राजवंशानुकीर्तन*

ऋषय ऊचुः

पूरोर्वंशस्त्वया सूत सभविष्यो निवेदितः।

सूर्यवंशे नृपा ये तु भविष्यन्ति हि तान् वद॥ १

तथैव यादवे वंशे राजानः कीर्तिवर्धनाः ।

कलौ युगे भविष्यन्ति तानपीह वदस्व नः॥ २

वंशान्ते ज्ञातयो याश्च राज्यं प्राप्स्यन्ति सुव्रताः ।

ब्रूहि संक्षेपतस्तासां यथाभव्यमनुक्रमात्॥ ३

सूत उवाच

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि हीक्ष्वाकूणां महात्मनाम्।

बृहबलस्य दायादो वीरो राजा बृहत्क्षयः।

उरुक्षयः सुतस्तस्य वत्सव्यूहो उरुक्षयात्॥ ४

वत्सव्यूहात् प्रतिव्योमस्तस्य पुत्री दिवाकरः।

तस्यैव मध्यदेशे तु अयोध्या नगरी शुभा॥ ५

दिवाकरस्य भविता सहदेवो महायशाः।

सहदेवस्य दायादो बृहदश्वो महामनाः॥ ६

तस्य भानुरथो भाव्यः प्रतीपाश्वश्च तत्सुतः।

प्रतीपाश्वसुतश्चापि सुप्रतीको भविष्यति॥ ७

मरुदेवः सुतस्तस्य सुनक्षत्रस्ततोऽभवत्।

किंनराश्वः सुनक्षत्राद् भविष्यति परंतपः॥ ८

किंनराश्वादन्तरिक्षो भविष्यति महामनाः।

सुषेणश्चान्तरिक्षाच्च सुमित्रश्चाप्यमित्रजित्॥ ९

सुमित्रजो बृहद्राजो धर्मी तस्य सुतः स्मृतः।

पुत्रः कृतञ्जयो नाम धर्मिणः स भविष्यति॥१०

कृतञ्जयसुतो विद्वान् भविष्यति रणञ्जयः।

भविता सञ्जयश्चापि वीरो राजा रणञ्जयात्॥११

सञ्जयस्य सुतः शाक्यः शाक्याच्छुद्धौदनोऽभवत्।

शुद्धौदनस्य भविता सिद्धार्थो राहुलः सुतः॥१२

ऋषियोंने पूछा-सूतजी! आप पिछली कथाके प्रसङ्गमें पूरुवंशी राजाओंके वंशका भविष्यसहित वर्णन हमलोगोंको सुना चुके हैं। अब आगे कलियुगमें जो सूर्यवंशी राजा होंगे, उनका वर्णन कीजिये। इसी प्रकार जो कीर्तिशाली यदुवंशी राजा होंगे, उन्हें भी बताइये तथा इन वंशोंके अन्त हो जानेपर जो अन्य शुभ व्रत-परायण जातियाँ राज्य करेंगी, उनका भी संक्षेपमें वर्णन कीजिये। इसीके साथ-साथ क्रमश: यह भी बताइये कि भविष्यमें कौन-सी विशेष घटनाएँ घटित होंगी? ॥ १-३॥

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! इसके बाद मैं इक्ष्वाकुवंशी महात्मा राजाओंका वर्णन कर रहा हूँ। सूर्यवंशी राजा बृहद्बलका पुत्र वीरवर राजा बृहत्क्षय होगा तथा बृहत्क्षयका पुत्र उरुक्षय और उरुक्षयका पुत्र वत्सव्यूह होगा। वत्सव्यूहका पुत्र प्रतिव्योम तथा उसका पुत्र दिवाकर होगा। उसीकी राजधानी मध्य देशमें अयोध्या नामक सुन्दर नगरी होगी। दिवाकरका पुत्र महायशस्वी सहदेव होगा तथा सहदेवका पुत्र महामना बृहदश्व होगा। उस बृहदश्वका पुत्र भानुरथ तथा भानुरथका पुत्र प्रतीपाश्व होगा। प्रतीपाश्वका पुत्र सुप्रतीक होगा और उसका पुत्र मरुदेव होगा। मरुदेवका पुत्र सुनक्षत्र उत्पन्न होगा। सुनक्षत्रका पुत्र शत्रुओंको संतप्त करनेवाला किंनराश्व होगा और किंनराश्वका पुत्र महामना अन्तरिक्ष होगा। अन्तरिक्षका पुत्र सुषेण तथा उसका पुत्र शत्रुओंको जीतनेवाला सुमित्र होगा। (प्रथम) सुमित्रका पुत्र बृहद्राज और बृहद्राजका पुत्र धर्मी तथा धर्मीका पुत्र कृतञ्जय होगा। कृतञ्जयका पुत्र विद्वान् रणञ्जय और रणञ्जयका पुत्र वीरराजा सञ्जय उत्पन्न होगा। सञ्जयका पुत्र शाक्य तथा शाक्यका पुत्र राजा शुद्धोदन होगा। शुद्धोदनका पुत्र सिद्धार्थ तथा सिद्धार्थका

