आन्ध्रवंशीय, शकवंशीय एवं यवनादि राजाओंका संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण

सूत उवाच

काण्वायनांस्ततो भृत्यान् सुशर्माणं प्रसह्य तम्।

शुङ्गानां चैव यच्छेषं क्षपित्वा तु बलीयसः॥ १

शिशुकोऽन्धः सजातीयः प्राप्स्यतीमां वसुंधराम्।

त्रयोविंशत्समा राजा शिशुकस्तु भविष्यति॥ २

कृष्णो भ्राता यवीयस्तु ह्यष्टादश भविष्यति।

श्रीशातकर्णिर्भविता तस्य पुत्रस्तु वै दश॥ ३

पूर्णोत्सङ्गस्ततो राजा वर्षाण्यष्टादशैव तु।

स्कन्धस्तम्भिस्तथा राजा वर्षाण्यष्टादशैव तु॥ ४

पञ्चाशतं समाः षट् च शान्तकर्णिर्भविष्यति।

दश चाष्टौ च वर्षाणि तस्य लम्बोदरः सुतः॥ ५

आपीतको दश द्वे च तस्य पुत्रो भविष्यति।

दश चाष्टौ च वर्षाणि मेघस्वातिर्भविष्यति॥ ६

स्वातिश्च भविता राजा समास्त्वष्टादशैव तु।

स्कन्दस्वातिस्तथा राजा सप्तैव तु भविष्यति॥ ७

मृगेन्द्रः स्वातिकर्णस्तु भविष्यति समास्त्रयः।

कुन्तलः स्वातिकर्णस्तु भविताष्टौ समा नृपः।

एकसंवत्सरं राजा स्वातिवर्णो भविष्यति॥८

भविता रिक्तवर्णस्तु वर्षाणि पञ्चविंशतिः।

ततः संवत्सरान् पञ्च हालो राजा भविष्यति॥ ९

पञ्च मन्तुलको राजा भविष्यति समा नृपः।

पुरीन्द्रसेनो भविता तस्मात् सौम्यो भविष्यति॥१०

सुन्दरः शान्तिकर्णस्तु अब्दमेकं भविष्यति।

चकोर: स्वातिकर्णस्तु षण्मासान्वै भविष्यति॥११

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! (गत अध्यायमें कथित) काण्वायनवंशमें उत्पन्न होनेवाले क्षत्रियों तथा उनके स्वामी सुशर्मा नामक राजाको, जो शुङ्गभृत्योंका अन्तिम राजा होगा, बलपूर्वक पराजित कर उन्हींका सजातीय शिशुक नामक आन्ध्र राजा इस वसुन्धराको प्राप्त करेगा।* वह शिशुक तेईस वर्षोंतक पृथ्वीका शासन करेगा। उसके बाद उसका छोटा भाई कृष्ण अठारह वर्षतक शासन करेगा। उसका पुत्र श्रीशातकर्णि दस वर्षतक राज्य करेगा। उसका पुत्र पूर्णोत्सङ्ग नामक राजा होगा, जो अठारह वर्षोंतक राज्य करेगा। उसके बाद स्कन्धस्तम्भि नामक राजा अठारह वर्षतक राज्य करेगा। फिर शान्तकर्णि नामक राजा छप्पन वर्षतक राज्य करेगा। उसका पुत्र लम्बोदर अठारह वर्षतक राज्य करेगा। उसका पुत्र आपीतक बारह वर्षतक राज्य करेगा। तदनन्तर मेघस्वाति नामक राजा होगा, जो अठारह वर्षतक राज्य करेगा। इसके बाद स्वाति नामक राजा होगा, वह भी अठारह वर्षतक राज्य करेगा। फिर स्कन्धस्वाति नामक राजा सात वर्षतक राज्य करेगा। इसके बाद मृगेन्द्र स्वातिकर्ण नामक राजा तीन वर्षों तक पृथ्वीपर शासन करेगा। तदनन्तर कुन्तल स्वातिकर्ण आठ वर्षोंतक राज्य करेगा। उसके बाद स्वातिवर्ण नामक राजा मात्र एक वर्ष राज्य करेगा। तदनन्तर रिक्तवर्ण पच्चीस वर्षतक राजा होगा। उसके बाद पाँच वर्षतक हाल राजा होगा। इसके बाद मन्तुलक नामक राजा होगा, जो पाँच वर्षतक राज्य करेगा। उसके बाद पुरीन्द्रसेन राजा होगा। फिर इसके बाद सौम्य एवं सुन्दर स्वभाववाला शान्तिकर्ण नामक राजा होगा, जो मात्र एक वर्षतक राज्य करेगा। फिर चकोरस्वातिकर्ण नामक राजा होगा, जो मात्र छ: मास ही शासन करेगा।

