मत्स्य महा पुराण
हिमालयकी अद्भुत छटाका वर्णन
सूत उवाच
आलोकयन् नदी पुण्यां तत्समीरहृतश्रमः ।
स गच्छन्नेव ददृशे हिमवन्तं महागिरिम्॥ १
खमुल्लिखद्भिर्बहुभिर्वृतं शृङ्गैस्तु पाण्डुरैः ।
पक्षिणामपि सञ्चारैर्विना सिद्धगतिं शुभाम्॥ २
नदीप्रवाहसञ्जातमहाशब्दैः समन्ततः।
असंश्रुतान्यशब्दं तं शीततोयं मनोरमम्॥ ३
देवदारुवने नीलैः कृताधोवसनं शुभम्।
मेघोत्तरीयकं शैलं ददृशे स नराधिपः॥ ४
श्वेतमेघकृतोष्णीषं चन्द्रार्कमुकुटं वचित्।
हिमानुलिप्तसर्वाङ्ग क्वचिद् धातुविमिश्रितम्॥ ५
चन्दनेनानुलिप्ताङ्गं दत्तपञ्चाङ्गुलं यथा।
शीतप्रदं निदाघेऽपि शिलाविकटसङ्कटम्।
सालक्तकैरप्सरसां मुद्रितं चरणैः क्वचित्॥ ६
क्वचित् संस्पृष्टसूर्यांशुं क्वचिच्च तमसावृतम्।
दरीमुखैः क्वचिद् भीमैः पिबन्तं सलिलं महत्॥ ७
क्वचिद् विद्याधरगणैः क्रीडद्भिपशोभितम्।
उपगीतं तथा मुख्यैः किन्नराणां गणैः कचित्॥ ८
आपानभूमौ गलितैर्गन्धर्वाप्सरसां क्वचित्।
पुष्पैः संतानकादीनां दिव्यैस्तमुपशोभितम्॥ ९
सुप्तोत्थिताभिः शय्याभिः कुसुमानां तथा क्वचित्।
मृदिताभिः समाकीर्णं गन्धर्वाणां मनोरमम्॥१०
निरुद्धपवनैर्देशैर्नीलशाद्वलमण्डितैः
क्वचिच्च कुसुमैर्युक्तमत्यन्तरुचिरं शुभम्॥११
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! ऐरावती नदीके जलका स्पर्श करके बहती हुई वायुके स्पर्शसे राजा पुरूरवाकी थकावट दूर हो गयी थी। वे उस पुण्यमयी नदीको देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। इतनेमें उन्हें महान् पर्वत हिमवान् दृष्टिगोचर हुआ। वह बहुत-से पीलापन लिये हुए उज्ज्वल वर्णवाले गगनचुम्बी शिखरोंसे युक्त था। वहाँ मङ्गलमयी सिद्ध-गतिके बिना पक्षियोंका भी संचार कठिन था अर्थात् वहाँ केवल सिद्धलोग ही जा सकते थे। वहाँ नदियोंके प्रवाहसे उत्पन्न हुआ महान् घर्घर शब्द चारों ओर गूंज रहा था, जिसके कारण दूसरा कोई शब्द सुनायी ही नहीं पड़ता था। वह शीतल जलसे परिपूर्ण एवं अत्यन्त मनोरम था। उसने देवदारुके नीले वनोंको अधोवस्त्रके स्थानपर और मेघोंको उत्तरीय वस्त्रके रूपमें धारण कर रखा था। ऐसे हिमालय पर्वतको राजा पुरूरवाने देखा। उसने कहीं तो श्वेत बादलोंकी पगड़ी बाँध रखी थी और कहीं सूर्य एवं चन्द्रमा उसके मुकुट-सरीखे दीख रहे थे। उसका सारा अङ्ग तो बर्फसे आच्छादित था, किंतु उसमें कहीं-कहीं गेरू आदि धातुएँ भी मिली हुई थी, जिससे वह ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो श्वेत चन्दनसे लिपटे हुए शरीरपर पाँचों अङ्गुलियोंकी छाप लगा दी गयी हो। वह ग्रीष्म-ऋतुमें भी शीतलता प्रदान कर रहा था तथा बड़ी-बड़ शिलाओंसे युक्त होनेके कारण अगम्य था। कहीं-कहीं अप्सराओंके महावरयुक्त चरणोंसे चिह्नित था, कहीं तो सूर्यकी किरणोंका स्पर्श हो रहा था, किंतु कहीं घोर अन्धकारसे आच्छादित था, कहीं भयानक गुफाओंके मुखोंमें जल गिर रहा था, जो ऐसा लगता था मानो वह अधिक-से-अधिक जल पी रहा हो। कहीं क्रीडा करते हुए यूथ-के-यूथ विद्याधरोंसे सुशोभित था, कहीं किंनरोंके प्रधान गणोंद्वारा गान हो रहा था, कहीं गन्धर्वो एवं अप्सराओंकी आपानभूमि (मधुशाला)-में गिरे हुए कल्पवृक्ष आदि वृक्षोंके दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित था और कहीं गन्धर्वोकी शयन करके उठ जानेके पश्चात् मर्दित हुई शय्याओंके बिखरे हुए पुष्पोंसे आच्छादित होनेके कारण अत्यन्त मनोरम लग रहा था। कहीं ऐसे प्रदेश थे, जहाँ वायुकी पहुँच नहीं थी, किंतु वे हरी घासोंसे सुशोभित थे तथा उनपर फूल बिखरे हुए थे, जिससे वह अत्यन्त रुचिर एवं सुन्दर लग रहा था॥१-११॥
तपस्विशरणं शैलं कामिनामतिदुर्लभम्।
मृगैर्यथानुचरितं दन्तिभिन्नमहाद्रुमम्॥१२
