दण्डनीतिका निरुपण

मत्स्य उवाच

निक्षेपस्य समं मूल्यं दण्ड्यो निक्षेपभुक् तथा।

वस्त्रादिकसमस्तस्य तदा धर्मो न हीयते॥ १

यो निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते।

तावुभौ चोरवच्छास्यौ दाप्यौ वा द्विगुणं धनम्॥ २

उपधाभिश्च यः कश्चित् परद्रव्यं हरेन्नरः ।

ससहायः स हन्तव्यः प्रकामं विविधैर्वधैः॥ ३

यो याचितं समादाय न तद् दद्याद् यथाक्रमम्।

स निगृह्य बलाद्दाप्यो दण्ड्यो वा पूर्वसाहसम्॥ ४

अज्ञानाद् यदि वा कुर्यात् परद्रव्यस्य विक्रयम्।

निर्दोषो ज्ञानपूर्वं तु चोरवद् वधमर्हति॥ ५

मूल्यमादाय यो विद्यां शिल्पं वा न प्रयच्छति।

दण्ड्यः स मूल्यं सकलं धर्मज्ञेन महीक्षिता॥ ६

द्विजभोज्ये तु सम्प्राप्ते प्रतिवेश्ममभोजयन्।

हिरण्यमाषकं दण्ड्यः पापे नास्ति व्यतिक्रमः॥ ७

आमन्त्रितो द्विजो यस्तु वर्तमानश्च स्व गृहे।

निष्कारणं न गच्छेद्यः सदाप्योऽष्टशतं दमम्।

प्रतिश्रुत्याप्रदातारं सुवर्णं दण्डयेनृपः॥ ८

भृत्यश्चाज्ञां न कुर्याद् यो दर्पात् कर्म यथोदितम्।

स दण्ड्यः कृष्णलान्यष्टौ न देयं चास्य वेतनम्॥ ९

संगृहीतं न दद्याद् यः काले वेतनमेव च।

अकाले तु त्यजेद् भृत्यं दण्ड्यः स्याच्छतमेव च॥१०

मत्स्यभगवान्ने कहा-राजन्! (रत्न-धन-) वस्त्रादि धरोहरको हड़प जानेवाले व्यक्तिको उसके मूल्यके अनुरूप दण्ड देनेपर राजाका धर्म नष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति रखी हुई धरोहरको वापस नहीं करता और जो बिना धरोहर रखे ही माँगता है, वे दोनों ही चोरके समान दण्डनीय हैं। उनसे मूल्यसे दुगुना धन दिलाना चाहिये। जो कोई उपर्धा-डाँका डालकर या छल-कपटसे दूसरेके धनको चुरा लेता है, उसे अनेकों वधोपायोंद्वारा सहायकोंसहित प्राण-दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति दूसरेसे माँगकर ली गयी वस्तुको समयपर वापस नहीं करता तो उसे बुलपूर्वक पकड़कर वह वस्तु दिला देने अथवा पूर्वसाहसेका दण्ड देनेका विधान है। जो कोई अनजानमें किसी दूसरेकी वस्तुको बेंच देता है, वह तो निर्दोष है, किंतु जो जानते हुए दूसरेकी वस्तुको बेचता है वह चोरके समान दण्डनीय है। जो मूल्य लेकर विद्या या शिल्पज्ञानको नहीं देता, उसे धर्मज्ञ राजाको रकमवापसीका दण्ड देना चाहिये। जो ब्रह्मभोजका अवसर प्राप्त होनेपर अपने पड़ोसियोंको भोजन नहीं कराता उसे एक माशा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। अपराधियोंको दण्ड देने में व्यतिक्रमका विधान नहीं है। जो निमन्त्रित ब्राह्मण अपने घरपर रहते हुए भी बिना किसी कारणके भोजन करने नहीं जाता उसे एक सौ आठ माशा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। जो किसी वस्तुको देनेकी प्रतिज्ञा कर उसे नहीं देता; उसे राजा एक सुवर्ण-मुद्राका दण्ड दे। जो नौकर अभिमानवश आज्ञापालन तथा कहा हुआ कर्म नहीं करता, उसे राजा आठ कृष्णलको दण्ड दे और उसका वेतन भी रोक दे। जो स्वामी अपने नौकरको उसके संचित धन तथा वेतनको समयपर नहीं देता और कुसमयमें उसे छोड़ देता है, उसे सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये॥१-१०॥

१. कामन्दक आदिने उपधाको छल, साहस (डाँका) आदि भेदसे चार प्रकारका बतलाया है।

२. दण्डनीति एवं मन्वादि धर्मशास्त्रोंके अनुसार वध (फाँसी), वनवास, अग्निचिह्नपूर्वक देशनिष्कासन अथवा सहस्रपणका दण्ड पूर्व या उत्तमसाहस दण्ड कहलाता है। ३. १३ दाने जौकी स्वर्णमुद्रा (कौटलीय अर्थशास्त्र, लीलावती आदि)।

यो ग्रामदेशसस्यानां कृत्वा सत्येन संविदम्।

विसंवदेन्नरो लोभात् तं राष्ट्राद् विप्रवासयेत्॥११

क्रीत्वा विक्रीय वा किंचिद्यस्येहानुशयी भवेत्।

सोऽन्तर्दशाहात् तत्साम्यं दद्याच्चैवाददीत वा ॥१२

परेण तु दशाहस्य न दद्यान्नैव दापयेत्।

आददद्विददच्चैव राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट्॥१३

यस्तु दोषवती कन्यामनाख्याय प्रयच्छति।

तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं स्वयं षण्णवतिं पणान्॥१४

अकन्यैवेति यः कन्यां ब्रूयाद् दोषेण मानवः ।

स शतं प्राप्नुयाद् दण्डं तस्या दोषमदर्शयन्॥१५

यस्त्वन्यां दर्शयित्वान्यां वोढुः कन्यां प्रयच्छति।

उत्तमं तस्य कुर्वीत राजा दण्डं तु साहसम्॥१६

वरो दोषाननाख्याय यः कन्यां वरयेदिह।

दत्ताप्यदत्ता सा तस्य राज्ञा दण्ड्यः शतद्वयम्॥१७

प्रदाय कन्यां योऽन्यस्मै पुनस्तां सम्प्रयच्छति।

दण्डः कार्यो नरेन्द्रेण तस्याप्युत्तमसाहसः॥ १८

सत्यंकारेण वा वाचा युक्तं पण्यमसंशयम्।

लुब्धो ह्यन्यत्र विक्रेता षट्शतं दण्डमर्हति ॥१९

दुहितुः शुल्कविक्रेता सत्यंकारात् तु संत्यजेत्।

द्विगुणं दण्डयेदेनमिति धर्मो व्यवस्थितः ॥२०

मूल्यैकदेशं दत्त्वा तु यदि क्रेता धनं त्यजेत्।

स दण्ड्यो मध्यमं दण्डं तस्य पण्यस्य मोक्षणम्॥ २१

दुह्याद् धेनुं च यः पालो गृहीत्वा भुक्तवेतनम्।

स तु दण्ड्यः शतं राज्ञा सुवर्णं चाप्यरक्षिता ॥ २२

दण्डं दत्त्वा तु विरमेत् स्वामितः कृतलक्षणः।

बद्धः काष्र्णायसैः पाशैस्तस्य कर्मकरो भवेत्॥ २३

जो मनुष्य सत्यतापूर्वक किये गये देश, ग्राम और अन्नके बँटवारेको लोभके कारण पुनः असत्य बतलाता है, उसे देशसे निकाल देना चाहिये। किसी वस्तुको खरीदने या बेंचनेके बाद यदि कुछ मूल्य शेष रह जाता है तो उसे दस दिनके भीतर दे देना या ले लेना चाहिये। यदि दस दिन बीत जानेके बाद कोई शेष मूल्यको न देता है न दिलाता है तो राजा उन न देने और दिलानेवाले दोनोंको छ: सौ मुद्राओंका दण्ड दे। जो व्यक्ति अपनी दोषसे युक्त कन्याको बिना दोष सूचित किये किसीको दान कर देता है तो स्वयं राजा उसे छियानबे पणोंका दण्ड दे। जो मनुष्य बिना दोषके ही किसी दूसरेकी कन्याको दोषयुक्त बतलाता है और उस कन्याके दोषको दिखाने में असमर्थ हो जाता है तो राजा उसे सौ मुद्राका दण्ड दे। जो व्यक्ति अन्य कन्याको दिखलाकर वरको दूसरी कन्याका दान करता है तो राजाको उसे उत्तम साहसिक दण्ड देना चाहिये। जो वर अपने दोषको न बतलाकर किसी कन्याका पाणिग्रहण करता है तो वह कन्या देनेके बाद भी न दी हुईके समान है। राजाको उसपर दो सौ मुद्राओंका दण्ड लगाना चाहिये। जो एक ही कन्याको किसीको दान कर देनेके बाद फिर किसी दूसरेको दान करता है, उसे भी राजाको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो अपने मुखसे 'निश्चय ही मैं इतने मूल्यपर अमुक वस्तु आपको दे दूंगा' ऐसी प्रतिज्ञा कर फिर लोभके कारण उसे दूसरेके हाथ बेंच देता है, वह छ: सौ मुद्राओंके दण्डका भागी होता है। जो व्यक्ति कन्याका मूल्य लेकर विक्रय नहीं करता या प्रतिज्ञासे हटता है तो उसे लिये हुए मूल्यसे दुगुने द्रव्यका दण्ड देना चाहिये, यह धर्मकी व्यवस्था है। मूल्यका कुछ भाग देनेके पश्चात् यदि लेनेवाला व्यक्ति उसे लेना नहीं चाहता तो उसे मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये और उसे दिये हुए द्रव्यको लौटा देना चाहिये। जो गोपाल वेतन लेकर गायको दुहता है और उसकी ठीकसे रक्षा नहीं करता उसे राजाको सौ सुवर्ण मुद्राओंका दण्ड देना चाहिये। राजा दण्ड देनेके बाद विराम ले ले। तदनन्तर राजाद्वारा चिह्नित अपराधीको काले लोहेकी जंजीरसे आबद्ध कर दिया जाय और पुनः किसी अपने ही कार्यपर नियुक्त कर लिया जाय ॥११-२३॥

