मत्स्य महा पुराण
नरसिंह और हिरण्यकशिपुका भीषण युद्ध, दैत्योंको उत्पातदर्शन, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा ब्रह्माद्वारा नरसिंहकी स्तुति
सूत उवाच
खरश्वानमुखाश्चैव मकराशीविषाननाः।
ईहामृगमुखाश्चान्ये वराहमुखसंस्थिताः॥ १
बालसूर्यमुखाश्चान्ये धूमकेतुमुखास्तथा।
अर्धचन्द्रार्धवक्त्राश्च अग्निदीप्तमुखास्तथा॥ २
हंसकुक्कुटवक्त्राश्च व्यादितास्या भयावहाः।
सिंहास्या लेलिहानाच काकगृध्रमुखास्तथा॥ ३
द्विजिह्वका वक्रशीर्षास्तथोल्कामुखसंस्थिताः ।
महाग्राहमुखाश्चान्ये दानवा बलदर्पिताः॥ ४
शैलसंवर्मणस्तस्य शरीरे शरवृष्टिभिः।
अवध्यस्य मृगेन्द्रस्य न व्यथां चक्रुराहवे॥ ५
एवं भूयो परान् घोरानसृजन् दानवेश्वराः।
मृगेन्द्रस्योपरि क्रुद्धा निःश्वसन्त इवोरगाः॥ ६
ते दानवशरा घोरा दानवेन्द्रसमीरिताः।
विलयं जग्मुराकाशे खद्योता इव पर्वते॥ ७
ततश्चक्राणि दिव्यानि दैत्याः क्रोधसमन्विताः।
मृगेन्द्रायासृजन्नाशु ज्वलितानि समन्ततः॥ ८
तैरासीद् गगनं चक्रैः सम्पतद्भिरितस्ततः।
युगान्ते सम्प्रकाशद्भिश्चन्द्रादित्यग्रहैरिव॥ ९
तानि सर्वाणि चक्राणि मृगेन्द्रेण महात्मना।
ग्रस्तान्युदीर्णानि तदा पावकार्चिःसमानि वै॥१०
तानि चक्राणि वदने विशमानानि भान्ति वै।
मेघोदरदरीष्वेव चन्द्रसूर्यग्रहा इव॥११
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो भूयः प्रासृजदूर्जिताम्।
शक्तिं प्रज्वलितां घोरां धौतशस्त्रतडित्प्रभाम्॥१२
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! उन दानवोंमें किन्हींके मुख गधे और कुत्तेके समान थे तो कुछ मकर और सर्पके-से मुखवाले थे। किन्हींके मुख भेड़िया-सदृश तो कुछके सूअर-जैसे थे। कुछ उदयकालीन सूर्यके समान तो कुछ धूमकेतु-से मुखवाले थे। किन्हींके मुख अर्धचन्द्र तथा किन्हींके अग्निकी तरह उद्दीप्त थे। किन्हींका मुख आधा ही था। किन्हींके मुख हंस और मुर्गेके समान थे। किन्हींके मुख फैले हुए थे, जो बड़े भयावने लग रहे थे। कुछ सिंहके-से मुखवाले दानव जीभ लपलपा रहे थे। किन्हींके मुख कौओं और गोधों-जैसे थे। किन्हींके मुखमें दो जिह्वाएँ थीं, किन्हींके मस्तक टेढ़े थे और कुछ उल्का-सरीखे मुखवाले थे। किन्हींके मुख महाग्राह- सदृश थे। इस प्रकार वे बलाभिमानी दानव रणभूमिमें पर्वतके समान सुदृढ़ शरीरवाले उन अवध्य मृगेन्द्रके शरीरपर बाणोंकी वृष्टि करके उन्हें पीड़ित न कर सके। तब क्रुद्ध हुए सर्पकी भाँति नि:श्वास छोड़ते हुए दानवेश्वर नरसिंहके ऊपर पुनः दूसरे भयंकर बाणोंकी वृष्टि करने लगे, परंतु दानवेश्वरोंद्वारा छोड़े गये वे भयंकर बाण उसी प्रकार आकाशमें विलीन हो जाते थे, जैसे पर्वतपर चमकते हुए जुगनू। तत्पश्चात् क्रोधसे भरे हुए दैत्य शीघ्र ही नरसिंहके ऊपर चारों ओरसे चमकते हुए दिव्य चक्रोंकी वर्षा करने लगे। इधर-उधर गिरते हुए उन चक्रोंसे आकाशमण्डल ऐसा दीख रहा था, मानो युगान्तके समय प्रकाशित हुए चन्द्रमा, सूर्य आदि ग्रहोंसे युक्त हो गया हो। अग्निकी लपटोंके समान उठते हुए उन सभी चक्रोंको महात्मा नरसिंह निगल गये। उस समय उनके मुखमें प्रविष्ट होते हुए वे चक्र मेघोंकी घनघोर घटामें घुसते हुए चन्द्र, सूर्य एवं अन्यान्य ग्रहोंकी भाँति सुशोभित हो रहे थे॥१-११॥
तदनन्तर दैत्यराज हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर पुनः अपनी भयंकर शक्ति छोड़ी, जो चमकीली, अत्यन्त शक्तिशालिनी और धुली होनेके कारण बिजली-सी चमक
तामापतन्ती सम्प्रेक्ष्य मृगेन्द्रः शक्तिमुज्वलाम्।
हुङ्कारेणैव रौद्रेण बभञ्ज भगवांस्तदा॥१३
रराज भग्ना सा शक्तिर्मंगेन्द्रेण महीतले।