* मत्स्यमहापुराणका यह तथा गत २७२ वा अध्याय सभी भारतीय इतिहासोंके लिये अत्यन्त प्रामाणिक माने गये हैं। कैम्ब्रिज इतिहासके प्रथम भाग, “स्मिथ के भारतके प्राचीन इतिहासमें तथा भारतीय विद्याभवनके बृहद् इतिहासके दूसरे भागमें इसका विस्तृत विवरण इसी पुराणके आधारपर विवेचित है। पार्जीटर आदिने अनेक अभिलेखोंसे भी इसकी परीक्षा कर शुद्धता और परम प्रामाणिकता स्वीकार कर ली है।

अष्टाविंशतिवर्षाणि शिवस्वातिर्भविष्यति।

राजा च गौतमीपुत्रो ह्येकविंशत्यतो नृपः॥१२

अष्टाविंशत्सुतस्तस्य पुलोमा वै भविष्यति।

शिवश्रीर्वै पुलोमा तु सप्तैव भविता नृपः॥१३

शिवस्कन्धः शान्तिकर्णाद् भविता ह्यात्मजः समाः।

नवविंशतिवर्षाणि यज्ञश्रीः शान्तिकर्णिकः॥१४

षडेव भविता तस्माद् विजयस्तु समास्ततः।

चण्डश्रीः शान्तिकर्णिस्तु तस्य पुत्रः समा दश॥१५

पुलोमा सप्त वर्षाणि अन्यस्तेषां भविष्यति।

एकोनत्रिंशति ह्येते आन्ध्रा भोक्ष्यन्ति वै महीम्॥१६

तेषां वर्षशतानि स्युश्चत्वारि षष्टिरेव च।

आन्ध्राणां संस्थिता राज्ये तेषां भृत्यान्वये नृपाः॥१७

सप्तैवान्ध्रा भविष्यन्ति दशाभीरास्तथा नृपाः।

सप्त गर्दभिलाश्चापि शकाश्चाष्टादशैव तु॥१८

यवनाष्टौ भविष्यन्ति तुषारास्तु चतुर्दश।

त्रयोदश गुरुण्डाश्च हूणा ह्येकोनविंशतिः॥१९

सप्त गर्दभिला भूयो भोक्ष्यन्तीमां वसुन्धराम्।

यवनाष्टौ भविष्यन्ति सप्ताशीतिं महीमिमाम्॥२०

सप्तवर्षसहस्राणि तुषाराणां मही स्मृता।

शतानि त्रीण्यशीतिं च शतान्यष्टादशैव तु॥२१

शतान्य चतुष्काणि भवितव्यास्त्रयोदश।

गुरुण्डा वृषलैः सार्धं भोक्ष्यन्ते म्लेच्छसम्भवाः॥२२

शतानि त्रीणि भोक्ष्यन्ते वर्षाण्येकादशैव तु।

आन्ध्राः श्रीपार्वतीयाश्च ते द्विपञ्चाशतं समाः॥२३

सप्तषष्टिस्तु वर्षाणि दशाभीरास्तथैव च।

तेषूत्सन्नेषु कालेन ततः किलकिला नृपाः॥२४

भविष्यन्तीह यवना धर्मतः कामतोऽर्थतः।

तैर्विमिश्रा जनपदा आर्या म्लेच्छाश्च सर्वशः॥२५

विपर्ययेण वर्तन्ते क्षयमेष्यन्ति वै प्रजाः।

लुब्धानृताब्रुवाश्चैव भवितारो नृपास्तथा ॥२६

उसके बाद शिवस्वातिनामक राजा होगा, जो अट्ठाईस वर्षतक राज्य करेगा। उसके बाद गौतमीपुत्र शातकर्णि राजा होगा, जो इक्कीस वर्षांतक राज्य करेगा। उसका पुत्र पुलोमा अट्ठाईस वर्षतक राज्य करेगा। उसके बाद शिवश्री पुलोमा नामक राजा सात वर्षतक राज्य करेगा। इसके बाद शान्तिकर्णका पुत्र शिवस्कन्ध उन्तीस वर्षांतक राज्य करेगा। फिर यज्ञश्री शान्तिकर्णिक नामक राजा उन्तीस वर्षतक राज्य करेगा। उसका पुत्र विजय छ: वर्षतक राजा होगा। उसका पुत्र चण्डश्री शान्तिकर्ण दस वर्षतक राज्य करेगा॥१-१५॥