धनुःशतपरीणाहो ग्रामस्य तु समंततः।

द्विगुणं त्रिगुणं वापि नगरस्य तु कल्पयेत्॥२४

वृत्तिं तत्र प्रकुर्वीत यामुष्टो नावलोकयेत्।

छिद्रं वा वारयेत् सर्वं श्वशूकरमुखानुगम्॥२५

यत्रापरिवृतं धान्यं विहिंस्युः पशवो यदि।

न तत्र कारयेद् दण्डं नृपतिः पशुरक्षिणे॥२६

अनिर्दशाहां गां सूतां वृषं देवपशुं तथा।

छिद्रं वा वारयेत् सर्वं न दण्ड्यो मनुरब्रवीत्॥ २७

अथोऽन्यथा विनष्टस्य दशांशं दण्डमर्हति।

पाल्यस्य पालकस्वामी विनाशे क्षत्रियस्य तु॥२८

भक्षयित्वोपविष्टस्तु द्विगुणं दण्डमर्हति।

विशं दण्ड्याद् दशगुणं विनाशे क्षत्रियस्य तु॥२९

गृहं तडागमारामं क्षेत्रं वापि समाहरन्।

शतानि पञ्च दण्डः स्यादज्ञानाद् द्विशतो दमः॥३०

सीमाबन्धनकाले तु सीमान्तं यो हि कारयेत्।

तेषां संज्ञां ददानस्तु जिह्वाच्छेदनमाप्नुयात्॥ ३१

अथैनामपि यो दद्यात् संविदं वाधिगच्छति।

उत्तमं साहसं दण्ड्य इति स्वायम्भुवोऽब्रवीत्॥३२

वर्णानामानुपूर्वेण त्रयाणामविशेषतः।

अकार्यकारिणः सर्वान् प्रायश्चित्तानि कारयेत्॥ ३३

अमत्या च प्रमाप्य स्त्रीं शूद्रहत्याव्रतं चरेत्।

दानेन च धनेनैकं सर्पादीनामशक्नुवन्॥३४

एकैकं स चरेत् कृच्छ्रे द्विजः पापापनुत्तये।

फलदानां च वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम्॥ ३५

गुल्मवल्लीलतानां च पुष्पितानां च वीरुधाम्।

अस्थिमतां च सत्त्वानां सहस्रस्य प्रमापणे।

पूर्णे वानस्यवस्थातुं शूद्रहत्याव्रतं चरेत्॥३६

ग्रामके बाहर चारों ओरसे सौ धनुषके विस्तारकी और नगरके लिये उससे दुगुने या तिगुने विस्तारकी ऐसी प्राचीर बनाये जिसके भीतरकी वस्तुको ऊँट भी न देख सके। उसमें कुत्ते तथा सूअरके मुख घुसने योग्य सभी छिद्रोंको बंद करा देना चाहिये। यदि पशु बिना घेरेके खेतके अन्नको हानि पहुंचाते हैं तो राजाको पशुके चरवाहेको दण्ड नहीं देना चाहिये। दस दिनके भीतरकी ब्यायी गायद्वारा तथा देवताके उद्देश्यसे छोड़े गये वृषद्वारा घेरा रहनेपर भी यदि खेतके अन्नकी हानि होती है तो उसके लिये पशुपालक दण्डनीय नहीं है-ऐसा मनुने कहा है। इन उपर्युक्त कारणोंके अतिरिक्त अन्य प्रकारसे नष्ट हुए द्रव्यके दशांशका दण्ड लगाना चाहिये। कोई पशु फसलको खाकर यदि वहीं बैठा हुआ मिलता है तो उसके स्वामीके ऊपर उक्त दण्डसे दुगुना दण्ड लगाना चाहिये। यदि खेतका स्वामी क्षत्रिय है और वैश्यका पशु हानि पहुंचाता है तो उसे हानिका दस गुना दण्ड देना चाहिये। यदि किसीके घर, तालाब, बगीचे या खेतको कोई दूसरा छीन लेता है तो उसे पाँच सौ मुद्राका तथा बिना जाने यदि इनको हानि पहुंचाता है तो दो सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये। किसी खेत आदिकी सीमा बाँधनेके समय यदि कोई सीमाका उल्लङ्घन करता है या सम्मति देता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये। जो सीमाका उल्लङ्घन करनेवाले व्यक्तिकी बातोंका शपथपूर्वक समर्थन करता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये-ऐसा स्वायम्भुव मनुने कहा है॥२४-३२ ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य-इन तीनों वर्गों के लोग समाजमें अपनी स्थितिके बिना किसी विशेषताके क्रमसे यदि निषिद्ध कार्य करते हैं तो उन सबसे प्रायश्चित्त करवाना चाहिये। यदि कोई अनजानमें स्त्रीका वध कर देता है तो उसे शूद्र-हत्या-व्रतका पालन करना चाहिये। सादिकी हत्या कर धन-दान करनेमें असमर्थ द्विजको पाप-शान्तिके लिये एक-एक कृच्छ्रव्रतका आचरण करना चाहिये। फल देनेवाले वृक्षों, फूली हुई लताओं, गुल्मों, वल्लियों तथा फूले हुए वृक्षोंको काटनेपर सौ ऋचाओंका जप करना चाहिये। एक सहस्र अथवा एक गाड़ीमें भर जानेके योग्य हड्डीवाले जीवोंकी हत्या करनेवालेको शूद्रहत्याका प्रायश्चित्त करना चाहिये।-

किंचिद् देयं च विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे।

अनस्थां चैव हिंसायां प्राणायामैर्विशुद्ध्यति ॥ ३७

अन्नादिजानां सत्त्वानां रसजानां च सर्वशः।

फलपुष्पोद्गतानां च घृतप्राशो विशोधनम्॥ ३८

कृष्टानामोषधीनां च जातानां च स्वयं वने।

वृथाच्छेदेन गच्छेत दिनमेकं पयोव्रती॥३९

एतैर्ऋतैरपोह्यं स्यादेनो हिंसासमुद्भवम् ।

स्तेयदोषापहर्तृणां श्रूयतां व्रतमुत्तमम्॥४०

धान्यान्नधनचौर्याणि कृत्वा कामाद् द्विजोत्तमः ।

सजातीयगृहादेव कृच्छ्रार्धेन विशुद्ध्यति॥४१

मनुष्याणां तु हरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य तु।

कूपवापीजलानां तु शुद्धिश्चान्द्रायणं स्मृतम्॥४२

द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वान्यवेश्मतः।

चरेत् सान्तपनं कृच्छ्रे तन्निर्यात्यविशुद्धये ॥ ४३

भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य तु।

पुष्पमूलफलानां तु पञ्चगव्यं विशोधनम्॥ ४४

तृणकाष्ठद्रुमाणां तु शुष्कान्नस्य गुडस्य च।

चैलचर्मामिषाणां तु त्रिरात्रं स्यादभोजनम्॥ ४५

मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च।

अयस्कांस्योपलानां च द्वादशाहं कणान्नभुक्॥४६

कार्पासकीटजोर्णानां द्विशफैकशफस्य च।

पक्षिगन्धौषधीनां च रज्ज्वाश्चैव त्र्यहं पयः॥ ४७

एतैर्ऋतैर्व्यपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः।

अगम्यागमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत्॥ ४८

गुरुतल्पव्रतं कुर्याद् रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु।

सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च॥ ४९

पैतृष्वस्त्रीयभगिनीं स्वस्त्रीयां मातुरेव च।

भ्रातुर्दुहितरं चैव गत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥५०

हड्डीवाले जानवरोंकी हत्या करनेपर ब्राह्मणको कुछ दान देना चाहिये और जो बिना हड्डीके हैं उनकी हिंसा करनेपर प्राणायामसे शुद्धि हो जाती है। अन्नादिसे एवं रससे उत्पन्न होनेवाले तथा फलों और पुष्पोंमें पैदा होनेवाले जन्तुओंकी हिंसा करनेपर घृत-पान ही प्रायश्चित्त है। जुताईसे उत्पन्न हुई तथा वनमें स्वत: उगी हुई ओषधियोंको बिना आवश्यकताके काटनेपर एक दिनका दुग्धव्रत करना चाहिये। हिंसासे उत्पन्न हुआ पातक इन व्रतोंसे दूर किया जा सकता है। अब चोर-कर्मसे उत्पन्न हुए पापको दूर करनेके लिये उत्तम व्रत सुनिये ॥३३-४०॥

यदि ब्राह्मण अपनी जातिवालोंके घरसे इच्छापूर्वक धान्य, अन्न और धनकी चोरी करता है तो वह अर्धकृच्छ्रव्रतसे शुद्ध होता है। मनुष्य, स्त्री, खेत, घर, कूप और बावलीके जलका हरण करनेपर शुद्धिके लिये

चान्द्रायणव्रतका विधान है। दूसरेके घरसे थोड़ी मूल्यवाली वस्तुओंकी चोरी करनेपर उससे शुद्ध होनेके लिये कृच्छ्रसांतपन-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। भक्ष्य, भोज्य, वाहन, शय्या, आसन, पुष्प, मूल और फलकी चोरी करनेपर उसका प्रायश्चित्त पञ्चगव्य-पान है। तृण, काष्ठ, वृक्ष, सूखा अन्न, गुड, वस्त्र, चमड़ा तथा मांसकी चोरी करनेपर तीन राततक उपवास करना चाहिये। मणि, मोती, प्रवाल, ताँबा, चाँदी, लोहा, काँसा तथा पत्थरकी चोरी करनेपर बारह दिनोंतक अन्नके कणोंका भोजन करना चाहिये। सूती, रेशमी, ऊनी वस्त्र, दो तथा एक खुरवाले पशु, पक्षी, सुगन्धित द्रव्य, ओषधि तथा रस्सीकी चोरी करनेपर तीन दिनतक केवल जल पीकर रहना चाहिये। ब्राह्मणको इन व्रतोंद्वारा चोरीसे उत्पन्न हुए पापका निवारण करना चाहिये। अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेसे उत्पन्न हुए पापको इन व्रतोंद्वारा नष्ट करना चाहिये। अपनी जातिकी परायी स्त्रीके साथ समागम करके गुरुतल्प-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये अर्थात् गुरुकी स्त्रीके साथ समागम करनेपर जो प्रायश्चित्त कहा गया है, उसका अनुष्ठान करना चाहिये। मित्र तथा पुत्रकी स्त्री, कुमारी कन्या, नीच जातिकी स्त्री (चाण्डाली), फुफेरी तथा मौसेरी बहन और भाईकी कन्याके साथ समागम करनेपर चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये॥ ४१-५०॥