सविस्फुलिङ्गाज्वलिता महोल्केव दिवश्च्युता॥१४
नाराचपङ्क्तिः सिंहस्य प्राप्ता रेजेऽविदूरतः।
नीलोत्पलपलाशानां मालेवोज्वलदर्शना॥१५
स गर्जित्वा यथान्यायं विक्रम्य च यथासुखम्।
तत्सैन्यमुत्सारितवांस्तृणाग्राणीव मारुतः॥१६
ततोऽश्मवर्षं दैत्येन्द्रा व्यसृजन्त नभोगताः।
नगमात्रैः शिलाखण्डैर्गिरिशृङ्गैर्महाप्रभैः॥ १७
तदश्मवर्षं सिंहस्य महन्मूर्धनि पातितम्।
दिशो दश विकीर्णा वै खद्योतप्रकरा इव॥१८
तदाश्मौधैर्दैत्यगणाः पुनः सिंहमरिन्दमम्।
छादयांचक्रिरे मेघा धाराभिरिव पर्वतम्॥१९
न च तं चालयामासुर्दैत्यौघा देवसत्तमम्।
भीमवेगोऽचलश्रेष्ठं समुद्र इव मन्दरम्॥२०
ततोऽश्मवर्षे विहते जलवर्षमनन्तरम्।
धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीत्समन्ततः॥२१
नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवेगा: समंततः।
आवृत्य सर्वतो व्योम दिशश्चोपदिशस्तथा ॥ २२
धारा दिवि च सर्वत्र वसुधायां च सर्वशः।
न स्पृशन्ति च ता देवं निपतन्त्योऽनिशं भुवि॥२३
बाह्यतो ववृषुवर्षं नोपरिष्टाच्च ववृषुः ।
मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युधि मायया॥२४
हतेऽश्मवर्षे तुमुले जलवर्षे च शोषिते।
सोऽसृजद् दानवो मायामग्निवायुसमीरिताम्॥ २५
महेन्द्रस्तोयदैः सार्धं सहस्राक्षो महाद्युतिः।
महता तोयवर्षेण शमयामास पावकम्॥ २६
रही थी। तब उस उज्वल शक्तिको अपनी ओर आती हुई देखकर भगवान् नरसिंहने अपने भयंकर हुंकारसे ही उसे तोड़कर टूक-टूक कर दिया। नरसिंहद्वारा तोड़ी गयी वह शक्ति ऐसी शोभा पा रही थी, जैसे आकाशमें भूतलपर गिरी हुई चिनगारियोंसहित प्रज्वलित महान् उल्का हो। नरसिंहके निकट पहुँची हुई (दैत्योंद्वारा छोड़े गये) बाणोंकी उज्ज्वल वर्णवाली पंक्ति नीले कमल-दलकी मालाकी तरह शोभा पा रही थी। यह देखकर भगवान् नरसिंहने न्यायतः पराक्रम प्रदर्शित कर सुखपूर्वक गर्जना की और उस दानवसेनाको वायुद्वारा उड़ाये गये क्षुद्र तिनकोंकी तरह खदेड़ दिया। तदुपरान्त दैत्येश्वरगण आकाशमें स्थित होकर पत्थरकी वर्षा करने लगे। पत्थरोंकी वह वर्षा नरसिंहके विशाल मस्तकपर गिरकर चूर-चूर हो जुगनुओंके समूहकी भाँति दसों दिशाओंमें बिखर गयी। तब दैत्यगणोंने पुनः पर्वत- सरीखे शिलाखण्डों, पर्वत-शिखरों और पत्थरोंसे उन शत्रुसूदन नरसिंहको इस प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे मेघ जलकी धाराओंद्वारा पर्वतको ढक देते हैं। फिर भी वह दैत्यसमुदाय उन देवश्रेष्ठ नरसिंहको उसी प्रकार विचलित नहीं कर सका, जैसे भयंकर वेगशाली समुद्र पर्वतश्रेष्ठ मन्दरको नहीं डिगा सका॥ १२-२०॥
तदनन्तर पत्थरोंकी वृष्टिके विफल हो जानेपर चारों ओर मूसलाधार जलकी वृष्टि होने लगी। चारों ओर आकाशसे गिरती हुई वे तीव्र वेगशाली धाराएँ सब ओरसे आकाश, दिशाओं तथा विदिशाओंको आच्छादित करके लगातार भूतलपर गिर रही थीं। यद्यपि वे धाराएँ आकाश तथा पृथ्वीपर सर्वत्र सब प्रकारसे व्याप्त थीं, तथापि वे भगवान् नरसिंहका स्पर्श नहीं कर पा रही थीं। युद्धभूमिमें मायाद्वारा मृगेन्द्रका रूप धारण करनेवाले भगवान्के ऊपर वे धाराएँ नहीं गिर रही थीं, अपितु बाहर चारों ओर वर्षा कर रही थीं। इस प्रकार जब वह शिलावृष्टि नष्ट कर दी गयी और घनघोर जलवृष्टि सोख ली गयी, तब दानवराज हिरण्यकशिपुने अग्नि और वायुद्वारा प्रेरित मायाका विस्तार किया, किंतु परम कान्तिमान् सहस्र नेत्रधारी महेन्द्रने बादलोंके साथ वहाँ आकर जलकी घनघोर वृष्टि से उस अग्निको शान्त कर
तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानवः।
असृजद् घोरसंकाशं तमस्तीवं समन्ततः ॥ २७
