प्रत्येक सर्गके अधिपतियोंका अभिषेचन तथा पृथुका राज्याभिषेक

ऋषय ऊचुः

आदिसर्गश्च यः सूत कथितो विस्तरेण तु।

प्रतिसर्गे च ये येषामधिपास्तान् वदस्व नः॥१

ऋषियोंने पूछा-सूतजी! आपने हम लोगोंके प्रति जिस आदिसर्ग और प्रतिसर्गका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, उन स!में जो जिस वर्गके अधिपति हुए, उनके विषयमें अब हमें बतलाइये ॥१॥

सूत उवाच

यदाभिषिक्तः सकलह्याधिराज्ये

पृथुर्धरित्र्यामधिपो बभूव।

तदौषधीनामधिपं चकार

यज्ञव्रतानां तपसां च चन्द्रम्॥२

नक्षत्रताराद्विजवृक्षगुल्म-

लतावितानस्य च रुक्मगर्भः।

अपामधीशं वरुणं धनानां

राज्ञां प्रभुं वैश्रवणं च तद्वत्॥३

विष्णुं रवीणामधिपं वसूना-

मग्निं च लोकाधिपतिश्चकार ।

प्रजापतीनामधिपं च दक्षं

चकार शक्रं मरुतामधीशम्॥४

दैत्याधिपानामथ दानवानां

प्रह्लादमीशं च यमं पितॄणाम्।

पिशाचरक्षःपशुभूतयक्ष-

वेतालराजं त्वथ शूलपाणिम् ॥५

प्रालेयशैलं च पतिं गिरिणा-

मीशं समुद्रं ससरिन्नदानाम् ।

गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणा-

मीशं पुनश्चित्ररथं चकार॥६

नागाधिपं वासुकिमुग्रवीर्य

साधिपं तक्षकमादिदेश।

दिशां गजानामधिपं चकार

गजेन्द्रमैरावत नामधेयम्॥७

सुपर्णमीशं पततामथाश्व-

राजानमुच्चैःश्रवसं चकार।

सिंहं मृगाणां वृषभं गवां च

प्लक्षं पुनः सर्ववनस्पतीनाम्॥८

पितामहः पूर्वमथाभ्यषिञ्च-

च्चैतान् पुनःसर्वदिशाधिनाथान्।

पूर्वेण दिक्पालमथाभ्यषिञ्च-

नाम्नासुधर्माणमरातिकेतुम् ॥९

ततोऽधिपं दक्षिणतश्चकार

सर्वेश्वरं शङ्खपदाभिधानम्।

सुकेतुमन्तं दिशि पश्चिमायां

चकार पश्चाद् भुवनाण्डगर्भः॥१०॥

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! जब महाराज पृथु समस्त भूमण्डलके अधिनायक-पदपर अभिषिक्त होकर सबके अधिपति हुए, उस समय उन हिरण्यगर्भ ब्रह्माने चन्द्रमाको ओषधि, यज्ञ, व्रत, तप, नक्षत्र, तारा, द्विज, वृक्ष, गुल्म और लतासमूहका अध्यक्ष बनाया। उन्होंने वरुणको जलका, कुबेरको धन और राजाओंका, विष्णुको आदित्योंका, अग्निको वसुओंका अधिपति बनाया। दक्षको प्रजापतियोंका, इन्द्रको मरुतोंका, प्रह्लादको दैत्यों और दानवोंका, यमराजको पितरोंका, शूलपाणि शिवको पिशाच, राक्षस, पशु, भूत, यक्ष और वेतालोंका, हिमालयको पर्वतोंका, समुद्रको छोटी-बड़ी नदियोंका, चित्ररथको गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरोंका, प्रबल पराक्रमी वासुकिको नागोंका, तक्षकको, सर्पोका, ऐरावत नामक गजेन्द्रको दिग्गजोंका, गरुड़को पक्षियोंका, उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका, सिंहको वन्य जीवोंका, , वृषभको गौओंका और पाकड़को समस्त वनस्पतियोंका अधिनायक नियुक्त किया। फिर ब्रह्माने सर्गारम्भके समय सम्पूर्ण दिशाओंके अधिनायकोंको भी अभिषिक्त किया। उन्होंने शत्रुओंके संहारक सुधर्माको पूर्व दिशाके दिक्पाल-पदपर स्थापित किया। इसके बाद सर्वेश्वर शङ्खपदको दक्षिण दिशाका स्वामी बनाया। सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपनेमें अन्तर्भूत करनेवाले ब्रह्माने सुकेतुमान्को पश्चिम दिशाका अध्यक्ष बनाया ॥२-१०॥

१. पाठान्तर- ऐरावण । २. इसीलिये वेदादिमें कुबेरको 'राजाधिराज वैश्रवण' कहा गया है

हिरण्यरोमाणमुदग्दिगीशं

प्रजापतिर्देवसुतं चकार।

अद्यापि कुर्वन्ति दिशामधीशा:

शत्रून् दहन्तस्तु भुवोऽभिरक्षाम्॥११॥

चतुर्भिरेभिः पृथुनामधेयो

नृपोऽभिषिक्तः प्रथमं पृथिव्याम्।

गतेऽन्तरे चाक्षुषनामधेये

वैवस्वताख्ये च पुनः प्रवृत्ते।

प्रजापतिः सोऽस्य चराचरस्य

बभूव सूर्यान्वयवंशचिह्नः॥१२॥

प्रजापति ब्रह्माने देवपुत्र हिरण्यरोमाको उत्तर दिशाका स्वामित्व प्रदान किया। ये दिक्पालगण आज भी शत्रुओंको सन्तप्त करते हुए पृथ्वीकी सब ओरसे रक्षा करते हैं। इन्हीं चारों दिक्पालोंद्वारा पहले-पहल भूतलपर पृथु नामके नरेश अभिषिक्त हुए थे। चाक्षुष-मन्वन्तरकी समाप्तिके बाद पुन: वैवस्वतमन्वन्तरके प्रारम्भ होनेपर सूर्यवंशके चिह्नस्वरूप ये राजा पृथु इस चराचर जगत्के प्रजापति हुए थे॥११-१२॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽधिपत्याभिषेचनं नामाष्टमोऽध्यायः॥८॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें आधिपत्याभिषेचन नामक आठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥८॥