मत्स्य महा पुराण
कल्याणसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
ब्रह्मोवाच
भगवन् भवसंसारसागरोत्तारकारक।
किञ्चिद् व्रतं समाचक्ष्व स्वर्गारोग्यसुखप्रदम्॥१
ईश्वर उवाच
सौरं धर्म प्रवक्ष्यामि नाम्ना कल्याणसप्तमीम्।
विशोकसप्तमी तद्वत् फलाढ्यां पापनाशिनीम्॥२
शर्करासप्तमी पुण्यां तथा कमलसप्तमीम्।
मन्दारसप्तमी तद्वच्छुभदां शुभसप्तमीम्॥३
ब्रह्माने पूछा- भगवान् आप तो भवसागरुपी संसारसे उद्धार करनेवाले है, अतः कोई ऐसा व्रत बतलाइये जो स्वर्ग, नीरोगता और सुखका प्रदाता हो।।
ईश्वरने कहा- ब्रह्मन अब मैं सूर्य से सम्बन्धित धर्म(व्रत) का वर्णन कर रहा हूँ, जो लोकमें कल्याणसप्तमी, विशोकसप्तमी, पापनाशिनी फलसप्तमी, पुण्यदायिनी शर्करासप्तमी, कमलसप्तमी, मन्दारसप्तमी तथा मङ्गलप्रदायिनी शुभसप्तमीके नामसे प्रसिद्ध है।
सर्वानन्तफला: प्रोक्ताः सर्वा देवर्षिपूजिताः।
विधानमासां वक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः॥ ४
यदा तु शुक्लसप्तम्यामादित्यस्य दिनं भवेत्।
सा तु कल्याणिनी नाम विजया च निगद्यते॥ ५
प्रातर्गव्येन पयसा स्नानमस्यां समाचरेत्।
ततः शुक्लाम्बरः पद्ममक्षताभिः प्रकल्पयेत्॥ ६
प्राङ्मुखोऽष्टदलं मध्ये तद्वद्वृत्तां च कर्णिकाम्।
पुष्पाक्षतैश्च देवेशं विन्यसेत् सर्वतः क्रमात्॥ ७
पूर्वेण तपनायेति मार्तण्डायेति चानले।
याम्ये दिवाकरायेति विधात्र इति नैर्ऋते॥ ८
पश्चिमे वरुणायेति भास्करायेति चानिले।
सौम्ये विकर्तनायेति रवये चाष्टमे दले॥
आदावन्ते च मध्ये च नमोऽस्तु परमात्मने।
मन्त्रैरेभिः समभ्यर्च्य नमस्कारान्तदीपितैः॥१०
शुक्लवस्त्रैः फलैर्भक्ष्यैधूपमाल्यानुलेपनैः ।
स्थण्डिले पूजयेद् भक्त्या गुडेन लवणेन च॥११
ततो व्याहृतिमन्त्रेण विसृजे द्विजपुङ्गवान्।
शक्तितः पूजयेद् भक्त्या गुडक्षीरघृतादिभिः।
तिलपात्रं हिरण्यं च ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥१२
एवं नियमकृत् सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः।
कृतस्नानजपो विप्रैः सहैव घृतपायसम्॥१३
भुक्त्वा च वेदविदुषे विडालव्रतवर्जिते।
घृतपानं सकनकं सोदकुम्भं निवेदयेत्॥१४
प्रीयतामत्र भगवान् परमात्मा दिवाकरः।
अनेन विधिना सर्वं मासि मासि व्रतं चरेत्॥ १५
ततस्त्रयोदशे मासि गा वै दद्यात् त्रयोदश।
वस्त्रालङ्कारसंयुक्ताः सुवर्णास्याः पयस्विनीः॥१६
एकामपि प्रदद्याद् वा वित्तहीनो विमत्सरः।
न वित्तशाठ्यं कुर्वीत यतो मोहात् पतत्यधः॥१७
ये सभी सप्तमियाँ* देवर्षियोंद्वारा पूजित हैं तथा अनन्त
फल देनेवाली कही गयी हैं। मैं इनके विधानको आनुपूर्वी यथार्थरूपसे वर्णन कर रहा हूँ॥२-४॥
जब शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको रविवार पड़ जाय तो उस सप्तमीको कल्याणिनी (नामसे) कहा जाता है। उसीका दूसरा नाम विजया भी है। व्रतीको चाहिये कि वह उस दिन प्रात:काल उठकर गोदुग्धयुक्त जलसे स्नान करनेके पश्चात् श्वेत वस्त्र धारण करे। फिर पूर्वाभिमुख हो चावलोंद्वारा अष्टदल कमल बनावे। उसके मध्यभागमें उसी आकारवाली कर्णिकाकी भी रचना करे। तत्पश्चात् पुष्प और अक्षतद्वारा क्रमश: सब ओर देवेश्वर सूर्यकी स्थापना करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करे-'तपनाय नमः' से पूर्वदलपर, 'मार्तण्डाय नमः' से अग्निकोणस्थित दलपर, 'दिवाकराय नमः' से दक्षिणदलपर, 'विधात्रे नमः' से नैर्ऋत्यकोणके दलपर, 'वरुणाय नमः' से पश्चिमदलपर, 'भास्कराय नमः' से वायव्यकोणवाले दलपर, 'विकर्तनाय नमः' से उत्तरदलपर, 'रवये नमः' से ईशानकोणस्थित आठवें दलपर और 'परमात्मने नमः' से आदि, मध्य और अन्तमें सूर्यका आवाहन करके स्थापित कर दे। फिर नमस्कारान्तसे सुशोभित इन मन्त्रोंका उच्चारण कर श्वेत वस्त्र, फल, नैवेद्य, धूप, पुष्पमाला और चन्दनसे भलीभाँति पूजन करे। वेदीपर भी व्याहृति-मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक गुड़ और नमकसे भक्तिपूर्वक पूजा करनेका विधान है। