मत्स्य महा पुराण
नर्मदाके तरवर्ती तीर्थ
मार्कण्डेय उवाच
नार्मदे चोत्तरे कूले तीर्थं योजनविस्तृतम्।
यन्त्रेश्वरेति विख्यातं सर्वपापहरं परम्॥१
तत्र स्नात्वा नरो राजन् दैवतैः सह मोदते।
पञ्च वर्षसहस्त्राणि क्रीडते कामरूपधृक् ॥ २
गर्जनं च ततो गच्छेद् यत्र मेघचयोत्थितः।
इन्द्रजिन्नाम सम्प्राप्तस्तस्य तीर्थप्रभावतः॥३
मेघनादं ततो गच्छेद् यत्र मेघानुगर्जितम्।
मेघनादो गणस्तत्र परमां गणतां गतः॥४
मार्कण्डेयजीने कहा-राजन्! नर्मदाके उत्तर तटपर एक योजन विस्तृत यन्त्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ तीर्थ है, जो सभी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नानकर मानव देवताओंके साथ आनन्द मनाता है और इच्छानुसार रूप धारणकर पाँच हजार वर्षांतक वहाँ क्रीड़ा करता है। वहाँ गर्जन नामक तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ मेघसमूह ऊपर उठते रहते हैं। इस तीर्थके प्रभावसे मेघनादको इन्द्रजित् नाम प्राप्त हुआ था। वहाँसे मेघनाद जाना चाहिये, जहाँ मेघके गर्जनकी-सी ध्वनि होती रहती है। इसी स्थानपर मेघनाद-गण गणके श्रेष्ठ पदको प्राप्त किया था।
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थमानातकेश्वरम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५
नर्मदोत्तरतीरे तु धारा तीर्थं तु विश्रुतम्।
तस्मिस्तीर्थे नर: स्नात्वा तर्पयेत् पितृदेवताः॥ ६
सर्वान् कामानवाप्नोति मनसा ये विचिन्तिताः।
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मावर्तमिति स्मृतम्॥ ७
तत्र संनिहितो ब्रह्मा नित्यमेव युधिष्ठिर।
तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ब्रह्मलोके महीयते॥ ८
ततोऽङ्गारेश्वरं गच्छेन्नियतो नियताशनः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोकं स गच्छति॥ ९
ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् कपिलादानमाप्नुयात्॥ १०
गच्छेत् करञ्जतीर्थं तु देवर्षिगणसेवितम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोलोकं समवाप्नुयात्॥११
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कुण्डलेश्वरमुत्तमम्।
तत्र संनिहितो रुद्रस्तिष्ठते ह्युमया सह ॥१२
तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र स वन्द्यस्त्रिदशैरपि।
पिप्पलेशं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्॥१३
तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र रुद्रलोके महीयते।
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र विमलेश्वरमुत्तमम्॥१४
तत्र देवशिला रम्या चेश्वरेण विनिर्मिता।
तत्र प्राणपरित्यागाद् रुद्रलोकमवाप्नुयात्॥१५
ततः पुष्करिणीं गच्छेत् तत्र स्नानं समाचरेत्।
स्नातमात्रो नरस्तत्र हीन्द्रस्यार्धासनं लभेत्॥१६
नर्मदा सरितां श्रेष्ठा रुद्रदेहाद् विनिःसृता।
तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ॥१७
सर्वदेवाधिदेवेन त्वीश्वरेण महात्मना।
कथिता ऋषिसंघेभ्यो ह्यस्माकं च विशेषतः ॥ १८
मुनिभिः संस्तुता ह्येषा नर्मदा प्रवरा नदी।
रुद्रदेहाद् विनिष्क्रान्ता लोकानां हितकाम्यया॥१९
राजेन्द्र ! इसके बाद आम्रातकेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। राजन् ! वहाँ स्नानकर मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। नर्मदाके उत्तर तटपर प्रसिद्ध धारातीर्थ है, उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य यदि पितरों और देवताओंका तर्पण करता है तो उसे मनोऽभिलषित कामनाएँ प्राप्त हो जाती हैं। राजेन्द्र ! इसके बाद ब्रह्मावर्त नामसे प्रसिद्ध तीर्थमें जाना चाहिये। युधिष्ठिर! वहाँ ब्रह्मा सदा विराजमान रहते हैं। राजेन्द्र ! उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है ॥ १-८॥
