मत्स्य महा पुराण
तारकासुर और कुमारका भीषण युद्ध तथा कुमारद्वारा तारकका वध
सूत उवाच
श्रुत्वैतत्तारकः सर्वमुघुष्टं देववन्दिभिः।
सस्मार ब्रह्मणो वाक्यं वधं बालादुपस्थितम्॥ १
स्मृत्वा धर्मं ह्यवर्माङ्गः पदातिरपदानुगः ।
मन्दिरान्निर्जगामाशु शोकग्रस्तेन चेतसा॥ २
कालनेमिमुखा दैत्याः संरम्भाद् भ्रान्तचेतसः।
योधा धावत गृह्णीत योजयध्वं वरूथिनीम्॥ ३
कुमारं तारको दृष्ट्वा बभाषे भीषणाकृतिः।
किं बाल योद्धकामोऽसि क्रीड कन्दुकलीलया॥ ४
त्वया न दानवा दृष्टा यत्सङ्गरविभीषकाः।
बालत्वादथ ते बुद्धिरेवं स्वल्पार्थदर्शिनी॥ ५
कुमारोऽपि तमग्रस्थं बभाषे हर्षयन् सुरान्।
शृणु तारक शास्त्रार्थस्तव चैव निरूप्यते॥ ६
शास्त्रैरा न दृश्यन्ते समये निर्भयैर्भटैः।
शिशुत्वं मावमंस्था मे शिशुः कालभुजङ्गमः ॥ ७
दुष्प्रेक्ष्यो भास्करो बालस्तथाहं दुर्जयः शिशुः।
अल्पाक्षरो न मन्त्रः किं सुस्फुरो दैत्य दृश्यते॥ ८
कुमारे प्रोक्तवत्येवं दैत्यश्चिक्षेप मुद्गरम्।
कुमारस्तं निरस्याथ वजेणामोघवर्चसा॥ ९
ततश्चिक्षेप दैत्येन्द्रो भिन्दिपालमयोमयम्।
करेण तच्च जग्राह कार्तिकेयोऽमरारिहा॥१०
गदां मुमोच दैत्याय षण्मुखोऽपि खरस्वनाम्।
तया हतस्ततो दैत्यश्चकम्पेऽचलराडिव॥११
मेने च दुर्जयं दैत्यस्तदा षड्वदनं रणे।
चिन्तयामास बुद्ध्या वै प्राप्तः कालो न संशयः॥१२
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! देववन्दियोंद्वारा उद्घोषित वह सारा प्रसङ्ग सुनकर तारकको ब्रह्माद्वारा कही हुई बालकके हाथसे वध होनेवाली बातका स्मरण हो आया। तब वह कालधर्मका स्मरण कर कवचरहित अवस्थामें अकेले पैदल ही तुरंत अपने भवनसे बाहर निकल पड़ा। उस समय उसका चित्त शोकसे ग्रस्त था। उसने पुकारकर कहा-'अरे कालनेमि आदि प्रमुख दैत्य योद्धाओ! यद्यपि आतुरतावश तुमलोगोंका चित्त उद्भ्रान्त हो उठा है, तथापि तुमलोग दौड़ो, इसे पकड़ लो और इस सेनाके साथ युद्ध करो।' तत्पश्चात् भयंकर आकृतिवाला तारक कुमारको देखकर बोला-'अरे बच्चे! क्या तुम युद्ध करना चाहते हो? यदि ऐसी बात है तो आओ और कन्दुकक्रीडाकी तरह खेलो। तुमने अभीतक रणभूमिमें भय उत्पन्न करनेवाले दानवोंको नहीं देखा है। बालक होनेके कारण तुम्हारी बुद्धि इस प्रकारके छोटे-मोटे प्रयोजनोंको देखनेवाली है अर्थात् दूरदर्शिनी नहीं है।' यह सुनकर कुमार भी देवताओंको हर्षित करते हुए आगे खड़े हुए तारकसे बोले-'तारक! सुनो, मैं तुम्हारे शास्त्रीय अर्थका निरूपण कर रहा हूँ। निर्भीक योद्धा समरभूमिमें शास्त्रीय प्रयोजनको नहीं देखते। तुम मेरे बालकपनकी अवहेलना मत करो। जैसे साँपका बच्चा कष्टकारक होता है और उदयकालीन सूर्यकी ओर भी नहीं देखा जा सकता, उसी तरह मैं दुर्जय बालक हूँ। दैत्य! थोड़े अक्षरोंवाला मन्त्र क्या महान् स्फूर्तिदायक नहीं देखा जाता?'॥१-८॥
कुमार इस प्रकारकी बातें कह ही रहे थे कि दैत्यने उनपर मुद्गरसे आघात किया। तब कुमारने अपने अमोघ वर्चस्वी वज्रसे उसे निरस्त कर दिया। तत्पश्चात् दैत्येन्द्रने उन पर लोहनिर्मित भिन्दिपाल चलाया, किंतु देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले कार्तिकेयने उसे हाथसे पकड़ लिया। फिर षडाननने उस दैत्यके ऊपर घोर शब्द करती हुई गदा फेंकी। उस गदासे आहत हो वह दैत्य पर्वतराजकी तरह काँप उठा। तब उस दैत्यने षडाननको रणभूमिमें अजेय मान लिया और वह बुद्धिसे विचार करने लगा कि निश्चय ही मेरा काल आ पहुंचा है।
कुपितं तु यमालोक्य कालनेमिपुरोगमाः।
