मत्स्य महा पुराण
पूरु-वंशके वर्णन-प्रसङ्गमें भरत-वंशकी कथा, भरद्वाजकी उत्पत्ति और उनके वंशका कथन, नीप-वंशका वर्णन तथा पौरवोंका इतिहास
सूत उवाच
पूरोः पुत्रो महातेजा राजा स जनमेजयः।
प्राचीत्वतः सुतस्तस्य यः प्राचीमकरोद् दिशम्॥१
प्राचीत्वतस्य तनयो मनस्युश्च तथाभवत्।
राजा वी (पी)तायुधो नाम मनस्योरभवत् सुतः॥२
दायादस्तस्य चाप्यासीद् धुन्धुर्नाम महीपतिः।
धुन्धोर्बहुविधः पुत्रः संयातिस्तस्य चात्मजः॥३
संयातेस्तु रहंवर्चा भद्राश्वस्तस्य चात्मजः।
भद्राश्वस्य घृतायां तु दशाप्सरसि सूनवः॥४
औचेयुश्च हृषेयुश्च कक्षेयुश्च सनेयुकः।
धृतेयुश्च विनेयुश्च स्थलेयुश्चैव सत्तमः॥५
धर्मेयुः संनतेयुश्च पुण्येयुश्चेति ते दश।
औचेयोर्ध्वलना नाम भार्या वै तक्षकात्मजा॥ ६
तस्यां स जनयामास रन्तिनारं महीपतिम्।
रन्तिनारो मनस्विन्यां पुत्राञ्जज्ञे पराशुभान्॥ ७
अमूर्तरयसं वीरं त्रिवनं चैव धार्मिकम्।
गौरी कन्या तृतीया च मान्धातुर्जननी शुभा॥८
इलिना तु यमस्यासीत् कन्या साजनयत् सुतम्।
त्रिवनाद् दयितं पुत्रमैलिनं ब्रह्मवादिनम्॥ ९
उपदानवी सुताँल्लेभे चतुरस्त्विलिनात्मजात्।
ऋष्यन्तमथ दुष्यन्तं प्रवीरमनघं तथा॥१०
चक्रवर्ती ततो जज्ञे दुष्यन्तात् समितिञ्जयः।
शकुन्तलायां भरतो यस्य नाम्ना च भारताः।।११
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! (ययातिके सबसे छोटे पुत्र) पूरुका पुत्र महातेजस्वी राजा जनमेजय (प्रथम) था। उसका पुत्र प्राचीत्वत (प्राचीनवंत) हुआ, जिसने प्राची (पूर्व) दिशा बसायी। प्राचीत्वतका पुत्र मनस्यु* हुआ। मनस्युका पुत्र राजा वीतायुध (अभय) हुआ। उसका पुत्र धुन्धु नामका राजा हुआ। धुन्धुका पुत्र बहुविध (बहुविद्य, अन्यत्र बहुगव) और उसका पुत्र संयाति हुआ। संयातिका पुत्र रहंवर्चा और उसका पुत्र भद्राश्व (रौद्राश्व) हुआ। भद्राश्वके घृता (घृताची, अन्यत्र मिश्रकेशी) नामकी अप्सराके गर्भसे दस पुत्र उत्पन्न हुए। उन दसोंके नाम हैं-औचेयु (अधिकांश पुराणोंमें ऋचेयु), हृषेयु, कक्षेयु, सनेयु, धृतेयु, विनेयु, श्रेष्ठ स्थलेयु, धर्मेयु, संनतेयु और पुण्येयु। औचेयु (ऋचेयु)-की पत्नीका नाम ज्वलना था। वह नागराज तक्षककी कन्या थी। उसके गर्भसे उन्होंने भूपाल रन्तिनार (यह प्राय: सर्वत्र मतिनार, पर भागवतमें रन्तिभार है)-को जन्म दिया। रन्तिनारने अपनी पत्नी मनस्विनीके गर्भसे कई सुन्दर पुत्रोंको उत्पन्न किया, जिनमें वीरवर अमूर्तरय और धर्मात्मा त्रिवन प्रधान थे। उसकी तीसरी संतति गौरी नामकी सुन्दरी कन्या थी, जो मान्धाताकी जननी हुई। इलिना यमराजकी कन्या थी। उसने त्रिवनसे ब्रह्मवादमें श्रेष्ठ पराक्रमी ऐलिन (ऐलिक, त्रंसु या जंसु) नामक प्रिय पुत्र उत्पन्न किया। इलिना-नन्दन ऐलिन (जंसु)-के संयोगसे उपदानवीने ऋष्यन्त, दुष्यन्त, प्रवीर तथा अनघ नामक चार पुत्रोंको प्राप्त किया। इनमें द्वितीय पुत्र राजा दुष्यन्तके संयोगसे शकुन्तलाके गर्भसे भरतका जन्म हुआ, जो आगे चलकर संग्राम-विजयी चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। उसीके नामपर उसके वंशधर 'भारत' नामसे कहे जाने लगे॥ १-११॥
