मत्स्य महा पुराण
भगवान् शिवद्वारा पार्वतीके वर्णपर आक्षेप, पार्वतीका वीरकको अन्तःपुरका रक्षक नियुक्त कर पुनः तपश्चर्याके लिये प्रस्थान
शर्व उवाच
शरीरे मम तन्वङ्गि सिते भास्यसितद्युतिः।
भुजङ्गीवासिता शुद्धा संश्लिष्टा चन्दने तरौ॥ १
चन्द्रातपेन सम्पृक्ता रुचिराम्बरया तथा।
रजनीवासिते पक्षे दृष्टिदोषं ददासि मे॥ २
इत्युक्ता गिरिजा तेन मुक्तकण्ठा पिनाकिना।
उवाच कोपरक्ताक्षी भृकुटीकुटिलानना॥ ३
देव्युवाच
स्वकृतेन जनः सर्वो जाड्येन परिभूयते।
अवश्यमर्थी प्राप्नोति खण्डनं शशिमण्डन॥ ४
तपोभिर्दीर्घचरितैर्यच्च प्रार्थितवत्यहम्।
तस्या मे नियतस्त्वेष पवमानः पदे पदे॥ ५
नैवास्मि कुटिला शर्व विषमा नैव धूर्जटे।
सविषस्त्वं गतः ख्यातिं व्यक्तं दोषाकराश्रयः॥ ६
नाहं पूष्णोऽपि दशना नेत्रे चास्मि भगस्य हि।
आदित्यश्च विजानाति भगवान् द्वादशात्मकः॥ ७
मूर्ध्नि शूलं जनयसि स्वैर्दोषैर्मामधिक्षिपन्।
यत्स्वं मामाह कृष्णेति महाकालेति विश्रुतः॥ ८
यास्याम्यहं परित्यक्त्वा चात्मानं तपसा गिरिम्।
जीवन्त्या नास्ति मे कृत्यं धूर्तेन परिभूतया॥ ९
निशम्य तस्या वचनं कोपतीक्ष्णाक्षरं भवः।
उवाचाधिकसम्भ्रान्तिप्रणयोन्मिश्रया गिरा॥१०
शर्व उवाच
अगात्मजासि गिरिजे नाहं निन्दापरस्तव।
त्वद्भक्तिबुद्ध्या कृतवांस्तवाहं नामसंश्रयम्॥११
शिवजीने (विवाहके बाद एक बार पार्वतीसे) कहा-कृशाङ्गी पार्वति! कृष्ण कान्तिसे युक्त तुम मेरे श्वेत शरीरमें लिपटनेपर चन्दन-वृक्षमें लिपटी हुई सीधी काली नागिन-जैसी दीखती हो। तुम कृष्णपक्षमें चाँदनीके पीछे काले आकाश तथा अँधेरी रात्रिकी तरह मेरी दृष्टिको दूषित कर रही हो। भगवान् शंकरद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वती उनके गलेसे अलग हो गयीं। क्रोधके कारण उनके नेत्र लाल हो गये। तब वे मुख और भौंहोंको टेढ़ी करके बोलीं ॥१-३॥
देवीने कहा-चन्द्रभूषण! सभी लोग अपने द्वारा की गयी मूर्खताका दुष्परिणाम भोगते दुष्परिणाम भोगते हैं। स्वार्थी मनुष्य जनसमाजमें अवश्य ही अपमानित होता है। दीर्घकालिक तपस्याद्वारा मैंने जिस मनोरथकी प्रार्थना की थी, उसीके परिणामस्वरूप मुझे यह पग-पगपर तिरस्कार प्राप्त हो रहा है। जटाधारी शंकर! (आपके कथनानुसार) न तो मैं कुटिल हूँ और न विषम ही हूँ, अपितु आप स्वयं स्पष्टरूपसे विषयुक्त अर्थात् विषयी और दोषोंके समूह (अथवा चन्द्रमा)-के आश्रयरूपसे प्रसिद्ध हैं। मैं पूषाके दाँत और भगके नेत्र भी नहीं हूँ। बारह भागोंमें विभक्त भगवान् सूर्य मुझे भलीभाँति जानते हैं। अपने दोषोंद्वारा मुझपर आक्षेप करते हुए आप मेरे सिरमें पीड़ा उत्पन्न कर रहे हैं। आपने मुझे जो 'कृष्णा' नामसे सम्बोधित किया है सो आप भी तो 'महाकाल' नामसे विख्यात हैं। अतः अब मैं जीवनका मोह त्यागकर तपस्या करनेके लिये पर्वतपर जाऊँगी; क्योंकि आप-जैसे धूर्तसे अपमानित होकर जीवित रहनेसे मैं अपना कोई प्रयोजन नहीं समझ रही हूँ। तब पार्वतीके इस प्रकार क्रोधके कारण तीखे अक्षरोंसे युक्त वचनको सुनकर भगवान् शंकर अतिशय प्रेमसे सनी हुई वाणीमें इस प्रकार बोले॥ ४-१०॥
