मत्स्य महा पुराण
षोडश दानान्तर्गत तुलादानका वर्णन
ऋषय ऊचुः
न्यायेनार्जनमर्थानां वर्धनं चाभिरक्षणम्।
सत्पात्रप्रतिपत्तिश्च सर्वशास्त्रेषु पठ्यते॥ १
कृतकृत्यो भवेत् केन मनस्वी धनवान् बुधः।
महादानेन दत्तेन तन्नो विस्तरतो वद॥ २
सूत उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानानुकीर्तनम्।
दानधर्मेऽपि यन्नोक्तं विष्णुना प्रभविष्णुना॥ ३
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।
सर्वपापक्षयकरं नृणां दुःस्वप्ननाशनम्॥ ४
यत्तत्षोडशधा प्रोक्तं वासुदेवेन भूतले।
पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वपापहरं शुभम्॥ ५
पूजितं देवताभिश्च ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः।
आद्यं तु सर्वदानानां तुलापुरुषसंज्ञकम्॥ ६
हिरण्यगर्भदानं च ब्रह्माण्डं तदनन्तरम्।
कल्पपादपदानं च गोसहस्रं च पञ्चमम्॥ ७
हिरण्यकामधेनुश्च हिरण्याश्वस्तथैव च।
हिरण्याश्वरथस्तद्वद्धेमहस्तिरथस्तथा॥८
पञ्चलाङ्गलकं तद्वद् धरादानं तथैव च।
द्वादशं विश्वचक्रं तु ततः कल्पलतात्मकम्॥ ९
सप्तसागरदानं च रत्नधेनुस्तथैव च।
महाभूतघटस्तद्वत् षोडशं परिकीर्तितम्॥१०
सर्वाण्येतानि कृतवान् पुरा शम्बरसूदनः।
वासुदेवस्तु भगवानम्बरीषोऽथ भार्गवः॥११
कार्तवीर्यार्जुनो नाम प्रह्लादः पृथुरेव च।
कुर्युरन्ये महीपालाः केचिच्च भरतादयः॥१२
यस्माद् विघ्नसहस्त्रेण महादानानि सर्वदा।
रक्षन्ते देवताः सर्वा एकैकमपि भूतले॥१३
ऋषियोंने पूछा-सूतजी! सभी शास्त्रोंमें न्यायपूर्वक धनार्जन, उसकी वृद्धि और रक्षा करना तथा उसे सत्पात्रको दान करना आदि बातें पढ़ी जाती हैं, किंतु मनस्वी बुद्धिमान् धनी पुरुष किस महादानके करनेसे कृतार्थ हो सकता है, आप मुझे इसे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १-२॥
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! अब इसके बाद मैं आपलोगोंको महादानकी विधि बतला रहा हूँ। जिसे महातेजस्वी विष्णुने भी (विष्णुधर्मोत्तरपुराणके) दान-धर्म-प्रकरणमें नहीं बतलाया है, उस सर्वश्रेष्ठ महादानका वर्णन मैं कर रहा हूँ। वह मनुष्योंके सभी पापोंको नष्ट करनेवाला तथा दु:स्वप्नोंका विनाशक है। उस दानको पृथ्वीतलपर भगवान् वासुदेवने सोलह प्रकारका बतलाया है। वे सभी पुण्यप्रद, पवित्र, दीर्घ आयु प्रदान करनेवाले, सभी पापोंके विनाशक, मङ्गलकारी तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवताओंद्वारा पूजित हैं। उन सभी दानोंमें सबसे प्रथम तुलापुरुषका दान है। तत्पश्चात् (दूसरा) हिरण्यगर्भदान, (तीसरा) ब्रह्माण्डदान, (चौथा) कल्पवृक्षदान, पाँचवाँ एक हजार गो-दान, फिर सुवर्ण-निर्मित कामधेनुका दान, स्वर्णमय अश्वका दान, हिरण्याश्वरथ-दान, हेम-हस्ति- रथ-दान, पञ्चलाङ्गलक-दान, धरादान, (बारहवाँ) विश्वचक्र-दान, कल्पलता-दान, सप्तसागर-दान, रत्नधेनु-दान तथा (सोलहवाँ) महाभूतघट-दान-ये सोलह दान कहे गये हैं ॥३-१०॥
प्राचीनकालमें इन सभी दानोंको शम्बरासुरके शत्रु भगवान् वासुदेवने किया था। उसके बाद अम्बरीष, भार्गव (परशुराम), कार्तवीर्यार्जुन, प्रह्लाद, पृथु तथा भरत आदि अन्यान्य राजाओंने किया था। चूँकि इस पृथ्वीतलपर इन सब दानोंमें एक-एक दानकी सर्वदा सभी देवता हजारों विघ्नोंसे रक्षा करते हैं; इनमेंसे भूतलपर यदि
