मत्स्य महा पुराण
देवासुर-संग्रामका प्रारम्भ
सूत उवाच
सुरासुराणां सम्मर्दस्तस्मिन्नत्यन्तदारुणे।
तुमुलोऽतिमहानासीत् सेनयोरुभयोरपि॥१
गर्जतां देवदैत्यानां शङ्खभेरीरवेण च।
तूर्याणां चैव निर्घोषैर्मातङ्गानां च बृंहितैः ॥ २
द्वेषतां हयवृन्दानां रथनेमिस्वनेन
ज्याघोषेण च शूराणां तुमुलोऽतिमहानभूत्॥३
समासाद्योभये सेने परस्परजयैषिणाम्।
रोषेणातिपरीतानां त्यक्तजीवितचेतसाम्॥४
समासाद्य तु तेऽन्योन्यं प्रक्रमेण विलोमतः।
रथेनासक्तपादातो रथेन च तुरङ्गमः॥५
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! देवताओं और असुरोंके उस अत्यन्त भीषण संग्रामके अवसरपर दोनों ही सेनाओंमें घोर गर्जनाके साथ-साथ अत्यन्त भयंकर संघर्ष छिड़ गया। उस समय देवता और दैत्य सिंहनाद कर रहे थे, शङ्ख, भेरी और तुरहीका शब्द हो रहा था, हाथी चिग्घाड़ रहे थे, यूथ-के-यूथ घोड़े हींस रहे थे, रथके पहियोंकी घरघराहट हो रही थी और वीरोंद्वारा खींची गयी प्रत्यञ्चाके चटाचट शब्द हो रहे थे। इन सबके सम्मिलित हो जानेसे अत्यन्त भयानक ध्वनि होने लगी। अतिशय क्रोधसे युक्त हो जीवनकी आशाका परित्याग कर परस्पर एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे युक्त वीरोंकी दोनों सेनाएँ आमने-सामने घमासान युद्ध करने लगीं। उस समय परस्पर अनुलोम और विलोमका क्रम नहीं रह गया। पैदल सैनिक रथीके साथ, घुड़सवार रथीके साथ,
हस्ती पदातिसंयुक्तो रथिना च क्वचिद् रथी।
मातङ्गेनापरो हस्ती तुरङ्गैर्बहुभिर्गजः॥ ६
ततः पदातिरेको बहुभिर्गजैर्मत्तैश्च युज्यते। ।
प्रासाशनिगदाभिन्दिपालपरश्वधैः॥ ७
शक्तिभिः पट्टिशैः शूलैर्मुद्रैः कुणपैन्डैः।
चक्रैश्च शङ्कुभिश्चैव तोमरैरङ्कुशैः सितैः॥ ८
कर्णिनालीकनाराचवत्सदन्तार्धचन्द्रकैः
भल्लैश्च शतपत्रैश्च शुकतुण्डैश्च निर्मलैः॥ ९
वृष्टिरत्यद्भुताकारा गगने समदृश्यत।
सम्प्रच्छाद्य दिशः सर्वास्तमोमयमिवाकरोत्॥१०
न प्राज्ञायत तेऽन्योऽन्यं तस्मिंस्तमसि संकुले।
अलक्ष्यं विसृजन्तस्ते हेतिसंघातमुद्धतम्॥११
पतितं सेनयोर्मध्ये निरीक्षन्ते परस्परम्।
ततो ध्वजैर्भुजैश्छत्रैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः॥१२
गजैस्तुरङ्गैः पादातैः पतद्भिः पतितैरपि।
आकाशसरसो भ्रष्टैः पङ्कजैरिव भूः स्तृता॥ १३
भग्नदन्ता भिन्नकुम्भाश्छिन्नदीर्घमहाकराः।
गजा: शैलनिभाः पेतुर्धरण्यां रुधिरस्रवाः॥१४
भग्नेषादण्डचक्राक्षा रथाश्च शकलीकृताः।
पेतुः शकलतां यातास्तुरङ्गाश्च सहस्रशः॥१५
ततोऽसृग्ध्रददुस्तारा पृथिवी समजायत।
नद्यश्च रुधिरावर्ता हर्षदाः पिशिताशिनाम्।
वेतालाक्रीडमभवत् तत्संकुलरणाजिरम्॥१६
हाथी पैदल सैनिकके साथ, कहीं एक रथी दूसरे रथीके साथ, एक हाथी दूसरे हाथीके साथ, एक हाथी बहुत- से घोड़ोंके साथ और अकेला पैदल सैनिक बहुत-से मतवाले हाथियोंके साथ जूझने लगे॥१-६३॥