शंकरजीने कहा-गिरिजे! तुम पर्वतकी पुत्री हो, अत: मैं तुम्हारी निन्दा करनेपर उतारू नहीं हूँ। यह तो मैंने तुम्हारे ऊपर भक्तिपूर्ण बुद्धिसे तुम्हारे नामका कारण बतलाया है।
विकल्पः स्वस्थचित्तेऽपि गिरिजे नैव कल्पना।
यद्येवं कुपिता भीरु त्वं तवाहं न वै पुनः॥१२
नर्मवादी भविष्यामि जहि कोपं शुचिस्मिते।
शिरसा प्रणतश्चाहं रचितस्ते मयाञ्जलिः॥१३
स्नेहनावमानेन निन्दितेनैति विक्रियाम्।
तस्मान्न जातु रुष्टस्य नर्मस्पृष्टो जनः किल॥१४
अनेकैश्चाटुभिर्देवी देवेन प्रतिबोधिता।
कोपं तीव्र न तत्याज सती मर्मणि घट्टिता॥१५
अवष्टब्धमथास्फाल्य वासः शङ्करपाणिना।
विपर्यस्तालका वेगद्यातुमैच्छत शैलजा॥ १६
तस्या वजन्त्याः कोपेन पुनराह पुरान्तकः ।
सत्यं सर्वैरवयवैः सुतासि सदृशी पितुः॥ १७
हिमाचलस्य शृङ्गैस्तैर्मेघजालाकुलैर्नभः।
तथा दुरवगाह्येभ्यो हृदयेभ्यस्तवाशयः॥१८
काठिन्याङ्कस्त्वमस्मभ्यं वनेभ्यो बहुधा गता।
कुटिलत्वं च वर्मभ्यो दुःसेव्यत्वं हिमादपि।
संक्रान्ति सर्वमेवैतत् तन्वनि हिमभूधरात्॥१९
इत्युक्ता सा पुनः प्राह गिरिशं शैलजा तदा।
कम्पकम्पितमूर्धा च प्रस्फुरद्दशनच्छदा॥२०
उमोवाच
मा सर्वान् दोषदानेन निन्दान्यान् गुणिनो जनान्।
तवापि दुष्टसम्पर्कात्संक्रान्तं सर्वमेव हि ॥ २१
व्यालेभ्योऽधिकजिह्मत्वं भस्मना स्नेहबन्धनम्।
हृत्कालुष्यं शशाङ्कात्तु दुर्बोधित्वं वृषादपि॥२२
तथा बहु किमुक्तेन अलं वाचा श्रमेण ते।
श्मशानवासान्निर्भीस्त्वं नग्नत्वान्न तव त्रपा॥२३
निपुणत्वं कपालित्वाद् दया ते विगता चिरम्।
इत्युक्त्वा मन्दिरात् तस्मानिर्जगाम हिमाद्रिजा।। २४
तस्यां व्रजन्त्यां देवेशगणैः किलकिलो ध्वनिः ।
क्व मातर्गच्छसि त्यक्त्वा रुदन्तो धाविताः पुनः॥२५
गिरिजे! मेरे स्वस्थ चित्तमें भी तुम्हें विकल्पकी कल्पना नहीं करनी चाहिये। भीरु! यदि तुम इस प्रकार कुपित हो गयी हो तो अब मैं पुनः तुम्हारे साथ परिहासकी बात नहीं करूँगा। शुचिस्मिते! तुम क्रोध छोड़ दो। देखो, मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर सिर झुकाये हूँ। जो प्रेमयुक्त अवमानना तथा व्याजनिन्दासे क्रुद्ध हो जाता है, उस व्यक्तिके साथ कभी भी परिहासकी बात नहीं करनी चाहिये। इस प्रकार महादेवजीने अनेकों चाटुकारिताभरी बातोंसे पार्वतीको