तदनन्तर उसके बाद दूसरा पुलोमा नामक राजा होगा, जो सात वर्षतक राज्य करेगा। इस प्रकार ये उन्तीस (मतान्तरसे ३० या ३१) आन्ध्रवंशी राजा पृथ्वीका उपभोग करेंगे, इनका राज्यकाल चार सौ आठ वर्षोंका होगा, भृत्योपनामधारी उन आन्ध्रवंशीय राजाओंके वंशज राज्यके अधिकारी होंगे। उनमें सात आन्ध्रवंशीय, दस आभीरवंशी, सात गर्दभिल,* अठारह शकवंशीय, आठ यवन, चौदह तुषार, तेरह गुरुण्ड तथा उन्नीस हूणवंशीय राजा होंगे। फिर सात गर्दभिलवंशीय राजा इस पृथ्वीका उपभोग करेंगे। आठ यवन राजा सत्तासी वर्षतक राज्य करेंगे। सात सहस्र वर्षोंतक यह पृथ्वी तुषारोंके अधीन रहेगी। फिर एक तौ तिरासी वर्ष, एक सौ अठारह वर्ष तथा चार सौ पचास वर्षतक अर्थात् सात सौ इक्यावन वर्षतक तेरह म्लेच्छवंशज गुरुण्ड राजा शूद्रोंके साथ पृथ्वीका उपभोग करेंगे। तीन सौ  ग्यारह वर्षतक आन्ध्रवंशीय राजा राज्य करेंगे तथा श्रीपर्वतीयोंका राज्य बावन वर्षतक रहेगा। उसी प्रकार दस आभीर राजा सड़सठ वर्षतक राज्य करेंगे। कालवश उनके विनष्ट हो जानेपर किलकिला नामक राजा होंगे, जो यवन-जातिके होंगे। धर्म, काम, अर्थ-तीनों दृष्टियोंसे आर्य लोग उनकी संस्कृतिसे विमिश्रित हो म्लेच्छ हो जायेंगे और आश्रमधर्मका विपर्यय करने लगेंगे। परिणामतः प्रजा नष्ट हो जायगी तथा राजालोग लोभी और असत्यवादी हो जायेंगे। डी पुत्र मानते हैं।

*महाराज विक्रमादित्यको ऐतिहासिक विद्वान् गर्दभिलका ही पुन्न मानते हैं। उन्हींके बाद शकोंका राज्य हुआ था।