*महाभारत ११ ९४।१ तथा अन्य वायु, विष्णु, ब्रह्माण्डादि पुराणोंमें प्राचीनवंत या प्राचीनवंशका पुत्र प्रवीर और उसका पुत्र मनस्यु कहा गया है। इसमें आगे भी जहाँ-तहाँ कुछ पुरुष छोड़ दिये गये हैं जो पढ़ते समय स्पष्ट ज्ञात हो जाता है।
दौष्यन्तिं प्रति राजानं वागूचे चाशरीरिणी।
माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः॥१२
भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम्।
रेतोधां नयते पुत्रः परेतं यमसादनात्।
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला॥१३
भरतस्य विनष्टेषु तनयेषु पुरा किल।
पुत्राणां मातृकात् कोपात् सुमहान् संक्षयः कृतः॥ १४
ततो मरुद्भिरानीय पुत्रः स तु बृहस्पतेः।
संक्रामितो भरद्वाजो मरुद्भिर्भरतस्य तु॥१५
ऋषय ऊचुः
भरतस्य भरद्वाजः पुत्रार्थं मारुतैः कथम्।
संक्रामितो महातेजास्तन्नो ब्रूहि यथातथम्॥१६
सूत उवाच
पल्यामापन्नसत्त्वायामुशिजः स स्थितो भुवि।
भ्रातुर्भार्यां स दृष्ट्वा तु बृहस्पतिरुवाच ह॥१७
उपतिष्ठ स्वलंकृत्य मैथुनाय च मां शुभे।
एवमुक्ताब्रवीदेनं स्वयमेव बृहस्पतिम्॥१८
गर्भः परिणतश्चायं ब्रह्म व्याहरते गिरा।
अमोघरेतास्त्वं चापि धर्मं चैवं विगर्हितम्॥१९
एवमुक्तोऽब्रवीदेनां स्वयमेव बृहस्पतिः।
नोपदेष्टव्यो विनयस्त्वया मे वरवर्णिनि॥२०
धर्षमाणः प्रसौनां मैथुनायोपचक्रमे।
ततो बृहस्पतिं गर्भो धर्षमाणमुवाच ह॥२१
संनिविष्टो ह्यहं पूर्वमिह नाम बृहस्पते।
अमोघरेताश्च भवान् नावकाश इह द्वयोः॥ २२
एवमुक्तः स गर्भेण कुपितः प्रत्युवाच ह।
यस्मात् त्वमीदृशे काले सर्वभूतेप्सिते सति।
अभिषेधसि तस्मात् त्वं तमो दीर्घ प्रवेक्ष्यसि ॥२३
ततः कामं संनिवर्त्य तस्यानन्दाद् बृहस्पतेः।
तद्रेतस्त्वपतद् भूमौ निवृत्तं शिशुकोऽभवत्॥ २४
सद्योजातं कुमारं तु दृष्ट्वा तं ममताब्रवीत्।
गमिष्यामि गृहं स्वं वै भरस्वैनं बृहस्पते॥२५
एवमुक्त्वा गता सा तु गतायां सोऽपितं त्यजत्।
इसी दुष्यन्त-पुत्र भरतके विषयमें आकाशवाणीने राजा दुष्यन्तसे कहा था-'दुष्यन्त! माताका गर्भाशय तो एक चमड़ेके थैलेके समान है, उसमें गर्भाधान करनेके कारण पुत्र पिताका ही होता है; अतः जो जिससे पैदा होता है, वह उसका आत्मस्वरूप ही होता है। इसलिये तुम अपने पुत्रका भरण-पोषण करो और शकुन्तलाका अपमान मत करो। पुत्र अपने मरे हुए पिताको यमपुरीके कष्टोंसे छुटकारा दिलाता है। इस गर्भका आधान करनेवाले तुम्ही हो, शकुन्तलाने यह बिलकुल सच बात कही है।' पूर्वकालमें भरतके सभी पुत्रोंका विनाश हो गया था। माताके कोपके कारण उनके पुत्रोंका यह महान् संहार हुआ था। यह देखकर मरुद्गणोंने बृहस्पतिके पुत्र भरद्वाजको लाकर भरतके हाथोंमें समर्पित किया था। बृहस्पति अपने इस पुत्रको वनमें छोड़कर चले गये थे॥ १२-२५॥