समझाया, परंतु सतीका वह उत्कट क्रोध शान्त नहीं हुआ; क्योंकि उस व्यङ्गसे उनका मर्मस्थल विद्ध हो गया था। तत्पश्चात् पार्वती शंकरजीके हाथसे पकड़े हुए अपने वस्त्रको छुड़ाकर बाल बिखेरे हुए वेगपूर्वक वहाँसे चली जानेकी चेष्टा करने लगीं। क्रोधावेशसे जानेके लिये उद्यत हुई पार्वतीसे त्रिपुरारिने पुनः कहा- 'तुम सचमुच ही सभी अवयवोंद्वारा अपने पिताके सदृश उनकी कन्या हो। जैसे हिमाचलके मेघसमूहसे व्याप्त ऊँचे शिखरोंके कारण आकाश दुर्गम्य हो जाता है, उसी तरह तुम्हारा हृदय भी दु:खगाह्य हृदयोंसे भी अत्यन्त कठोर है। तुम्हारे सभी चिह्न बहुधा वनोंकी अपेक्षा कठिनतासे परिपूर्ण हैं। तुम्हारी चालमें पहाड़ी मार्गोंसे भी बढ़कर कुटिलता है। तुम्हारा सेवन बर्फसे भी अधिक कठिन है। सूक्ष्माङ्गी पार्वती! ये सभी गुण तुम्हारे शरीरमें हिमाचलसे ही संक्रमित हुए हैं। शिवजीद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वतीका मस्तक क्रोधके कारण काँपने लगा और होंठ फड़कने लगे। तब वे पुनः शंकरजीसे बोलीं ॥११-२०॥
उमाने कहा-भगवन्! आप अन्यान्य सभी गुणीजनोंमें दोष लगाकर उनकी निन्दा मत करें; क्योंकि आपमें भी तो सभी गुण दुष्टोंके संसर्गसे ही प्रविष्ट हुए हैं। आपमें सोके सम्पर्कसे अधिक टेढ़ापन, भस्मसे प्रेमहीनता, चन्द्रमासे हृदयकी कालिमा और वृषसे दुर्बोधता भर गयी है। आपके विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ? वह तो केवल वचनका परिश्रम ही होगा। आप श्मशानमें निवास करनेके कारण निर्भीक हो गये हैं। नग्न रहनेके कारण आपमें लज्जा रह नहीं गयी है। कपाली होनेके कारण आप निर्मम हो गये हैं और आपकी दया तो चिरकालसे नष्ट हो गयी है। ऐसा कहकर पार्वती उस भवनसे बाहर निकल गयीं। उनको इस प्रकार जाती देखकर देवेशके गण (प्रमथ) किलकारी मारकर रोते हुए उनके पीछे दौड़े और कहने लगे-'माँ! हमलोगोंको
विष्टभ्य चरणौ देव्या वीरको बाष्पगद्गदम्।
प्रोवाच मातः किंत्वेतत्व यासि कुपितान्तरा॥२६
अहं त्वामनुयास्यामि व्रजन्तीं स्नेहवर्जिताम्।
नो चेत् पतिष्ये शिखरात् तपोनिष्ठे त्वयोज्झितः॥ २७
उन्नाम्य वदनं देवी दक्षिणेन तु पाणिना।
उवाच वीरकं माता शोकं पुत्रक मा कृथाः॥ २८
शैलानात् पतितुं नैव न चागन्तुं मया सह।
युक्तं ते पुत्र वक्ष्यामि येन कार्येण तच्छृणु॥२९
कृष्णेत्युक्त्वा हरेणाहं निन्दिता चाप्यनिन्दिता।
साहं तपः करिष्यामि येन गौरीत्वमाप्नुयाम्॥३०
एष स्त्रीलम्पटो देवो यातायां मय्यनन्तरम्।
द्वाररक्षा त्वया कार्या नित्यं रन्ध्रान्ववेक्षिणा॥३१
यथा न काचित् प्रविशेद्योषिदत्र हरान्तिकम्।
दृष्ट्वा परां स्त्रियं चात्र वदेथा मम पुत्रक॥ ३२
शीघ्रमेव करिष्यामि यथायुक्तमनन्तरम्।