एषामन्यतमं कुर्याद् वासुदेवप्रसादतः।
न शक्यमन्यथा कर्तुमपि शक्रेण भूतले॥१४
तस्मादाराध्य गोविन्दमुमापतिविनायकौ।
महादानमखं कुर्याद् विप्रैश्चैवानुमोदितः॥१५
एतदेवाह मनवे परिपृष्टो जनार्दनः।
यथावदनुवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः॥१६
मनुरुवाच
महादानानि यानीह पवित्राणि शुभानि च ।
रहस्यानि प्रदेयानि तानि मे कथयाच्युत॥१७
मत्स्य उवाच
यानि नोक्तानि गुह्यानि महादानानि षोडश।
तानि ते कथयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः॥१८
तुलापुरुषयोगोऽयं येषामादौ विधीयते।
अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये॥१९
युगादिषूपरागेषु तथा मन्वन्तरादिषु।
संक्रान्तौ वैधृतिदिने चतुर्दश्यष्टमीषु च॥२०
सितपञ्चदशीपर्वद्वादशीष्वष्टकासु
यज्ञोत्सवविवाहेषु दुःस्वप्नाद्भुतदर्शने॥२१
द्रव्यब्राह्मणलाभे वा श्रद्धा वा यत्र जायते।
तीर्थे वायतने गोष्ठे कूपारामसरित्सु वा॥ २२
गृहे वाथ वने वापि तडागे रुचिरे तथा।
महादानानि देयानि संसारभयभीरुणा॥२३
अनित्यं जीवितं यस्माद् वसु चातीव चञ्चलम्।
केशेष्वेव गृहीतः सन्मृत्युना धर्ममाचरेत्॥ २४
पुण्यां तिथिमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।
षोडशारत्निमात्रं तु दश द्वादश वा करान्॥२५
मण्डपं कारयेद् विद्वांश्चतुर्भद्राननं बुधः।
सप्तहस्ता भवेद् वेदी मध्ये पञ्चकराश्रया॥२६
एक दान भी वासुदेव भगवान्की कृपासे विघ्नरहित सम्पन्न हो जाय तो उसके सत्फलको देवराज इन्द्र भी अन्यथा करने में समर्थ नहीं हैं, इसलिये मनुष्यको भगवान् वासुदेव, शंकर और विनायककी आराधना कर तथा विप्रोंका अनुमोदन प्राप्तकर यह महादान-यज्ञ करना चाहिये। ऋषिवर्य! इसी विषयको मनुके पूछनेपर भगवान् जनार्दनने उन्हें बताया था, वह मैं आपलोगोंको यथार्थरूपमें बतला रहा हूँ, सुनिये॥११-१६॥
मनुजीने पूछा-अच्युत! इस पृथ्वीतलपर जितने पुनीत मङ्गलदायी, गोपनीय और देनेयोग्य महादान हैं, उन्हें मुझे बतलाइये ॥ १७ ॥
मत्स्यभगवान्ने कहा-राजन् ! जिन सोलह गुह्य महादानोंको आजतक मैंने किसीसे नहीं बतलाया था, उन्हींको यथार्थ रूपमें आनुपूर्वी तुम्हें बतला रहा हूँ। इनमें तुलापुरुषका दान सर्वप्रथम कहा गया है। संसार-भयसे भीत मनुष्यको अयन-परिवर्तनके समय, विषुवयोगमें, पुण्यदिनों, व्यतीपात, दिनक्षय तथा युगादि तिथियोंमें सूर्य-चन्द्रके ग्रहणके अवसरपर, मन्वन्तरके प्रारम्भमें, संक्रान्तिके दिन, वैधृतियोगमें, चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णिमा, पर्वके दिन, द्वादशी तथा अष्टको तिथियों में, यज्ञ-उत्सव अथवा विवाहके अवसरपर, दुःस्वप्नके देखने या किसी अद्भुत उत्पातादिके होनेपर, यथेष्ट द्रव्य या ब्राह्मणके मिल जानेपर, या जब जहाँ श्रद्धा उत्पन्न हो जाय, किसी तीर्थ, मन्दिर या गोशालामें, कूप, बगीचा या नदीके तटपर, अपने घरपर या पवित्र वनमें अथवा पवित्र तालाबके किनारे इन महादानोंको देना चाहिये। चूँकि यह जीवन अस्थिर है, सम्पत्ति अत्यन्त चञ्चल है, मृत्यु सर्वदा केश पकड़े खड़ी है, इसलिये धर्माचरण करना चाहिये। किसी पुण्यतिथिके आनेपर विद्वान् पुरुष ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर सोलह हाथोंका या दस अथवा बारह हाथोंको चौकोर मण्डप निर्मित करवाये, जिसमें चार सुन्दर प्रवेशद्वार बनवाये जायें। उसके भीतर सात हाथकी वेदी बनाकर मध्यमें पाँच हाथकी एक दूसरी