तमसा संवृते लोके दैत्येष्वात्तायुधेषु च।
स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवावभौ॥२८
त्रिशिखां भृकुटी चास्य ददृशुर्दानवा रणे।
ललाटस्थां त्रिशूलाङ्कां गङ्गां त्रिपथगामिव ॥ २९
ततः सर्वासु मायासु हतासु दितिनन्दनाः।
हिरण्यकशिपुं दैत्यं विवर्णाः शरणं ययुः॥३०
ततः प्रज्वलित: क्रोधात् प्रदहन्निव तेजसा।
तस्मिन् क्रुद्धे तु दैत्येन्द्रे तमोभूतमभूज्जगत्॥ ३१
आवहः प्रवहश्चैव विवहोऽथ हुंदावहः।
तथा परावहः संवहश्च महाबलपराक्रमाः॥३२
परिवहः श्रीमानुत्पातभयशंसनाः।
इत्येवं क्षुभिताः सप्त मरुतो गगनेचराः॥३३
ये ग्रहाः सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति वै।
ते सर्वे गगने दृष्टा व्यचरन्त यथासुखम्॥३४
अयोगतश्चाप्यचरद् योगं निशि निशाकरः।
सग्रहः सह नक्षत्रै राकापतिररिन्दमः॥३५
विवर्णतां च भगवान् गतो दिवि दिवाकरः।
कृष्णं कबन्धं च तथा लक्ष्यते सुमहद्दिवि॥ ३६
अमुञ्चच्चार्चिषां वृन्दं भूमिवृत्तिर्विभावसुः।
गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्णं परिदृश्यते॥३७
सप्त धूम्रनिभा घोरा सूर्याद्दिवि समुत्थिताः
सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगाः॥ ३८
वामे तु दक्षिणे चैव स्थितौ शुक्रबृहस्पती।
शनैश्चरो लोहिताङ्गो ज्वलनाङ्गसमद्युती॥३९
समं समधिरोहन्तः सर्वे ते गगनेचराः।
शृङ्गानि शनकै?रा युगान्तावर्तिनो ग्रहाः ॥ ४०
चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैर्ग्रहैः सह तमोनुदः।
चराचरविनाशाय रोहिणी नाभ्यनन्दत॥४१
गृह्यते राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते।
उल्काः प्रज्वलिताश्चन्द्रे विचरन्ति यथासुखम्॥४२
दिया। युद्धस्थलमें उस मायाके नष्ट हो जानेपर उस दानवने चारों ओर भयंकर दीखनेवाले घने अन्धकारकी सृष्टि की। उस समय सारा जगत् अन्धकारसे ढक गया और दैत्यगण अपना-अपना हथियार लिये डटे रहे। उसके मध्य अपने तेजसे घिरे हुए भगवान् नरसिंह सूर्यकी तरह शोभा पा रहे थे। दानवोंने रणभूमिमें नरसिंहके ललाटमें स्थित त्रिशूलकी-सी आकारवाली उनकी त्रिशिखा भृकुटिको देखा, जो त्रिपथगा गङ्गाकी तरह प्रतीत हो रही थी॥२१-२९॥
इस प्रकार सभी मायाओंके नष्ट हो जानेपर तेजोहीन दैत्य अपने स्वामी हिरण्यकशिपुकी शरणमें गये। यह देख वह अपने तेजसे जगत्को जलाता-सा क्रोधसे प्रज्वलित हो उठा। उस दैत्येन्द्रके क्रुद्ध होनेपर सारा जगत् अन्धकारमय हो गया। पुनः आवह, प्रवह, विवह, , उदावह, परावह, संवह तथा श्रीमान् परिवह-ये महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न आकाशचारी सातों वायुमार्ग उत्पातके भयकी सूचना देते हुए क्षुब्ध हो उठे। समस्त लोकोंके विनाशके अवसरपर जो ग्रह प्रकट होते हैं, वे सभी आकाशमें दृष्टिगोचर होकर सुखपूर्वक विचरण करने लगे। राहुने अमा एवं पूर्णिमाके बिना ही ग्रहणको दृश्य उपस्थित कर दिया। रातमें नक्षत्रों और ग्रहोंसहित राकापति शत्रुसूदन चन्द्रमा और दिनमें भगवान् सूर्य कान्तिहीन हो गये तथा आकाशमें अत्यन्त विशाल काले रंगका कबन्ध (धूमकेतु) दिखायी देने लगा। भगवान् अग्नि एक ओर पृथ्वीपर रहकर चिनगारियाँ छोड़ने लगे और दूसरी ओर वे निरन्तर आकाशमें भी स्थित दिखायी दे रहे थे। आकाशमण्डलमें धुएँकी-सी कान्तिवाले सात भयंकर सूर्य प्रकट हो गये। ग्रहगण आकाशमें स्थित चन्द्रमाके शिखरपर स्थित हो गये। उनके वामभागमें शुक्र और दाहिने भागमें बृहस्पति स्थित हो गये। अग्निके समान कान्तिमान् शनैश्चर और मङ्गल भी दृष्टिगोचर हुए। युगान्तके समय प्रकट होनेवाले वे सभी भयंकर ग्रह शनैः-शनैः एक साथ शिखरोंपर आरूढ़ हो आकाशमें विचरण करने लगे॥३०-४०॥