एता: स्त्रियस्तु भार्यार्थे नोपगच्छेत्तु बुद्धिमान्।

ज्ञातीनां च स्त्रियो यास्तु पतितानुगताश्च याः॥५१

अमानुषीषु पुरुषो उदक्यायामयोनिषु।

रेत: सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रे सांतपनं चरेत्॥५२

मैथुनं च समालोक्य पुंसि योषिति वा द्विजः।

गोयानेऽप्सु दिवा चैव सवासाः स्नानमाचरेत्॥५३

चाण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च।

पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात् साम्यं तु गच्छति॥५४

विप्रदुष्टां स्त्रियं भर्ती निरुन्ध्यादेकवेश्मनि।

यत् पुंसः परदारेषु तच्चैनां चारयेद् व्रतम्॥५५

सा चेत् पुनः प्रदुष्येत्तु सदृशेनोपमन्त्रिता।

कृच्छं चान्द्रायणं चैव तत् तस्याः पावनं स्मृतम्॥५६

यः करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं द्विजः।

तद्भक्ष्यभुग जपेन्नित्यं त्रिभिर्वर्डंळपोहति ॥५७

एषा पापकृतामुक्ता चतुर्णामपि निष्कृतिः।

पतितैः सम्प्रयुक्तानामिमां शृणुत निष्कृतिम्॥५८

संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन्।

याजनाध्यापनाद् यौनादनुयानाशनासनात्॥५९

यो येन पतितेनैषां संसर्ग याति मानवः ।

स तस्यैव व्रतं कुर्यात् तत्संसर्गविशुद्धये॥६०

पतितस्योदकं कार्य सपिण्डैर्बान्धवैः सह।

निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञातिभिर्गुरुसंनिधौ॥६१

दासी घटमपां पूर्णं पर्यस्येत् प्रेतवत् सदा।

अहोरात्रमुपासीरन् नाशौचं बान्धवैः सह॥६२

निवर्तयेरंस्तस्मात्तु सम्भाषणसहासनम्।

दायादस्य प्रमाणंच यात्रामेव च लौकिकीम्।। ६३

ज्येष्ठाभावान्निवर्तेत ज्येष्ठ्यावाप्तं च यत्पुनः।

ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान् गुणतोऽधिकः॥६४

बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि जो स्त्रियाँ अपनी जातिकी हों तथा जो पतितोंकी अनुगामिनी हों, उनके साथ भार्याके समान समागम न करे। मनुष्यसे भिन्न योनि, ऋतुमती स्त्री तथा योनिद्वारसे अन्यत्र अथवा जलमें वीर्यपात करके पुरुषको कृच्छ्र-सान्तपन नामक व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। बैलगाड़ीपर, जलमें तथा दिनमें स्त्री-पुरुषके मैथुनको देखकर ब्राह्मणको वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये। ब्राह्मण यदि अज्ञानसे चाण्डाल और अन्त्यज स्त्रियोंके साथ सम्भोग, उनके यहाँ भोजन और उनका दिया हुआ दान ग्रहण करता है तो वह पतित हो जाता है और जान-बूझकर करता है तो वह उन्हींके समान हो जाता है। ब्राह्मणद्वारा दूषित स्त्रीको उसका पति एक घरमें बंद कर दे। इसी प्रकार दूसरेकी स्त्रियोंसे समागम करनेवाले पुरुषको भी यही व्रत करना चाहिये। यदि वह स्त्री पुनः किसी परकीय पुरुषसे दूषित होती है तो उसे शुद्ध करनेके लिये कृच्छ्रचान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान बताया गया है। जो द्विज एक रात भी शूद्र स्त्रीके साथ समागम करता है तथा उसका दिया हुआ अन्न भोजन करता है, वह तीन वर्षोंतक निरन्तर गायत्रीजप करनेसे शुद्ध होता है। चारों वर्गों के पापियोंके लिये यह प्रायश्चित्त कहा गया है। अब पतितोंके संसर्गमें होनेवाले पापके लिये यह प्रायश्चित्त सुनिये ॥५१-५८॥

पतितके साथ यज्ञानुष्ठान, अध्यापन, यौन-सम्बन्ध, भोजन, एक वाहनपर गमन तथा आसनपर उपवेशन करनेसे भला मनुष्य (भी) एक वर्षमें पतित हो जाता है। जो मनुष्य इन कर्मोमें जिस पतितका संसर्ग प्राप्त करता है, उसे उस संसर्गदोषकी शुद्धिके लिये उसी पतितके व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। उसके सपिण्ड भाई-बन्धुओंको जातिवालोंके साथ किसी निन्दित दिनको सायंकालके समय गुरुके समीप उस पतितके लिये उदक-क्रिया करनी चाहिये। दासी उक्त व्यक्तिके लिये प्रेतकी तरह जलपूर्ण घट रखे, परिवारवालोंके साथ एक दिन-रातका उपवास करे और अशौचके समान व्यवहार करे। परिवारवालोंके लिये उसके साथ वार्तालाप करना और एक आसनपर बैठना निषिद्ध है। इस पाप-कर्मकी जातिको भी उन्हें नहीं प्रकट करना चाहिये-यह लोककी मर्यादा है। जिस प्रकार ज्येष्ठ भाईके न रहनेपर उसके हिस्सेकी प्राप्ति छोटे भाईको होती है, उसी प्रकार अधिक गुणवान् होनेपर भी छोटे भाईको उसका फल भोगना पड़ता है।

स्थापितांचापि मर्यादा ये भिन्द्युः पापकर्मिणः।

सर्वे पृथग्दण्डनीया राज्ञा प्रथमसाहसम्॥६५

शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियो दण्डमर्हति।

वैश्यस्तु द्विशतं राजशूद्रस्तु वधमर्हति॥६६

पञ्चाशद् ब्राह्मणा दण्ड्यः क्षत्रियस्याभिशंसने।

वैश्यस्याप्यर्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको दमः॥६७

क्षत्रियस्याप्नुयाद्वैश्यः साहसं पुनरेव च।

शूद्रः क्षत्रियमाक्रुश्य जिह्वाच्छेदनमाप्नुयात्॥६८

पञ्चाशत्क्षत्रियो दण्ड्यस्तथा वैश्याभिशंसने।

शूद्रे चैवार्धपञ्चाशत्तथा धर्मो न हीयते॥६९

वैश्यस्याक्रोशने दण्ड्यः शूद्रश्चोत्तमसाहसम्।

शूद्राक्रोशे तथा वैश्यः शतार्धं दण्डमर्हति॥७०

सवर्णाक्रोशने दण्ड्यस्तथा द्वादशकं स्मृतम्।

वादेष्ववचनीयेषु तदेव द्विगुणं भवेत्॥७१

एकजातिर्द्विजातिं तु वाचा दारुणया क्षिपन्।

जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यः प्रथमो हि सः॥७२

नामजातिगृहं तेषामभिद्रोहेण कुर्वतः।

निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुचलन्नास्ये दशाङ्गुलः॥७३

धर्मोपदेशं शूद्रस्तु द्विजानामभिकुर्वतः।

तप्तमासेचयेत्तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः॥७४

श्रुतिं देशं च जातिं च कर्म शारीरमेव च।

वितथं च ब्रुवन् दण्ड्यो राज्ञा द्विगुणसाहसम्॥७५

यस्तु पातकसंयुक्तः क्षिपेद् वर्णान्तरं नरः।

उत्तमं साहसं दण्डः पात्यस्तस्मिन् यथाक्रमम्॥७६

राज्ञो निवेशनियम वितथं यान्ति वै मिथः।

सर्वे द्विगुणदण्ड्यास्ते विप्रलम्भान्नृपस्य तु॥७७

प्रीत्या मयास्याभिहितं प्रमादेनाथवा वदेत्।

भूयो न चैवं वक्ष्यामि स तु दण्डार्धभाग्भवेत्॥७८

जो पापाचारी प्राणी निश्चित की गयी मर्यादाको तोड़ देते हैं, उन्हें राजा पृथक्-पृथक् जाति-क्रमके अनुसार उत्तम

साहसका दण्ड दे। राजन् ! यदि क्षत्रिय होकर ब्राह्मणको कटु वचन कहता है तो उसे सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये। यदि वैश्य है तो उसे दो सौ मुद्राका और यदि शूद्र है तो उसे प्राण-दण्ड देना चाहिये। यदि ब्राह्मण क्षत्रियको कटु बातें कहे तो उसे पचास पण, वैश्यको कहे तो पचीस पण तथा शूद्रको कहे तो बारह पणका दण्ड देना चाहिये। यदि वैश्य क्षत्रियको कटु वचन कहता है तो उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये और शूद्र क्षत्रियको कटूक्ति सुनाता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये॥५९-६८॥

क्षत्रिय यदि वैश्यको बुरा-भला कहता है तो उसे पचास और शूद्रको कहता है तो पचीस दमका दण्ड देना चाहिये। ऐसा करनेसे उसका धर्म क्षीण नहीं होता। शूद्र यदि वैश्यको कटु वचन कहे तो उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये और वैश्य होकर शूद्रको बुरा-भला कह रहा है तो वह पचास दमके दण्डका भागी होता है। यदि कोई अपने वर्णवालेको कटूक्ति सुनाता है तो उसे बारह दमका दण्ड देना चाहिये तथा अकथनीय बातें कहनेपर वह दण्ड दुगुना हो जाता है। यदि द्विजातिसे भिन्न जातिवाला किसी द्विजातिको कठोर वाणीसे बुरा-भला कहता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये और उसे परम नीच समझना चाहिये। अधिक द्रोहवश नाम, जाति तथा घरकी निन्दा करनेवालेके मुखमें लोहेकी बारह अंगुल लम्बी जलती हुई शलाका डाल देनी चाहिये। राजाको द्विजातिको धर्मोपदेश करनेवाले शूद्रके मुख और कानमें खौलता हुआ तेल डाल देना चाहिये। वेद, देश, जाति और शारीरिक कर्मको निष्फल बतलानेवाला राजाद्वारा दुगुने साहसके दण्डका भागी होता है। जो मनुष्य स्वयं पापाचारी होकर दूसरे वर्णकी निन्दा करता है, उसे राजा जातिके अनुरूप उत्तम साहसका दण्ड दे। जो राजाके बनाये हुए नियमकी अवहेलना करते हैं अथवा राजाकी निन्दा करते हैं, उन सबको दुगुने साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति 'मैंने प्रेमवश अथवा प्रमादसे ऐसा कहा है, अब पुनः ऐसा नहीं कहूँगा' ऐसा कहकर अपराध स्वीकार कर लेता है, वह आधे दण्डका पात्र है॥ ६९-७८ ॥

