मत्स्य महा पुराण
नर्मदातटवर्ती तीर्थोका माहात्म्य
मार्कण्डेय उवाच
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ह्यकुशेश्वरमुत्तमम्।
दर्शनात् तस्य देवस्य मुच्यते सर्वपातकैः॥ १
ततो गच्छेच्च राजेन्द्र नर्मदेश्वरमुत्तमम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोके महीयते॥ २
अश्वतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।
सुभगो दर्शनीयश्च भोगवाञ्जायते नरः॥ ३
पैतामहं ततो गच्छेद् ब्रह्मणा निर्मितं पुरा।
तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या पितृपिण्डं तु दापयेत्॥ ४
तिलदर्भविमिश्रं तु ह्युदकं तत्र दापयेत्।
तस्य तीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम्॥ ५
सावित्रीतीर्थमासाद्य यस्तु स्नानं समाचरेत्।
विधूय सर्वपापानि ब्रह्मलोके महीयते॥ ६
मनोहरं ततो गच्छेत् तीर्थं परमशोभनम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् पितृलोके महीयते॥ ७
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र मानसं तीर्थमुत्तमम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ८
ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कुञ्जतीर्थमनुत्तमम्।
विख्यातं त्रिषु लोकेषु सर्वपापप्रणाशनम्॥ ९
यान् यान् कामयते कामान् पशुपुत्रधनानि च।
प्राप्नुयात् तानि सर्वाणि तत्र स्नात्वा नराधिप॥१०
मार्कण्डेयजीने कहा-राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ अङ्कुशेश्वरतीर्थकी यात्रा करे, जहाँ उन देवके दर्शन- मात्रसे मनुष्य सभी पापोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ नर्मदेश्वरतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य स्वर्गलोकमें पूजित होता है। तदुपरान्त अश्वतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य सौभाग्यशाली, दर्शनीय और रूपवान् हो जाता है। इसके बाद प्राचीनकालमें ब्रह्माद्वारा निर्मित पैतामहतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर भक्तिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान करे तथा तिल और कुशसे युक्त तर्पण करे; क्योंकि उस तीर्थके प्रभावसे वहाँ किया गया यह सब अक्षय हो जाता है। जो सावित्रीतीर्थमें जाकर स्नान करता है, वह अपने सभी पापोंको धोकर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। राजन्! तदनन्तर अतिशय रमणीय मनोहर-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नानकर मनुष्य पितृलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ मानसतीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ कुञ्जतीर्थकी यात्रा करे। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध यह तीर्थ सभी पापोंका नाशक है। नराधिप! मनुष्य, पशु, पुत्र, धन आदि जिन-जिन वस्तुओंकी कामना करता है, वह सब उसे वहाँ स्नान करनेसे प्राप्त हो जाता है॥१-१०॥
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र त्रिदशज्योतिविश्रुतम्।
यत्र ता ऋषिकन्यास्तु तपोऽतप्यन्त सुव्रताः॥११
भर्ता भवतु सर्वासामीश्वरः प्रभुरव्ययः ।
प्रीतस्तासां महादेवो दण्डरूपधरो हरः॥ १२
विकृताननबीभत्सुर्वती तीर्थमुपागतः।
तत्र कन्या महाराज वरयत् परमेश्वरः ।। १३
कन्या ऋषेर्वरयत: कन्यादानं प्रदीयताम्।
तीर्थं तत्र महाराज ऋषिकन्येति विश्रुतम्॥१४
तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते।
ततो गच्छेच्च राजेन्द्र स्वर्णविन्दु त्विति स्मृतम्॥ १५
तत्र स्नात्वा नरो राजन् दुर्गतिं न च पश्यति।
अप्सरेशं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्॥१६
क्रीडते नागलोकस्थोऽप्सरोभिः सह मोदते।
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र नरके तीर्थमुत्तमम्॥१७
तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं नरकं च न पश्यति।
भारभूतिं ततो गच्छेदुपवासपरो जनः॥१८
एतत् तीर्थं समासाद्य चावतारं तु शाम्भवम्।
अर्चयित्वा विरूपाक्षं रुद्रलोके महीयते॥१९
अस्मिस्तीर्थे नरः स्नात्वा भारभूतौ महात्मनः।
यत्र तत्र मृतस्यापि ध्रुवं गाणेश्वरी गतिः॥२०
कार्तिकस्य तु मासस्य ह्यर्चयित्वा महेश्वरम्।
अश्वमेधाद् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः॥२१
दीपकानां शतं तत्र घृतपूर्णं तु दापयेत्।
विमानैः सूर्यसंकाशैर्बजते यत्र शंकरः ॥ २२
वृषभं यः प्रयच्छेत् तु शङ्खकुन्देन्दुसप्रभम्।
वृषयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति॥२३
धेनुमेकां तु यो दद्यात् तस्मिस्तीर्थे नराधिप।
पायसं मधुसंयुक्तं भक्ष्याणि विविधानि च॥२४
राजेन्द्र! इसके बाद प्रसिद्ध त्रिदशज्योतितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ उत्तम व्रत धारण करनेवाली उन ऋषि-कन्याओंने तपस्या की थीं। उनकी अभिलाषा थी कि अविनाशी एवं सामर्थ्यशाली महेश्वर हम सभीके पति हों। तब उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर संहारकारी महादेव, जिनका मुख विकृत और शरीर घृणास्पद था तथा जो उत्तम व्रतमें लीन थे, दण्ड धारणकर उस तीर्थमें आये। महाराज! वहाँ शंकरजीने उन कन्याओंका वरण किया। महाराज! वहाँ शंकरजीने ऋषिकन्याओंका वरण किया था, अतः वह स्थान ऋषिकन्या नामसे विख्यात तीर्थ हुआ। यहाँ कन्यादान करना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदनन्तर स्वर्णबिन्दु नामक प्रसिद्ध तीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यको दुर्गति नहीं देखनी पड़ती। तत्पश्चात् अप्सरेशतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेवाला नागलोकमें अप्सराओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त नरक नामक श्रेष्ठ तीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करे तो नरक नहीं देखना पड़ता ॥११-१७॥
इसके बाद भारभूतितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। इस तीर्थमें आकर मनुष्य उपवासपूर्वक शम्भूके अवतार विरूपाक्षकी अर्चना करके रुद्रलोकमें पूजित होता है। महात्मा शंकरके इस भारभूतितीर्थमें स्नानकर मनुष्य जहाँ-कहीं भी मरता है तो उसे निश्चय ही गणोंके अध्यक्षकी गति प्राप्त होती है। कार्तिकमासमें यहाँ महेश्वरकी पूजा करनेसे अश्वमेधयज्ञसे दसगुना फल प्राप्त होता है-ऐसा विद्वानोंने कहा है। जो वहाँ घृतपूर्ण सौ दीपक जलाता है, वह सूर्यके समान देदीप्यमान विमानोंसे शंकरजीके निकट चला जाता है। जो वहाँ शङ्ख, कुन्द-पुष्प एवं चन्द्रमाके समान उज्ज्वल रंगके वृषभका दान करता है, वह वृषयुक्त विमानसे रुद्रलोकको जाता है। नराधिप! उस तीर्थमें जो एक धेनुका दान देता है और यथाशक्ति मधुसंयुक्त खीर एवं विविध भोज्य पदार्थ ब्राह्मणोंको खिलाता है,
यथाशक्त्या च राजेन्द्र ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः।
तस्य तीर्थप्रभावेण सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥ २५
नर्मदाया जलं पीत्वा ह्यर्चयित्वा वृषध्वजम्।
दुर्गतिं च न पश्यन्ति तस्य तीर्थप्रभावतः॥२६
एतत् तीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् विमुञ्चति।
सर्वपापविनिर्मुक्तो व्रजेद् वै यत्र शंकरः।
जलप्रवेशं यः कुर्यात् तस्मिस्तीर्थे नराधिप॥ २७
हंसयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति।
यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च हिमवांश्च महोदधिः ॥ २८
गङ्गाद्याः सरितो यावत् तावत् स्वर्गे महीयते।
अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिस्तीर्थे नराधिप॥२९
गर्भवासे तु राजेन्द्र न पुनर्जायते पुमान्।