इसी प्रकार अन्धकारका विनाश करनेवाले चन्द्रमा नक्षत्रों और ग्रहोंके साथ रहकर चराचर जगत्का विनाश करनेके लिये रोहिणीका अभिनन्दन नहीं कर रहे थे। राहु चन्द्रमाको ग्रस्त कर रहा था और उल्काएँ उन्हें मार भी रही थीं। प्रज्वलित उल्काएँ चन्द्रलोकमें सुखपूर्वक
देवानामपि यो देवः सोऽप्यवर्षत शोणितम्।
अपतनगगनादुल्का विद्युद्रूपा महास्वनाः॥४३
अकाले च द्रुमाः सर्वे पुष्यन्ति च फलन्ति च।
लताश्च सफलाः सर्वा ये चाहुदैत्यनाशनम्॥४४
फलैः फलान्यजायन्त पुष्पैः पुष्पं तथैव च।
उन्मीलन्ति निमीलन्ति हसन्ति च रुदन्ति च॥ ४५
विक्रोशन्ति च गम्भीरा धूमयन्ति ज्वलन्ति च।
प्रतिमाः सर्वदेवानां वेदयन्ति महद् भयम्॥४६
आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः।
चक्रुः सुभैरवं तत्र महायुद्धमुपस्थितम्॥ ४७
नद्यश्च प्रतिकूलानि वहन्ति कलुषोदकाः।
न प्रकाशन्ति च दिशो रक्तरेणुसमाकुलाः॥ ४८
वानस्पत्यो न पूज्यन्ते पूजनार्हाः कथञ्चन।
वायुवेगेन हन्यन्ते भज्यन्ते प्रणमन्ति च॥४९
यदा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते।
अपराह्नगते सूर्ये लोकानां युगसंक्षये॥५०
तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरि वेश्मनः ।
भाण्डागारायुधागारे निविष्टमभवन्मधु॥५१
असुराणां विनाशाय सुराणां विजयाय च।
दृश्यन्ते विविधोत्पाता घोरा घोरनिदर्शनाः॥५२
एते चान्ये च बहवो घोरोत्पाताः समुत्थिताः।
दैत्येन्द्रस्य विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मिताः॥५३
मेदिन्यां कम्पमानायां दैत्येन्द्रेण महात्मना।
महीधरा नागगणा निपेतुरमितौजसः॥५४
विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैर्विमुञ्चन्तो हुताशनम्।
चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः॥५५
वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनञ्जयौ।
एलामुखः कालियश्च महापद्मश्च वीर्यवान्॥५६
सहस्रशीर्षों नागो वै हेमतालध्वजः प्रभुः।
शेषोऽनन्तोमहाभागो दुष्प्रकम्प्यः प्रकम्पितः॥५७
विचरण कर रही थीं। जो देवताओंका भी देवता (इन्द्र) है, वह रक्तकी वर्षा करने लगा। आकाशसे बिजलीकी-सी कान्तिवाली उल्काएँ भयंकर शब्द करती हुई पृथ्वीपर गिरने लगी। सभी वृक्ष असमयमें ही फूलने और फलने लगे तथा सभी लताएँ फलसे युक्त हो गयीं, जो दैत्योंके विनाशकी सूचना दे रही थीं। फलोंसे फल तथा फूलोंसे फूल प्रकट होने लगे। सभी देवताओंकी मूर्तियाँ कभी आँख फाड़कर देखती, कभी आँखें बंद कर लेती, कभी हँसती थीं तो कभी रोने लगती थीं। वे कभी जोर-जोरसे चिल्लाने लगती थीं, कभी गम्भीररूपसे धुआँ फेंकती थीं तो कभी प्रज्वलित हो जाती थीं। इस प्रकार वे महान् भयकी सूचना दे रही थीं। उस समय ग्रामीण मृग-पक्षी वन्य मृग-पक्षियोंसे संयुक्त होकर अत्यन्त भयंकर महान् युद्ध करने लगे। गंदे जलसे भरी हुई नदियाँ उलटी दिशामें बहने लगीं। रक्त और धूलसे व्याप्त दिशाएँ दिखायी नहीं दे रही थीं। पूजनीय वृक्षोंकी किसी प्रकार पूजा (रक्षा) नहीं हो रही थी। वे वायुके झोंकेसे प्रताडित हो रहे थे, झुक जाते थे और टूट भी जाते थे॥ ४१-४९ ॥