सर्वे दैत्येश्वरा जघ्नुः कुमारं रणदारुणम्॥१३
स तैः प्रहारैरस्पृष्टो वृथाक्लेशो महाद्युतिः।
रणशौण्डास्तु दैत्येन्द्राः पुनः प्रासैः शिलीमुखैः॥१४
कुमारं सामरं जघ्नुर्बलिनो देवकण्टकाः ।
कुमारस्य व्यथा नाभूद् दैत्यास्त्रनिहतस्य तु॥१५
प्राणान्तकरणो जातो देवानां दानवाहवः।
देवान्निपीडितान् दृष्ट्वा कुमारः कोपमाविशत्॥१६
ततोऽस्त्रैर्वारयामास दानवानामनीकिनीम्।
ततस्तर्निष्प्रतीकारस्ताडिताः सुरकण्टकाः॥१७
कालनेमिमुखाः सर्वे रणादासन् पराङ्मुखाः।
विद्रुतेष्वथ दैत्येषु हतेषु च समंततः॥१८
ततः क्रुद्धो महादैत्यस्तारकोऽसुरनायकः।
जग्राह च गदां दिव्यां हेमजालपरिष्कृताम्॥१९
जम्ने कुमारं गदया निष्टप्लकनकाङ्गदः।
शरैर्मयूरं चित्रैश्च चकार विमुखान् सुरान्॥ २०
तथा परैर्महाभल्लैर्मयूरं गुहवाहनम्।
विभेद तारकः क्रुद्धः स सैन्येऽसुरनायकः॥२१
दृष्ट्वा पराङ्मुखान् देवान् मुक्तरक्तं स्ववाहनम्।
जग्राह शक्तिं विमलां रणे कनकभूषणाम्॥२२
बाहुना हेमकेयूररुचिरेण षडाननः।
ततो जवान्महासेनस्तारकं दानवाधिपम्॥ २३
तिष्ठ तिष्ठ सुदुर्बुद्धे जीवलोकं विलोकय।
हतोऽस्यद्य मया शक्त्या स्मर शस्त्रं सुशिक्षितम्॥ २४
इत्युक्त्वा च ततः शक्तिं मुमोच दितिजं प्रति।
सा कुमारभुजोत्सृष्टा तत्केयूररवानुगा।
बिभेद दैत्यहृदयं वज्रशैलेन्द्रकर्कशम्॥२५
गतासुः स पपातोया प्रलये भूधरो यथा।
विकीर्णमुकुटोष्णीषो विस्रस्ताखिलभूषणः ॥२६
तदनन्तर रणमें भीषण कार्य करनेवाले उन कुमारको क्रुद्ध देखकर कालनेमि आदि सभी दैत्येश्वर उनपर प्रहार करने लगे, परंतु उन प्रहारोंका परम कान्तिमान् कुमारपर कुछ भी प्रभाव न पड़ा। उनका शस्त्रास्त्र छोड़नेका श्रम व्यर्थ हो गया। पुनः युद्धनिपुण, देवकण्टक महाबली दैत्येन्द्र देवताओंसहित कुमारपर भाले और बाणोंसे प्रहार करने लगे। इस प्रकार दैत्यास्त्रोंद्वारा प्रहार करनेपर भी कुमारको कुछ भी पीड़ा न हुई। पर दानवोंका वह युद्ध जब देवताओंके लिये प्राणघातक-सा दीखने लगा, तब देवताओंको अत्यन्त पीड़ित देख कुमार क्रुद्ध हो उठे। फिर तो उन्होंने अपने अस्त्रोंके प्रहारसे दानवोंकी सेनाको खदेड़ दिया। उन अनिवार्य अस्त्रोंकी चोटसे कालनेमि आदि सभी देवकण्टक दानव घायल हो गये, तब वे युद्धसे विमुख हो भाग खड़े हुए॥९-१७३ ॥
तदनन्तर चारों ओर दैत्योंके इस प्रकार मारे जाने एवं पलायन कर जानेपर असुरनायक महादैत्य तारक क्रोधमें भर गया। तब तपाये हुए स्वर्णके बने हुए बाजूबंदको धारण करनेवाले उस दैत्यने स्वर्णसमूहसे विभूषित अपनी दिव्य गदा हाथमें ली और उस गदासे कुमारपर प्रहार किया। फिर मोर-पंखसे सुशोभित बाणोंके आघातसे देवताओंको युद्ध-विमुख कर दिया। तदुपरान्त क्रोधसे भरे हुए असुरनायक तारकने उस सेनामें दूसरे भल्ल नामक विशाल बाणोंसे गुहके वाहन मयूरको विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार रणभूमिमें देवताओंको युद्धविमुख और अपने वाहन मयूरको खून उगलते देखकर षडाननने वेगपूर्वक अपने स्वर्णनिर्मित केयूरसे विभूषित हाथमें स्वर्णजटित निर्मल शक्ति ग्रहण की। तत्पश्चात् देव- सेनानायक कुमार दानवेश्वर तारकको ललकारते हुए बोले-'सुदुर्बुद्धे ! खड़ा रह, खड़ा रह और जीवलोककी ओर दृष्टिपात कर ले। अपने भलीभाँति सीखे हुए शस्त्रका स्मरण कर ले। अब तू मेरी शक्तिद्वारा मारा जा चुका।' ऐसा कहकर उन्होंने उस दैत्यपर अपनी शक्ति छोड़ दी। कुमारके हाथसे छूटी हुई उस शक्तिने उनके केयूरके शब्दका अनुगमन करती हुई आगे बढ़कर उस दैत्यके हृदयको, जो वज्र और पर्वतके समान अत्यन्त कठोर था, विदीर्ण कर दिया। फिर तो वह प्राणरहित हो भूतलपर उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे प्रलयकालमें पर्वत धराशायी हो जाते हैं। उसकी पगड़ी और मुकुट छिन्न-भिन्न हो गये और सारे आभूषण पृथ्वीपर बिखर गये॥१८-२६ ॥