* सभी पुराणोंकी अनेक छपी तथा हस्तलिखित प्रतियोंको एकत्र कर तथा पाठका संशोधनकर विल्सन्, स्मिथ, पार्जीटर आदिने इनका सुन्दर अनुवाद भी प्रस्तुत किया है और पीछे वही मिल, एलिफिंस्टन, स्मिथ, कैम्ब्रिज आदिके भारतके प्राचीन इतिहासोंका आधार बना।

प्रसेनजित् ततो भाव्यः क्षुद्रको भविता ततः।

क्षुद्रकात्कुलको भाव्यः कुलकात्सुरथः स्मृतः॥१३

सुमित्रः सुरथाज्जातो ह्यन्त्यस्तु भविता नृपः।

एते चैक्ष्वाकवः प्रोक्ता भविष्या ये कलौ युगे॥१४

बृहद्बलान्वये जाता भविष्या: कुलवर्धनाः ।

अत्रानुवंशश्लोकोऽयं विप्रैर्गीतः पुरातनैः ।। १५

शूराश्च कृतविद्याश्च सत्यसंधा जितेन्द्रियाः।

निःशेषाः कथिताश्चैव नृपा ये वै पुरातनाः॥१६

इक्ष्वाकूणामयं वंशः सुमित्रान्तो भविष्यति।

सुमित्रं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ॥१७

इत्येवं भानवो वंशः प्रागेव समुदाहृतः।

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मागधा ये बृहद्रथाः॥१८

जरासंधस्य ये वंशे सहदेवान्वये नृपाः।

अतीता वर्तमानाश्च भविष्यांश्च तथा पुनः॥१९

संग्रामे भारते वृत्ते सहदेवे निपातिते।

सोमाधिस्तस्य दायादो राजाभूच्च गिरिव्रजे॥२०

पञ्चाशतं तथाष्टौ च समा राज्यमकारयत्।

श्रुतश्रवाश्चतुःषष्टिं समास्तस्यान्वयेऽभवत्॥२१

अयुतायुस्तु षट्त्रिंशत् समा राज्यमकारयत्।

चत्वारिंशत् समास्तस्य निरमित्रो दिवं गतः॥२२

पञ्चाशतं समाः षट्च सुक्षत्रः प्राप्तवान् महीम्।

बृहत्कर्मा त्रयोविंशदब्दं राज्यमकारयत्॥ २३

सेनाजित् सम्प्रयातश्च भुक्त्वा पञ्चाशतं महीम्।

श्रुतञ्जयस्तु वर्षाणि चत्वारिंशद् भविष्यति॥२४

अष्टाविंशतिवर्षाणि महीं प्राप्स्यति वै विभुः।

अष्टपञ्चाशतं षट् च राज्ये स्थास्यति वै शुचिः॥ २५

अष्टाविंशत् समा राजा क्षेमो भोक्ष्यति वै महीम्।

सुव्रतस्तु चतुःषष्टिं राज्यं प्राप्स्यति वीर्यवान्॥२६

पञ्चत्रिंशतिवर्षाणि सुनेत्रो भोक्ष्यते महीम्।

भोक्ष्यते निर्वृतिश्चमामष्टपञ्चाशतं समाः॥२७

अष्टाविंशत् समा राज्यं त्रिनेत्रो भोक्ष्यते ततः।

चत्वारिंशत् तथाष्टौ च धुमत्सेनो भविष्यति ॥ २८

पुत्र राहुल होगा। उससे प्रसेनजित उत्पन्न होगा और उससे क्षुद्रककी उत्पत्ति होगी। क्षुद्रकसे कुलक और कुलकसे सुरथ उत्पन्न होगा। सुरथसे सुमित्र (द्वितीय) पैदा होगा, जो इस वंशका अन्तिम राजा होगा। ये इक्ष्वाकुवंशी राजा हैं, जो कलियुगमें उत्पन्न होंगे। ये सभी राजा शूर, विद्वान्, जितेन्द्रिय एवं कुलकी वृद्धि करनेवाले राजा बृहद्बलके वंशमें उत्पन्न होंगे। प्राचीनकालिक ब्राह्मणोंने इस वंशपरम्पराको सूचित करनेवाला इस भावका एक श्लोक कहा है-'इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका यह वंश राजा सुमित्रके राज्यकालतक होगा। कलियुगमें यह वंश राजा सुमित्रको प्राप्त कर विश्राम करेगा।' इस प्रकार यह सूर्यवंश पहले ही कहा जा चुका है॥४-१७॥