१. हेमन्त-शिशिर ऋतुओंके कृष्णपक्षकी चारों अष्टमी तिथियाँ अष्टका कही गयी हैं।
२. ये । मण्डप दस, बारह या सोलह हाथोंके वर्गाकार होंगे। ये जितने लम्बे होंगे, उतनी ही इनकी चौड़ाई होगी।
तन्मध्ये तोरणं कुर्यात् सारदारुमयं बुधः।
कुर्यात् कुण्डानि चत्वारि चतुर्दिक्षु विचक्षणः ॥ २७
समेखलायोनियुतानि कुर्यात्
सम्पूर्णकुम्भानि महासनानि।
सुताम्रपात्रद्वयसंयुतानि
सुयज्ञपात्राणि सुविष्टराणि ॥२८
हस्तप्रमाणानि तिलाज्यधूप-
पुष्पोपहाराणि सुशोभनानि।
पूर्वोत्तरे हस्तमिताथ वेदी
ग्रहादिदेवेश्वरपूजनाय ॥२९
अत्रार्चनं ब्रह्मशिवाच्युतानां
तत्रैव कार्यं फलमाल्यवस्त्रैः।
लोकेशवर्णाः परितः पताका
मध्ये ध्वजः किङ्किणिकायुतः स्यात्॥३०
द्वारेषु कार्याणि तोरणानि
चत्वार्यपि क्षीरवनस्पतीनाम्।
द्वारेषु कुम्भद्वयमत्र कार्य
स्नग्गन्धधूपाम्बररत्नयुक्तम् ॥३१
शालेङ्गुदीचन्दनदेवदारु-
श्रीपर्णिबिल्वप्रियकाञ्चनोत्थम् ।
स्तम्भद्वयं हस्तयुगावखातं
कृत्वा दृढं पञ्चकरोच्छ्रितं च॥३२
तदन्तरं हस्तचतुष्टयं स्या-
दथोत्तराङ्गं तदीयमेव।
समानजातिश्च तुलावलम्ब्या
हैमेन मध्ये पुरुषेण युक्ता ॥ ३३
दैर्येण सा हस्तचतुष्टयं स्यात्
पृथुत्वमस्यास्तु दशाङ्गुलानि।
सुवर्णपट्टाभरणा कार्या
सलोहपाशद्वयशृङ्खलाभिः ॥३४
युता सुवर्णेन तु रत्नमाला
विभूषिता माल्यविलेपनाभ्याम् ।
चक्रं लिखेद् वारिजगर्भयुक्तं
नानारजोभिर्भुवि पुष्पकीर्णम्॥३५
वितानकं चोपरि पञ्चवर्ण
संस्थापयेत् पुष्पफलोपशोभम्।
वेदी बनाये। उसके मध्यभागमें बुद्धिमान् पुरुष साल काष्ठकी बनी हुई तोरण लगवाये। विचक्षण पुरुष चारों दिशाओंमें चार कुण्डोंकी रचना करे ॥ १८-२७॥
उन कुण्डोंको मेखला और योनिसे युक्त बनाना चाहिये। उनके समीप जलसे भरे हुए कलश, बड़े-बड़े आसन, सुन्दर ताँबेके बने हुए दो पात्र, यज्ञके सुन्दर पात्र तथा सुन्दर विष्टर रखना चाहिये। कुण्ड एक हाथ लंबा-चौड़ा हो तथा तिल, घृत, धूप, पुष्प और अन्य उपहारोंसे सुशोभित हो। तदनन्तर पूर्व तथा उत्तर दिशाके कोणमें ग्रहादि तथा देवेश्वरोंके पूजनके लिये एक हाथ विस्तृत वेदी बनायी जाय। वहीं फलों, मालाओं तथा वस्त्रोंद्वारा ब्रह्मा, शिव और विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। चारों ओर लोकपालोंके वर्णों के अनुरूप पताकाएँ तथा मध्य भागमें घंटियोंसे युक्त ध्वज होना चाहिये। चारों द्वारोंपर भी दूधवाले वृक्षोंके बने हुए तोरण सुशोभित हों। प्रधान द्वारपर माला, गन्ध, धूप, वस्त्र एवं रत्नोंसे सुशोभित दो कलश रखे जायँ। तदनन्तर साल, इंगुदी, चन्दन, देवदारु, श्रीपर्णी (गम्भारी), बिल्व, बीजौरा अथवा चम्पक वृक्षके काष्ठके बने हुए दो स्तम्भोंको, जो पाँच हाथ ऊँचे हों, दो हाथ गहरा गड्डा खोदकर उसमें सुदृढ़ कर दे। उन दोनों स्तम्भोंके बीच चार हाथका अन्तर रहे। फिर उन दोनोंसे मिला उत्तराङ्ग-खम्भेके