एवमस्त्विति देवीं स वीरकः प्राह साम्प्रतम्॥३३
मातुराज्ञामृताह्लादप्लाविताङ्गो गतज्वरः।
जगाम कक्ष्यां संद्रष्टुं प्रणिपत्य च मातरम्॥३४
छोड़कर आप कहाँ जा रही हैं?' तत्पश्चात् वीरक देवीके दोनों चरणोंको पकड़कर वाष्पगद्गद वाणीमें बोला-'माँ! यह क्या हो गया? आप क्रुद्ध होकर कहाँ जा रही हैं? तपोनिष्ठे! इस प्रकार स्नेह छोड़कर जाती आपके पीछे मैं भी चलूँगा, अन्यथा आपके त्याग देनेपर मैं पर्वतशिखरसे कूदकर प्राण दे दूंगा ।। २१-२७॥
तदनन्तर माता पार्वती अपने दाहिने हाथसे वीरकके मुखको ऊपर उठाकर बोलीं-'बेटा! शोक मत करो। तुम्हारा पर्वतशिखरसे कूदना या मेरे साथ चलना उचित नहीं है। पुत्र! मैं जिस कार्यसे जा रही हूँ, वह तुम्हें बतला रही हूँ, सुनो। मेरे अनिन्द्य होनेपर भी शंकरजीने मुझे 'कृष्णा' कहकर मेरी निन्दा की है। इसलिये अब मैं तपस्या करूँगी, जिससे गौर वर्णकी प्राप्ति कर सकूँ। मेरे चले जानेके बाद ये महादेव स्त्रीलम्पट न हो जायँ, इसके लिये तुम्हें सभी छिद्रोंपर दृष्टि रखते हुए नित्य द्वारकी रक्षा करनी चाहिये, जिससे यहाँ कोई स्त्री शंकरजीके निकट प्रवेश न करने पावे। बेटा! यहाँ किसी परायी स्त्रीको देखकर मुझे तुरंत सूचित करना। फिर उसके बाद जैसा उचित होगा, मैं शीघ्र ही उपाय कर लूँगी।' इसपर वीरकने देवीसे कहा-'माँ! ऐसा ही होगा।' इस प्रकार माताकी आज्ञारूपी अमृतके आहादसे आप्लावित अङ्गोंवाला वीरक शोकरहित हो माताके चरणोंमें प्रणाम कर अन्तःपुरकी रखवाली करनेके लिये चला गया॥ २८-३४॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे देव्यास्तपोऽनुगमनं नाम पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥१५५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें देवीका तपके लिये अनुगमन नामक एक सौ पचपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१५५ ।।
Summary of chapter 157 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya narrates the divine manifestation of Vināyaka Gaṇesha created by Goddess Pārvatī from sanctified unguents to guard her inner apartments on Mount Kailāsa. Displaying heroic strength, the young deity barred even the Pramathaganas until Mahādeva recognized His divine lineage and blessed Him with an elephant head symbolizing supreme wisdom and cosmic intellect. Mahādeva crowned Him as Gaṇapati, the supreme leader of the Gaṇas, ordaining that Gaṇesha must be worshipped first in all Vedic sacrifices, auspicious rites, and holy endeavors before any other deity.