अब इसके बाद मैं बृहद्रथके वंशवाले मगधके राजाओंका, जो जरासंधके पुत्र सहदेवके वंशमें भूत, वर्तमान तथा भविष्यकालमें उत्पन्न होंगे, वर्णन कर रहा हूँ। महाभारत-युद्धमें सहदेवके मारे जानेपर उनका पुत्र सोमाधि गिरिव्रजमें राजा हुआ। उसने अट्ठावन वर्षांतक राज्य किया। उसीके वंशमें श्रुतश्रवा नामक राजा हुआ, जो चौंसठ वर्षोंतक राज्य करता रहा। उसके बाद उसका पुत्र अयुतायु राजा हुआ, जिसने छत्तीस वर्षांतक राज्य किया। उसका पुत्र निरमित्र हुआ, जो चालीस वर्षोंतक राज्य कर स्वर्गवासी हो गया। उसके बाद राजा सुक्षत्र उत्पन्न हुआ, जिसने छप्पन वर्षोंतक राज्य किया। तदनन्तर बृहत्कर्माने तेईस वर्षांतक राज्य किया। उसके बाद राजा सेनाजित्ने पचास वर्षोंतक पृथ्वीका पालनकर स्वर्गकी राह ली। तदनन्तर श्रुतञ्जय नामक राजा होगा, जो चालीस वर्षांतक राज्य करेगा। उसके बाद विभु अट्ठाईस वर्षांतक पृथ्वीपर शासक होगा। तत्पश्चात् राजा शुचि चौंसठ वर्षांतक राज्यपर स्थित रहेगा। उसके बाद राजा क्षेम अट्ठाईस वर्षोंतक पृथ्वीका उपभोग करेगा। तदुपरान्त पराक्रमी सुव्रत चौंसठ वर्षों के लिये राज्य प्राप्त करेगा। उसके उपरान्त सुनेत्र पचीस वर्षांतक पृथ्वीका उपभोग करेगा। तदनन्तर निवृत्ति अट्ठावन वर्षांतक पृथ्वीका उपभोग करेगा। उसके बाद राजा त्रिनेत्र अट्ठाईस वर्षतक राज्यका भोग करेगा। तदनन्तर अड़तालीस वर्षतक धुमत्सेन राजा

त्रयस्त्रिंशत्तु वर्षाणि महीनेत्रः प्रकाश्यते।

द्वात्रिंशत्तु समा राजा चञ्चलस्तु भविष्यति॥२९

रिपुञ्जयस्तु वर्षाणि पञ्चाशत् प्राप्स्यते महीम्।

द्वात्रिंशति नृपा ह्येते भवितारो बृहद्रथाः।

पूर्ण वर्षसहस्रं तु तेषां राज्यं भविष्यति॥३०

अष्टाविंशतिवर्षाणि विम्बसारो भविष्यति॥ ८

होगा। उसके बाद तैंतीस वर्षांतक महीनेत्रका राज्य होगा। तदुपरान्त बत्तीस वर्षतक चञ्चल राजा होगा। उसके बाद पचास वर्षोंतक पृथ्वी रिपुञ्जयके हाथमें रहेगी। इस प्रकार ये बत्तीस राजा बृहद्रथके वंशमें उत्पन्न होंगे। उनका राज्यकाल पूरा एक सहस्र वर्षका होगा॥ १८-३०॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजवंशानुकीर्तने एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७१॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजवंशका कीर्तन नामक दो सौ एकहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ। २७१ ॥