मत्स्य महा पुराण
शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना
शौनक उवाच
ततः काव्यो भृगुश्रेष्ठः समन्युरुपगम्य ह।
वृषपर्वाणमासीनमित्युवाचाविचारयन्॥१
नाधर्मश्चरितो राजन् सद्यः फलति गौरिव।
शनैरावय॑मानस्तु मूलान्यपि निकृन्तति॥२
यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पश्यति नतृषु।
पापमाचरितं कर्म त्रिवर्गमतिवर्तते॥३
शौनकजी कहते हैं-शतानीक! देवयानीकी बात सुनकर भृगुश्रेष्ठ शुक्राचार्य बड़े क्रोधमें भरकर वृषपर्वाके समीप गये।वह राजसिंहासनपर बैठा हुआ था।शुक्राचार्यजीने बिना कुछ सोचे-विचारे उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया-'राजन्! जो (लोकमें) अधर्म किया जाता है, उसका फल तुरंत नहीं मिलता। जैसे गायकी सेवा करनेपर धीरे- धीरे कुछ कालके बाद वह ब्याती और दूध देती है अथवा धरतीको जोत-बोकर बीज डालनेसे कुछ कालके बाद पौधा उगता और यथासमय फल देता है, उसी प्रकार किया जानेवाला अधर्म धीरे-धीरे जड़ काट देता है। यदि वह (पापसे उपार्जित द्रव्यका) दुष्परिणाम न अपने ऊपर दिखायी देता है, न पुत्रों अथवा नाती-पोतोंपर ही तो वह इस त्रिवर्गका अतिक्रमण करके आगेकी पीढ़ियोंपर अवश्य प्रकट होता है।
फलत्येवं ध्रुवं पापं गुरुभुक्तमिवादरे।
यदा घातयसे विप्रं कचमाङ्गिरसं तदा ॥ ४
अपापशीलं धर्मज्ञं शुश्रूषु मद्गृहे रतम्।
वधादनहतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम॥ ५
वृषपर्वन् निबोध त्वं त्यक्ष्यामि त्वां सबान्धवम्।
स्थातुं त्वद्विषये राजन् न शक्नोमि त्वया सह॥ ६
अद्यैवमभिजानामि दैत्यं मिथ्याप्रलापिनम्।
यतस्त्वमात्मनोदी) दुहितां किमुपेक्षसे॥ ७
वृषपर्वोवाच
नावद्यं न मृषावादं त्वयि जानामि भार्गव।
त्वयि सत्यं च धर्मश्च तत् प्रसीदतु मां भवान्॥ ८
अद्यास्मानपहाय त्वमितो यास्यसि भार्गव।
समुद्रं सम्प्रवेक्ष्यामि नान्यदस्ति परायणम्॥ ९
शुक्र उवाच
समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा व्रजतासुराः।
दुहितुर्नाप्रियं सोढुं शक्तोऽहं दयिता हि मे॥१०
प्रसाद्यतां देवयानी जीवितं यत्र मे स्थितम्।
योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः॥११/
वृषपर्वोवाच
यत्किञ्चिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव।
भुवि हस्तिरथाश्वं वा तस्य त्वं मम चेश्वरः॥१२
शुक्र उवाच
यत्किचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर।
तस्येश्वरोऽस्मि यद्येतद् देवयानी प्रसाद्यताम्॥१३
जैसे खाया हुआ गरिष्ठ अन्न तुरंत नहीं तो कुछ देर बाद अवश्य ही पेटमें उपद्रव करता है, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी निश्चय ही अपना फल देता है। राजन्! अङ्गिराका पौत्र कच विशुद्ध ब्राह्मण है। वह स्वभावसे ही निष्पाप और धर्मज्ञ है तथा उन दिनों मेरे घर में रहकर निरन्तर मेरी सेवामें संलग्न था, परंतु तुमने उसका बार-बार वध करवाया था। वृषपर्वन् ! ध्यान देकर मेरी यह बात सुन लो, तुम्हारे द्वारा पहले वधके अयोग्य ब्राह्मणका वध किया गया है और अब मेरी पुत्री देवयानीका भी वध करनेके लिये उसे कुएँमें ढकेला गया है। इन दोनों हत्याओंके कारण मैं तुमको और तुम्हारे भाई-बन्धुओंको त्याग दूंगा। राजन्! तुम्हारे राज्यमें और तुम्हारे साथ मैं एक क्षण भी नहीं ठहर सकूँगा। दैत्यराज! आज मैं तुम-जैसे मिथ्याप्रलापी दैत्यको भलीभाँति समझ सका हूँ। तुम अपनी पुत्रीके उद्धत स्वभावकी उपेक्षा क्यों कर रहे हो?'॥ १-७॥
वृषपर्वा बोले-भृगुनन्दन! आपने मेरे जानते कभी अनुचित या मिथ्या भाषण नहीं किया। आपमें धर्म और सत्य सदा प्रतिष्ठित हैं। अतः आप हमलोगोंपर कृपा करके प्रसन्न होइये! भार्गव! यदि आप हमें छोड़कर चले जाते हैं तो मैं (तुरन्त) समुद्रमें प्रवेश कर जाऊँगा; क्योंकि हमारे लिये फिर दूसरी कोई गति नहीं है।८-९॥