ऊपरके दो सजातीय काष्ठ लगावे, उसीसे सजातीय काष्ठकी बनी सुवर्णनिर्मित पुरुषसे युक्त तुला मध्यभागमें लटकावे। वह तुला चार हाथ लंबी हो तथा उसकी मोटाई दस अंगुल होनी चाहिये, उसमें लोहेकी बनी हुई जंजीरोंको जोड़े तथा उसे सुवर्णजटित वस्त्र, सुवर्णखचित रत्नमाला तथा विविध प्रकारके पुष्प एवं चन्दनादिसे अलंकृत करना चाहिये। फिर पृथ्वीपर विविध रंगके रजोंसे कमलके मध्यके आकारका चक्र बनावे और उसपर पुष्प बिखेर दे। उसके ऊपर पुष्प और फलोंसे सुशोभित पंचरंगा वितान तनवाये ॥ २८-३५॥
अथविजो वेदविदश्च कार्याः
सुरूपवेशान्वयशीलयुक्ताः॥३६
विधानदक्षाः पटवोऽनुकूला
ये चार्यदेशप्रभवा द्विजेन्द्राः।
गुरुश्च वेदान्तविदार्यवंश-
समुद्भवः शीलकुलाभिरूपः॥३७
पुराणशास्त्राभिरतोऽतिदक्षः
प्रसन्नगम्भीरसरस्वतीकः
सिताम्बरः कुण्डलहेमसूत्र-
केयूरकण्ठाभरणाभिरामः ॥३८
पूर्वेण ऋग्वेदविदौ भवेतां
यजुर्विदौ दक्षिणतश्च शस्तौ।
स्थाप्यौ द्विजौ सामविदौ तु पश्चा-
दाथर्वणावुत्तरतस्तु कायौं॥३९
विनायकादिग्रहलोकपाल-
वस्वष्टकादित्यमरुद्गणानाम् ।
ब्रह्माच्युतेशार्कवनस्पतीनां
स्वमन्त्रतो होमचतुष्टयं स्यात्॥४०
जप्यानि सूक्तानि तथैव चैषा-
मनुक्रमेणापि यथास्वरूपम्।
होमावसाने कृततूर्यनादो
गुरुर्गृहीत्वा बलिपुष्पधूपम्।
आवाहयेल्लोकपतीन् क्रमेण
मन्त्रैरमीभिर्यजमानयुक्तः ॥४१
एह्येहि सर्वामरसिद्धसाध्यै-
रभिष्टुतो वज्रधरोऽमरेशः।
संवीज्यमानोऽप्सरसां गणेन
रक्षाध्वरं नो भगवन् नमस्ते॥४२
ॐ इन्द्राय नमः।
एह्येहि सर्वामरहव्यवाह
मुनिप्रवीरैरभितोऽभिजुष्टः
तेजस्विना लोकगणेन सार्धं
ममाध्वरं रक्ष कवे नमस्ते॥४३
तदनन्तर वेदवेत्ता, सुन्दर रूप, वेश, वंश और शीलसे युक्त, विधिके ज्ञाता, पटु, अपने अनुकूल, आर्यदेशोत्पन्न द्विजवरोंको ऋत्विजके पदपर नियुक्त करे। गुरु (आचार्य), वेदान्तवेत्ता, आर्यवंशमें समुत्पन्न, शीलवान्, कुलीन, सुन्दर, पुराणों एवं शास्त्रोंमें निरत रहनेवाला, अत्यन्त पटु, सरल एवं गम्भीर वाणी बोलनेवाला, श्वेत वस्त्रधारी, कुण्डल, जंजीर, केयूर तथा कण्ठाभरणसे सुशोभित हो। मण्डपमें पूर्व दिशामें दो ऋग्वेदी ऋत्विजोंको, दक्षिण दिशामें दो यजुर्वेदी अध्वर्यु ब्राह्मणोंको, पश्चिम दिशामें दो सामवेदी उद्गाता ब्राह्मणोंको तथा उत्तर दिशामें दो अथर्ववेदी विद्वानोंको नियुक्त करना चाहिये। विनायक आदि ग्रह, लोकपाल, आठों वसुगण, आदित्यगण, मरुद्गण, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य एवं वनस्पतियोंके लिये उनके मन्त्रोंद्वारा चार-चार आहुतियाँ देनी चाहिये तथा इनके सूक्तोंका क्रमानुरूप शुद्ध-शुद्ध जप करवाना चाहिये। हवनकी समाप्तिके बाद यजमानसहित आचार्य तुरहीका शब्द करते हुए बलि, पुष्प और धूप लेकर क्रमश: सभी लोकपालोंका उनके मन्त्रोंद्वारा इस प्रकार आवाहन करे। भगवन्! आप देवताओंके स्वामी और वन धारण करनेवाले हैं, सभी अमर, सिद्ध और साध्य आपकी स्तुति करते हैं तथा अप्सराओंके समूह आपपर पंखा झलते हैं, आपको नमस्कार है। आप यहाँ आइये, अवश्य आइये, हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये।'ॐ इन्द्रको नमस्कार है'-ऐसा कहकर इन्द्रका आवाहन करना चाहिये। अग्निदेव! आप सभी देवताओंके हव्यवाहक हैं, मुनिवरगण सब ओरसे आपकी सेवा करते हैं, आप अपने तेजस्वी लोकगणोंके साथ वहाँ आयें, अवश्य आयें और मेरे यज्ञकी रक्षा करें, आपको प्रणाम है।