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र आषाढीतीर्थमुत्तमम्॥३०
तत्र स्नात्वा नरो राजन्निन्द्रस्यार्धासनं लभेत्।
स्त्रियास्तीर्थं ततो गच्छेत्सर्वपापप्रणाशनम्॥३१
तत्रापि स्नातमात्रस्य ध्रुवं गाणेश्वरी गतिः।
ऐरण्डीनर्मदयोश्च संगमं लोकविश्रुतम्॥ ३२
तच्च तीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
उपवासपरो भूत्वा नित्यव्रतपरायणः॥३३
तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र मुच्यते ब्रह्महत्यया।
ततो गच्छेच्च राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमम्।। ३४
जामदग्न्यमिति ख्यातं सिद्धो यत्र जनार्दनः ।
यत्रेष्ट्वा बहुभिर्यज्ञैरिन्द्रो देवाधिपोऽभवत्। ३५
तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमे।
त्रिगुणं चाश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ३६
पश्चिमस्योदधेः संधौ स्वर्गद्वारविघट्टनम्।
तत्र देवाः सगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः॥३७
आराधयन्ति देवेशं त्रिसंध्यं विमलेश्वरम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥३८
विमलेशात् परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।
तत्रोपवासं कृत्वा ये पश्यन्ति विमलेश्वरम्॥३९
सप्तजन्मकृतं पापं हित्वा यान्ति शिवालयम्।
राजेन्द्र! उसका वह सभी कर्म उस तीर्थके प्रभावसे करोड़गुना हो जाता है। जो लोग नर्मदाका जल पीकर शिवजीकी पूजा करते हैं, उन्हें उस तीर्थके प्रभावसे दुर्गति नहीं देखनी पड़ती। जो इस तीर्थमें आकर प्राणोंका त्याग करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर शंकरजीके समीप चला जाता है। नराधिप! उस तीर्थमें जो जलमें प्रवेश (करके प्राण-त्याग) करता है, वह हंसयुक्त विमानसे रुद्रलोकको जाता है तथा जबतक चन्द्रमा, सूर्य, हिमालय, महासागर और गङ्गा आदि नदियाँ हैं, तबतक स्वर्गमें पूजित होता है। नराधिप! जो पुरुष उस तीर्थमें अनशन करता है, राजेन्द्र ! वह पुनः गर्भमें वास नहीं करता ॥ १८-२९॥
राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ आषाढ़ीतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य इन्द्रके आधे आसनको प्राप्त कर लेता है। तत्पश्चात् सभी पापोंके विनाशक स्त्री-तीर्थमें जाय। वहाँ भी स्नानमात्रसे निश्चय ही गाणेश्वरी गति प्राप्त होती है। ऐरण्डी और नर्मदाका संगम लोकप्रसिद्ध तीर्थ है, वह अतिशय पुण्यदायक तथा सभी पापोंका विनाश करनेवाला है। राजेन्द्र ! वहाँ उपवास और नित्य व्रतोंका सम्पादन करते हुए स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त नर्मदा और समुद्रके संगमपर जाना चाहिये, जो जामदग्न्य नामसे प्रसिद्ध है। इसी तीर्थमें जनार्दनको सिद्धि प्राप्त हुई थी तथा इन्द्र अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान कर देवताओंके अधीश्वर हुए। राजेन्द्र! उस नर्मदा और सागरके सङ्गममें स्नान कर मनुष्य अश्वमेधयज्ञसे तिगुना फल प्राप्त करता है। पश्चिम समुद्रके संधि-स्थानपर स्वर्गद्वारविघट्टन तीर्थ है, वहाँ देवता, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण तीनों संध्याओंमें विमलेश्वर महादेवकी आराधना करते हैं। राजन्! वहाँ स्नानकर मानव रुद्रलोकमें पूजित होता है। विमलेश्वरसे बढ़कर तीर्थ न हुआ है और न होगा। उस तीर्थमें उपवास कर जो विमलेश्वरका दर्शन करते हैं, वे सात जन्मोंके पापोंसे मुक्त होकर शिवपुरीमें जाते हैं॥३०-३१।।
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कौशिकीतीर्थमुत्तमम्॥ ४०
तत्र स्नात्वा नरो राजन्नुपवासपरायणः।
उपोष्य रजनीमेकां नियतो नियताशनः॥४१
एतत्तीर्थप्रभावेण मुच्यते ब्रह्महत्यया।
सर्वतीर्थाभिषेकं तु यः पश्येत् सागरेश्वरम्॥४२
योजनाभ्यन्तरे तिष्ठन्नावर्ते संस्थितः शिवः।