शुक्राचार्यने कहा-असुरो! तुम लोग समुद्रमें घुस जाओ अथवा चारों दिशाओंमें भाग जाओ, मैं अपनी पुत्रीके प्रति किया गया अप्रिय बर्ताव नहीं सह सकता; क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। तुम देवयानीको प्रसन्न करो; क्योंकि उसीमें मेरे प्राण बसते हैं। उसके प्रसन्न हो जानेपर इन्द्रके पुरोहित बृहस्पतिकी भाँति मैं तुम्हारे योगक्षेमका वहन करता रहूँगा ॥१०-११॥
वृषपर्वा बोले-भृगुनन्दन! असुरेश्वरोंके पास इस भूतलपर जो कुछ भी सम्पत्ति तथा हाथी-घोड़े आदि पशुधन है, उसके और मेरे भी आप ही स्वामी हैं॥१२॥
शुक्राचार्यने कहा-महान् असुर! दैत्यराजोंका जो कुछ भी धन-वैभव है, यदि उसका स्वामी मैं ही हूँ तो उसके द्वारा इस देवयानीको प्रसन्न करो॥१३ ।।
शौनक उवाच
ततस्तु त्वरितः शुक्रस्तेन राज्ञा समं ययौ।
उवाच चैनां सुभगे प्रतिपन्नं वचस्तव॥१४
देवयान्युवाच
यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव।
नाभिजानामि तत्तेऽहं राजा वदतु मां स्वयम्॥१५
वृषपर्वोवाच
यं काममभिजानासि देवयानि शुचिस्मिते।
तत्तेऽहं सम्प्रदास्यामि यद्यपि स्यात् सुदुर्लभम्॥१६
देवयान्युवाच
दासी कन्यासहस्त्रेण शर्मिष्ठामभिकामये।
अनुयास्यति मां तत्र यत्र दास्यति मे पिता॥१७
वृषपर्वोवाच
उत्तिष्ठ धात्रि गच्छ त्वं शर्मिष्ठां शीघ्रमानय।
यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम्॥१८
शौनक उवाच
ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठामिदमब्रवीत्।
उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह॥१९
यं सा कामयते कामं स कार्योऽत्र त्वयानचे।
दासी त्वमभिजातासि देवयान्या: सुशोभने॥२०
त्यजति ब्राह्मण: शिष्यान् देवयान्या प्रचोदितः।
शर्मिष्ठोवाच
यं च कामयते कामं करवाण्यहमद्य तम्।
मा गान्मन्युवशं शुक्रो देवयानी च मत्कृते॥२१
शौनक उवाच
तत: कन्यासहस्त्रेण वृता शिविकया तदा।
पितुर्निदेशात् त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात्॥ २२
शर्मिष्ठोवाच
अहं कन्यासहस्त्रेण दासी ते परिचारिका।
ध्रुवं त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता॥२३
शौनकजी कहते हैं-शतानीक! तदनन्तर शुक्राचार्य तुरंत ही राजा वृषपर्वाके साथ अपनी पुत्री देवयानीके पास पहुंचे और उससे बोले-'सुभगे! तुम्हारी बात पूरी हो गयी' ॥ १४॥
तब देवयानीने कहा-तात भार्गव! आप राजाके धनके स्वामी हैं' मैं इस बातको आपके कहनेसे नहीं मानूँगी। राजा स्वयं कहें तो हमें विश्वास होगा॥१५॥
वृषपर्वा बोले-पवित्र मुसकानवाली देवयानी! तुम जिस वस्तुको पाना चाहती हो, वह यदि अत्यन्त दुर्लभ हो तो भी मैं उसे तुम्हें अवश्य दूंगा (यह तुम विश्वास करो)॥१६॥
देवयानीने कहा-मैं चाहती हूँ, शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओंके साथ मेरी दासी बनकर रहे और पिताजी जहाँ मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाय ॥ १७॥
यह सुनकर वृषपर्वाने धायसे कहा-धात्रि! तुम उठो, जाओ और शर्मिष्ठाको (यहाँ) शीघ्र बुला लाओ एवं देवयानीकी जिस वस्तुकी कामना हो, उसे वह पूर्ण करे ॥ १८॥
शौनकजी कहते हैं-तब धायने शर्मिष्ठाके पास जाकर कहा-'भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने जाति- भाइयोंको सुख पहुँचाओ। पापरहित राजकुमारी ! आज शुक्राचार्य देवयानीके कहनेसे अपने शिष्यों-यजमानोंको त्याग रहे हैं। अत: देवयानीकी जो कामना हो, वह तुम्हें पूर्ण करनी चाहिये। सुशोभने! तुम देवयानीकी दासी बनायी गयी हो'॥ १९-२०॥