मातापितृभ्यां त्यक्तं तु दृष्ट्वा तं मरुतः शिशुम्।
जगृहुस्तं भरद्वाजं मरुतः कृपया स्थिताः॥२६
तस्मिन् काले तु भरतो बहुभिर्ऋतुभिर्विभुः।
पुत्रनैमित्तिकैर्यज्ञैरयजत् पुत्रलिप्सया॥२७
यदा स यजमानस्तु पुत्रं नासादयत् प्रभुः।
ततः क्रतुं मरुत्सोमं पुत्रार्थे समुपाहरत्॥ २८
तेन ते मरुतस्तस्य मरुत्सोमेन तुष्टुवुः ।
उपनिन्युर्भरद्वाजं पुत्रार्थं भरताय वै॥२९
दायादोऽङ्गिरसः सूनोरौरसस्तु बृहस्पतेः
संक्रामितो भरद्वाजा मरुद्भिर्भरतं प्रति॥३०
भरतस्तु भरद्वाजं पुत्रं प्राप्य विभुर्ब्रवीत्।
आदावात्महिताय त्वं कृतार्थोऽहं त्वया विभो॥३१
पूर्वं तु वितथे तस्मिन् कृते वै पुत्रजन्मनि।
ततस्तु वितथो नाम भरद्वाजो नृपोऽभवत्॥३२
तस्मादपि भरद्वाजाद् ब्राह्मणाः क्षत्रिया भुवि।
व्यामुष्यायणकौलीनाः स्मृतास्ते द्विविधेन च ॥३३
ततो जाते हि वितथे भरतश्च दिवं ययौ।
भरद्वाजो दिवं यातो ह्यभिषिच्य सुतं ऋषिः॥३४
दायादो वितथस्यासीद् भुवमन्युर्महायशाः।
महाभूतोपमाः पुत्राश्चत्वारो भुवमन्यवः ॥ ३५
बृहत्क्षत्रो महावीर्यो नरो गर्गश्च वीर्यवान्।
नरस्य संकृतिः पुत्रस्तस्य पुत्रो महायशाः॥३६
गुरुधी रन्तिदेवश्च सत्कृत्यां तावुभौ स्मृतौ।
गर्गस्य चैव दायादः शिबिर्विद्वानजायत॥३७
स्मृताः शैव्यास्ततो गर्गाः क्षत्रोपेता द्विजातयः ।
आहार्यतनयश्चैव धीमानासीदुरुक्षवः॥३८
तस्य भार्या विशाला तु सुषुवे पुत्रकत्रयम्।
त्र्यरुणं पुष्करिं चैव कविं चैव महायशाः॥३९
इस प्रकार माता-पिताद्वारा त्यागे गये उस शिशुको देखकर मरुद्गणोंका हृदय दयार्द्र हो गया, तब उन्होंने उस भरद्वाज नामक शिशुको उठा लिया। उसी समय राजा भरत पुत्र-प्राप्तिकी अभिलाषासे अनेकों ऋतुकालके अवसरोंपर पुत्रनिमित्तक यज्ञोंका अनुष्ठान करते आ रहे थे, परंतु जब उन सामर्थ्यशाली नरेशको उन यज्ञोंके करनेसे भी पुत्रकी प्राप्ति नहीं हुई, तब उन्होंने पुत्र- प्राप्तिके निमित्त 'मरुत्स्तोम' नामक यज्ञका अनुष्ठान प्रारम्भ किया। राजा भरतके उस मरुत्स्तोम यज्ञसे सभी मरुद्गण प्रसन्न हो गये। तब वे उस भरद्वाज नामक शिशुको साथ लेकर भरतको पुत्ररूपमें प्रदान करनेके लिये उस यज्ञमें उपस्थित हुए। वहाँ उन्होंने अङ्गिरा-पुत्र बृहस्पतिके औरस पुत्र भरद्वाजको भरतके हाथों में समर्पित कर दिया। तब राजा भरत भरद्वाजको पुत्ररूपमें पाकर इस प्रकार बोले-'विभो! पहले तो आप (इस शिशुको लेकर) आत्महितकी ही बात सोच रहे थे, परंतु अब इसे पाकर मैं आपकी कृपासे कृतार्थ हो गया हूँ।' पुत्र- जन्मके हेतु किये गये पहलेके सभी यज्ञ वितथ (निष्फल) हो गये थे, इसलिये वह भरद्वाज राजा वितथके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस भरद्वाजसे भी भूतलपर ब्राह्मण और क्षत्रिय-दोनों प्रकारके पुत्र उत्पन्न हुए, जो व्यामुष्यायण और कौलीन नामसे विख्यात हुए॥२६-३३॥
