मत्स्य महा पुराण
श्राद्धकल्प-पितृगाथा-कीर्तन
मत्स्य उवाच
एतद्वंशभवा विप्राः श्राद्धे भोज्याः प्रयत्नतः।
पितॄणां वल्लभं यस्मादेषु श्राद्धं नरेश्वर॥१
अतः परं प्रवक्ष्यामि पितृभिर्याः प्रकीर्तिताः।
गाथा: पार्थिवशार्दूल कामयद्भिः पुरे स्वके॥२
अपिस्यात्स कुलेऽस्माकंयो नो दद्याजलाञ्जलिम्।
नदीषु बहुतोयासु शीतलासु विशेषतः॥३
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यः श्राद्धं नित्यमाचरेत् ।
पयोमूलफलैर्भक्ष्यस्तिलतोयेन वा पुनः॥४
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यो नो दद्यात्त्रयोदशीम्।
पायसं मधुसर्पिभ्र्ष्या वर्षासु च मघासु च॥५
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं खड्गमांसेन यः सकृत्।
श्राद्धं कुर्यात् प्रयत्नेन कालशाकेन वा पुनः॥६
कालशाकं महाशाकं मधु मुन्यन्नमेव च।
विषाणवर्जा ये खड्गा आसूर्यं तदशीमहि ॥ ७
गयायां दर्शने राहोः खड्गमांसेन योगिनाम्।
भोजयेत् कः कुलेऽस्माकं छायायां कुञ्जरस्य च॥८
मत्स्यभगवान्ने कहा-नरेश्वर! इन धर्मके वंशमें उत्पन्न हुए विप्रोंको श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक भोजन कराना चाहिये; क्योंकि इन ब्राह्मणोंके सम्बन्धसे किया हुआ श्राद्ध पितरोंको अतिशय प्रिय है। राजसिंह! इसके बाद अब मैं उस गाथाका वर्णन कर रहा हूँ जिसका अपने पुरमें स्थित कामना करनेवाले पितरोंने कथन किया था। क्या हमलोगोंके वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो अधिक एवं शीतल जलवाली नदियोंमें जाकर हमलोगोंको जलाञ्जलि देगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो दूध, मूल, फल और खाद्य सामग्रियोंसे या तिलसहित जलसे नित्य श्राद्ध करेगा? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो वर्षा-ऋतुके मघानक्षत्रकी त्रयोदशी तिथिको मधु और घीसे मिश्रित दूधमें पका हुआ खाद्य पदार्थ हमें समर्पित करेगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा, जो कालशाकसे श्राद्ध करेगा? कालशाक, महाशाक, मधु और मुनिजनोंके अनुकूल अन्नोंको हमलोग सूर्यास्तसे पूर्व ही ग्रहण करते हैं। हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कौन व्यक्ति सूर्यग्रहणके अवसरपर अर्थात् राहुके दर्शनकालतक गयातीर्थमें एवं गजच्छायायोगमें योगियोंको फलके गूदेका भोजन करायेगा?
आकल्पकालिकी तृप्तिस्तेनास्माकं भविष्यति।
दाता सर्वेषु लोकेषु कामचारो भविष्यति॥९
आभूतसम्प्लवं कालं नात्र कार्या विचारणा।
यदेतत्पञ्चकं तस्मादेकेनापि वयं सदा॥१०
तृप्ति प्राप्स्याम चानन्तां किं पुनः सर्वसम्पदा।
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं दद्यात् कृष्णाजिनं च यः॥११
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं कश्चित् पुरुषसत्तमः।
प्रसूयमानां यो धेनुं दद्याद् ब्राह्मणपुङ्गवे॥१२
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं वृषभं यः समुत्सृजेत्।
सर्ववर्णविशेषेण शुक्लं नीलं वृषं तथा॥१३
अपि स्यात्स कुलेऽस्माकंयः कुर्याच्छ्रद्धयान्वितः।
सुवर्णदानं गोदानं पृथिवीदानमेव च॥१४
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं कश्चित् पुरुषसत्तमः ।
कूपारामतडागानां वापीनां यश्च कारकः॥१५
अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं सर्वभावेन यो हरिम्।
प्रयायाच्छरणं विष्णुं देवेशं मधुसूदनम्॥१६
अपिन: स कुले भूयात् कश्चि विद्वान् विचक्षणः।
धर्मशास्त्राणि यो दद्याद् विधिना विदुषामपि॥१७
एतावदुक्तं तव भूमिपाल
श्राद्धस्य कल्पं मुनिसम्प्रदिष्टम्।
पापापहं पुण्यविवर्धनं च
लोकेषु मुख्यत्वकरं तथैव॥ १८
इत्येतां पितृगाथां तु श्राद्धकाले तु यः पितॄन्।
श्रावयेत्तस्य पितरो लभन्ते दत्तमक्षयम्॥१९
इन खाद्य पदार्थों से हमलोगोंको कल्पपर्यन्त तृप्ति बनी रहती है और दाता प्रलयकालपर्यन्त सभी लोकोंमें स्वेच्छानुसार विचरण करता है-इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। पूर्वकथित. इन पाँचोंमेंसे एकसे भी हमलोग सदा अनन्त तृप्ति प्राप्त करते हैं, फिर सभीके द्वारा करनेपर तो कहना ही क्या है? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति उत्पन्न होगा, जो कृष्णमृगचर्मका दान देगा?॥ १-११॥
क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा नरश्रेष्ठ पैदा होगा, जो ब्राह्मणश्रेष्ठको व्याती हुई गायका दान देगा? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा, जो वृषभका उत्सर्ग करेगा? वह वृष विशेषरूपसे सभी रङ्गोंकी अपेक्षा नील अथवा शुक्ल वर्णका होना चाहिये। क्या हमलोगोंके कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति उत्पन्न होगा, जो श्रद्धासम्पन्न होकर सुवर्ण-दान, गो-दान और पृथ्वीदान करेगा? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा पुरुषश्रेष्ठ पैदा होगा, जो कूप, बगीचा, सरोवर और बावलियोंका निर्माण करायेगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म ग्रहण करेगा जो सभी प्रकारसे मधु दैत्यके नाशक देवेश भगवान् विष्णुको शरण ग्रहण करेगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा प्रतिभाशाली विद्वान् होगा, जो विद्वानोंको विधिपूर्वक धर्मशास्त्रकी पुस्तकोंका दान देगा? भूपाल! मैंने इस प्रकार आपसे मुनियोंद्वारा कही गयी इस श्राद्धकर्मकी विधिका वर्णन कर दिया। यह पापनाशिनी, पुण्यको बढ़ानेवाली एवं संसारमें प्रमुखता प्रदान करनेवाली है। जो श्राद्धके समय पितरोंको यह पितृगाथा सुनाता है उसके पितर दिये गये पदार्थोंको अक्षयरूपमें प्राप्त करते हैं॥१२-१९॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पितृगाथाकीर्तनं नाम चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृगाथानुकीर्तन नामक दो सौ चारवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०४॥
Summary of chapter 206 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya delivers a profound discourse on Pūrta-dharma, the sacred spiritual practice of constructing public utility works, excavating water reservoirs, ponds, wells, and irrigation canals for the welfare of all living beings. Bhagavān Matsya emphasizes that while internal meditation purifies the mind, selfless public works establish lasting merit that sustains a soul across multiple lifetimes. The text details the precise Vedic consecration rituals for new water bodies, including Varuna oblations and releasing aquatic life into the sanctified waters, declaring that providing clean water to humans, animals, and birds satisfies all celestial Deities and grants imperishable heavenly abodes.