शर्मिष्ठा बोली- यदि इस प्रकार देवयानीके लिये ही शुक्राचार्यजी मुझे बुला रहे हैं तो देवयानी जो कुछ चाहती हैं, वह सब आजसे मैं करूँगी। मेरे अपराधसे न शुक्राचार्यजी कहीं जायँ और न देवयानी ही। मेरे कारण ये अन्यत्र जानेका विचार न करें॥ २१ ।।
शौनकजी कहते हैं- शतानीक! तदनन्तर पिताकी आज्ञासे राजकुमारी शर्मिष्ठा शिविकापर आरूढ़ हो तुरन्त राजधानीसे बाहर निकली। उस समय वह एक सहस्र कन्याओंसे घिरी हुई थी॥ २२॥
शर्मिष्ठा बोली-देवयानी ! मैं एक सहस्र दासियोंके साथ तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूँगी और तुम्हारे पिता जहाँ भी तुम्हारा ब्याह करेंगे, निश्चय ही वहाँ तुम्हारे साथ चलूँगी ॥ २३ ॥
देवयान्युवाच
स्तुवतो दुहिता चाहं याचतः प्रतिगृह्णतः।
स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि ॥२४
शर्मिष्ठोवाच
येन केनचिदार्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत्।
अनुयास्याम्यहं तत्र यत्र दास्यति ते पिता ॥ २५
शौनक उवाच
प्रतिश्रुते दासभावे दुहित्रा वृषपर्वणः ।
देवयानी नृपश्रेष्ठ पितरं वाक्यमब्रवीत्॥२६
देवयान्युवाच
प्रविशामि पुरं तात तुष्टास्मि द्विजसत्तम।
अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्याबलं च ते॥२७
शौनक उवाच
एवमुक्तो द्विजश्रेष्ठो दुहित्रा सुमहायशाः ।
प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजित: सर्वदानवैः॥ २८
देवयानीने कहा-अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुककी पुत्री हूँ और तुम उस बड़े बापकी बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं, फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी? ॥ २४॥
शर्मिष्ठा बोली-जिस-किसी उपायसे भी सम्भव हो, अपने विपद्ग्रस्त जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाना चाहिये। (इसलिये) तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी ॥ २५ ॥
शौनकजी कहते हैं-नृपश्रेष्ठ ! जब वृषपर्वाकी पुत्रीने दासी होनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब देवयानीने अपने पितासे कहा॥ २६॥
देवयानी बोली-पिताजी! अब मैं नगरमें प्रवेश करूँगी। द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपका विज्ञान और आपकी विद्याका बल अमोघ है ॥ २७॥
शौनकजी कहते हैं-शतानीक! अपनी पुत्री देवयानीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी द्विज श्रेष्ठ शुक्राचार्यने समस्त दानवोंसे पूजित एवं प्रसन्न होकर नगरमें प्रवेश किया ॥२८॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरितवर्णन नामक उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २९ ॥
Summary of chapter 29 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya describes how King Yayāti, while out hunting in the forest, approached the dry well to quench his thirst and discovered Devayānī trapped inside. Extending his right hand, the king pulled her out to safety. Recognizing this act as an auspicious union, Devayānī declared that since he had grasped her right hand, he was ordained by destiny to be her husband. She sent her maidservant to inform Śukrāchārya of Princess Śarmishṭhā's insult. Infuriated by the humiliation of his daughter, Śukrāchārya immediately prepared to abandon King Vṛshaparvan and the entire Asura kingdom. Terrified of losing their spiritual preceptor and protection, King Vṛshaparvan rushed to Śukrāchārya, fell at his feet, and offered complete submission to satisfy Devayānī's demands.