यत्र सिंहनिनादेन त्रस्तानां भैरवं रवम्।
दृश्यते न च संश्रान्तं गजानामाकुलं कुलम्॥१३
तटाश्च तापसैर्यत्र कुञ्जदेशैरलङ्कताः।
रत्नैर्यस्य समुत्पन्नस्त्रैलोक्यं समलङ्कृतम्॥१४
अहीनशरणं नित्यमहीनजनसेवितम्।
अहीनः पश्यति गिरिमहीनं रत्नसम्पदा॥१५
अल्पेन तपसा यत्र सिद्धि प्राप्स्यन्ति तापसाः।
यस्य दर्शनमात्रेण सर्वकल्मषनाशनम्॥१६
महाप्रपातसम्पातप्रपातादिगताम्बुभिः
वायुनीतैः सदा तृप्तिकृतदेशं क्वचित् क्वचित्॥१७
समालब्धजलैः शृङ्गैः क्वचिच्चापि समुच्छ्रितैः।
नित्यार्कतापविषमैरगम्यैर्मनसा युतम्॥१८
देवदारुमहावृक्षवजशाखानिरन्तरैः
वंशस्तम्बवनाकारैः प्रदेशैरुपशोभितम्॥१९
हिमच्छत्रमहाशृङ्ग प्रपातशतनिर्झरम्।
शब्दलभ्याम्बुविषमं हिमसंरुद्धकन्दरम् ।। २०
दृष्ट्वैव तं चारुनितम्बभूमि
महानुभावः स तु मद्रनाथः।
बभ्राम तत्रैव मुदा समेत:
स्थानं तदा किंचिदथाससाद ॥२१
वह पर्वत तपस्वियोंका आश्रयस्थान तथा कामीजनोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ था, उसपर मृग आदि वन्य पशु स्वच्छन्द विचरण करते थे, उसके विशाल वृक्षोंको हाथियोंने भिन्न-भिन्न कर दिया था, जहाँ सिंहकी गर्जनासे भयभीत हुए हाथियोंके दल व्याकुल होकर भयंकर चिग्घाड़ कर रहे थे, जिससे उनमें शान्ति नहीं दीख रही थी, जिसके तटवर्ती प्रदेश निकुञ्जों और तपस्वियोंसे अलंकृत थे, जिससे उत्पन्न हुए रत्नोंसे त्रिलोकी अलंकृत होती है, वासुकि आदि बड़े-बड़े नागोंके आश्रयस्थान, सत्पुरुषोंद्वारा सेवित तथा रत्नसम्पत्तियोंसे परिपूर्ण उस पर्वतको कोई सत्पुरुष ही देख सकता है। जहाँ तपस्वीलोग थोड़े ही तपसे सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, जिसके दर्शनमात्रसे सारा पाप नष्ट हो जाता है, जिसके किन्हीं-किन्हीं स्थलोंपर वायुद्वारा लाये गये बड़े-बड़े झरनोंके गिरनेसे उत्पन्न हुए छोटे-छोटे झरनोंके जलसे पर्वतीय प्रदेश तृप्त होते हैं। कहीं उसके ऊँचे-ऊँचे शिखर जलसे आप्लावित थे तथा कहीं सूर्यके तापसे संतप्त होनेके कारण अगम्य थे। वहाँ केवल मनसे ही जाया जा सकता था; जो कहीं-कहीं देवदारुके विशाल वृक्षोंकी शाखा-प्रशाखाओंसे घनीभूत हुए तथा कहीं बाँसोंकी झुरमुटरूपी वनोंके आकारसे युक्त प्रदेशोंसे सुशोभित था। कहीं छत्तेके समान बड़े-बड़े शिखर बर्फसे आच्छादित थे, कहीं सैकड़ों झरने झर रहे थे, कहीं जलके गिरनेसे उत्पन्न हुए शब्दोंसे ही जलकी प्रतीति होती थी, कहीं गुफाएँ बर्फसे ढकी हुई थीं। इस प्रकार सुन्दर नितम्बरूपी भूमिसे युक्त उस हिमालय पर्वतको देखकर महानुभाव मद्रेश्वर पुरूरवा हर्षपूर्वक वहीं (अपने मनोऽनुकूल स्थानकी खोज करते हुए) घूमने लगे। तब उन्हें एक स्थान प्राप्त हुआ॥१२-२१॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोषे हिमवद्वर्णनं नाम सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः॥११७।।
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोष-वर्णनमें हिमवद्व वर्णन नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ।॥ ११७ ॥
Summary of chapter 117 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya describes the majestic eastern and southern supporting mountain peaks of Meru, known as Mount Mandara and Mount Gandhamādana. Bhagavān Matsya highlights the dense divine forests of Kadamba and Jambū flourishing upon these peaks, along with vast lakes of fragrant nectar and lotus flowers. These celestial mountains serve as the sporting grounds for Devas, Siddhas, Gandharvas, and Apsaras, who constantly sing praises of Bhagavān Vishṇu while enjoying the natural opulences of these elevated realms.