मत्स्य महा पुराण
कार्पासाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
ईश्वर उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कार्पासाचलमुत्तमम्।
यत्प्रदानान्नरः श्रीमान् प्राप्नोति परमं पदम्॥१
कार्पासपर्वतस्तद्वद् विंशद्धारैरिहोत्तमः।
ईश्वरने कहा-नारद! इसके पश्चात् मैं श्रेष्ठ कार्पासाचलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका दान करनेसे मनुष्य धनवाला परमपदको प्राप्त कर लेता है। इस लोकमें बीस भार रूईसे बना हुआ कार्पासपर्वत उत्तम,
दशभिर्मध्यमः प्रोक्तः पञ्चभिस्त्वधमः स्मृतः।
भारेणाल्पधनो दद्याद् वित्तशाठ्यविवर्जितः॥२
धान्यपर्वतवत् सर्वमासाद्य मुनिपुङ्गव।
प्रभातायां तु शर्वर्यां दद्यादिदमुदीरयन्॥३
त्वमेवावरणं यस्माल्लोकानामिह सर्वदा।
कार्पासाद्रे नमस्तुभ्यमघौघध्वंसनो भव॥४
इति कार्पासशैलेन्द्रं यो दद्याच्छर्वसंनिधौ।
रुद्रलोके वसेत् कल्पं ततो राजा भवेदिह॥५
दस भारसे बना हुआ मध्यम और पाँच भारसे बना हुआ अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य कृपणता छोड़कर एक भार कपाससे बने हुए पर्वतका दान कर सकता है। मुनिश्रेष्ठ! धान्यपर्वतकी भाँति सारी सामग्री एकत्र कर रात्रिके व्यतीत होनेपर प्रात:काल इसे दान करनेका विधान है। उस समय ऐसा मन्त्र उच्चारण करना चाहिये-'कार्पासाचल! चूँकि इस लोकमें तुम्हीं सदा सभी लोगोंके शरीरके आच्छादन हो, इसलिये तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे पापसमूहका विनाश कर दो।' इस प्रकार जो मनुष्य भगवान् शिवके संनिधानमें कार्पासाचलका दान करता है, वह एक कल्पतक रुद्रलोकमें निवास करनेके पश्चात् भूतलपर राजा होता है॥ १-५॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कार्पासशैलकीर्तनं नामाष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥८८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कार्पासशैलकीर्तन नामक अठासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥८८॥
Summary of chapter 88 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the procedure for Kārpasāchala-Dāna, the sacred donation of a symbolic mountain constructed from clean, unblemished raw cotton. The practitioner arranges twenty maunds of raw cotton upon a sanctified platform, decorating it with golden images, silver ornaments, fruit clusters, and colorful banners. The devotee invokes the Devas of protection and purity within the cotton heap, performing worship with sandalwood paste, white flowers, and lighted lamps. Presenting this cotton mountain to a worthy Brāhmaṇa purifies the donor from all subtle sins of thought, word, and deed, bestows pure garments and endless prosperity, and grants residence in the celestial realm of Svarga.