तदनन्तर आकाशमण्डलमें भाला, वज्र, गदा, ढेलवाँस, कुठार, शक्ति, पटा, त्रिशूल, मुद्गर, कुणप, गड, चक्र, शङ्कु, तोमर, चमकीले अङ्कुश, फलयुक्त बाण, बाण, पोला बाण, वत्सदन्त, अर्धचन्द्र, भाला, शतपत्र और निर्मल शुकतुण्डोंके प्रहारसे अत्यन्त अद्भुत आकारवाली वृष्टि दीख पड़ी। उससे सारी दिशाएँ आच्छादित हो गयी और उसने सारे जगत्को अन्धकारमय बना दिया। उस घोर अन्धकारमें वे परस्पर एक-दूसरेको पहचानतक नहीं पाते थे; अत: वे बिना लक्ष्यके ही अपने भयंकर शस्त्रसमूहोंका प्रहार कर रहे थे। दोनों सेनाओंमें परस्पर कटकर धराशायी होते हुए वीरोंको देख रहे थे। उस समय कटकर गिरे हुए या गिरते हुए ध्वजों, भुजाओं, छत्रों, कुण्डलमण्डित मस्तकों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंसे युद्धभूमि इस प्रकार पट गयी थी, मानो आकाशरूपी सरोवरसे गिरे हुए कमल-पुष्पोंसे आच्छादित हो। जिनके दाँत टूट गये थे, कुम्भस्थल विदीर्ण हो गये थे और लम्बे-लम्बे शुण्डदण्ड कटकर गिर गये थे ऐसे पर्वत-सदृश विशालकाय गजराज पृथ्वीपर पड़े हुए थे, जिनके शरीरसे खूनकी धाराएँ बह रही थीं। जिनके हरसे, पहिये और धुरे आदि विदीर्ण हो गये थे, ऐसे अनेकों रथ खण्ड-खण्ड होकर पड़े थे। हजारों घोड़े भी टुकड़े-टुकड़े हुए पड़े थे। इस प्रकार वहाँ रक्तसे भरे हुए बहुत- से गड्ढे बन गये थे, जिससे युद्धभूमिको पार करना कठिन हो गया था। खूनसे भरी हुई नदियाँ भंवर बनाती हुई बह रही थीं, जो मांसभोजियोंको हर्षोल्लसित कर रही थीं। इस प्रकार तरह-तरहकी लाशोंसे पटा हुआ वह युद्धस्थल वेतालोंका क्रीडास्थल बन गया था॥७-१६॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकासुरोपाख्याने देवासुर युद्धं नामैकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः १४९।।
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकोपाख्यानमें देवासुरयुद्ध नामक एक सौ उनचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४९ ॥
Summary of chapter 151 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the aggressive expansion of the blind Asura king Andhakāsura after receiving divine boons of invincibility and regenerated vision from Bhagavān Brahmā. Fueled by insatiable ambition and pride, Andhakāsura assembled an immense demon army equipped with dark mystical weapons, war elephants, and chariot divisions led by fierce commanders like Baka, Kāla, and Virūpāksha. The Asura sovereign marched against the celestial realm of Svarga, overwhelming Devarāja Indra and the Lokapālas in battle and seizing control of the three worlds. Having vanquished the celestial forces, Andhakāsura established a tyrannical rule, halting Vedic sacrifices and disturbing the spiritual harmony maintained by righteous sages across the earth.