ॐ अग्नये नमः।
एह्येहि वैवस्वत धर्मराज
सर्वामरैरर्चित दिव्यमूर्ते।
शुभाशुभानन्दशुचामधीश
शिवाय नः पाहि मखं नमस्ते॥४४
ॐ यमाय नमः।
एह्येहि रक्षोगणनायकस्त्वं
सर्वैस्तु वेतालपिशाचसंघैः।
ममाध्वरं पाहि शुभादिनाथ
लोकेश्वरस्त्वं भगवन् नमस्ते॥ ४५
ॐ नितये नमः।
एह्येहि यादोगणवारिधीनां
गणेन पर्जन्यमहाप्सरोभिः।
विद्याधरेन्द्रामरगीयमान
पाहि त्वमस्मान् भगवन् नमस्ते॥४६
ॐ वरुणाय नमः।
एह्येहि यज्ञे मम रक्षणाय
मृगाधिरूढः सह सिद्धसंधैः।
प्राणाधिपः कालकवेः सहायो
गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥४७
ॐ वायवे नमः।
एह्येहि यज्ञेश्वर यज्ञरक्षा
विधत्स्व नक्षत्रगणेन सार्धम्।
सौषधीभिः पितृभिः सहैव
गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥ ४८
ॐ सोमाय नमः।
एोहि विश्वेश्वर नस्त्रिशूल-
कपालखष्ट्वाङ्गधरेण सार्धम्।
लोकेश यज्ञेश्वर यज्ञसिद्ध्यै
गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥४९
ॐ ईशानाय नमः।
एह्येहि पातालधराधरेन्द्र
नागाङ्गनाकिन्नरगीयमान
यक्षोरगेन्द्रामरलोकसार्ध-
मनन्त रक्षाध्वरमस्मदीयम् ॥५०
'ॐ अग्निको नमस्कार है।'-ऐसा कहकर अग्निका आवाहन करना चाहिये। सूर्यपुत्र धर्मराज! आप सभी देवताओंद्वारा पूजित, दिव्य शरीरधारी और शुभ एवं अशुभ तथा आनन्द एवं शोकके अधीश्वर हैं, हमारे कल्याणके लिये हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको अभिवादन है। 'ॐ यमराजको नमस्कार है।'-ऐसा कहकर यमका आवाहन करना चाहिये ॥३६-४४॥
भगवन्! आप लोकोंके अधीश्वर तथा राक्षससमूहके नायक हैं। शुभादिनाथ! आप वेतालों और पिशाचोंके विशाल समूहके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको प्रणाम है। ॐ निर्ऋतिको नमस्कार है, ऐसा कहकर निर्ऋतिका आवाहन करना चाहिये। भगवन्! विद्याधर और इन्द्र आदि देवता आपका गुण-गान करते हैं, आप समस्त जलचरों, समुद्रों, बादलों और अप्सराओंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और हमारी रक्षा कीजिये। आपको अभिवादन है। 'ॐ वरुणको नमस्कार है।' ऐसा कहकर वरुणका आवाहन करना चाहिये। भगवन्! आप कालाग्निके सहायक और प्राणोंके अधीश्वर हैं, आप मृग (हिरन)-पर आरूढ़ हो सिद्ध-समूहोंके साथ मेरी रक्षा करनेके लिये यज्ञमें पधारिये, अवश्य पधारिये और मेरी पूजा स्वीकार कीजिये। आपको नमस्कार है। 'ॐ वायुको नमस्कार है।'-ऐसा कहकर वायुका आवाहन करना चाहिये। यज्ञेश्वर! आप नक्षत्रगणों, सभी ओषधियों तथा पितरोंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। भगवन्! आप मेरी पूजा स्वीकार कीजिये, आपको प्रणाम है। 'ॐ सोमको नमस्कार है'-ऐसा कहकर सोमका आवाहन करना चाहिये। यज्ञोंके स्वामी विश्वेश्वर! आप त्रिशूल, कपाल, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले अपने गणोंके साथ हमारे यज्ञमें सिद्धि प्रदान करनेके लिये उपस्थित होइये, अवश्य आइये और लोकेश! मेरी पूजा ग्रहण कीजिये। भगवन्! आपको अभिवादन है। ॐ ईशानको नमस्कार है।'-ऐसा कहकर ईशानका आवाहन करना चाहिये। अनन्त! आप पाताल एवं पृथ्वीको धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं तथा नागाङ्गनाएँ और किंनर आपका गुण-गान करते हैं, आप यक्षों, नागेन्द्रों और देवगणोंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये
ॐ अनन्ताय नमः।
एह्येहि विश्वाधिपते मुनीन्द्र
लोकेन सार्धं पितृदेवताभिः ।
सर्वस्य धातास्यमितप्रभाव
विशाध्वरं नो भगवन् नमस्ते॥५१
ॐ ब्रह्मणे नमः।
त्रैलोक्ये यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च।
ब्रह्मविष्णुशिवैः सार्धं रक्षां कुर्वन्तु तानि मे॥५२
देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः।
ऋषयो मदनो गावो देवमातर एव च॥५३
सर्वे ममाध्वरे रक्षां प्रकुर्वन्तु मुदान्विताः।
इत्यावाह्य सुरान् दद्याद् ऋत्विग्भ्यो हेमभूषणम्॥५४
कुण्डलानि च हैमानि सूत्राणि कटकानि च।
अङ्गुलीयपवित्राणि वासांसि शयनानि च॥५५
द्विगुणं गुरवे दद्याद् भूषणाच्छादनानि च ।
जपेयुः शान्तिकाध्यायं जापकाः सर्वतोदिशम्॥५६
तत्रोषितास्तु ते सर्वे कृत्वैवमधिवासनम्।
आदावन्ते च मध्ये च कुर्याद् ब्राह्मणवाचनम्॥५७
ततो मङ्गलशब्देन स्नापितो वेदपुङ्गवैः।
त्रिःप्रदक्षिणमावृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥५८
शुक्लमाल्याम्बरो भूत्वा तां तुलामभिमन्त्रयेत्।
नमस्ते सर्वदेवानां शक्तिस्त्वं सत्यमास्थिता॥५९
साक्षिभूता जगद्धात्री निर्मिता विश्वयोनिना।
एकतः सर्वसत्यानि तथानृतशतानि च॥६०
धर्माधर्मकृतां मध्ये स्थापितासि जगद्धिते।
त्वं तुले सर्वभूतानां प्रमाणमिह कीर्तिता॥६१
मां तोलयन्ती संसारादुद्धरस्व नमोऽस्तु ते।
योऽसौ तत्त्वाधिपो देवः पुरुषः पञ्चविंशकः ॥ ६२
स एकोऽधिष्ठितो देवि त्वयि तस्मान्नमो नमः ।
नमो नमस्ते गोविन्द तुलापुरुषसंज्ञक॥६३
त्वं हरे तारयस्वास्मानस्मात् संसारकर्दमात्।
पुण्यकालं समासाद्य कृत्वैवमधिवासनम्॥६४
और हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। 'ॐ अनन्तको नमस्कार है'-ऐसा कहकर अनन्तका आवाहन करना चाहिये। विश्वाधिपति! आप समस्त जगत्के विधाता हैं। मुनीन्द्र! आप पितर, देवता एवं लोकपालोंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये। अमित प्रभावशाली! आप हमारे यज्ञमें प्रविष्ट होइये। भगवन्! आपको प्रणाम है। 'ॐ ब्रह्माको नमस्कार है'-ऐसा कहकर ब्रह्माका आवाहन करना चाहिये। त्रिलोकीमें जितने स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सभी ब्रह्मा, विष्णु और शिवके साथ मेरी रक्षा करें। देवता, दानव, गन्धर्व, यज्ञ, राक्षस, सर्प, ऋषिगण, कामदेव, गौएँ, देव-माताएँ-ये सभी हर्षपूर्वक मेरे यज्ञकी रक्षा करें॥ ४५-५३॥