कल्किनानुहताः सर्वे आर्या म्लेच्छाश्च सर्वतः।

अधार्मिकाश्च येऽत्यर्थं पाषण्डाश्चैव सर्वशः॥२७

प्रनष्टे नृपवंशे तु संध्याशिष्ट कलौ युगे।

किंचिच्छिष्टाः प्रजास्ता वै धर्मे नष्टे परिग्रहाः॥ २८

असाधवो ह्यसत्त्वाश्च व्याधिशोकेन पीडिताः।

अनावृष्टिहताश्चैव परस्परवधेप्सवः॥२९

अशरण्याः परित्रस्ताः सङ्कटं घोरमाश्रिताः।

सरित्पर्वतवासिन्यो भविष्यन्त्यखिलाः प्रजाः॥३०

नृपवंशेषु नष्टेषु प्रजाः सर्वगृहाणि च।

नष्टस्नेहा निरापत्रास्त्यक्तभ्रातृसुहृद्गणाः।

वर्णाश्रमपरिभ्रष्टा अधर्मनिरताश्च ताः॥३१

पत्रमूलफलाहाराश्चीरपत्राजिनाम्बराः

वृत्त्यर्थमभिलिप्सन्त्यश्चरिष्यन्ति वसुन्धराम्॥३२

एवं कष्टमनुप्राप्ताः प्रजाः काले युगान्तके।

निःशेषास्तु भविष्यन्ति सार्धं कलियुगेन तु॥३३

क्षीणे कलियुगे तस्मिन् दिव्ये वर्षसहस्रके।

ससन्ध्यांशे सुनिःशेषे कृतं तु प्रतिपत्स्यते॥३४

एवं वंशक्रमः कृत्स्न: कीर्त्तितो यो मया क्रमात्।

अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये॥३५

महापद्माभिषेकात् तु यावज्जन्म परीक्षितः।

एवं वर्षसहस्त्रं तु ज्ञेयं पञ्चाशदुत्तरम्॥ ३६

पौलोमास्तु तथान्धास्तु महापद्मान्तरे पुनः।

अनन्तरं शतान्यष्टौ षट्त्रिंशत् तु समास्तथा॥३७

तावत्कालान्तरं भाव्यमान्ध्रान्तादापरीक्षितः।

भविष्ये ते प्रसंख्याताः पुराणज्ञैः श्रुतर्षिभिः॥ ३८

सप्तर्षयस्तदा प्रांशुप्रदीप्तेनाग्निना समाः।

सप्तविंशतिभाव्यानामान्ध्राणां तु यदा पुनः॥३९

सप्तर्षयस्तु वर्तन्ते यत्र नक्षत्रमण्डले।

सप्तर्षयस्तु तिष्ठन्ति पर्यायेण शतं शतम्॥४०

दम्भ-पाखण्डसे सभी आर्य तथा म्लेच्छ लोग प्रभावहत हो जायँगे। अधार्मिकोंकी वृद्धि होगी, पाखंड बढ़ जायगा। इस प्रकार सन्ध्यामात्र शेष रह जानेपर कलियुगमें जब सभी राजवंश नष्ट हो जायगा तब थोड़ी प्रजा शेष रह जायगी, जो धर्मके विनष्ट हो जानेसे विशृंखलित रहेगी॥१६-२८॥

उस समय सारी प्रजा असत्कर्मपरायण, निर्बल, व्याधि और शोकसे जर्जरित, अनावृष्टिसे पीड़ित, परस्पर एक-दूसरेके संहारके इच्छुक, आश्रयहीन, भयभीत, घोर संकटसे ग्रस्त होकर नदियोंके तटों तथा पर्वतोपर निवास करेंगी। राजवंशोंके नष्ट हो जानेपर सारी प्रजा घर-द्वारसे विहीन, स्नेहरहित, निर्लज्ज, भाई-मित्र आदिका त्याग कर देनेवाली, वर्णाश्रमधर्मसे भ्रष्ट, अधर्ममें लीन, पत्ते, मूल और फलोंका आहार करनेवाली, पत्तों और मृगचर्मको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाली तथा जीविकाके लोभमें सारी पृथ्वीका चक्कर लगाने लगेगी। इस प्रकार कलियुगके अवसानके समय प्रजाएँ कष्ट झेलेंगी। वे कलियुगके साथ ही समाप्त हो जायँगी। तब संध्यासहित कलियुगके एक हजार दिव्य वर्ष बीत जानेपर कृतयुगकी प्रवृत्ति होगी। इस प्रकार मैंने क्रमशः भूत, वर्तमान और भविष्य-कालीन राजवंशका पूर्णरूपसे वर्णन किया है। यह राज्यकाल परीक्षित्के जन्मसे लेकर महापद्मके राज्याभिषेकतक एक हजार पचास वर्ष* होता है। पुनः पौलोम आन्ध्रसे लेकर महापद्मके राजत्वकालतक आठ सौ छत्तीस वर्ष समझना चाहिये॥ २९-३७॥

परीक्षित्के समयसे लेकर आन्ध्रवंशीय राजाओंके अन्तकालतकका प्रमाण वेदों एवं पुराणोंके जाननेवाले ऋषियोंने भविष्यपुराणमें इस प्रकार परिगणित किया है। जब पुनः सत्ताईस आन्ध्रवंशीय राजाओंका राज्य होगा, तब सप्तर्षिगण प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त रहेंगे। वे सप्तर्षिगण एक-एक सौ वर्षोंतक नक्षत्रमण्डलमें निवास करते हैं।