तं दृष्ट्वा सर्वतीर्थानि दृष्टान्येव न संशयः॥ ४३
सर्वपापविनिर्मुक्तो यत्र रुद्रः स गच्छति।
नर्मदासंगमं यावद् यावच्चामरकण्टकम्॥४४
अत्रान्तरे महाराज तीर्थकोट्यो दश स्मृताः ।
तीर्थात्तीर्थान्तरं यत्र ऋषिकोटिनिषेवितम्॥४५
साग्निहोत्रैस्तु विद्वद्भिः सर्वैर्ध्यानपरायणैः।
सेवितानेन राजेन्द्र त्वीप्सितार्थप्रदायिका॥४६
यस्त्विदं वै पठेन्नित्यं शृणुयाद् वापि भावतः।
तस्य तीर्थानि सर्वाणि ह्यभिषिञ्चन्ति पाण्डव ।। ४७
नर्मदा च सदा प्रीता भवेद् वै नात्र संशयः।
प्रीतस्तस्य भवेद् रुद्रो मार्कण्डेयो महामुनिः॥ ४८
वन्ध्या चैव लभेत् पुत्रान् दुर्भगा सुभगा भवेत्।
कन्या लभेत भर्तारं यश्च वाञ्छेत् तु यत्फलम्।
तदेव लभते सर्वं नात्र कार्या विचारणा॥४९
ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विजयी भवेत्।
वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रः प्राप्नोति सद्गतिम्॥५०
मूर्खस्तु लभते विद्यां त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।
नरकं च न पश्येत् तु वियोगं च न गच्छति॥५१
राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ कौशिकीतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ उपवासपूर्वक स्नान करने और नियमित भोजन करके एक रात निवास करनेसे मनुष्य इस तीर्थके प्रभावसे ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। जो सागरेश्वरका दर्शन करता है, उसे सभी तीर्थों के अभिषेकका फल प्राप्त हो जाता है। वहाँसे एक योजनके भीतर बर्तुलस्थानमें शिवजी संस्थित हैं, अतः उनका दर्शन कर लेनेसे सभी तीर्थों का दर्शन हो जाता है-इसमें संशय नहीं है। वह मानव सभी पापोंसे मुक्त होकर जहाँ रुद्र रहते हैं, वहाँ चला जाता है। महाराज! नर्मदा-सङ्गमसे लेकर अमरकण्टकके मध्यमें दस करोड तीर्थ बतलाये जाते हैं। वहाँ एक तीर्थसे दूसरे तीर्थके मध्यमें करोड़ों ऋषिगण निवास करते हैं। राजेन्द्र! सभी ध्यानपरायण अग्निहोत्री विद्वानोंद्वारा सेवित यह तीर्थ-परम्परा अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली है। पाण्डव! जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इन तीर्थोंका पाठ करता है या श्रवण करता है, उसे सभी तीर्थों में अभिषेक करनेका फल प्राप्त होता है और उसपर नर्मदा सदा प्रसन्न होती है-इसमें संदेह नहीं है। साथ ही उसपर महामुनि मार्कण्डेय एवं रुद्र प्रसन्न होते हैं। (इस तीर्थके प्रभावसे) वन्ध्याको पुत्रकी प्राप्ति होती है, अभागिनी सौभाग्यवती हो जाती है, कन्या पतिको प्राप्त करती है तथा अन्य जो कोई जिस फलको चाहता है, उसे वह सब फल प्राप्त हो जाता है-इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। ब्राह्मण वेदका ज्ञान प्राप्त करता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य धन प्राप्त करता है और शूद्रको अच्छी गति प्राप्त होती है तथा मूर्ख विद्याको प्राप्त करता है। जो मनुष्य तीनों संध्याओंमें इसका पाठ करता है उसे न तो नरकका दर्शन होता है और न प्रियजनोंका वियोग ही प्राप्त होता है॥४०-५१॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्यं नाम चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९४ ।।
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९४॥
Summary of chapter 196 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya expounds upon the expansive Gotra branches and Pravaras descending from Maharshi Aṅgiras, one of the greatest mind-born sons of Bhagavān Brahmā. The text details prominent sub-clans including Bharadvāja, Gautama, Utathya, and Saṁvarta, specifying their ancestral sage triads and pentads used during Vedic fire sacrifices.