तदनन्तर वितथके पुत्ररूपमें प्राप्त हो जानेपर राजा भरत (उसे राज्याभिषिक्त करके) स्वर्गलोकको चले गये। राजर्षि भरद्वाज भी यथासमय अपने पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वर्गलोक सिधारे।महायशस्वी भुवमन्यु वितथका पुत्र था। भुवमन्युके बृहत्क्षत्र, महावीर्य, नर और वीर्यशाली गर्ग नामक चार पुत्र थे, जो वायु आदि चार महातत्त्वोंके समान थे। नरका पुत्र संकृति हुआ।संकृतिके दो पुत्र महायशस्वी गुरुधी और रन्तिदेव हुए। वे दोनों सत्कृतिके गर्भसे उत्पन्न हुए बतलाये जाते हैं। गर्गके पुत्ररूपमें विद्वान् शिवि उत्पन्न हुआ। उसके वंशधर जो क्षत्रियांशसे युक्त द्विज थे, शैव्य और गर्गके नामसे विख्यात हुए। शिविके आहार्यतनय और बुद्धिमान् उरुक्षव नामक दो पुत्र थे। उरुक्षवकी पत्नी विशालाने त्र्यरुण, पुष्करि और महायशस्वी कवि-इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया।
उरुक्षवाः स्मृता ह्येते सर्वे ब्राह्मणतां गताः।
काव्यानां तु वरा ह्येते त्रयः प्रोक्ता महर्षयः॥ ४०
गर्गाः संकृतयः काव्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः ।
सम्भृताङ्गिरसो दक्षा बृहत्क्षत्रस्य च क्षितिः॥ ४१
बृहत्क्षत्रस्य दायादो हस्तिनामा बभूव ह।
तेनेदं निर्मितं पूर्वे पुरं तु गजसाह्वयम्॥४२
हस्तिनश्चैव दायादास्त्रयः परमकीर्तयः।
अजमीढो द्विमीढश्च पुरुमीढस्तथैव च ॥ ४३
अजमीढस्य पल्यस्तु तिस्त्रः कुरुकुलोद्वहाः।
नीलिनी धूमिनी चैव केशिनी चैव विश्रुताः॥ ४४
स तासु जनयामास पुत्रान् वै देववर्चसः।
तपसोऽन्ते महातेजा जाता वृद्धस्य धार्मिकाः॥ ४५
भारद्वाजप्रसादेन विस्तरं तेषु मे शृणु।
अजमीढस्य केशिन्यां कण्वः समभवत् किल॥ ४६
मेधातिथिः सुतस्तस्य तस्मात् काण्वायना द्विजाः।
अजमीढस्य भूमिन्यां जज्ञे बृहदनुपः ॥ ४७
बृहदनोबृहन्तोऽथ बृहन्तस्य बृहन्मनाः।
बृहन्मनःसुतश्चापि बृहद्धनुरिति श्रुतः॥४८
बृहद्धनोबृंहदिषुः पुत्रस्तस्य जयद्रथः।
अश्वजित् तनयस्तस्य सेनजित् तस्य चात्मजः ॥ ४९
अथ सेनजितः पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रुताः ।
रुचिराश्वश्च काव्यश्च राजा दृढरथस्तथा॥५०
वत्सश्चावर्तको राजा यस्यैते परिवत्सकाः।
रुचिराश्वस्य दायादः पृथुसेनो महायशाः॥५१
पृथुसेनस्य पौरस्तु पौरान्नीपोऽथ जज्ञिवान्।
नीपस्यैकशतं त्वासीत् पुत्राणाममितौजसाम्॥५२
नीपा इति समाख्याता राजानः सर्व एव ते।
तेषां वंशकरः श्रीमान्नीपानां कीर्तिवर्धनः॥५३
काव्याच्च समरो नाम सदेष्टसमरोऽभवत्।
समरस्य पारसम्पारौ सदश्व इति ते त्रयः॥५४
पुत्राः सर्वगुणोपेता जाता वै विश्रुता भुवि।
पारपुत्रः पृथुर्जातः पृथोस्तु सुकृतोऽभवत्॥५५