*'विष्णुपुराणमें इसे १५०० वर्ष कहा है और भागवतमें ११११५ वर्ष।

सप्तर्षीणामुपर्येतत् स्मृतं वै दिव्यसंज्ञया।

समा दिव्याः स्मृताः षष्टिर्दिव्याब्दानि तु सप्तभिः॥४१

एभिः प्रवर्तते कालो दिव्यः सप्तर्षिभिस्तु वै।

सप्तर्षीणां च यौ पूर्वी दृश्येते ह्युदितौ निशि॥४२

तयोर्मध्ये तु नक्षत्रं दृश्यते यत्समं दिवि।

तेन सप्तर्षयो ज्ञेया युक्ता व्योम्नि शतं समाः॥४३

नक्षत्राणामृषीणां च योगस्यैतन्निदर्शनम्।

सप्तर्षयो मघायुक्ताः काले पारिक्षिते सतम्॥ ४४

ब्राह्मणास्तु चतुर्विंशा भविष्यन्ति शतं समाः।

ततः प्रभृत्ययं सर्वो लोको व्यापत्स्यते भृशम्॥ ४५

अनृतोपहता लुब्धा धर्मतः कामतोऽर्थतः।

श्रौतस्मार्तेऽतिशिथिले नष्टवर्णाश्रमे तथा॥४६

संकरं दुर्बलात्मानः प्रतिपत्स्यन्ति मोहिताः।

ब्राह्मणाः शूद्रयोनिस्थाः शूद्रा वै मन्त्रयोनयः॥ ४७

उपस्थास्यन्ति तान् विप्रास्तदर्थमभिलिप्सवः।

क्रमेणैव च दृश्यन्ते स्ववर्णान्तरदायकम्॥४८

क्षयमेव गमिष्यन्ति क्षीणशेषा युगक्षये।

यस्मिन् कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि॥४९

प्रतिपन्नं कलियुगं प्रमाणं तस्य मे शृणु।

चतुःशतसहस्रं तु वर्षाणां वै स्मृतं बुधैः॥५०

चत्वार्यष्टसहस्राणि संख्यातं मानुषेण तु।

दिव्यं वर्षसहस्रं तु तदा संध्या प्रवर्तते॥५१

निःशेषे तु तदा तस्मिन् कृतं वै प्रतिपत्स्यते।

ऐलश्चक्ष्वाकुवंशश्च सहदेवः प्रकीर्तितः॥५२

इक्ष्वाकोः संस्मृतं क्षत्रं सुमित्रान्तं भविष्यति।

ऐलं क्षत्रं समाक्रान्तं सोमवंशविदो विदुः॥५३

एते विवस्वतः पुत्राः कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः।

अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताश्च यैः॥५४

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्तथा शूद्राश्च वै स्मृताः।

वैवस्वतेऽन्तरे तस्मिन्निति वंशः समाप्यते॥५५

उन सप्तर्षियोंके ऊपर यह दिव्य नामसे कहा गया है।  इसका परिमाण सड़सठ दिव्य वर्षोंका है। इस प्रकार इन सप्तर्षियोंका दिव्य काल प्रवृत्त होता है। रात्रिके समय सप्तर्षियोंके जो दो प्रारम्भिक पूर्व दिशामें जिस नक्षत्रके सामने उदित होते हैं, सभी सप्तर्षि उसी नक्षत्रमें स्थित माने जाते हैं। पुनः सौ वर्षों के बाद आकाशमें उनका दूसरे नक्षत्रके साथ मिलन होता है। नक्षत्रों और उन सप्तर्षियोंके संयोगकी यही गति बतायी जाती है। ये सप्तर्षिगण राजा परीक्षित्के राज्यकालमें मघा नक्षत्रमें स्थित थे। उनके चौबीस सौ वर्ष बाद राज्य करनेवाले शुङ्गवंशीय ब्राह्मण राजा होंगे। उसके बाद यह सारा लोक अत्यन्त पतित हो जायगा। उस समय सारी प्रजाएँ मिथ्या व्यवहारमें लीन, लोभी, धर्म, अर्थ एवं कामसे हीन, वैदिक एवं स्मार्त नियमोंके पालनसे विमुख, वर्णाश्रम-धर्मकी मर्यादासे विहीन और दुर्बलात्मा हो जायेंगी। वे मोहित होकर वर्णसंकर संतान उत्पन्न करेंगी। ब्राह्मण शूद्रयोनिमें स्थित हो जायेंगे और शूद्र मन्त्रोंके ज्ञाता हो जायेंगे। उन्हीं मन्त्रोंको जाननेकी अभिलाषासे ब्राह्मण उन मन्त्रज्ञ शूद्रोंकी उपासना करेंगे। क्रमश: सभी लोग अपने वर्ण-धर्मको छोड़कर अन्य वर्णमें सम्मिलित हो जायँगे॥३८-४८॥