इस प्रकार देवताओंका आवाहन कर ऋत्विजोंको सुवर्णका आभूषण, कुण्डल, जंजीर, कङ्कण, पवित्र अंगूठी, वस्त्र तथा शय्याका दान करना चाहिये। ये भूषण और वस्त्र गुरुके लिये दूना देना चाहिये। उस समय सभी दिशाओंमें जापक शान्तिकाध्यायका जप करते रहें। उन सभी ब्राह्मणोंको वहाँ उपस्थित रहना चाहिये और इस प्रकार अधिवासन कर प्रत्येक कार्यके प्रारम्भ, मध्य तथा अन्तमें स्वस्तिवाचन करना चाहिये। तत्पश्चात् माङ्गलिक शब्दोंका उच्चारण करते हुए वेदज्ञोंद्वारा अभिषिक्त यजमान श्वेत वस्त्र धारणकर अञ्जलिमें पुष्प ले उस तुलाकी तीन बार प्रदक्षिणा कर उसे इस प्रकार अभिमन्त्रित करे। तुले! तुम सभी देवताओंकी शक्तिस्वरूपा हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम सत्यकी आश्रयभूता, साक्षिस्वरूपा, जगत्को धारण करनेवाली और विश्वयोनि ब्रह्माद्वारा निर्मित की गयी हो, जगत्की कल्याणकारिणी! तुम्हारी एक तुलापर सभी सत्य हैं, दूसरीपर सौ असत्य हैं। धर्मात्मा और पापियोंके बीच तुम्हारी स्थापना हुई है। तुम भूतलपर सभी जीवोंके लिये प्रमाणरूप बतलायी गयी हो। मुझे तोलती हुई तुम इस संसारसे मेरा उद्धार कर दो, तुम्हें नमस्कार है। देवि! जो ये तत्त्वोंके अधीश्वर पचीसवें पुरुष भगवान् हैं, वे एकमात्र तुम्हींमें अधिष्ठित हैं, इसलिये तुम्हें बारंबार प्रणाम है। तुला- पुरुष नामधारी गोविन्द! आपको बारंबार अभिवादन है। हरे! आप इस संसाररूपी पङ्कसे हमारा उद्धार कीजिये। इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुष पुण्यकालमें अधिवासन
पुनः प्रदक्षिणं कृत्वा तुलामारोहयेद् बुधः।
सखड्गचर्मकवचः सर्वाभरणभूषितः॥६५
धर्मराजमथादाय हैमं सूर्येण संयुतम्।
कराभ्यां बद्धमुष्टिभ्यामास्ते पश्यन् हरेर्मुखम्॥६६
ततोऽपरे तुलाभागे न्यसेयुर्द्विजपुङ्गवाः ।
समादभ्यधिकं यावत् काञ्चनं चातिनिर्मलम्॥६७
पुष्टिकामस्तु कुर्वीत भूमिसंस्थं नरेश्वरः।
क्षणमात्रं ततः स्थित्वा पुनरेवमुदीरयेत्॥ ६८
नमस्ते सर्वभूतानां साक्षिभूते सनातनि।
पितामहेन देवि त्वं निर्मिता परमेष्ठिना॥६९
त्वया धृतं जगत् सर्वं सहस्थावरजङ्गमम्।
सर्वभूतात्मभूतस्थे नमस्ते विश्वधारिणि॥७०
ततोऽवतीर्य गुरवे पूर्वमधू निवेदयेत्।
ऋत्विग्भ्योऽपरमर्द्ध च दद्यादुदकपूर्वकम्॥७१
गुरवे ग्रामरत्नानि ऋत्विग्भ्यश्च निवेदयेत्।
प्राप्य तेषामनुज्ञां तु तथान्येभ्योऽपि दापयेत्॥७२
दीनानाथविशिष्टादीन् पूजयेद् ब्राह्मणैः सह।
न चिरं धारयेद् गेहे सुवर्णं प्रोक्षितं बुधः ॥७३
तिष्ठेद् भयावहं यस्माच्छोकव्याधिकरं नृणाम्।
शीघ्रं परस्वीकरणाच्छ्रेयः प्राप्नोति मानवः॥७४
अनेन विधिना यस्तु तुलापुरुषमाचरेत्।
प्रतिलोकाधिपस्थाने प्रतिमन्वन्तरं वसेत्॥७५
विमानेनार्कवर्णेन किङ्किणीजालमालिना।
पूज्यमानोऽप्सरोभिश्च ततो विष्णुपुरं व्रजेत्।
कल्पकोटिशतं यावत् तस्मिल्लोके महीयते॥७६
कर्मक्षयादिह पुनर्भुवि राजराजो
भूपालमौलिमणिरञ्जितपादपीठः।
श्रद्धान्वितो भवति यज्ञसहस्रयाजी
दीप्तप्रतापजितसर्वमहीपलोकः॥७७
कर पुनः प्रदक्षिणा कर तुलापर आरोहण करे। उस समय वह खड्ग, ढाल, कवच एवं सभी आभरणोंसे अलंकृत रहे । वह सुवर्णनिर्मित सूर्यसहित धर्मराजको बँधी हुई मुट्ठीवाले दोनों हाथोंसे पकड़कर विष्णुके मुखकी ओर ताकता हुआ स्थित रहे ॥ ५४-६६ ॥
