मत्स्य महा पुराण
विशोकसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
ईश्वर उवाच
विशोकसप्तमी तद्वद् वक्ष्यामि मुनिपुङ्गव।
यामुपोष्य नरः शोकं न कदाचिदिहाश्नुते॥१
माधे कृष्णतिलैः स्नात्वा षष्ठयां वै शुक्लपक्षतः।
कृताहारः कृसरया दन्तधावनपूर्वकम्।
उपवासव्रतं कृत्वा ब्रह्मचारी भवेन्निशि ॥२
ततः प्रभात उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः।
कृत्वा तु काञ्चनं पद्ममर्कायेति च पूजयेत्।
करवीरेण रक्तेन रक्तवस्त्रयुगेन च॥३
यथा विशोकं भुवनं त्वयैवादित्य सर्वदा।
तथा विशोकता मेऽस्तु त्वद्भक्तिः प्रतिजन्म च॥४
एवं सम्पूज्य षष्ठ्यां तु भक्त्या सम्पूजयेद् द्विजान्।
सुप्त्वा सम्प्राश्य गोमूत्रमुत्थाय कृतनैत्यकः॥५
सम्पूज्य विप्रानन्नेन गुडपात्रसमन्वितम्।
तद्वस्त्रयुग्मं पद्मं च ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥६
ईश्वरने कहा-मुनिपुङ्गव! अब मैं उसी प्रकार विशोकसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ। जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य इस लोकमें कभी शोकको नहीं प्राप्त होता। व्रतीको चाहिये कि वह माघमासमें शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिको दातूनसे दाँतोंको साफ करनेके बाद काले तिलमिश्रित जलसे स्नान करे और (तिल-चावलकी) खिचड़ीका भोजन करे। फिर उपवासका व्रत लेकर ब्रह्मचर्यपूर्वक रातमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर स्नान, जप आदि नित्यकर्म करके पवित्र हो ले, फिर स्वर्णनिर्मित कमलको स्थापित कर 'अर्काय नमः'- इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए लाल कनेरके पुष्प और दो लाल रंगके वस्त्रोंद्वारा सूर्यकी पूजा करे और ऐसा कहे-'आदित्य! जैसे आपके द्वारा यह सारा जगत् सदा शोकरहित बना रहता है, उसी प्रकार मुझे भी प्रत्येक जन्ममें विशोकता और आपकी भक्ति प्राप्त हो।' इस प्रकार षष्ठी तिथिको भगवान् सूर्यकी पूजा कर ब्राह्मणोंका भी भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। फिर रात्रिमें गोमूत्रका प्राशन कर शयन करे और प्रात:काल उठकर नित्यकर्मसे निवृत्त हो जाय। तत्पश्चात् अन्नद्वारा ब्राह्मणोंका पूजन करके दो वस्त्र और गुड़पूर्ण पात्रसहित वह स्वर्णमय कमल ब्राह्मणको निवेदित कर दे।
अतैललवणं भुक्त्वा सप्तम्यां मौनसंयुतः ।
ततः पुराणश्रवणं कर्तव्यं भूतिमिच्छता॥ ७
अनेन विधिना सर्वमुभयोरपि पक्षयोः ।
कृत्वा यावत् पुनर्माघशुक्लपक्षस्य सप्तमी॥ ८
व्रतान्ते कलशं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।
शय्यां सोपस्करां दद्यात् कपिलां च पयस्विनीम्॥ ९
अनेन विधिना यस्तु वित्तशाठ्यविवर्जितः।
विशोकसप्तमी कुर्यात् स याति परमां गतिम्॥१०
यावजन्मसहस्राणां साग्रं कोटिशतं भवेत्।
तावन्न शोकमभ्येति रोगदौर्गत्यवर्जितः॥११
यं यं प्रार्थयते कामं तं तमाप्नोति पुष्कलम्।
निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति ।। १२
यः पठेच्छृणुयाद्वापि विशोकाख्यां च सप्तमीम्।
सोऽपीन्द्रलोकमाप्नोति न दुःखी जायते क्वचित्॥१३
स्वयं सप्तमीको तेल और नमकरहित अत्रका भोजन करके मौन धारण कर ले। वैभवकी इच्छा रखनेवाले व्रतीको उस दिन पुराणोंकी कथाएँ सुननी चाहिये। इस विधिसे दोनों पक्षोंमें सारा कार्य तबतक करते रहना चाहिये जबतक पुनः माघमासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी न आ जाय॥१-८॥
व्रतके अन्तमें स्वर्णनिर्मित कमलसमेत कलश, समस्त उपकरणोंसहित शय्या और दुधारू कपिला गौका दान करना चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य कृपणता छोड़कर उपर्युक्त विधिके अनुसार विशोकसप्तमी- व्रतका अनुष्ठान करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है तथा करोड़ों जन्मतक उसे शोककी प्राप्ति नहीं होती। वह रोग और दुर्गतिसे रहित हो जाता है तथा जिस-जिस मनोरथकी प्रार्थना करता है, उसे-उसे वह प्रचुरमात्रामें प्राप्त करता है। जो व्रती निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस विशोकसप्तमीव्रतकी कथा या विधानको पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह भी इस लोकमें कभी दुःखी नहीं होता और अन्तमें इन्द्रलोकको प्राप्त होता है॥९-१३॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विशोकसप्तमीव्रतं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः॥७५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विशोकसप्तमीव्रत नामक पचहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ।७५ ॥
Summary of chapter 75 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the Vishoka-Saptamī-Vrata, a sacred vow observed on the seventh lunar day of the bright fortnight in the month of Māgha, specifically performed to eradicate all forms of sorrow, mental anxiety, and grief from human life. The practitioner worships Sūrya Deva by placing a golden or lotus-shaped image of the Sun upon a sanctified vessel filled with water, offering red sandalwood, red garlands, and sweet grains. The devotee abstains from salt, maintains mental calmness, and spends the day contemplating the divine light of the Sun that illuminates the universe and dispels all darkness. The Lord declares that this vow cleanses deep-seated emotional and spiritual afflictions, bestows unshakeable mental fortitude, and grants an unbroken life of peace and divine joy.