फिर नष्ट होनेसे बची हुई प्रजाएँ युगान्तके समय विनष्ट हो जायँगी। जिस दिन श्रीकृष्ण स्वर्ग (गोलोक) गये, उसी दिन कलियुगका प्रारम्भ हुआ। इसका प्रमाण मुझसे सुनिये। बुद्धिमान् लोग उस कलियुगका प्रमाण मानववर्षके अनुसार चार लाख बत्तीस हजार और दिव्यमानके अनुसार एक हजार वर्ष मानते हैं। उसके बाद उसकी संध्या (तथा संध्यांश) प्रवृत्त होती है। उस कलियुगके समाप्त होनेपर कृतयुगका प्रारम्भ होता है। सहदेव ऐल और इक्ष्वाकुवंशीय-दोनों कहा जाता है। इक्ष्वाकुका वंश राजा सुमित्रतक बतलाया जाता है। सोमवंशके ज्ञाता लोग ऐलवंशको चन्द्रवंशमें संक्रान्त मानते हैं। ये ही विवस्वान्के भी कीर्तिशाली पुत्र कहे गये हैं, जो भूत, वर्तमान तथा भविष्यकालमें होनेवाले हैं। उस वैवस्वत मन्वन्तरमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र-इन सभी वर्गों के लोग होते हैं। इस प्रकार अब यहाँ यह वंश-वर्णन समाप्त हो जाता है॥ ४९-५५ ॥