इस प्रकार लोकोंके युगान्तके समय सूर्यके अपराह्नसमयमें पहुँचनेपर जब सभी प्राणियोंकी छायामें कोई परिवर्तन नहीं दीखने लगा, तब दैत्यराज हिरण्यकशिपुके महल, भाण्डारागार और आयुधागारके ऊपर मधु टपकने लगा। इस प्रकार असुरोंके विनाश और देवताओंकी विजयके लिये भयकी सूचना देनेवाले अनेकों प्रकारके भयंकर उत्पात दिखायी दे रहे थे। ये तथा इनके अतिरिक्त और भी बहुत-से भयंकर उत्पात, जो कालद्वारा निर्मित थे, दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुके विनाशके लिये प्रकट हुए दीख रहे थे। महान् आत्मबलसे सम्पन्न दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुद्वारा पृथ्वीके प्रकम्पित किये जानेपर पर्वत तथा अमित तेजस्वी नागगण गिरने लगे। वे चार, पाँच अथवा सात सिरवाले नाग विषकी ज्वालासे व्याप्त मुखोंद्वारा अग्नि उगलने लगे। वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, धनञ्जय, एलामुख, कालिय, पराक्रमी महापद्म, एक हजार फणोंवाला सामर्थ्यशाली नाग हेमतालध्वज तथा महान् भाग्यशाली अनन्त शेषनाग-इन सबका काँपना यद्यपि अत्यन्त कठिन था, तथापि ये सभी काँप उठे।
दीप्तान्यन्तर्जलस्थानि पृथिवीधरणानि च।
तदा कुद्धेन महता कम्पितानि समन्ततः॥५८
नागास्तेजोधराश्चापि पातालतलचारिणः।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यस्तदा संस्पृष्टवान् महीम्॥५९
संदष्टौष्ठपुटः क्रोधाद्वाराह इव पूर्वजः ।
नदी भागीरथी चैव शरयू: कौशिकी तथा॥६०
यमुना त्वथ कावेरी कृष्णवेणा च निम्नगा।
सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरी तथा॥६१
चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः।
कमलप्रभवश्चैव शोणो मणिनिभोदकः॥६२
नर्मदा शुभतोया च तथा वेत्रवती नदी।
गोमती गोकुलाकीर्णा तथा पूर्वसरस्वती॥६३
मही कालमही चैव तमसा पुष्यवाहिनी।
जम्बूद्वीपं रत्नवटं सर्वरत्नोपशोभितम्॥६४
सुवर्णप्रकटं चैव सुवर्णाकरमण्डितम्।
महानदं च लौहित्यं शैलकाननशोभितम्॥६५
पत्तनं कोशकरणमृषिवीरजनाकरम्।
मागधाश्च महाग्रामा मुण्डाः शुङ्गास्तथैव च॥६६
सुझा मल्ला विदेहाश्च मालवाः काशिकोसलाः।
भवनं वैनतेयस्य दैत्येन्द्रेणाभिकम्पितम्॥ ६७
कैलासशिखराकारं यत् कृतं विश्वकर्मणा।
रक्ततोयो महाभीमो लौहित्यो नाम सागरः॥६८
उदयश्च महाशैल उच्छ्रितः शतयोजनम्।
सुवर्णवेदिकः श्रीमान् मेघपङ्क्तिनिषेवितः॥६९
भ्राजमानोऽर्कसदृशैर्जातरूपमयैर्दुमैः
शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः॥७०
अयोमुखश्च विख्यातः पर्वतो धातुमण्डितः।
तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः॥७१
सुराष्ट्राश्च सबाह्रीकाः शूराभीरास्तथैव च।
भोजा: पाण्ड्याश्च वङ्गाश्च कलिङ्गास्ताम्रलिप्तकाः॥७२
तथैवोण्ड्राश्च पौण्ड्राश्च वामचूडाः सकेरलाः।
क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाश्चाप्सरोगणाः॥७३
अगस्त्यभवनं चैव यदगम्यं कृतं पुरा।
सिद्धचारणसङ्घश्च विप्रकीर्णं मनोहरम्॥७४
उसने चारों ओर जलके भीतर स्थित रहनेवाले उद्दीप्त पर्वतोंको भी अत्यन्त क्रोधवश कँपा दिया। उस समय पाताललोकमें विचरण करनेवाले तेजस्वी नाग भी प्रकम्पित हो उठे। इस प्रकार दैत्यराज हिरण्यकशिपु क्रोधवश दाँतोंसे होंठोंको दबाये हुए जब पृथ्वीपर खड़ा हुआ तो वह पूर्वकालमें प्रकट हुए वाराहकी तरह दीख रहा था॥ ५०-५९॥
इसी प्रकार भागीरथी नदी, सरयू, कौशिकी, यमुना, कावेरी, कृष्णवेणा नदी, महाभागा, सुवेणा, गोदावरी नदी, चर्मण्वती, सिन्धु, नद और नदियोंका स्वामी, कमल उत्पन्न करनेवाला तथा मणिसदृश जलसे परिपूर्ण शोण, पुण्यसलिला नर्मदा, वेत्रवती नदी, गोकुलसे सेवित होनेवाली गोमती, प्राचीसरस्वती, मही, कालमही, तमसा, पुष्पवाहिनी, जम्बूद्वीप, सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित रत्नवट, सुवर्णकी खानोंसे युक्त सुवर्णप्रकट, पर्वतों और काननोंसे सुशोभित महानद लौहित्य, ऋषियों और वीरजनोंका उत्पत्तिस्थानस्वरूप कोशकरण नामक नगर, बड़े-बड़े ग्रामोंसे युक्त मागध, मुण्ड, शुङ्ग, सुह्म, मल्ल, मालव, काशी, कोसल-इन सबको तथा गरुडके