काणं वाप्यथवा खञ्जमन्धं चापि तथाविधम्।

तथ्येनापि ब्रुवन् दाप्यो दण्डं कार्षापणं धनम्॥७९

मातरं पितरं ज्येष्ठं भ्रातरं श्वशुरं गुरुम्।

आक्रोशयशतं दण्ड्यः पन्थानं चादयन् गुरोः॥८०

गुरुवर्यं तु मानार्ह यो हि मार्गं न यच्छति।

स दाप्यः कृष्णलं राज्ञस्तस्य पापस्य शान्तये॥८१

एकजातिर्द्विजातिं तु येनाङ्गेनापराध्नुयात्।

तदेव च्छेदयेत्तस्य क्षिप्रमेवाविचारयन्॥८२

अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ च्छेदयेन्नृपः।

अवमूत्रयतो मेढमपशब्दयतो गुदम्॥८३

सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः

कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचं वाप्यस्य कर्तयेत्॥८४

केशेषु गृह्णतो हस्तं छेदयेदविचारयन्।

पादयो सिकायां च ग्रीवायां वृषणेषु च॥८५

त्वग्भेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः।

मांसभेत्ता च षनिष्कान् निर्वास्यस्त्वस्थिभेदकः॥८६

अङ्गभङ्गकरस्याङ्गं तदेवापहरेन्नृपः।

दण्डपारुष्यकृद् दण्ड्यः समुत्थानव्ययं तथा॥८७

अर्धपादकरः कार्यों गोगजाश्वोष्ट्रघातकः।

पशुक्षुद्रमृगाणां च हिंसायां द्विगुणो दमः॥८८

पञ्चाशच्च भवेद् दण्ड्यस्तथैव मृगपक्षिषु।

कृमिकीटेषुदण्ड्यः स्याद्रजतस्य चमाषकम्॥८९

तस्यानुरूपं मूल्यं च प्रदद्यात् स्वामिने तथा।

स्वस्वामिकानां सकलं शेषाणां दण्डमेव तु॥ ९०

कोई काना हो, लँगड़ा हो अथवा अन्धा हो, उसे सत्यतापूर्वक उसी प्रकारका कहनेपर भी उसे एक कार्षापणका* दण्ड देना चाहिये। माता, पिता, ज्येष्ठ भाई, श्वशुर तथा गुरु-इनकी निन्दा करनेवाले तथा गुरुजनोंके मार्गको नष्ट करनेवालेको सौ कार्षापणका दण्ड देना चाहिये। जो माननीय श्रेष्ठ लोगोंको मार्ग नहीं देता, उसे उस पापकी शान्तिके लिये राजा एक कृष्णलका दण्ड दे। द्विजातिसे भिन्न जातिवाला व्यक्ति किसी द्विजातिका जिस अङ्गसे अपकार करता है, उसके उसी अङ्गको शीघ्र ही बिना कुछ विचार किये कटवा देना चाहिये। राजा सामने गर्वपूर्वक थूकनेवाले, पेशाब करनेवाले तथा अपानवायु छोड़नेवाले व्यक्तिका क्रमश: दोनों होंठ, लिङ्ग और गुदाद्वार कटवा दे। यदि कोई नीच जातिवाला व्यक्ति उत्कृष्ट व्यक्तिके साथ आसनपर बैठना चाहता है तो राजा उसकी कमरमें एक चिह्न बनाकर अपने राज्यसे निर्वासित कर दे या उसके गुदाभागको कटवा दे। इसी प्रकार यदि कोई निम्न जातिवाला किसी उच्च जातीय व्यक्तिके केशोंको पकड़ता है तो उसके हाथको बिना विचार किये ही कटवा देना चाहिये। इसी प्रकारका दण्ड दोनों पैरों, नासिका, गला तथा अण्डकोशके पकड़नेपर भी देना चाहिये। यदि कोई किसीके चमड़ेको काट देता है और उससे रक्त निकलने लगता है तो उसे शतमुद्राका दण्ड देना चाहिये। मांस काट लेनेवालेको छ: निष्कोंका दण्ड तथा हड्डी तोड़नेवालेको देशनिकालाका दण्ड देना चाहिये। यदि कोई व्यक्ति किसीके अङ्गको तोड़-फोड़ देता है तो राजाको चाहिये कि उसके उसी अङ्गको कटवा दे तथा उसे उतने द्रव्यका भी दण्ड दे, जितना उस आहत व्यक्तिके उठने-बैठनेके व्ययके लिये अपेक्षित हो। गाय, हाथी, अश्व और ऊँटकी हत्या करनेवालेका आधा हाथ और आधा पैर काट लेना चाहिये। राजाको पशु तथा छोटे जानवरोंकी हत्या करनेपर अपराधीको उनके मूल्यके दुगुने पणका दण्ड देना चाहिये। मृग तथा पक्षियोंकी हत्या करनेपर पचास पणका दण्ड करनेका विधान है। कृमि तथा कीटोंके मारनेपर एक मासा चाँदीका दण्ड लगाना उचित है तथा उसके अनुकूल मूल्य भी उसके स्वामीको दिलाना चाहिये ।। ७९-८९६ ॥

अब स्वतन्त्र पदार्थोंको नष्ट करनेपर लगनेवाले

*१६ माशेकी स्वर्णमुद्रा या १६ पणकी रजतमुद्रा। (दे० मनु०८।१३६, ३३६ आदि)

वृक्षं तु सफलं छित्त्वा सुवर्णं दण्डमर्हति।

द्विगुणं दण्डयेच्चैनं पथि सीम्नि जलाशये॥९१

छेदनादफलस्यापि मध्यमं साहसं स्मृतम्।

गुल्मवल्लीलतानां च सुवर्णस्य च माषकम्॥९२

वृथाच्छेदी तृणस्यापि दण्ड्यः कार्षापणं भवेत्।

त्रिभागं कृष्णला दण्ड्याः प्राणिनस्ताडने तथा॥ ९३

देशकालानुरूपेण मूल्यं राजा द्रुमादिषु।

तत्स्वामिनस्तथा दण्ड्या दण्डमुक्तस्तु पार्थिव॥९४

यत्रातिवर्तते युग्यं वैगुण्यात् प्राजकस्य तु।

तत्र स्वामी भवेद्दण्ड्यो नाप्तश्चेत् प्राजको भवेत्॥ ९५

प्राजकश्च भवेदाप्तः प्राजको दण्डमर्हति।

नास्ति दण्डश्च तस्यापि तथा वै हेतुकल्पकः॥९६

द्रव्याणि यो हरेद् यस्य ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा।

स तस्योत्पादयेत् तुष्टिं राज्ञो दद्यात् ततो दमम्॥ ९७

यस्तु रज्जुंघट कूपाद्धरेद् भिन्द्याच्च तां प्रपाम्।

स दण्डं प्राप्नुयान्माषं तच्च सम्प्रतिपादयेत्।। ९८

धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः।

शेषेऽप्येकादशगुणं तस्य दण्डं प्रकल्पयेत्॥ ९९

तथा भक्ष्यान्नपानानां न तथाप्यधिके वधः।

सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां न वाससाम्॥१००

पुरुषाणां कुलीनानां नारीणां च विशेषतः।

महापशूनां हरणे शस्त्राणामौषधस्य च॥१०१

मुख्यानां चैव रत्नानां हरणे वधमर्हति।

दनः क्षीरस्य तक्रस्य पानीयस्य रसस्य च॥१०२

वेणुवैदलभाण्डानां लवणानां तथैव च।

मृन्मयानां च सर्वेषां मृदो भस्मन एव च॥१०३

दण्डको बतला रहा हूँ। फलयुक्त वृक्षको काटनेपर अपराधीको सुवर्णका दण्ड देना उचित है। यदि वह वृक्ष किसी सीमा, मार्ग अथवा जलाशयके समीप है तो उसे दुगुना दण्ड देना चाहिये। फलरहित वृक्षको भी काटनेपर मध्यमसाहसका दण्ड देनेका विधान है। गुल्मों, लताओं तथा वल्लियोंको काटनेपर एक मासा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। बिना किसी आवश्यकताके तृणको भी नष्ट करनेवाला व्यक्ति एक कार्षापणके दण्डका भागी होता है। किसी प्राणीको कष्ट पहुँचानेवालेको कृष्णलके तिहाई भागका दण्ड देना चाहिये। राजन् ! वृक्षादिके काटे जानेपर राजा देश तथा कालके अनुसार उचित मूल्यका दण्ड दे और उस दण्डको वृक्षादिके स्वामीको दिला दे। यदि चालककी असावधानीसे रथ मार्गसे विचलित हो जाता है तो ऐसे अवसरपर यदि वह चालक निपुण नहीं है तो उसके स्वामीको दण्ड देना चाहिये और यदि चालक निपुण है तो उसीके ऊपर दण्ड लगाना चाहिये, किंतु यदि वह घटना किसी विशेष परिस्थितिवश घटित हुई हो तो चालकको भी दण्ड नहीं देना चाहिये। जो किसीके द्रव्यको जानकर या अनजानमें अपहरण कर लेता है, उसे राजाके सम्मुख दण्ड स्वीकार कर उसके स्वामीको संतुष्ट करना चाहिये। अन्यथा उसपर एक पण दण्ड लगानेका विधान है। जो व्यक्ति किसी कुएँपरसे रस्सी अथवा घड़ा चुरा लेता है या उस कुएँको तोड़ता-फोड़ता है, उसके ऊपर एक मासा सुवर्णका दण्ड लगाना उचित है और उसीसे कुएँकी क्षति-पूर्ति करानी चाहिये। दस घड़ेसे अधिक अन्न चुरानेवालेको प्राण-दण्ड देना चाहिये। यदि दस घड़ेसे कम अन्न चुराता है तो उसने जितना अन्न चुराया है, उससे ग्यारहगुना अधिक मूल्यका दण्ड उसपर लगाना चाहिये। उसी प्रकार दस घड़ेसे अधिक खाद्य-सामग्री, अन्न एवं पानादिकी चोरी करनेपर उसी प्रकारके दण्डका विधान है। उसे प्राणदण्ड नहीं देना चाहिये। सुवर्ण, चाँदी आदि धातुओं, उत्तम वस्त्रों, कुलीन पुरुषों, विशेषतया कुलीन स्त्रियों, बड़े-बड़े पशुओं, हथियारों, ओषधियों तथा मुख्य-मुख्य रत्नोंकी चोरी करनेपर चोर प्राण-दण्डका पात्र होता है॥९०-१०१३॥

दही, दूध, तक्र (छाँछ-मट्ठा), जल, रस, बाँस एवं वैदल आदिके पात्र, लवण, सभी प्रकारके मिट्टीके पात्र, मिट्टी और भस्मकी चोरी करनेवालेके लिये राजा