ये सभी उरुक्षव कहलाते हैं और अन्तमें ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो गये थे। काव्यके वंशधरों (भार्गव गोत्र-प्रवरों)-में ये तीनों महर्षि कहे गये हैं। इस प्रकार गर्ग, संकृति और कविके वंशमें उत्पन्न हुए लोग क्षत्रियांशसे युक्त ब्राह्मण थे। अङ्गिरागोत्रीय बृहत्क्षत्रने भी इस समृद्धिशालिनी पृथ्वीका शासन किया था। बृहत्क्षत्रका हस्ति नामक पुत्र हुआ। उसीने पूर्वकालमें इस हस्तिनापुर नामक नगरको बसाया था। हस्तीके अजमीढ, द्विमीढ और पुरुमीढ नामक तीन परम कीर्तिशाली पुत्र हुए। अजमीढकी तीन पत्नियाँ थीं, जो कुरुकुलमें उत्पन्न हुई थीं। वे नीलिनी, धूमिनी और केशिनी नामसे प्रसिद्ध थीं। अजमीढने उनके गर्भसे अनेकों पुत्रोंको पैदा किया था, जो सभी देवताओंके समान वर्चस्वी, महान् तेजस्वी और धर्मात्मा थे। वे अपने वृद्ध पिताकी तपस्याके अन्तमें महर्षि भारद्वाजकी कृपासे उत्पन्न हुए थे। उनका विस्तारपूर्वक वृत्तान्त मुझसे सुनिये॥ ३४-४५३ ॥
अजमीढके केशिनीके गर्भसे कण्व नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र मेधातिथि हुआ। उससे काण्वायन ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति हुई। भूमिनी (धूमिनी)-के गर्भसे अजमीढके पुत्ररूपमें राजा बृहदनुका जन्म हुआ। बृहदनुका पुत्र बृहन्त, बृहन्तका पुत्र बृहन्मना और बृहन्मनाका पुत्र बृहद्धनु नामसे विख्यात हुआ। बृहद्धनुका पुत्र बृहदिषु और उसका पुत्र जयद्रथ हुआ। उसका पुत्र अश्वजित् और उसका पुत्र सेनजित् हुआ। सेनजित्के रुचिराश्व, काव्य, राजा दृढरथ और राजा वत्सावर्तक-ये चार लोकविख्यात पुत्र हुए। इनमें वत्सावर्तकके वंशधर परिवत्सक नामसे कहे जाते हैं। रुचिराश्वका पुत्र महायशस्वी पृथुसेन हुआ। पृथुसेनसे पौरका और पौरसे नीपका जन्म हुआ। नीपके अमित तेजस्वी पुत्रोंकी संख्या एक सौ थी। वे सभी राजा थे और नीप नामसे ही विख्यात थे। काव्यसे समर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो उन नीपवंशियोंका वंशप्रवर्तक, लक्ष्मीसे युक्त और कीर्तिवर्धक था। वह समरके लिये सदा प्रयत्नशील रहता था। समरके पार, सम्पार और सदश्व-ये तीन पुत्र हुए, जो सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न तथा भूतलपर विख्यात थे। पारका पुत्र पृथु हुआ और पृथुसे सुकृतकी उत्पत्ति हुई।
*विशेष द्रष्टव्य-ऋग्वेदसंहिता-८1५५।४, ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड, भागवत १२।१।४९ तथा पुनः मत्स्यपुराण १९१ । २६ ।
जज्ञे सर्वगुणोपेतो विभ्राजस्तस्य चात्मजः।
विभ्राजस्य तु दायादस्त्वणुहो नाम वीर्यवान्॥५६
बभूव शुकजामाता कृत्वीभर्ता महायशाः।
अणुहस्य तु दायादो ब्रह्मदत्तो महीपतिः॥ ५७
युगदत्तः सुतस्तस्य विष्वक्सेनो महायशाः।
विभ्राजः पुनराजातो सुकृतेनेह कर्मणा॥५८
विष्वक्सेनस्य पुत्रस्तु उदक्सेनो बभूव ह।
भल्लाटस्तस्य पुत्रस्तु तस्यासीजनमेजयः।
उग्रायुधेन तस्यार्थे सर्वे नीपाः प्रणाशिताः॥५९
ऋषय ऊचुः
उग्रायुधः कस्य सुतः कस्य वंशे स कथ्यते।
किमर्थं तेन ते नीपाः सर्वे चैव प्रणाशिताः॥६०
