवसे प्रमुदित जनसमूहके साथ विविध ध्वजाओंसे विभूषित देव-मन्दिर बनवाता है, उसे लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ती और स्वर्गमें उसकी पूजा होती है। इसी प्रकार गृहपूजनके अवसरपर भी अपनी शक्तिके अनुरूप सभी मन्त्रों और विधानोंसे युक्त स्थापना करनी चाहिये। उस समय गुरु तथा ब्राह्मणोंको गौ, वस्त्र, सुवर्णके आभूषण, सुवर्ण और पृथ्वीका दान देना चाहिये तथा अन्नदान भी करना चाहिये ॥३०-३६॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रासादानुकीर्तनं नाम सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥२७०॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रासाद-अनुकीर्तन नामक दो सौ सत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७० ॥