भवनको, जो कैलासके शिखरकी-सी आकृतिवाला था तथा जिसे विश्वकर्माने बनाया था, उस दैत्येन्द्रने प्रकम्पित कर दिया। रक्तरूपी जलसे भरा हुआ महान् भयंकर लौहित्य सागर तथा जो स्वर्णमयी वेदिकासे युक्त, शोभाशाली, मेघकी पतियोंद्वारा सुसेवित और सूर्य-सदृश एवं स्वर्णमय खिले हुए साल, ताल, तमाल और कनेरके वृक्षोंसे सुशोभित है, वह सौ योजन ऊँचा महान् पर्वत उदयाचल, धातुओंसे विभूषित अयोमुख नामक विख्यात पर्वत, तमाल-वनके गन्धसे सुवासित सुन्दर मलय पर्वत, सुराष्ट्र, बाह्लीक, शूर, आभीर, भोज, पाण्ड्य, वङ्ग, कलिङ्ग, ताम्रलिप्तक, उण्ड्र, पौण्ड्र, केरल-इन सबको तथा देवों और अप्सराओंके समूहोंको उस दैत्यने क्षुब्ध कर दिया॥६०-७३॥
इसी प्रकार जो पहले अगम्य कर दिया गया था तथा सिद्धों और चारणोंके समूहोंसे व्याप्त,
विचित्रनानाविहगं सुपुष्पितमहाद्रुमम्।
जातरूपमयैः शृङ्गैरप्सरोगणनादितम्॥७५
गिरिपुष्पितकश्चैव लक्ष्मीवान् प्रियदर्शनः।
उत्थितः सागरं भित्त्वा विश्रामश्चन्द्रसूर्ययोः।
रराज सुमहाशृङ्गैर्गगनं विलिखन्निव॥७६
चन्द्रसूर्यांशुसङ्काशैः सागराम्बुसमावृतैः।
विद्युत्वान् सर्वत: श्रीमानायतः शतयोजनम्॥७७
विद्युतां यत्र सङ्घाता निपात्यन्ते नगोत्तमे।
ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमान् वृषभसंज्ञितः॥७८
कुञ्जरः पर्वतः श्रीमान् यत्रागस्त्यगृहं शुभम्।
विशालाक्षश्च दुर्धर्षः सर्पाणामालयः पुरी॥७९
तथा भोगवती चापि दैत्येन्द्रेणाभिकम्पिता।
महासेनो गिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वतः॥८०
चक्रवांश्च गिरिश्रेष्ठो वाराहश्चैव पर्वतः।
प्राग्ज्यौतिषपुरं चापि जातरूपमयं शुभम्॥८१
यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः।
मेघश्च पर्वतश्रेष्ठो मेघगम्भीरनिःस्वनः॥८२
षष्टिस्तत्र सहस्राणि पर्वतानां द्विजोत्तमाः।
तरुणादित्यसंकाशो मेरुस्तत्र महागिरिः॥८३
यक्षराक्षसगन्धर्वैर्नित्यं सेवितकन्दरः।
हेमगर्भो महाशैलस्तथा हेमसखो गिरिः॥८४
कैलासश्चैव शैलेन्द्रो दानवेन्द्रेण कम्पिताः।
हेमपुष्करसंछन्नं तेन वैखानसं सरः॥८५
कम्पितं मानसं चैव हंसकारण्डवाकुलम्।
त्रिशृङ्गपर्वतश्चैव कुमारी च सरिद्वरा ॥ ८६
तुषारचयसंच्छन्नो मन्दरश्चापि पर्वतः।
उशीरबिन्दुश्च गिरिश्चन्द्रप्रस्थस्तथाद्रिराट्॥८७
प्रजापतिगिरिश्चैव तथा पुष्करपर्वतः।
देवाभ्रपर्वतश्चैव तथा वै रेणुको गिरिः॥८८
क्रौञ्चः सप्तर्षिशैलश्च धूम्रवर्णश्च पर्वतः।
एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा ॥८९
नद्यः ससागराः सर्वाः सोऽकम्पयत दानवः ।
कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्रवांश्चैव कम्पितः ॥ ९०
मनोहर, नाना प्रकारके रंग-विरंगे पक्षियोंसे युक्त और पुष्पोंसे लदे हुए महान् वृक्षोंसे सुशोभित था, उस अगस्त्य-भवनको भी कँपा दिया। इसके बाद जो लक्ष्मीवान्, प्रियदर्शन और अपने अत्यन्त ऊँचे शिखरोंसे आकाशमें रेखा-सी खींच रहा था तथा चन्द्रमा और सूर्यको विश्राम देनेके लिये सागरका भेदन कर बाहर निकला था, वह पुष्पितक गिरि अपने स्वर्णमय शिखरोंसे शोभा पा रहा था। फिर चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले एवं सागरके जलसे घिरे हुए शिखरोंसे युक्त शोभाशाली विद्युत्वान् पर्वत था, जो सब ओरसे सौ योजन विस्तृत था। उस पर्वतश्रेष्ठपर बिजलियोंके समूह गिराये जाते थे। वृषभ नामसे पुकारा जानेवाला शोभासम्पन्न ऋषभ पर्वत तथा शोभाशाली कुंजर पर्वत, जिसपर महर्षि अगस्त्यका सुन्दर आश्रम था। सोका दुर्धर्ष निवासस्थान विशालाक्ष तथा भोगवती पुरी-ये सभी दैत्येन्द्रद्वारा प्रकम्पित कर दिये