सूत उवाच
उग्रायुधः सूर्यवंश्यस्तपस्तेपे वराश्रमे।
स्थाणुभूतोऽष्टसाहस्रं तं भेजे जनमेजयः॥६१
तस्य राज्यं प्रतिश्रुत्य नीपानाजघ्निवान् प्रभुः।
उवाच सान्त्वं विविधं जघ्नुस्ते वै ह्युभावपि॥ ६२
हन्यमानांश्च तांश्चैव यस्माद्धेतोन मे वचः।
शरणागतरक्षार्थं तस्मादेवं शपामि वः॥६३
यदि मेऽस्ति तपस्तप्तं सर्वान् नयतु वो यमः।
ततस्तान् कृष्यमाणांस्तु यमेन पुरतः स तु॥६४
कृपया परयाऽऽविष्टो जनमेजयमूचिवान्।
गतानेतानिमान् वीरांस्त्वं मे रक्षितुमर्हसि॥६५
जनमेजय उवाच
अरे पापा दुराचारा भवितारोऽस्य किंकराः।
तथेत्युक्तस्ततो राजा यमेन युयुधे चिरम्॥६६
उससे सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न विभ्राज नामक पुत्र पैदा हुआ। विभ्राजका पुत्र महायशस्वी एवं पराक्रमी अणुह हुआ, जो शुकदेवजीका जामाता एवं कृत्वीका पति था। अणुहका पुत्र राजा ब्रह्मदत्त हुआ। उसका पुत्र युगदत्त और युगदत्तका पुत्र महायशस्वी विष्वक्सेन हुआ। अपने पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप राजा विभ्राजने ही पुनः विष्वक्सेनरूपसे जन्म धारण किया था। विष्वक्सेनका पुत्र उदक्सेन हुआ। उसका पुत्र भल्लाट* और उसका पुत्र जनमेजय (द्वितीय) हुआ। इसी जनमेजयकी रक्षाके लिये उग्रायुधने सभी नीपवंशी नरेशोंको मौतके घाट उतारा था॥ ४६-५९॥
ऋषियोंने पूछा-सूतजी! उग्रायुध किसका पुत्र था? वह किसके वंशमें उत्पन्न हुआ बतलाया जाता है? तथा किस कारण उसने समस्त नीपवंशी राजाओंका संहार किया था? (यह हमें बतलाइये)॥६०॥
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! उग्रायुध सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए थे। इन्होंने एक श्रेष्ठ आश्रममें जाकर स्थाणुकी भाँति स्थित हो आठ हजार वर्षोंतक घोर तप किया। उसी समय (युद्धमें पराजित हुए) राजा जनमेजय उनके पास पहुँचे। (जनमेजयकी प्रार्थनापर) उन्हें राज्य दिलानेकी प्रतिज्ञा करके सामर्थ्यशाली उग्रायुधने नीपवंशियोंका संहार किया था। प्रथमतस्तु उग्रायुधने उन्हें अनेक प्रकारके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा समझाने-बुझानेकी चेष्टा की, किंतु जब वे (इनकी बात न मानकर) इन्हीं दोनोंको मार डालनेके लिये उतारू हो गये, तब मारनेके लिये उद्यत हुए उनसे उग्रायुधने कहा-'जिस कारण तुमलोग मेरी बातको अनसुनी कर रहे हो, इसीलिये शरणागतकी रक्षाके हेतु मैं तुमलोगोंको इस प्रकारका शाप दे रहा हूँ कि यदि मैंने तपका अनुष्ठान किया है तो यमराज तुम सबको अपने घर उठा ले जायँ।' तदनन्तर अपने सामने ही उन्हें यमराजद्वारा घसीटा जाता हुआ देखकर उग्रायुधके हृदयमें अतिशय दया उत्पन्न हो गयी। तब उन्होंने जनमेजयसे कहा-'जनमेजय! तुम मेरे कहनेसे इन ले जाये गये हुए तथा ले जाये जाते हुए वीरोंकी रक्षा करो'॥ ६१-६५॥