तदनन्तर ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे तुलाकी दूसरी ओर यजमानकी तोलसे कुछ अधिक अत्यन्त निर्मल स्वर्ण रखें। पुष्टिकामी श्रेष्ठ मनुष्य जबतक स्वर्णकी तुला भूमिपर स्पर्श न कर ले, तबतक स्वर्ण रखे। फिर क्षणमात्र चुप रहकर इस प्रकार निवेदन करे-'सभी जीवोंकी साक्षीभूता सनातनी देवि! तुम पितामह ब्रह्माद्वारा निर्मित हुई हो, तुम्हें नमस्कार है। तुले! तुम समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत्को धारण करनेवाली हो, सभी जीवोंको आत्मभूत करनेवाली विश्वधारिणि! तुम्हें नमस्कार है।' तत्पश्चात् तुलासे उतरकर स्वर्णका आधा भाग पहले गुरुको देना चाहिये एवं बचे हुए आधे भागको हाथमें जल लेकर संकल्पपूर्वक ऋत्विजोंको दे देना चाहिये। फिर गुरुको तथा ऋत्विजोंको इसके अतिरिक्त ग्राम और रत्न भी प्रदान करना चाहिये। पुनः उनकी आज्ञा लेकर अन्य ब्राह्मणोंको भी दान करना चाहिये। विशेषतया दीनों एवं अनाथोंको भी ब्राह्मणोंके साथ दान देना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष उस तोले गये स्वर्णको अधिक देरतक अपने घरमें न रखे; क्योंकि यदि वह घरमें रह जाता है तो मनुष्योंको भय देनेवाला, शोक और व्याधिको बढ़ानेवाला होता है, उसे शीघ्र ही दूसरेको दे देनेसे मनुष्य श्रेयका भागी हो जाता है। इस प्रकारकी विधिसे जो मनुष्य तुलापुरुषका दान देता है, वह प्रत्येक मन्वन्तरमें प्रत्येक लोकके स्वामित्व पदपर निवास करता है। वह किङ्किणीसमूहोंसे युक्त एवं सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर अप्सराओंसे सुपूजित हो विष्णुपुरको जाता है और उस लोकमें सौ कोटि कल्पोंतक पूजित होता है। फिर पुण्यकर्मके क्षय होनेपर वह भूतलपर राजराजेश्वर होता है। अनेक राजाओंके मुकुटकी मणियोंसे उसका पदपीठ शोभायमान होता है, वह श्रद्धासहित सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करता है और प्रचण्ड प्रतापसे समस्त राजाओंको पराजित करता है।
यो दीयमानमपि पश्यति भक्तियुक्तः
कालान्तरे स्मरतिवाचयतीह लोके ।
यो वा शृणोति पठतीन्द्रसमानरूपः
प्राप्नोति धाम स पुरन्दरदेवजुष्टम्॥७८
जो मनुष्य इस तुलापुरुषके दानको दिये जाते हुए देखता है, दूसरे अवसरपर उसका स्मरण करता है, लोकमें पढ़कर उसकी विधिको सुनाता है अथवा जो इसकी विधिको सुनता या पढ़ता है, वह भी इन्द्रके समान स्वरूप धारणकर पुरंदर प्रभृति देवगणोंद्वारा सेवित स्वर्गलोकको प्राप्त करता है॥६७-७८॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने तुलापुरुषदानं नाम चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-अनुकीर्तन-प्रसङ्गमें तुलापुरुष-दान नामक दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७४ ।।
Summary of chapter 277 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya presents the regulations for Hiraṇyakalpa-dāna, the third Mahādāna involving the donation of a magnificent golden representation of the cosmic tree or golden lotus resting upon a copper platform. Bhagavān Matsya details crafting the golden tree complete with golden branches, gemstone fruits, silk draperies, and golden bird icons perched on limbs. The donor worships the golden tree as the embodiment of universal life force and Bhagavān Vishṇu, presenting it to elevated spiritual masters, securing immense prosperity, agricultural abundance, and ultimate spiritual liberation.