कालमासाद्य कार्यं च राजा दण्डं प्रकल्पयेत्।

गोषु ब्राह्मणसंस्थासु महिषीषु तथैव च॥१०४

अश्वापहारकश्चैव सद्यः कार्योऽर्धपादकः।

सूत्रकार्पासकिण्वानां गोमयस्य गुडस्य च ॥ १०५

मत्स्यानां पक्षिणां चैव तैलस्य च घृतस्य च ।

मांसस्य मधुनश्चैव यच्चान्यद्वस्तुसम्भवम्॥१०६

अन्येषां लवणादीनां मद्यानामोदनस्य च।

पक्वान्नानां च सर्वेषां तन्मूल्याद् द्विगुणो दमः ॥१०७

पुष्पेषु हरिते धान्ये गुल्मवल्लीलतासु च।

अन्नेषु परिपूर्णेषु दण्डः स्यात् पञ्चमाषकम्।

परिपूर्णेषु धान्येषु शाकमूलफलेषु च॥१०८

निरन्वये शतं दण्ड्यः सान्वये द्विशतं दमः।

येन येन यथाङ्गेन स्तेनोऽन्येषु विचेष्टते॥१०९

तत्तदेव हरेत् तस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः ।

द्विजोऽध्वगः क्षीणवृत्तिविक्षू द्वे च मूलके॥११०

त्रपुसोर्वारुको द्वौ च तावन्मानं फलेषु च।

तथा च सर्वधान्यानां मुष्टिग्राहेण पार्थिव॥१११

शाके शाकप्रमाणेन गृह्यमाणे न दुष्यति।

वानस्पत्यं फलं मूलं दार्वग्न्यर्थं तथैव च॥११२

तृणं गोऽभ्यवहारार्थमस्तेयं मनुरब्रवीत्।

अदेववाटिजं पुष्पं देवतार्थं तथैव च॥११३

आददानः परक्षेत्रान्न दण्डं दातुमर्हति।

शृङ्गिणं नखिनं राजन् दंष्ट्रिणं च वधोद्यतम्॥११४

यो हन्यान्न स पापेन लिप्यते मनुजेश्वर।

गुरुं वा बालवृद्धं वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम्॥११५

आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्।

नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन ॥११६

प्रकाशं वाप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युमृच्छति।

गृहक्षेत्राभिहर्तारस्तथागम्याभिगामितः ॥११७

अग्निदो गरदश्चैव तथा चाभ्युद्यतायुधः।

अभिचारं तु कुर्वाणो राजगामि च पैशुनम्॥११८

देश एवं कालके अनुसार दण्डकी व्यवस्था करे। ब्राह्मणके घरसे गाय, भैंस और घोड़ेकी चोरी करनेवालेको तुरंत ही आधे पैरवाला कर देना चाहिये। सूत, कपास, आसव, गोबर, गुड़, मछली, पक्षी, तेल, घी, मांस, मधु, नमक, मदिरा, भात एवं इनसे बनी हुई अन्यान्य वस्तुओं तथा सभी प्रकारके पकवानोंकी चोरी करनेवालेको उस वस्तुके मूल्यसे दुगुना दण्ड देना चाहिये। पुष्प, कच्चा अन्न, गुल्म, लता, वल्ली तथा अधिक अन्नकी चोरी करनेवालेको पाँच मासा सुवर्णका दण्ड देना उचित है। प्रचुरमात्रामें अन्न, शाक, मूल और फलकी चोरी करनेवाले संतानहीनको सौ मुद्राका तथा संतानवालेको दो सौ पणका दण्ड देना चाहिये। चोर जिस-जिस अङ्गोंकी सहायतासे चोरी करनेकी चेष्टा करता है, राजा उसके उस अङ्गको कटवा दे। यदि कोई अकिंचन ब्राह्मण मार्गमें चलते हुए दो ईख, दो कन्द (मूली), दो खीरे, दो तरबूजे, दो अन्य फल, दो मुट्ठी सभी प्रकारके अन्न अथवा साग ले लेता है तो वह चोरीके दोषसे दूषित नहीं होता। भोजनके लिये वृक्षसे उत्पन्न हुए फल, मूल और जलौनी लकड़ीको काट लेना अथवा गौको खिलानेके लिये घास उखाड़ लेना चोरी नहीं है-ऐसा मनुजीने कहा है। देवताकी वाटिकासे भिन्न दूसरेके खेतमें उत्पन्न हुए पुष्पको देवताकी पूजाके लिये तोड़नेवाला दण्डका पात्र नहीं होता, उसे दण्ड नहीं देना चाहिये॥ १०२-११३॥

राजन् ! जो अपनेको मारनेके लिये उद्यत सींगवाले, नखवाले तथा दाढ़वाले पशुको मारता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता। गुरु, बालक, वृद्ध अथवा शास्त्रज्ञ ब्राह्मण ही क्यों न हो, यदि वह अपनेको मारनेके लिये

आ रहा हो तो उसे बिना विचार किये ही मार डालना चाहिये;* क्योंकि आततायीका वध करनेपर वधकर्ताको कोई पाप नहीं लगता। प्रकटरूपमें अथवा गुप्तरूपमें भी पाप करनेवाला पापका भागी होता है। दूसरोंके घर तथा खेतका अपहरण करनेवाले, अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले, आग लगानेवाले, विष देनेवाले, हथियार लेकर मारनेके लिये उद्यत, अभिचारपरायण, राजाके विरोधमें विद्रोह करनेवाले-

* मिताक्षरादिके मतसे यह अर्थवाद है।

एते हि कथिता लोके धर्मज्ञैराततायिनः।

भिक्षुकोऽप्यथवा नारी योऽपि वा स्यात् कुशीलवः ॥११९

प्रविशेत् प्रतिषिद्धस्तु प्राप्नुयाद् द्विगुणं दमः।

परस्त्रीणां तु सम्भाषे तीर्थेऽरण्ये गृहेऽपि वा॥१२०

नदीनां चैव सम्भेदे स संग्रहणमाप्नुयात्।

न सम्भाषेत् परस्त्रीभिः प्रतिषिद्धः समाचरेत्॥१२१

प्रतिषिद्धे समाभाष्य सुवर्णं दण्डमर्हति।

नैव चारणदारेषु विधिरात्मोपजीविषु॥१२२

सज्जयन्ति मनुष्यैस्ता निगूढं वा चरन्त्युत।

किंचिदेव तुदाप्यः स्यात् सम्भाषणापचारयन्॥ १२३

प्रेष्यासु चैव सर्वासु गृहप्रव्रजितासु च।

योऽकामां दूषयेत् कन्यां स सद्यो वधमर्हति॥१२४

सकामां दूषयाणस्तु प्राप्नुयाद् द्विशतं दमम्।

यश्च संरक्षकस्तत्र पुरुषः स तथा भवेत्॥१२५

पारदारिकवद्दण्ड्यो योऽपि स्यादवकाशदः।

बलात् संदूषयेद्यस्तु परभार्यां नरः क्वचित्॥१२६

वधो दण्डो भवेत्तस्य नापराधो भवेत् स्त्रियाः।

रजस्तृतीयं या कन्या स्वगृहे प्रतिपद्यते॥१२७

अदण्ड्या सा भवेद्ाज्ञा वरयन्ती पतिं स्वयम्।

स्वदेशे कन्यकां दत्त्वा तामादाय तथा व्रजेत्॥१२८

परदेशे भवेद् वध्यः स्त्रीचौरः स यतो भवेत्।

अद्रव्यां मृतपत्नी तु संगृह्णन्नापराध्यति॥१२९

सद्रव्यां तां संग्रहीता दण्डं तु क्षिप्रमर्हति।

उत्कृष्टं या भजेत् कन्या देया तस्यैव सा भवेत्॥१३०

यच्चान्यं सेवमानां च संयतां वासयेद् गृहे।

उत्तमां सेवमानस्तु जघन्यो वधमर्हति।

जघन्यमुत्तमा नारी सेवमाना तथैव च॥१३१

इनको धर्मज्ञोंने लोकमें आततायी बतलाया है। यदि भिक्षुक, परायी स्त्री तथा चारण आदि निषेध करनेपर भी घरमें घुस जाते हैं तो उन्हें दुगुना दण्ड देना चाहिये। तीर्थ, जंगल या घरमें परायी स्त्रियों के साथ वार्तालाप करनेवाले तथा नदीकी धाराका भेदन करनेवालेको पकड़कर बंद कर देना चाहिये। 'परायी स्त्रीके साथ सम्भाषण नहीं करना चाहिये'-ऐसी निषेधाज्ञा घोषित कर दे। निषेध होनेपर भी यदि कोई सम्भाषण करता है तो वह एक सुवर्ण-मुद्राके दण्डका भागी होता है। किंतु यह दण्ड चारणों, स्त्रियों तथा अन्तःपुरमें प्रवेश कर नृत्य-गीतादिद्वारा अपनी जीविका चलानेवालेको नहीं देना चाहिये। ऐसे लोग यदि अन्तःपुरके लोगोंके साथ सम्भाषण करते हैं या वहाँ घूमते-फिरते हैं तो उन्हें तथा घरसे निकालकर बाहर घूमती हुई सभी दासियोंको नाममात्रका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति किसी कुमारी कन्याके साथ बलात्कार करता है, वह तुरंत ही मार डालने योग्य है। यदि कोई किसी कामुकी कुमारी कन्याके साथ व्यभिचार करता है तो उसे दो सौ पणका दण्ड देना चाहिये और वहाँ जो संरक्षणकर्ता पुरुष है, उसे भी यही दण्ड देना चाहिये। ११४-१२५॥

जो ऐसे व्यभिचारोंको सम्भव बनानेमें अवकाश देता है, उसे परायी स्त्रीके साथ व्यभिचार करनेवालेके समान ही दण्ड देना चाहिये। जो मनुष्य दूसरेकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, उसे प्राणदण्ड देना चाहिये और इसमें उस स्त्रीका कोई भी अपराध नहीं मानना चाहिये। जो कन्या पिताके घरपर तीसरी बार रजस्वला होकर स्वयं पतिका वरण कर लेती है, वह राजाद्वारा दण्डनीय नहीं होती। जो अपने देशमें कन्यादान देकर पुनः उसे लेकर परदेशमें भाग जाता है, उसे प्राणदण्ड देना चाहिये; क्योंकि वह स्त्री-चोर है। द्रव्यहीना, विधवा स्त्रीको ग्रहण करनेवाला अपराधी नहीं माना जाता, किंतु सम्पत्तिसहित विधवाको स्वीकार करनेवाला शीघ्र ही दण्डका भागी होता है। जो कन्या अपनी जाति अथवा योग्यतासे उत्कृष्ट व्यक्तिसे प्रेम करती है तो उसे उसी व्यक्तिको दे देना चाहिये, किंतु जो कन्या किसी कम योग्यतावालेसे प्रेम करती है, उसे विशेष संयमके साथ घरमें ही रखे। यदि नीच जातिवाला जघन्य पुरुष उत्तम जातिकी कन्याके साथ प्रेम करता है तो उसे प्राण-दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार यदि उत्तम जातिकी स्त्री किसी नीच जातिके पुरुषके साथ प्रेम करती है तो वह भी प्राण-दण्डके योग्य है।

भर्तारं लङ्घयेद् या स्त्री ज्ञातिभिर्बलदर्पिता।

तां च निष्कासयेद् राजा संस्थाने बहुसंस्थिते॥१३२

हृताधिकारां मलिनां पिण्डमात्रोपजीविनीम्।

वासयेत् स्वैरिणीं नित्यं सवर्णेनाभिदूषिताम्॥१३३

ज्यायसा दूषिता नारी मुण्डनं समवाप्नुयात्।

वासश्च मलिनं नित्यं शिखां सम्प्राप्नुयाद् दश॥१३४

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः क्षत्रविट्शूद्रयोषितः।

व्रजन् दाप्यो भवेद् राज्ञा दण्डमुत्तमसाहसम्॥१३५

वैश्यागमे च विप्रस्य क्षत्रियस्यान्त्यजागमे।

मध्यमं प्रथमं वैश्यो दण्ड्यः शूद्रागमाद्भवेत्॥१३६

शूद्रः सवर्णागमने शतं दण्ड्यो महीक्षिता।

वैश्यस्तु द्विगुणं राजन् क्षत्रस्तु त्रिगुणं तथा॥१३७

ब्राह्मणश्च भवेद् दण्ड्यस्तथा राजंश्चतुर्गुणम्।

अगुप्तासु भवेद् दण्डः सुगुप्तास्वधिको भवेत्॥१३८

माता पितृष्वसा श्वश्रूर्मातुलानी पितृव्यजा।

पितृव्यसखिशिष्यस्त्री भगिनी तत्सखी तथा।

भ्रातृभार्यागमे पूर्वाद् दण्डस्तु द्विगुणो भवेत्॥१३९

भागिनेयी तथा चैव राजपत्नी तथैव च।

तथा प्रव्रजिता नारी वर्णोत्कृष्टा तथैव च॥१४०

इत्यगम्याश्च निर्दिष्टास्तासां तु गमने नरः।

शिश्नस्योत्कर्तनं कृत्वा ततस्तु वधमर्हति॥१४१

चण्डालींच श्वपाकींचगच्छन्वधमवाप्नुयात्॥१४२

तिर्यग्योनिं च गोवयं मैथुनं यो निषेवते।

वपनं प्राप्नुयाद् दण्डं तस्याश्च यवसोदकम्॥१४३

जो स्त्री अपने जाति-भाइयोंके बलसे गर्वीली होकर अपने पतिको छोड़ देती है, उसे घरसे निकालकर अनेक व्यक्तियोंसे युक्त संस्थानमें रख दे। राजा सवर्ण पुरुषद्वारा दूषित कुलटा स्त्रीको सभी अधिकारोंसे वञ्चित कर मलिन बना दे और भोजनमात्रका प्रबन्ध कर घरमें पड़ा रहने दे। उत्तम कुल एवं जातिमें उत्पन्न हुई स्त्री यदि दूषित हुई हो तो उसकी दस चोटियाँ रखकर शेष बाल कटवा दे और नित्य मैला वस्त्र पहननेको दे। यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य क्रमश: क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रकी स्त्रीके साथ दुराचार करते हैं तो वे राजाद्वारा उत्तमसाहस नामक दण्डके भागी होते हैं। यदि ब्राह्मण वैश्य-स्त्रीके साथ और क्षत्रिय अन्त्यज-स्त्रीके साथ पापाचरण करते हैं तो उन्हें मध्यमसाहसका दण्ड देना चाहिये और यदि वैश्य शूद्रा स्त्रीके साथ व्यभिचार करता है तो उसे भी पूर्वोक्त रीतिके अनुसार उत्तमसाहसका दण्ड मिलना चाहिये। राजन्! यदि शूद्र अपनी जातिकी स्त्रीके साथ समागम करता है तो उसे राजाद्वारा सौ मुद्राओंका दण्ड मिलना चाहिये। इसी प्रकार सवर्णा स्त्रीके साथ पापाचरण करनेसे वैश्यको दो सौ, क्षत्रियको तीन सौ तथा ब्राह्मणको चार सौ मुद्राओंका दण्ड देनेका विधान है। ये दण्ड अरक्षित स्त्रीके साथ पापाचरण करनेपर बताये गये हैं, किंतु सुरक्षित स्त्रियोंके साथ दुराचार करनेपर इससे अधिक दण्ड देना चाहिये॥१२६-१३८॥