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये। फिर अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक गुड़, दूध और घी आदिके द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करे और तिलसे भरा हुआ पात्र और सुवर्ण ब्राह्मणको दान कर दे। इस प्रकार विधानको पूरा करके व्रती मानव रात्रिमें शयन करे और प्रात:काल उठकर स्नान-जप आदि नित्यकर्म पूरा करे। तत्पश्चात् उन ब्राह्मणोंके साथ ही घी और दूधसे बने हुए पदार्थोंका भोजन करे। अन्तमें विडालव्रत (छल-कपट)-से रहित वेदज्ञ ब्राह्मणको सुवर्णसहित घृतपूर्ण पात्र और जलसे भरा हुआ घट दान कर दे और उस समय इस प्रकार कहे-'मेरे इस व्रतसे परमात्मा भगवान् सूर्य प्रसन्न हों।' इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सभी व्रतोंका अनुष्ठान करना चाहिये। तदनन्तर तेरहवाँ महीना आनेपर तेरह गौ दान करनेका विधान है, जो सभी दुधारू हों, वस्त्र और अलंकार आदिसे सुसज्जित हों और जिनके मुखपर सोनेका पत्र लगा हुआ हो। यदि व्रती निर्धन हो तो वह अलंकाररहित होकर एक ही गौका दान करे, किंतु कृपणता न करे; क्योंकि मोहवश कंजूसी करनेसे अध:पतन हो जाता है॥५-१७॥
* प्रागः ये सभी राप्तमियाँ भविष्यपुराणमें अन्य कई अधिक सप्तमीव्रतोंके साथ उपदिष्ट हैं।
अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् कल्याणसप्तमीम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तः सूर्यलोके महीयते।
आयुरारोग्यमैश्वर्यमनन्तमिह जायते॥१८
सर्वपापहरा नित्यं सर्वदैवतपूजिता।
सर्वदुष्टोपशमनी सदा कल्याणसप्तमी॥१९
इमामनन्तफलदां यस्तु कल्याणसप्तमीम्।
शृणोति पठते चेह सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥२०
जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार इस कल्याणसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस लोकमें भी उसे अनन्त आयु, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है; क्योंकि यह कल्याणसप्तमी सदा समस्त पापोंको हरनेवाली और सम्पूर्ण दुष्ट ग्रहोंका शमन करनेवाली है। सभी देवता नित्य इसकी पूजा करते हैं। जो मानव इस लोकमें इस अनन्त फलप्रदायिनी कल्याणसप्तमीकी चर्चा-कथाको सुनता अथवा पढ़ता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥१८-२०॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कल्याणसप्तमीव्रतं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कल्याणसप्तमीव्रत नामक चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७४॥
Summary of chapter 74 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya presents the Kalyāṇa-Saptamī-Vrata, an auspicious vow observed on the seventh lunar day of the bright fortnight in the month of Mārgaśīrsha to secure all-round prosperity, family welfare, and spiritual perfection. The devotee worships Sūrya Deva under His divine name Kalyāṇa-Mārtaṇḍa, presenting offerings of fresh water, red lotuses, aromatic incenses, and ghee-laden food preparations. The practitioner observes a complete fast during the day and partakes only of milk or fruits at night, maintaining a compassionate and truthful attitude toward all living beings. Completing this annual vow removes all obstacles from one's path, grants immense agricultural and financial prosperity, and elevates the practitioner to the luminous solar realm upon the conclusion of earthly life.