वहाँ नियमपूर्वक संयत भोजन करता हुआ अङ्गारेश्वर जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकको जाता है। राजेन्द्र ! वहाँसे कपिलानामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य कपिला गौके दानका फल प्राप्त करता है। इसके बाद देवों और ऋषियोंसे सेवित करंज नामक तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! इस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको गोलोककी प्राप्ति होती है। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ कुण्डलेश्वर नामक तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ उमाके साथ रुद्र सदा निवास करते हैं। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नानकर वह देवताओंद्वारा भी वन्दनीय हो जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् सभी पापोंके नाशक पिप्पलेश-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र ! वहाँसे श्रेष्ठ विमलेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ महेश्वरद्वारा निर्मित एक देवशिला है। उस स्थानपर प्राणोंका त्याग करनेसे रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। तदुपरान्त पुष्करिणीतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करे, वहाँ स्नान करनेमात्रसे ही मानव इन्द्रका आधा आसन प्राप्त कर लेता है॥९-१६॥
नदियोंमें श्रेष्ठ नर्मदा रुद्रके शरीरसे निकली है, यह स्थावर और जंगम सभी जीवोंका उद्धार करती है। ऐसा सभी देवताओंके अधीश्वर महात्मा शंकरने स्वयं ऋषिगणको और विशेषकर मुझे बताया है। मुनियोंने इस श्रेष्ठ नर्मदा नदीकी स्तुति की है। यह नर्मदा संसारके हितकी कामनासे रुद्रके शरीरसे निकली है।
सर्वपापहरा नित्यं सर्वदेवनमस्कृता।
संस्तुता देवगन्धर्वैरप्सरोभिस्तथैव च॥२०
नमः पुण्यजले ह्याद्ये नमः सागरगामिनि।
नमस्ते पापनिर्दाहे नमो देवि वरानने॥२१
नमोऽस्तु ते ऋषिगणसिद्धसेविते
नमोऽस्तु ते शंकरदेहनिःसृते।
नमोऽस्तु ते धर्मभृतां वरप्रदे
नमोऽस्तु ते सर्वपवित्रपावने ॥२२
यस्त्विदं पठते स्तोत्रं नित्यं श्रद्धासमन्वितः।
ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विजयी भवेत्॥ २३
वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रश्चैव शुभां गतिम्।
अर्थार्थी लभते ह्यर्थं स्मरणादेव नित्यशः ॥ २४
नर्मदा सेवते नित्यं स्वयं देवो महेश्वरः ।
तेन पुण्या नदी ज्ञेया ब्रह्महत्यापहारिणी॥ २५
यह सभी पापोंका क्षय करनेवाली और सभी देवोंद्वारा नमस्कृत है। देव, गन्धर्व और अप्सराओंने इसकी भलीभाँति स्तुति की है। आदि गङ्गे! तुम्हें नमस्कार है। पुण्यसलिले! तुम्हें प्रणाम है। सागरकी ओर गमनशीले! तुम्हें अभिवादन है। पापोंको नष्ट करनेवाली एवं सुन्दर मुखवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम ऋषिसमूह एवं सिद्धोंसे सेवित हो, तुम्हें प्रणाम है। शंकरके शरीरसे निकली हुई तुम्हें अभिवादन है। तुम धर्मात्मा प्राणियोंको वर देनेवाली हो, तुम्हें नमस्कार है। सभीको पवित्र एवं निष्पाप करनेवाली तुम्हें प्रणाम है। जो श्रद्धासे समन्वित होकर इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता है, वह ब्राह्मण हो तो वेदज्ञ और क्षत्रिय हो तो विजयी होता है। वैश्य धनका लाभ करता है और शूद्रको शुभ गतिकी प्राप्ति होती है। अर्थको चाहनेवाला सदा स्मरणमात्रसे ही अर्थ-लाभ करता है। साक्षात् महेश्वरदेव नर्मदा नदीका नित्य सेवन करते हैं, इसीलिये इस पवित्र नदीको ब्रह्महत्यारूपी पापका निवारण करनेवाली जानना चाहिये ॥ १७-२५॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९०।।
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यवर्णन-प्रसङ्गमें एक सौ नब्बेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९० ॥
Summary of chapter 192 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the supreme spiritual efficacy of the Narmadā-Sāgara-Saṅgama, the holy confluence where river Narmadā merges into the western ocean. Bathing at this grand confluence during lunar eclipses or solar transits grants spiritual merit equivalent to performing a hundred Rājasūya sacrifices, wiping away all past sins and granting immediate elevation to the celestial realms.