माता, फूफी, सास, मामी, चचेरी बहन, चाचीकी सखी, शिष्यकी स्त्री, बहिन, उसकी सखी तथा भाईकी स्त्री-इन सबके साथ समागम करनेपर पूर्वकथित दण्डसे दुगुना दण्ड देना चाहिये। भानजेकी स्त्री, राजाकी पत्नी, संन्यासिनी तथा उच्चवर्णकी स्त्री-ये सभी अगम्या मानी गयी हैं। इन सबके साथ समागम करनेवाले व्यक्तिके लिंगको कटवाकर तत्पश्चात् उसे प्राण-दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार चाण्डालकी स्त्री तथा कुत्तेको खानेवालोंकी स्त्रीके साथ व्यभिचार करनेवालेको प्राण-दण्ड देना चाहिये। गौको छोड़कर अन्य तिर्यग् योनियों में सम्भोग करनेवाले व्यक्तिको मुण्डनका दण्ड देकर उस पशुके लिये घास तथा जल देनेका दण्ड देना चाहिये।

सुवर्णं च भवेद् दण्ड्यो गां व्रजन् मनुजोत्तम।

वेश्यागामी द्विजो दण्ड्यो वेश्याशुल्कसमंपणम्॥१४४

गृहीत्वा वेतनं वेश्या लोभादन्यत्र गच्छति।

वेतनं द्विगुणं दद्याद् दण्डं च द्विगुणं तथा॥१४५

अन्यमुद्दिश्य यो वेश्यां नयेदन्यस्य कारणात्।

तस्य दण्डो भवेद्राजन् सुवर्णस्य च माषकम्॥१४६

नीत्वा भोगान्न यो दद्याद् दाप्यो द्विगुणवेतनम्।

राज्ञश्च द्विगुणं दण्डं तथा धर्मो न हीयते॥१४७

बहूनां व्रजतामेकां सर्वे ते द्विगुणं दमम्।

दधुः पृथक् पृथक् सर्वे दण्डं च द्विगुणं परम्॥१४८

न माता न पिता न स्त्री न ऋत्विग्याज्यमानवाः।

अन्योन्यं पतितास्त्याज्या योगे दण्ड्याः शतानि षट् ॥१४९

पतिता गुरवस्त्याज्या न तु माता कथञ्चन।

गर्भधारणपोषाभ्यां तेन माता गरीयसी॥१५०

अधीयानोऽप्यनध्याये दण्ड्यः कार्षापणत्रयम्।

अध्यापकश्च द्विगुणं तथाऽऽचारस्य लङ्घने॥१५१

अनुक्तस्य भवेद्दण्डः सुवर्णस्य च कृष्णलम्।

भार्या पुत्रश्च दासश्च शिष्यो भ्राता च सोदरः॥१५२

कृतापराधास्ताड्याः स्यू रज्ज्वा वेणुदलेन वा।

पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाकं कथञ्चन ॥१५३

अतोऽन्यथा प्रहरतः प्राप्तं स्याच्चोरकिल्बिषम्।

दूतीं समाह्वयंश्चैव यो निषिद्धं समाचरेत्॥१५४

प्रच्छन्नंवा प्रकाशंवा सदण्ड्यः पार्थिवेच्छया।

वासांसि फलकैः श्लक्ष्णैनिर्णिज्याद् रजकः शनैः ॥ १५५

अतोऽन्यथा हि कुर्वंस्तु दण्ड्यः स्याद् रुक्मभाषकम् ।

रक्षास्वधिकृतैश्चैव प्रदेयं यैर्विलुप्यते॥१५६

मानवश्रेष्ठ! गौके साथ भोग करनेवाले व्यक्तिको सुवर्णका दण्ड लगाना चाहिये। वेश्याके साथ समागम करनेवाले ब्राह्मणको वेश्याको दिये गये शुल्कके बराबर अर्थ-दण्ड देना चाहिये। वेश्या यदि वेतन स्वीकार करनेके उपरान्त लोभवश अन्यत्र चली जाती है तो उसे दुगुना दण्ड देनेके उपरान्त लिये हुए शुल्कका दूना अर्थ-दण्ड भी देना चाहिये। राजन्! यदि कोई वेश्याको दूसरेके बहानेसे किसी दूसरेके पास लिवा जाता है तो उसे एक मासा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। जो वेश्याको लानेके बाद उसके साथ सम्भोगादि नहीं करता, उसे दूना दण्ड देकर उस वेश्याको दूना शुल्क दिलाना चाहिये। ऐसा करनेसे राजाका धर्म क्षीण नहीं होता। यदि अनेक व्यक्ति एक वेश्याके साथ समागम करनेको उपस्थित हों तो राजा उनको दूना दण्ड दे और वे सब पृथक्-पृथक् उस वेश्याको दूना द्रव्य दण्डरूपमें अधिक दें। माता, पिता, स्त्री, पुरोहित और यजमान-ये पतित होनेपर भी नहीं छोड़े जाते, पर यदि कोई मनुष्य इनमेंसे किसीको छोड़ता है तो वह छ: सौ सुवर्ण-मुद्राओंका दण्डभागी होता है। पतित होनेपर गुरुजन भी त्याज्य हो सकते हैं, किंतु माता नहीं छोड़ी जा सकती। गर्भकालमें धारण-पोषण करनेके कारण माताका गौरव गुरुजनोंसे भी अधिक है ॥ १३९-१५० ॥

अनध्यायके दिन भी अध्ययन करनेवाले ब्राह्मणको तीन कार्षापणका दण्ड देना चाहिये और अध्यापकको दुगुना दण्ड देनेका विधान है। इसी प्रकार उन्हें अपने-अपने आचारोंका उल्लङ्घन करनेपर भी दण्ड देना चाहिये। जिन-जिन अपराधोंमें केवल दण्डकी चर्चा की गयी है और कोई परिमाण नहीं निश्चित किया गया है, वहाँ सुवर्णका एक कृष्णल दण्डरूपमें समझना चाहिये। स्त्री, पुत्र, सेवक, शिष्य तथा सगा भाई-ये यदिअपराध करते हैं तो इन्हें रस्सीसे बाँधकर बाँसकी छड़ीसे शरीरके पिछले भागपर दण्ड देना चाहिये; किंतु सिरपर किसी प्रकार भी चोट न लगने दे। इन कहे गयेस्थानोंके अतिरिक्त अन्य स्थानोंपर प्रहार करनेवालेको चोरी करनेके समान पाप लगता है। जो दूतीको बुलाकर प्रकटरूपमें या गुप्तरूपमें निषिद्धाचरण करता है, उसके लिये राजा स्वेच्छानुसार दण्डकी व्यवस्था करे। धोबीको चाहिये कि वह कोमल काठके पीठकोंपर वस्त्रको धीरे-धीरे साफ करे। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उसे एक मासे सुवर्णका दण्ड देना चाहिये।राजाकी ओरसे रक्षा आदि स्थानोंपर नियुक्त किये गये लोग यदि देय भागको हड़प