गये। द्विजवरो! वहाँ महासेन गिरि, पारियात्र पर्वत, गिरिश्रेष्ठ चक्रवान्, वाराह पर्वत, स्वर्णनिर्मित रमणीय प्राग्ज्योतिषपुर, जिसमें नरक नामक दुष्टात्मा दानव निवास करता है, बादलोंके समान गम्भीर शब्द करनेवाला पर्वतश्रेष्ठ मेघ आदि साठ हजार पर्वत थे, वहीं मध्याह्नकालीन सूर्यक समान प्रकाशमान विशाल पर्वत मेरु था, जिसकी कन्दराओंमें यक्ष, राक्षस और गन्धर्व नित्य निवास करते थे। महान् पर्वत हेमगर्भ, हेमसख गिरि तथा पर्वतराज कैलास-इन सबको भी दानवेन्द्र हिरण्यकशिपुने कँपा दिया॥७४-८४३ ॥
हिरण्यकशिपुने स्वर्ण-सदृश कमल-पुष्पोंसे आच्छादित वैखानस सरोवर तथा हंसों और बतखोंसे भरे हुए मानसरोवरको भी कम्पित कर दिया। इसके बाद त्रिशृङ्ग पर्वत, नदियोंमें श्रेष्ठ कुमारी नदी, तुषारसमूहसे आच्छादित मन्दर पर्वत, उशीरविन्दु गिरि, पर्वतराज चन्द्रप्रस्थ, प्रजापति गिरि, पुष्कर पर्वत, देवाभ्र पर्वत, रेणुक गिरि, क्रौंच पर्वत, सप्तर्षिशैल तथा धूम्रवर्ण पर्वत-इनको तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य पर्वतों, देशों, जनपदों तथा सागरोंसहित सभी नदियोंको उस दानवने कम्पित कर दिया। साथ ही महीपुत्र कपिल और व्याघ्रवान् भी काँप उठे।
खेचराश्च सतीपुत्राः पातालतलवासिनः ।
गणस्तथा परो रौद्रो मेघनामाङ्कुशायुधः ॥ ९१
ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च सर्व एवाभिकम्पिताः।
गदी शूली करालश्च हिरण्यकशिपुस्तदा॥९२
जीमूतघनसंकाशो जीमूतघननिःस्वनः।
जीमूतघननिर्घोषो जीमूत इव वेगवान्॥९३
देवारिर्दितिजो वीरो नृसिंह समुपाद्रवत्।
समुत्पत्य ततस्तीक्ष्णैर्मृगेन्द्रेण महानखैः॥९४
तदोंकारसहायेन विदार्य निहतो युधि।
मही च कालश्च शशी नभश्च
ग्रहाश्च सूर्यश्च दिशश्च सर्वाः।
नद्यश्च शैलाश्च महार्णवाश्च
गताः प्रसादं दितिपुत्रनाशात्॥ ९५
ततः प्रमुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः।
तुष्टवुर्नामभिर्दिव्यैरादिदेवं सनातनम्॥९६
यत्त्वया विहितं देव नारसिंहमिदं वपुः ।
एतदेवार्चयिष्यन्ति परावरविदो जनाः॥९७
ब्रह्मोवाच
भवान् ब्रह्मा च रुद्रश्च महेन्द्रो देवसत्तमः।
भवान् कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभवाव्ययः॥९८
परां च सिद्धिं च परं च देवं
परं च मन्त्रं परमं हविश्च।
परं च धर्म परमं च विश्वं
त्वामाहुरग्यं पुरुषं पुराणम्॥ ९९
परं शरीरं परमं च ब्रह्म
परं च योगं परमां च वाणीम्।
परं रहस्यं परमां गतिं च
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥१००
एवं परस्यापि परं पदं यत्
परं परस्यापि परं च देवम्।
परं परस्यापि पर च भूतं
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥१०१
आकाशचारी एवं पाताललोकमें निवास करनेवाले सतीके पुत्र, अङ्कुशको अस्त्ररूपमें धारण करनेवाला परम भयंकर मेघ नामक गण तथा उर्ध्वग और भीमवेग-ये सभी कँपा दिये गये। तदनन्तर जो गदा और त्रिशूल धारण किये हुए था, जिसकी आकृति बड़ी विकराल थी, जो देवताओंका शत्रु, घने बादलके समान कान्तिमान्, घने बादल-जैसा बोलनेवाला, घने बादल-सदृश गरजनेवाला और बादल- सा वेगशाली था, उस दितिनन्दन वीरवर हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर आक्रमण किया। तब युद्धस्थलमें ओंकारकी सहायतासे भगवान् नरसिंहने आकाशमें उछलकर अपने तीखे विशाल नखोंसे उनके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर उसे मार डाला॥ ८५-९४३ ॥