जनमेजय बोले-अरे पापी एवं दुराचारी यमदूतो! तुमलोग दण्डके भागी होओगे, अन्यथा उन्हें छोड़ दो। यमदूतोंद्वारा भी उसी प्रकारका उत्तर दिये जानेपर राजा जनमेजयने यमके साथ चिरकालतक युद्ध किया।
* इसने भल्लाटनगर (सुलेमानपर्वतके पासका एक शहर) बसाया, जहाँका राजा शशिध्वज (कल्किपुराण, अ० २१-२२) प्रसिद्ध था।
व्याधिभिर्नारकै?रैर्यमेन सह तान् बलात्।
विजित्य मुनये प्रादात् तदद्भुतमिवाभवत्।। ६७
यमस्तुष्टस्ततस्तस्मै मुक्तिज्ञानं ददौ परम्।
सर्वे यथोचितं कृत्वा जग्मुस्ते कृष्णमव्ययम्॥ ६८
येषां तु चरितं गृह्य हन्यते नापमृत्युभिः।
इह लोके परे चैव सुखमक्षय्यमश्रुते॥६९
अजमीढस्य धूमिन्यां विद्वाञ्जज्ञे यवीनरः ।
धृतिमांस्तस्य पुत्रस्तु तस्य सत्यधृतिः स्मृतः ।
अथ सत्यधृतेः पुत्रो दृढनेमिः प्रतापवान्॥७०
दृढनेमिसुतश्चापि सुधर्मा नाम पार्थिवः।
आसीत् सुधर्मतनयः सार्वभौमः प्रतापवान्॥७१
सार्वभौमेति विख्यातः पृथिव्यामेकराड् बभौ।
तस्यान्ववाये महति महापौरवनन्दनः॥७२
महापौरवपुत्रस्तु राजा रुक्मरथः स्मृतः।
अथ रुक्मरथस्यासीत् सुपार्थो नाम पार्थिवः॥७३
सुपार्श्वतनयश्चापि सुमतिर्नाम धार्मिकः ।
सुमतेरपि धर्मात्मा राजा संनतिमानपि॥७४
तस्यासीत् संनतिमतः कृतो नाम सुतो महान्।
हिरण्यनाभिन: शिष्यः कौसल्यस्य महात्मनः॥७५
चतुर्विंशतिधा येन प्रोक्ता वै सामसंहिताः।
स्मृतास्ते प्राच्यसामानः कार्ता नामेह सामगाः॥७६
कार्तिरुग्रायुधोऽसौ वै महापौरववर्धनः।
बभूव येन विक्रम्य पृथुकस्य पिता हतः॥७७
नीलो नाम महाराजः पाञ्चालाधिपतिर्वशी।
उग्रायुधस्य दायादः क्षेमो नाम महायशाः॥७८
क्षेमात् सुनीथः सञ्जज्ञे सुनीथस्य नृपञ्जयः।
नृपञ्जयाच्च विरथ इत्येते पौरवाः स्मृताः॥७९
अन्ततोगत्वा उन्होंने भयंकर नारकीय व्याधियोंके साथ उन सबको बलपूर्वक जीतकर यमराजसहित उन्हें उग्रायुध मुनिको समर्पित कर दिया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई। इससे प्रसन्न हुए यमराजने राजा जनमेजयको मुक्तिका उत्तम ज्ञान प्रदान किया। तत्पश्चात् वे सभी यथोचित धर्मकार्य कर अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णमें लीन हो गये। इन नरेशोंके जीवन-चरितको जान लेनेपर मनुष्य अपमृत्यु आदिका शिकार नहीं होता। उसे इस लोक और परलोकमें अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है। ६६-६९॥
धूमिनीके गर्भसे अजमीढके पुत्ररूपमें विद्वान् यवीनरका जन्म हुआ। उसका पुत्र धृतिमान् हुआ और उसका पुत्र सत्यधृति कहा जाता है। सत्यधृतिका पुत्र प्रतापी दृढ़नेमि हुआ। दृढ़नेमिका पुत्र सुधर्मा नामक भूपाल हुआ। सुधर्माका पुत्र प्रतापी सार्वभौम था, जो भूतलपर एकच्छत्र चक्रवर्ती सम्राटके रूपमें सुशोभित हुआ। उसके उस विशाल वंशमें एक महापौरव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा रुक्मरथ महापौरवके पुत्र कहे गये हैं। रुक्मरथका पुत्र सुपार्श्व नामका राजा हुआ। सुपार्श्वका