देवापिः पौरवो राजा ऐक्ष्वाको यश्च ते मतः।

महायोगबलोपेतौ कलापग्राममाश्रितौ॥५६

एतौ क्षत्रप्रणेतारौ नवविंशे चतुर्युगे।

सुवर्चा मनुपुत्रस्तु ऐक्ष्वाकाद्यो भविष्यति॥५७

नवविंशे युगेऽसौ वै वंशस्यादिर्भविष्यति।

देवापिपुत्रः सत्यस्तु ऐलानां भविता नृपः॥५८

क्षत्रप्रवर्तकावेतौ भविष्ये तु चतुर्युगे।

एवं सर्वेषु विज्ञेयं संतानार्थं तु लक्षणम्॥५९

क्षीणे कलियुगे चैव तिष्ठन्तीति कृते युगे।

सप्तर्षयस्तु तैः सार्धं मध्ये त्रेतायुगे पुनः॥६०

बीजार्थं वै भविष्यन्ति ब्रह्मक्षत्रस्तु वै पुनः।

एवमेवं तु सर्वेषु तिष्यान्तेष्वन्तरेषु च॥६०

सप्तर्षयो नृपैः सार्धं सन्तानार्थं युगे युगे।

एवं क्षत्रस्य चोत्सेधः सम्बन्धो वै द्विजैः स्मृतः॥६१

मन्वन्तराणां संताने संतानाश्च श्रुतौ स्मृताः ।

अतिक्रान्तयुगाश्चैव ब्रह्मक्षत्रस्य सम्भवाः॥६२

यथा प्रशान्तिस्तेषां वै प्रकृतीनां तथा क्षयः ।

सप्तर्षयो विदुस्तेषां दीर्घायुष्ठं क्षयोदयौ॥६३

एतेन क्रमयोगेन ऐला इक्ष्वाकवो नृपाः।

उत्पद्यमानास्त्रेतायां क्षीयमाणा: कलौ युगे॥६४

अनुयान्ति युगाख्यां तु यावन्मन्वन्तरक्षयम्।

जामदग्न्येन रामेण क्षत्रे निरवशेषिते॥६५

रिक्तेयं वसुधा सर्वा क्षत्रियैर्वसुधाधिपैः।

द्विवंशकरणं सर्वं कीर्त्तयिष्ये निबोध मे॥६६

ऐलं चैक्ष्वाकुवंशं च प्रकृतिं परिचक्षते।

राजानः श्रेणिबद्धाश्च तथान्ये क्षत्रिया भुवि॥६७

ऐलवंशास्तु भूयांसो न तथैक्ष्वाकवो नृपाः।

एषामेकशतं पूर्ण कुलानामभिरोचते॥६८

तावदेव तु भोजानां विस्ताराद् द्विगुणं स्मृतम्।

भोजानां द्विगुणं क्षत्रं चतुर्धा तद् यथातथम्॥६९

ते ह्यतीताः सनामानो ब्रुवतस्तान् निबोध मे।

शतं वै प्रतिविन्ध्यानां शतं नागाः शतं हयाः॥७०

पुरुवंशीय राजा देवापि और इक्ष्वाकुवंशीय राजा (सहदेव), जिसे तुम मानते हो-ये दोनों महान् योगबलसे सम्पन्न होंगे, जो कलाप ग्राममें निवास करते हैं। उन्तीसवीं चतुर्युगीमें ये दोनों राजा क्षत्रिय जातिके नेता होंगे। मनुका पुत्र सुवर्चा इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंमें प्रथम होगा। वही उन्तीसवें युगमें अपने वंशका मूल पुरुष  होगा तथा देवापिका पुत्र सत्य ऐलवंशीयोंका राजा होगा। भविष्यकालीन चतुर्युगमें ये दोनों क्षात्रधर्मके प्रवर्तक होंगे। इसी प्रकार सभी वंशोंमें सन्ततिके लक्षणोंको जानना चाहिये। कलियुगके क्षीण हो जानेपर कृतयुगमें सप्तर्षि उन राजाओंके साथ स्थित रहते हैं। पुनः त्रेताके मध्यमें वे ब्राह्मण और क्षत्रियके बीजके कारण होते हैं। इसी प्रकार सभी कलियुगों एवं अन्य युगोंमें होता है। प्रत्येक युगमें सप्तर्षि राजाओंके साथ प्रजाओंकी उत्पत्तिके लिये अवस्थित रहते हैं। इसी प्रकार ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियोंकी उत्पत्तिका सम्बन्ध कहा जाता है। मन्वन्तरोंके विस्तारमें ब्राह्मण और क्षत्रियसे उत्पन्न हुई संतान युगको अतिक्रान्त कर जाती है, ऐसा श्रुतियोंमें कहा गया है। वे सप्तर्षि उन संततियोंकी जिस प्रकार प्रशान्ति होती है तथा जिस प्रकार क्षय-दीर्घायुकी प्राप्ति, उन्नति और अवनति होती है, वह सब जानते हैं॥५६-६३ ।।

इस प्रकारके क्रमयोगसे चन्द्रवंशी और इक्ष्वाकुवंशीय राजा त्रेतामें उत्पन्न होकर कलियुगमें विनष्ट हो जाते हैं। एक मन्वन्तरके विनाशतक युग संज्ञा कही जाती है। जमदग्निके पुत्र परशुरामद्वारा क्षत्रियोंका संहार हो जानेपर यह सारी पृथ्वी क्षत्रिय राजाओंसे शून्य हो गयी थी। अब मैं राजाओंके सूर्य-चन्द्र-इन दो वंशोंकी उत्पत्ति बता रहा हूँ, उसे मुझसे सुनिये। ऐल और इक्ष्वाकुवंश-क्षत्रियोंकी मूल प्रकृति कहे गये हैं। इन राजाओंके वंशज तथा अन्य क्षत्रियगण पृथ्वीपर प्रचुर परिमाणमें अवस्थित हैं। इनमें ऐलवंशीय राजा तो बहुत हैं, किंतु इक्ष्वाकुवंशीय  उतने नहीं हैं। इनके कुलोंकी संख्या पूरी एक सौ बतलायी जाती है। इसी प्रकार भोजवंशीय राजाओंका विस्तार इनसे दूना है। भोजवंशीय राजाओंसे दूने अन्य क्षत्रियगण हैं। वे चार प्रकारके हैं और बीत चुके हैं। मैं उनका नामसहित यथार्थ रूपसे वर्णन कर रहा हूँ, उसे मुझसे सुनिये। इनमें प्रतिविन्ध्योंकी संख्या सौ, नागोंकी संख्या सौ, हयोंकी संख्या सौ