तस्मिन् विनिहते दैत्ये त्रिदशानां महोत्सवे।
नाभूत्कश्चित्तदा दुःखी नरकेष्वपि पापकृत्॥ २७
स्तुवन्तः षण्मुखं देवाः क्रीडन्तश्चाङ्गनायुताः।
जग्मुः स्वानेव भवनान् भूरिधामान उत्सुकाः॥२८
ददुश्चापि वरं सर्वे देवाः स्कन्दमुखं प्रति।
तुष्टाः सम्प्राप्तसर्वेच्छाः सह सिद्वैस्तपोधनैः॥ २९
देवा ऊचुः
यः पठेत् स्कन्दसम्बद्धां कथां मर्यो महामतिः।
शृणुयाच्छ्रावयेद्वापि स भवेत् कीर्तिमान्नरः॥३०
बह्वायुः सुभग: श्रीमान् कान्तिमाञ्छुभदर्शनः ।
भूतेभ्यो निर्भयश्चापि सर्वदुःखविवर्जितः॥३१
संध्यामुपास्य यः पूर्वां स्कन्दस्य चरितं पठेत्।
स मुक्तः किल्बिषैः सर्वैर्महाधनपतिर्भवेत्॥ ३२
बालानां व्याधिजुष्टानां राजद्वारं च सेवताम्।
इदं तत्परमं दिव्यं सर्वदा सर्वकामदम्।
तनुक्षये च सायुज्यं षण्मुखस्य व्रजेन्नरः॥ ३३
इस प्रकार उस दैत्यके मारे जानेपर देवताओंके उस महोत्सवके अवसरपर नरकोंमें भी कोई पापकर्मा प्राणी दु:खी नहीं था। परम तेजस्वी देवगण षडाननकी स्तुति करके अपनी-अपनी स्त्रियोंसहित क्रीडा करते हुए उत्सुकतापूर्वक अपने-अपने गृहोंको चले गये। सभी इच्छाओंकी पूर्ति हो जानेके कारण सभी देवता परम संतुष्ट थे। वे जाते समय तपोधन सिद्धोंके साथ स्कन्दको वर देते हुए बोले ॥ २७-२९ ।।
देवताओंने कहा-जो महाबुद्धिमान् मरणधर्मा मनुष्य स्कन्दसे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथाको पढ़ेगा, सुनेगा अथवा दूसरेको सुनायेगा, वह कीर्तिमान्, दीर्घायु, सौभाग्यशाली, श्रीसम्पन्न, कान्तिमान्, शुभदर्शन, सभी प्राणियोंसे निर्भय और सम्पूर्ण दुःखोंसे रहित हो जायगा। जो मनुष्य प्रात:कालिक संध्याकी उपासना करनेके बाद स्कन्दके चरित्रका पाठ करेगा वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर महान् धनराशिका स्वामी होगा। यह परम दिव्य स्कन्द-चरित बालकों, रोगियों और राजद्वारपर सेवा करनेवाले पुरुषोंके लिये सर्वदा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। इसका पाठ करनेवाला मनुष्य शरीरान्त होनेपर षडाननकी सायुज्यताको प्राप्त हो जायगा॥३०-३३ ।।
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकवधो नाम षष्टयधिकशततमोऽध्यायः॥१६०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तारकवध नामक एक सौ साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१६०॥
Summary of chapter 162 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya narrates the climactic destruction of Hiraṇyakashipu by Bhagavān Narasimha. Bypassing every condition of the demon king's divine boon, the Supreme Lord dragged Hiraṇyakashipu to the threshold of the assembly hall at twilight, placed him across His knees, and tore open his chest with His sharp claws. The text describes how this magnificent act destroyed the oppressive demon regime in a single moment, restoring freedom of worship across the universe and filling the hearts of the Devas with immense joy.