पुत्र धर्मात्मा सुमति हुआ। सुमतिका पुत्र धर्मात्मा राजा संनतिमान् था। उस संनतिमान्का कृत नामक महान् प्रतापी पुत्र था, जो महात्मा हिरण्यनाभ कौसल्य (कौथुम)-का शिष्य हुआ। इसी राजाने सामवेदकी संहिताओंको चौबीस भागोंमें विभक्त किया, जो प्राच्यसामके नामसे प्रसिद्ध हुईं तथा उन साम-संहिताओंका गान करनेवाले कार्त नामसे कहे जाने लगे। ये उग्रायुध इसी कृतके पुत्र थे, जो पौरववंशकी विशेषरूपसे वृद्धि करनेवाले थे। इन्होंने ही पराक्रम प्रकट करके पृथुकके पिता पाञ्चाल-नरेश जितेन्द्रिय महाराज नीलका वध किया था। उग्रायुधका पुत्र महायशस्वी क्षेम हुआ। क्षेमसे सुनीथका और सुनीथसे नृपञ्जयका जन्म हुआ। नृपञ्जयसे विरथकी उत्पत्ति हुई। ये सभी नरेश पौरवनामसे विख्यात हुए। ७०-७९॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे पौरववंश कीर्तनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें पौरव- -वंश-कीर्तन नामक उनचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४९ ॥
१. वायुपुराण ९९ । १०० में यहाँ कौथुम' पाठ है। सामवेदियोंकी कौथुमी संहिता प्रसिद्ध है।
२. यहाँ सामवेद-संहिताके इतिहासकी एकसे चौबीस (तथा पुनः एक हजार शाखा होनेकी) बड़ी रहस्यात्मक बात कही गयी है। कार्त्त शाखाका उल्लेख सभी चरणव्यूहोंमें भी है। इसी प्रकार वायु ५९-६१ तथा ब्रह्माण्ड २।३८-४१ में भी वेदोंका सच्चा एवं विस्तृत इतिहास है। २४ सामशाखाएँ चरणव्यूह आदिमें यों निर्दिष्ट हैं-१-वार्तान्तरेय, २-राणायनीय, ३-शाट्यायनीय, ४-आसुरायणीय, ५-वासुरायणीय, ६-प्राचीनयोग, ७-प्राञ्जल ऋग, ८-साक्ष्यमुद्गल, ९-खल्वल, १०-महाखल्वल, ११-माङ्गल, १२-कौथुम, १३-गौतम, १४-जेमिनीय, १५-सुपर्ण, १६-बालखिल्य, १७-सांत्यमुग्र, १८-कालेय, १९-महाकालेय, २०-लाङ्गलायन, २१-शार्दूल, २२-तातायन, २३-नैगमीय और २४-पावमान।
Summary of chapter 49 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the primary royal branch of Puru, known as the Paurava-vaṁsha, which held the central sovereign throne of Bhārata. The chronicle traces the lineage through Rantineya, Anila, and King Dushyanta, who married Shakuntalā who was the daughter of Sage Vishvāmitra and Menakā in a Gāndharva marriage. Their illustrious son was Emperor Bharata, a paramount sovereign who conquered the entire subcontinent from sea to sea, performed countless Ashvamedha sacrifices, and after whom this sacred land was named Bhāratavarsha. Finding his own biological sons lacking in royal virtue, Emperor Bharata named Bhumānyu, who was the son of Bharadvāja, as his heir, demonstrating that royal succession must prioritize moral character and competence over mere biological inheritance.