इस प्रकार उस दितिपुत्र हिरण्यकशिपुके मौतके मुखमें चले जानेसे पृथ्वी, काल, चन्द्रमा, आकाश, ग्रहगण, सूर्य, सभी दिशाएँ, नदियाँ, पर्वत और महासागर प्रसन्न हो गये। तदनन्तर हर्षसे फूले हुए देवता और तपोधन ऋषिगण दिव्य नामोंद्वारा उन अविनाशी आदि देवकी स्तुति करते हुए कहने लगे-'देव! आपने जो यह नरसिंहका शरीर धारण किया है, इसकी पूर्वापरके ज्ञाता लोग अर्चना करेंगे' ॥ ९५–९७॥
ब्रह्माजीने कहा-देव! आप ही ब्रह्मा, रुद्र और देवश्रेष्ठ महेन्द्र हैं। आप ही लोकोंके कर्ता, संहर्ता और उत्पत्तिस्थान हैं। आपका कभी विनाश नहीं होता। आपको ही परमोत्कृष्ट सिद्धि, परात्पर देव, परम मन्त्र, परम हवि, परम धर्म, परम विश्व और आदि पुराणपुरुष कहा जाता है। आपको ही परम शरीर, परम ब्रह्म, परम योग, परमा वाणी, परम रहस्य, परम गति और अग्रजन्मा पुराण पुरुष कहा जाता है। इसी प्रकार जो परात्पर पद, परात्पर देव, परात्पर भूत और सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष है, वह आप ही हैं।
परं परस्यापि परं रहस्यं
परं परस्यापि परं महत्त्वम्।
परं परस्यापि परं महत्वम्।
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥१०२
परं परस्यापि परं निधानं
परं परस्यापि परं पवित्रम्।
परं परस्यापि पर च दान्तं
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥१०३
एवमुक्त्वा तु भगवान् सर्वलोकपितामहः।
स्तुत्वा नारायणं देवं ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः॥१०४
ततो नदत्सु तूर्येषु नृत्यन्तीष्वप्सरःसु च।
क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जगाम हरिरीश्वरः॥१०५
नारसिंहं वपुर्देवः स्थापयित्वा सुदीप्तिमत्।
पौराणं रूपमास्थाय प्रययौ गरुडध्वजः॥१०६
अष्टचक्रेण यानेन भूतयुक्तेन भास्वता।
अव्यक्तप्रकृतिर्देवः स्वस्थानं गतवान् प्रभुः॥१०७
जो परात्पर रहस्य, परात्पर महत्त्व और परात्पर महत्तत्त्व है, वह सब आप अग्रजन्मा पुराणपुरुषको ही कहा जाता है। आप सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुषको परसे भी परम निधान, परसे भी परम पवित्र और परसे भी परम उदार कहा जाता है। ऐसा कहकर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्मा नारायणदेवकी स्तुति कर ब्रह्मलोकको चले गये। उस समय तुरहियाँ बज रही थीं और अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। इसी बीच जगदीश्वर श्रीहरि क्षीरसागरके उत्तर तटपर जानेके लिये उद्यत हुए। वहाँसे जाते समय भगवान् गरुडध्वजने परम कान्तिमान् उस नरसिंह-शरीरको जगत्में स्थापित कर अपने पुराने रूपको धारण कर लिया था। फिर अव्यक्त प्रकृतिवाले भगवान् विष्णु पञ्चभूतोंसे युक्त एवं चमकीले आठ पहियेवाले रथपर सवार हो अपने निवास स्थानको चले गये ॥९८-१०७॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे हिरण्यकशिपुवधो नाम त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥१६३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें हिरण्यकशिपु-वध नामक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६३॥
Summary of chapter 165 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the subsequent creation by Bhagavān Brahmā of the mental-born Rishis, Prajāpatis, and various classes of ancestors known as Pitṛs. The text outlines the origins of the divine sages Marīchi, Atri, Aṅgiras, Pulastya, Pulaha, Kratu, Vashishṭha, Bhṛgu, and Daksha, alongside the seven primary ancestral orders that receive ritual offerings. Bhagavān Brahmā assigned specific cosmic functions, sacrificial responsibilities, and spiritual realms to each order to maintain the spiritual lineage of humanity.