कर्षकेभ्योऽर्थमादाय यः कुर्यात् करमन्यथा।

तस्य सर्वस्वमादाय तं राजा विप्रवासयेत्॥१५७

ये नियुक्ताः स्वकार्येषुहन्युः कार्याणि कार्यिणाम्।

निघृणा: क्रूरमनसः सर्वे कर्मापराधिनः॥१५८

धनोष्मणा पच्यमानास्तान् निःस्वान् कारयेन्नृपः।

कूटशासनकर्तुश्च प्रकृतीनां च दूषकान्॥१५९

स्त्रीबालब्राह्मणांश्च वध्यात् तत्सेविनस्तथा।

अमात्यः प्राड् विवाको वा यः कुर्यात् कार्यमन्यथा॥१६०

तस्य सर्वस्वमादाय तं राजा विप्रवासयेत्।

ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च तस्करो गुरुतल्पगः ॥१६१

एतान् सर्वान् पृथग्घिस्यान्महापातकिनो नरान्।

महापातकिनो वध्या ब्राह्मणं तु विवासयेत्॥१६२

कृतचिह्न स्वदेशाच्च शृणु चिह्नाकृतिं ततः।

गुरुतल्पे भगः कार्यः सुरापाने सुराध्वजः ॥ १६३

स्तेने तु श्वपदं तद्वद् ब्रह्महन्यशिराः पुमान्।

असम्भाष्या ह्यसम्भोज्या असंवाह्या विशेषतः॥१६४

त्यक्तव्याश्च तथा राजञातिसम्बन्धिबान्धवैः।

महापातकिनो वित्तमादाय नृपतिः स्वयम्॥१६५

अप्सु प्रवेशयेद् दण्डं वरुणायोपपादयेत्।

सहोढं न विना चोरं घातयेद् धार्मिको नृपः॥१६६

सहोढं सोपकरणं घातयेदविचारयन्।

ग्रामेष्वपिच ये केचिच्चोराणां भक्ष्यदायकाः॥१६७

भाण्डावकाशदाश्चैव सर्वांस्तानपि घातयेत्।

राष्ट्रेषु राज्ञाधिकृताः सामन्ताश्चैव दूषकाः॥१६८

अभ्याघातेषुमध्यस्थाः क्षिप्रंशास्यास्तु चोरवत्।

ग्रामघाते मठाभने पथि मोषाभिमर्दने॥१६९

शक्तितो नाभिधावन्तो निर्वास्याः सपरिच्छदाः।

राज्ञः कोशापहर्तृच प्रतिकूलेषु संस्थितान्।। १७०

लेते हैं या किसानोंसे कर लेकर उसे दूसरे कार्यों में लगा देते हैं तो राजा उनका सर्वस्व छीनकर उन्हें निर्वासनका दण्ड दे।जो लोग अपने पदपर नियुक्त होकर अन्य कर्मचारियोंके कार्योंको हानि पहुंचाते हैं, वे सभी निर्दय, क्रूरात्मा, कर्मके अपराधी और धनकी गर्मीसे उन्मत्त हो जाते हैं, राजाको चाहिये कि उन्हें निर्धन बना दे। यदि राजाके सेवकगण कूटनीतिसे शासन करनेवाले, प्रजावर्गको राजाके विरुद्ध भड़कानेवाले, स्त्री, बालक और ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले हों तो राजा उन्हें प्राण-दण्ड दे। चाहे अमात्य हो या प्रधान न्यायकर्ता, यदि वह अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता तो राजा उसका सर्वस्व छीनकर उसे अपने देशसे बाहर निकाल दे। ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, चोर तथा गुरु-स्त्रीगामी-इन महापातकी पुरुषोंको राजा पृथक्-पृथक् प्राण-दण्डकी व्यवस्था करे। ऐसे महापापियोंको राजा प्राण-दण्ड दे, किंतु ब्राह्मणको चिह्नित करके अपने देशसे निकाल दे। उक्त चिह्नका आकार बताता हूँ, सुनिये। यदि ब्राह्मण गुरुपत्नीके साथ समागम करता है तो उसके शरीरमें भगका आकार, मदिरापायी हो तो सुराध्वजका चिह्न, चोरीके अपराधमें कुत्तेके पैरोंका चिह्न तथा ब्रह्मघातीके शरीरमें बिना सिरके पुरुषका चिह्न बनाना चाहिये। राजन्! ऐसे घोर पापियोंके साथ उनकी जातिवाले, सम्बन्धी तथा भाई-बन्धुओंको विशेषतया सम्भाषण, सहभोज तथा विवाहादि-सम्बन्ध त्याग देना चाहिये॥ १५१-१६४ ॥

राजा महापापी पुरुषोंकी सम्पत्तिको अपने अधीन कर ले और उसमेंसे दण्डभागको वरुणके उद्देश्यसे जलमें छोड़ दे। धार्मिक राजाको सपत्नीक चोरको प्राण-दण्ड नहीं देना चाहिये, किंतु चुरायी हुई वस्तुके साथ ही यदि सपत्नीक चोर पकड़ा जाता है तो उसे भी राजा बिना किसी विचारके प्राण-दण्ड दे। ग्रामोंमें भी जो कोई चोरोंको भोजन, पात्र तथा रहनेका आश्रय देनेवाले हों तो इन सभीको प्राण-दण्ड देना चाहिये। राष्ट्रमें राजाके अधिकारी तथा अधीनस्थ सामन्तगण यदि दुष्ट हो गये हों या बुरे अवसरपर तटस्थ रहते हों तो वे भी चोरोंके समान दण्डके भागी होते हैं। ग्राममें किसी विनाशके उपस्थित होनेपर, किसी घर आदिके गिरनेके अवसरपर या मार्गमें किसी रमणीपर अत्याचार किये जानेपर राजाके जो अधिकारी या सामन्त अपनी शक्तिके अनुसार उसकी रक्षाके लिये नहीं दौड़ते, वे परिवार तथा साधनसहित निर्वासित कर देने योग्य हैं। राजाके कोशको अपहत करनेवालों,

अरीणामुपकर्तृश्च घातयेद् विविधैर्वधैः ।

संधिं कृत्वा तु ये चौर्यं रात्रौ कुर्वन्ति तस्कराः॥१७१

तेषां छित्त्वा नृपो हस्तौ तीक्ष्णशूले निवेशयेत्।

तडागभेदकं हन्यादप्सु शुद्धवधेन तु॥१७२

यस्तु पूर्वं निविष्टं स्यात् तडागस्योदकं हरेत्।

आगमंचाप्यपां भिन्द्यात्स दाप्यः पूर्वसाहसम्॥१७३

कोष्ठागारायुधागारदेवागारविभेदकान्

पापान् पापसमाचारान् पातयेच्छीघ्रमेव च॥१७४

समुत्सृजेद् राजमार्गे यस्त्वमेध्यमनापदि।

स हि कार्षापणंदण्ड्यस्तत्त्वमेध्यं च शोधयेत्॥१७५

आपद्गतोऽथवा वृद्धो गर्भिणी बाल एव च।

परिभाषणमर्हन्ति न च शोध्यमिति स्थितिः॥ १७६

प्रथमं साहसंदण्ड्यो यश्च मिथ्या चिकित्सते।

परुषे मध्यमं दण्डमुत्तमं च तथोत्तमे॥१७७

छत्रस्य ध्वजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदकाः।

प्रतिकुर्युस्ततः सर्वे पञ्च दण्ड्याः शतानि च॥१७८

अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने तथा।

मणीनामपि भेदेन दण्ड्यः प्रथमसाहसम्॥१७९

समं च विषमं चैव कुरुते मूल्यतोऽपि वा।

समाप्नुयात् स वै पूर्वं दमं मध्यममेव च॥१८०

बन्धनानि च सर्वाणि राजमार्गे निवेशयेत्।

कर्षन्तो यत्र दृश्यन्ते विकृताः पापकारिणः॥१८१

प्राकारस्य च भेत्तारं परिखाणां च भेदकम्।

द्वाराणां चैव भेत्तारं क्षिप्रं निर्वासयेत् पुरात्॥ १८२

मूलकर्माभिचारेषु कर्तव्यो द्विशतो दमः।

अबीजविक्रयी यश्च बीजोत्कर्षक एव च॥१८३

मर्यादाभेदकश्चापि विकृतं वधमाप्नुयात्।

सर्वसंकरपापिष्ठं हेमकारं नराधिप॥ १८४

शत्रु-पक्षसे मिले रहनेवालों तथा शत्रुओंका उपकार करनेवालोंको विविध वधोपायोंद्वारा मरवा डालना चाहिये। जो चोर रातमें सेंध लगाकर चोरी करते हैं, राजाको उनके हाथोंको काटकर तीखे शूलपर बैठा देना चाहिये। तड़ागका भेदन करनेवालेको राजा जलमें डुबोकर मृत्युदण्ड दे। जो व्यक्ति तालाबमें भरे हुए जलकी चोरी करता है या उसमें जलके आनेके मार्गोंको रोक देता है, उसे पूर्ववत् साहस-दण्ड देना चाहिये। कोष्ठागार, आयुधागार तथा देवागारोंको तोड़नेवाले पापाचारियों एवं पापयुक्त किंवदन्तीसे लिप्त पुरुषोंको राजा शीघ्र ही प्राण-दण्ड दे॥१६५-१७४॥

जो किसी आपत्तिके न होनेपर भी सड़कपर मल आदि अपवित्र वस्तुओंको फेंकता है, उसे एक कार्षापणका दण्ड देना चाहिये और उसीसे उस गंदी वस्तुको हटवाना चाहिये। यदि आपत्तिग्रस्त, वृद्ध, गर्भिणी स्त्री अथवा बालक ऐसा अपराध करते हैं तो उन्हें कहकर मना कर दे, उनसे सफाई न कराये, ऐसी मर्यादा है। जो वैद्य झूठी दवा करता है या वैद्य न होकर भी दवा देता है, उसे प्रथम साहसका दण्ड देना चाहिये। जिसकी दवा निकृष्ट है, उसे मध्यम साहसका दण्ड तथा जिसकी दवा अत्यन्त अवगुणकारी है, उसे उत्तमसाहसका दण्ड देना चाहिये। छत्र, ध्वजाके दण्डों तथा प्रतिमाओंको तोड़नेवालेको पाँच सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये और उन्हींसे इन सबका प्रतिशोध भी कराना चाहिये। अदूषित वस्तुओंको दूषित करने या तोड़नेवालेको तथा मणि आदि मूल्यवान् वस्तुओंको नष्ट करनेवालेको प्रथमसाहसका दण्ड देना चाहिये। किसी वस्तुके मूल्यमें जो कमी या वृद्धि करता है, उसे क्रमशः पूर्व और मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये। राजाको अपराधियोंके सभी प्रकारके दण्डोंकी व्यवस्था मुख्य सड़कपर करनी चाहिये जिससे उस दण्डको भुगतनेवाले पापात्माको सभी लोग देख सकें। दुर्गकी चहारदीवारी, खाइयों तथा दरवाजोंको तोड़नेवालेको राजा तुरंत अपने पुरसे बाहर निकाल दे। वशीकरण, अभिचार आदि करनेवालेको राजा दो सौ पणका दण्ड दे। घटिया बीज बेचनेवाले, बोये हुए खेतको जोतनेवाले तथा खेतोंकी मेड़को तोड़नेवालेको विकृत मृत्युका दण्ड देना चाहिये। नराधिप! अच्छी धातुमें नकली धातु

अन्याये वर्तमानं च छेदयेल्लवशः क्षुरैः।

द्रव्यमादाय वणिजामनश्रृणावरुन्धताम्॥१८५

द्रव्याणां दूषको यस्तु प्रतिच्छन्नस्य विक्रयी।

मध्यमं प्राप्नुयाद् दण्डं कूटकर्ता तथोत्तमम्॥१८६

राजा पृथक् पृथक् कुर्याद्दण्डंचोत्तमसाहसम्।

शास्त्राणां यज्ञतपसां देशानां क्षेपको नरः॥१८७

देवतानां सतीनां च उत्तम दण्डमर्हति।

एकस्य दण्डपारुष्ये बहूनां द्विगुणो दमः॥१८८

कलहो यद्गतो दाप्यो दण्डश्च द्विगुणस्ततः।

मध्यमं ब्राह्मणं राजा विषयाद् विप्रवासयेत्॥१८९

लशुनं च पलाण्डुं न शूकरं ग्रामकुक्कुटम्।

तथा पञ्चनखं सर्वं भक्ष्यादन्यत्तु भक्षयेत्॥१९०

विवासयेत् क्षिप्रमेव ब्राह्मणं विषयात् स्वकात्।

अभक्ष्यभक्षणे दण्ड्यः शूद्रो भवति कृष्णलम्॥१९१

ब्राह्मणक्षत्रियविशां चतुस्त्रिद्विगुणं स्मृतम्।

यः साहसं कारयति स दण्ड्यो द्विगुणं दमम्॥१९२

यस्त्वेवमुक्त्वाहं दाता कारयेत् य चतुर्गुणम्।

संदिष्टस्याप्रदाता च समुद्रगृहभेदकः॥१९३

पञ्चाशत्पणिको दण्डस्तत्र कार्यो महीक्षिता।

अस्पृश्यं च स्पृशन्नार्यो ह्ययोग्यो योग्यकर्मकृत्॥१९४

पुंस्त्वहर्ता पशूनां च दासीगर्भविनाशकृत्।

शूद्रप्रव्रजितानां च दैवे पित्र्ये च भोजकः॥१९५

अव्रजन् बाढमुक्त्वा तु तथैव च निमन्त्रणे।

एते कार्षापणशतं सर्वे दण्ड्या महीक्षिता॥१९६

दुःखोत्पादिगृहेद्रव्यं क्षिपन्दण्ड्यस्तुकृष्णलम्।

पितापुत्रविरोधे च साक्षिणां द्विशतो दमः।

स्यान्नरश्च तथार्यः स्यात् तस्याप्यष्टशतो दमः॥१९७

मिलानेवाले पापात्मा एवं अन्यायी सोनारको छुरेसे खण्ड-खण्ड काट डालना चाहिये। जो बनियेसे वस्तु लेकर उसका दाम नहीं चुकाता, अच्छी वस्तुको बुरी बतलाता है और वस्तुको बाजार में छिपाकर बेंचता है, उसे मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार कूटनीतिका प्रयोग करनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देनेका विधान है। इन सभी अपराधियोंको राजा अलग-अलगसे उत्तम साहसका दण्ड दे। शास्त्र, यज्ञ, तपस्या, देश, देवता तथा सतीकी निन्दा करनेवाला पुरुष उत्तम साहसके दण्डका पात्र है। अनेक व्यक्ति किसी एक व्यक्तिके प्रति कठोर दण्डनीय अपराध करते हैं तो उन सबको दुगुना दण्ड देना चाहिये ॥१७५-१८८॥