शतमेकं धार्तराष्ट्रा ह्यशीतिर्जनमेजयाः।

शतं वै ब्रह्मदत्तानां वीराणां कुरवः शतम्॥७१

ततः शतं च पाञ्चालाः शतं काशिकुशादयः।

तथापरे सहस्त्रे द्वे ये नीपाः शशबिन्दवः॥७२

इष्टवन्तश्च ते सर्वे सर्वे नियुतदक्षिणाः।

एवं राजर्षयोऽतीताः शतशोऽथ सहस्रशः॥७३

मनोर्वैवस्वतस्यासन् वर्तमानेऽन्तरे विभोः।

तेषां तु निधनोत्पत्तौ लोकसंस्थितयः स्थिताः॥७४

न शक्यो विस्तरस्तेषां सन्तानस्य परस्परम् ।

तत्पूर्वापरयोगेन वक्तुं वर्षशतैरपि॥७५

अष्टाविंशसमाख्याता गता वैवस्वतेऽन्तरे।

एते देवगणैः सार्धं शिष्टा ये तान् निबोधत॥७६

चत्वारिंशत् त्रयश्चैव भविष्यास्ते महात्मनः ।

अवशिष्टा युगाख्यास्ते ततो वैवस्वतो ह्ययम्॥७७

एतद् वः कीर्त्तितं सम्यक् समासव्यासयोगतः।

पुनर्वक्तुं बहुत्वात् तु न शक्यं विस्तरेण तु॥७८

उक्ता राजर्षयो ये तु अतीतास्ते युगैः सह।

ये ते ययातिवंश्यानां ये च वंशा विशाम्पते॥७९

कीर्तिता द्युतिमन्तस्ते य एतान् धारयेन्नरः।

लभते स वरान् पञ्च दुर्लभानिह लौकिकान्॥८०

आयुः कीर्तिं धनं स्वर्गं पुत्रवांश्चाभिजायते।

धारणाच्छ्रवणाच्चैव परं स्वर्गस्य धीमतः॥८१

और धार्तराष्ट्रोंकी संख्या सौ है। जनमेजयोंकी संख्या अस्सी है। वीरवर ब्रह्मदत्तोंकी संख्या सौ, कुरुओंकी संख्या सौ, पाञ्चालोंकी संख्या सौ और काशि-कुशादिकी संख्या सौ है। इनके अतिरिक्त जो नीप और शशबिन्दु हैं, उनकी संख्या दो हजार है॥६४-७२॥

वे सभी यज्ञ करनेवाले तथा अत्यधिक दक्षिणा प्रदान करनेवाले थे। इस प्रकार सैकड़ों-हजारों राज र्षिगण बीत चुके हैं, जो प्रभावशाली वैवस्वत मनुके वर्तमान अन्तरमें जन्म ग्रहण कर चुके हैं। उनके मरण और उत्पत्तिमें अब लोककी स्थिति ही प्रमाणभूत है। उनकी संतानका विस्तार तो परस्पर पूर्वापर सम्बन्धसे सैकड़ों वर्षों में भी नहीं बताया जा सकता। इस वैवस्वत मन्वन्तरमें वे नृपतिगण अपने वंशदेवताओंके साथ अट्ठाईस पीढ़ीतक बीत चुके हैं। जो शेष हैं, उन्हें सुनिये। वे महात्मा राजा तैंतालीस होंगे। उन अवशिष्ट वैवस्वत महात्माओंकी संज्ञा उनके युगोंके साथ है। इस प्रकार मैंने इन वंशोंका विस्तार और संक्षेपसे वर्णन कर दिया। उनकी संख्या बहुत होनेके कारण मैं विस्तारपूर्वक बतलानेमें असमर्थ हूँ। राजन्! मैंने जिन ययातिवंशीय राजाओंके वंशधर राजर्षियोंकी चर्चा की है, वे सभी युगोंके साथ समाप्त हो चुके हैं। वे सभी कान्तिमान् एवं यशस्वी थे। जो मनुष्य उनके नामोंको स्मरण रखता है, वह इस लोकमें पाँच दुर्लभ लौकिक वरदानोंको प्राप्त कर लेता है, अर्थात् वह आयु, कीर्ति, धन, स्वर्ग और पुत्रसे सम्पन्न होकर उत्पन्न होता है तथा उस बुद्धिमान्को इनके स्मरण एवं श्रवण करनेसे परमस्वर्गकी प्राप्ति होती है॥७३-८१॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भविष्यराजानुकीर्तनं नाम त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २७३॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें भविष्यकालिक राजाओंका वर्णन नामक दो सौ तिहत्तरवा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७३ ॥