जिस व्यक्तिपर कलहका आरोप हो, उसे दूना दण्ड देना चाहिये। जो ब्राह्मण अपने आचार-विचारसे अधम हो गया हो, उसे राजा अपने देशसे निकाल दे। भक्ष्य पदार्थोंको छोड़कर जो लहसुन, प्याज, सूअर, ग्रामीण मुरगे, पाँच नखवाले जीवों तथा अन्य अभक्ष्य पदार्थोंको खाता है, उस ब्राह्मणको शीघ्र ही अपने राष्ट्रसे निकाल देना चाहिये। अभक्ष्य पदार्थोंको खानेसे शूद्रको एक कृष्णलका दण्ड देना चाहिये तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको क्रमशः चौगुना, तिगुना तथा दुगुना दण्ड देनेका विधान है। जो अभक्ष्य-भक्षणके लिये उत्साहित करता है, उसे दूना दण्ड देना चाहिये। जो मनुष्य 'मैं देता हूँ' ऐसा कहकर अभक्ष्य वस्तुओंके भक्षणमें दूसरेको प्रवृत्त करता है, उसे भी चौगुना दण्ड मिलना चाहिये। संदेशको न देनेवाला तथा समुद्रमें बने हुए अड्डेको नष्ट करनेवाले व्यक्तियोंको राजा पचास मुद्राका दण्ड दे। जो श्रेष्ठ होकर अस्पृश्यका स्पर्श करता है, अयोग्य होकर योग्य कार्यमें हाथ लगाता है, पशुओंके पुंस्त्वका अपहरण करता है, दासीके गर्भको नष्ट करता है, शूद्र और संन्यासियोंके घर देव-कार्य और पितृकार्यमें भोजन करता है तथा निमन्त्रण स्वीकार करनेपर भोजन करने नहीं जाता-ये सभी राजाद्वारा सौ पण कार्षापण-दण्डके भागी हैं। अपने घरमें पीडोत्पादक वस्तु रखनेवालेको एक कृष्णलका दण्ड देना चाहिये। पिता और पुत्रके पारस्परिक विरोधमें साक्षी देनेवालोंको दो सौ पणका दण्ड लगाना चाहिये। यदि कोई माननीय व्यक्ति यह अपराध करता है तो उसपर एक सौ आठ पणका दण्ड लगाना चाहिये ॥१८९-१९७॥

तुलाशासनमानानां कृटकृन्मानकस्य च।

एभिश्च व्यवहर्ता च स दण्ड्यो दममुत्तमम्॥१९८

विषाग्निदां पतिगुरुनिजापत्यप्रमापणीम्।

विकर्णनासिकां व्योष्ठी कृत्वा गोभिः प्रमापयेत्॥ १९९

ग्रामस्य दाहका ये च ये च क्षेत्रस्य वेश्मनः।

राजपत्न्यभिगामी च दग्धव्यास्ते कटाग्निना॥ २००

ऊनं वाप्यधिकंचापि लिखेद्यो राजशासनम्।

पारदारिकचौरं वा मुञ्चतो दण्ड उत्तमः ॥ २०१

अभक्ष्येण द्विजं दूष्य दण्ड्य उत्तमसाहसम्।

क्षत्रियं मध्यमं वैश्यं प्रथमं शूद्रमर्धकम्॥२०२

मृताङ्गलग्नविक्रेतुर्गुरु ताडयतस्तथा।

राजयानासनारोदुर्दण्ड उत्तमसाहसः॥२०३

यो मन्येताजितोऽस्मीति न्यायेनापि पराजितः।

तमायान्तं पुनर्जित्वा दण्डयेद् द्विगुणं दमम्॥२०४

आह्वानकारी मध्यः स्यादनाह्वाने तथाह्वयन्।

दण्डिकस्य च यो हस्तादभियुक्तः पलायते॥२०५

हीन: पुरुषकारेण तंदण्ड्याद् दाण्डिको धनम्।

प्रेष्यापराधात् प्रेष्यस्तु स दण्ड्यश्चार्धमेव च ॥ २०६

दण्डा) नियमार्थं च नीयमानेषु बन्धनम्।

यदि कश्चित् पलायेत दण्डश्चाष्टगुणो भवेत्॥२०७

अनिन्दिते विवादे तु नखरोमावतारणम्।

कारयेद् यः स पुरुषो मध्यमं दण्डमर्हति ॥२०८

बन्धनं चाप्यवध्यस्य बलान्मोचयते तु यः।

वध्यं विमोचयेद्यस्तुदण्ड्यो द्विगुणभाग्भवेत्॥ २०९

दुर्दृष्टव्यवहाराणां सभ्यानां द्विगुणो दमः।

राज्ञा त्रिंशद्गुणो दण्डः प्रक्षेप्य उदके भवेत्॥ २१०

तराजू, शासन, मानदण्ड और धर्मकाँटेके प्रति कूटनीतिका प्रयोग करनेवाले तथा ऐसे व्यक्तिके साथ व्यवहार करनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। विष देनेवाली, आग लगानेवाली, पति, गुरुजन एवं अपने बच्चोंकी हत्या करनेवाली स्त्रीको कान, ओठ और नाकसे रहित करके पशुओंद्वारा मरवा डालना चाहिये। जो गाँव, खेत और घरमें आग लगानेवाले तथा राजपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाले हैं,उन्हें घास-फूसकी अग्निमें जला देना चाहिये। जो (राजाका अधिकारी) राजाज्ञाको घटा-बढ़ाकर लिखता है तथा दूसरेकी स्त्रीके साथ अपराध करनेवाले एवं चोरको छोड़ देता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति अभक्ष्य वस्तु खिलाकर ब्राह्मणको दूषित करता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार क्षत्रियको विधर्मी करनेवालेको मध्यम, वैश्यको प्रथम तथा शूद्रको अर्धसाहसका दण्ड देना चाहिये। मृतकके शरीरपर लगे हुए आभूषण तथा वस्त्रादिको बेंचनेवाले, गुरुको पीटनेवाले, राजाके वाहन और आसनपर बैठनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति न्यायद्वारा या युद्ध में पराजित होनेपर भी अपनेको 'मैं पराजित नहीं हूँ'-ऐसा मानता है, उसे आता हुआ देखकर राजाको चाहिये कि उसे पुनः जीतकर दुगुने पणका दण्ड दे। जो व्यक्ति अपराध होनेपर सूचनाद्वारा बुलानेसे नहीं आता है और जो बिना बुलाये ही आकर सम्मुख उपस्थित होता है तथा जो अपराधी दण्ड देनेवालेके हाथसे छुड़ाकर भाग जाता है-ऐसे हीन लोगोंको पौरुषपूर्वक दण्ड देनेवाला न्यायकर्ता आर्थिक दण्ड दे। जो व्यक्ति दूत होनेपर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उसे उपर्युक्त दण्डका आधा दण्ड देना चाहिये। दण्ड या नियमनके लिये बाँधकर ले जाते समय यदि कोई अपराधी भाग जाता है तो उसे आठगुना दण्ड देना चाहिये। जो पुरुष सामान्य वाद-विवादमें किसीके नख या बालको काट लेता है, वह मध्यम दण्डका भागी होता है। १९८-२०८॥

जो व्यक्ति बलपूर्वक अवध्य अपराधीके बन्धनोंको खोल देता है तथा जो मृत्यु-दण्डके अपराधीको छोड़ देता है, वह दुगुने दण्डका भागी होता है। राजाके जो सभासद उपस्थित विषयोंमें कुशलतासे मनोयोग नहीं देते, उन्हें दूना दण्ड देना चाहिये। राजा ऐसे अपराधियोंको तीसगुना अधिक दण्ड दे और जलमें फेंकवा दे।

अल्पदण्डेऽधिकं कुर्याद् विपुले चाल्पमेव च।

ऊनाधिकं तु तं दण्डं सभ्यो दद्यात् स्वकाद् गृहात् ।। २११

यावानवध्यस्य वधे तावान् वध्यस्य रक्षणे।

अधर्मो नृपतेदृष्ट एतयोरुभयोरपि॥२१२

ब्राह्मणं नैव हन्यात्तु सर्वपापेष्ववस्थितम्।

प्रवासयेत् स्वकाद् राष्ट्रात् समग्रधनसंयुतम्॥ २१३

न जातु ब्राह्मणं वध्यात् पातकं त्वधिकं भवेत्।

यस्मात् तस्मात् प्रयत्नेन ब्रह्महत्यां विवर्जयेत्॥ २१४

अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्।

अयशो महदाप्नोति नरकं चाधिगच्छति॥२१५

ज्ञात्वापराधं पुरुषस्य राजा

कालं तथा चानुमतं द्विजानाम्।

दण्ड्येषु दण्डं परिकल्पयेत्तु

यो यस्य युक्तः स समीक्ष्य कुर्यात्॥२१६

थोड़ेसे अपराधमें अधिक दण्ड देनेवाले तथा भीषण अपराधमें अल्प दण्ड देनेवाले न्यायकर्ताको जितना कम या अधिक दण्ड हो, उसे अपने घरसे पूर्ण करना या अपराधीको लौटाना चाहिये। अवध्य अपराधीका वध करनेमें जितना पाप लगता है उतना ही पाप वध्यको छोड़ देने में लगता है। राजाको इन दोनों दशाओंमें समानरूपसे पापभागी होना पड़ता है। सभी प्रकारके पापोंमें अपराधी पाये गये ब्राह्मणको मृत्युदण्ड नहीं देना चाहिये, उसे सम्पूर्ण सम्पत्तिके साथ अपने राष्ट्रसे निर्वासित कर देना चाहिये। कभी भूलकर भी ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये; क्योंकि इससे अधिक पाप होता है। इसलिये राजाको ब्रह्महत्यासे बचना चाहिये। अदण्डनीय पुरुषोंको दण्ड देने तथा दण्डनीयको दण्ड न देनेसे राजा महान् अयशका भागी बनता है और मरनेपर नरकगामी होता है। इसलिये राजा मनुष्यके अपराधको भलीभाँति जानकर तथा यथासमय ब्राह्मणोंकी अनुमति लेकर दण्डनीयोंके प्रति दण्डकी कल्पना करे और जो जिस प्रकारके दण्डका पात्र हो, उसकी भलीभाँति समीक्षा कर उसे उसी प्रकारका समुचित दण्ड दे॥२०९-२१६ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे दण्डप्रणयनं नाम सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २२७॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-कीर्तन-प्रसङ्गमें दण्डनीति नामक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२७ ॥