चन्द्रमाकी सहायतासे वरुणद्वारा और्वाग्नि-मायाका प्रशमन, मयद्वारा शैली-मायाका प्राकट्य भगवान्  विष्णुके आदेशसे अग्नि और वायुद्वारा उस मायाका निवारण तथा कालनेमिका रणभूमिमें आगमन

मत्स्य उवाच

एवमस्त्विति संहृष्टः शक्रस्त्रिदशवर्धनः ।

संदिदेशाग्रतः सोमं युद्धाय शिशिरायुधम्॥ १

गच्छ सोम सहायत्वं कुरु पाशधरस्य वै।

असुराणां विनाशाय जयार्थं च दिवौकसाम्॥ २

त्वं मत्तः प्रतिवीर्यश्च ज्योतिषां चेश्वरेश्वरः।

त्वन्मयं सर्वलोकेषु रसं रसविदो विदुः॥ ३

क्षयवृद्धी तव व्यक्ते सागरस्येव मण्डले।

परिवर्तस्यहोरात्रं कालं जगति योजयन्॥ ४

लोकच्छायामयं लक्ष्म तवाङ्कः शशसंनिभः।

न विदुः सोम देवापि ये च नक्षत्रयोनयः॥ ५

त्वमादित्यपथादूर्ध्वं ज्योतिषां चोपरि स्थितः।

तमः प्रोत्सार्य महसा भासयस्यखिलं जगत्॥ ६

श्वेतभानुर्हिमतनुर्योतिषामधिपः शशी।

अधिकृत्कालयोगात्मा इष्टो यज्ञरसोऽव्ययः॥ ७

ओषधीशः क्रियायोनिहरशेखरभाक् तथा।

शीतांशुरमृताधारश्चपलः श्वेतवाहनः॥ ८

त्वं कान्ति: कान्तिवपुषां त्वं सोमः सोमपायिनाम्।

सौम्यस्त्वं सर्वभूतानां तिमिरघ्नस्त्वमृक्षराट्॥ ९

तद् गच्छ त्वं महासेन वरुणेन वरूथिना।

शमय त्वासुरी मायां यया दह्याम संयुगे॥१०

सोम उवाच

यन्मां वदसि युद्धार्थे देवराज वरप्रद।

एष वर्षामि शिशिरं दैत्यमायापकर्षणम्॥११

मत्स्यभगवान्ने कहा-देवताओंकी वृद्धि करनेवाले इन्द्र परम प्रसन्न हुए और 'एवमस्तु-ऐसा ही हो' यों कहकर सर्वप्रथम शीतायुध चन्द्रमाको युद्धके लिये आदेश देते हुए बोले-'सोम! आप जाइये और असुरोंके विनाश तथा देवताओंकी विजयके निमित्त पाशधारी वरुणकी सहायता कीजिये। आप मुझसे भी बढ़कर पराक्रमी और ज्योतिर्गणोंके अधीश्वर हैं। रसज्ञ लोग सम्पूर्ण लोकोंमें जितने रस हैं, उन्हें आपसे ही युक्त मानते हैं। आपके मण्डलमें सागरकी तरह क्षय और वृद्धि स्पष्टरूपसे होती रहती है। आप जगत्में कालका योग करते हुए दिन-रातका परिवर्तन करते रहते हैं। आपका चिह्न लोककी छायासे युक्त है। आप मृगलाञ्छन हैं। सोम! जो नक्षत्रोंके उत्पत्तिकर्ता हैं, वे देवता भी आपकी महिमाको नहीं जानते। आप सूर्यके मार्गसे ऊपर सभी ज्योतिर्गणोंके ऊपरी भागमें स्थित हैं और अपने तेजसे अन्धकारको दूर कर सम्पूर्ण जगत्को उद्भासित करते हैं। आप श्वेतभानु, हिमतनु, ज्योतियोंके अधीश्वर, शशलाञ्छन, कालयोग-स्वरूप, अग्निहोत्र-वेदाध्ययन आदि कर्मरूप, यज्ञके परिणामभूत, अविनाशी, ओषधियोंके स्वामी, कर्मके उत्पादक, शिवजीके मस्तकपर स्थित, शीतल किरणोंवाले, अमृतके आश्रयस्थान, चञ्चल और श्वेतवाहन हैं। आप ही सौन्दर्यशाली व्यक्तियोंके सौन्दर्य हैं और आप ही सोमपान करनेवालोंके लिये सोम हैं। आपका स्वभाव समस्त प्राणियोंके लिये सौम्य है। आप अन्धकारके विनाशक और नक्षत्रोंके स्वामी हैं। इसलिये महासेन! आप कवचधारी वरुणके साथ जाइये और उस आसुरी मायाको शान्त कीजिये, जिससे हमलोग युद्धस्थलमें जल रहे हैं'॥ १-१०॥

सोमने कहा-वरदायक देवराज! यदि आप मुझे युद्धके लिये आदेश देते हैं तो मैं अभी दैत्योंकी मायाका विनाश करनेवाले शिशिरकी वर्षा करता हूँ।

एतान् मच्छीतनिर्दग्धान् पश्य त्वं हिमवेष्टितान्।

विमायान् विमदांश्चैव दैत्यसिंहान् महाहवे॥१२

तेषां हिमकरोत्सृष्टाः सपाशा हिमवृष्टयः ।

वेष्टयन्ति स्म तान् घोरान् दैत्यान् मेघगणा इव॥१३

तौ पाशशीतांशुधरौ वरुणेन्दू महाबलौ।

जघ्नतुर्हिमपातैश्च पाशपातैश्च दानवान्॥१४

द्वावम्बुनाथौ समरे तो पाशहिमयोधिनौ।

मृधे चेरतुरम्भोभिः क्षुब्धाविव महार्णवौ॥१५

ताभ्यामाप्लावितं सैन्यं तद्दानवमदृश्यत।

जगत्संवर्तकाम्भोदैः प्रविष्टैरिव संवृतम्॥१६

तावुद्यताम्बुनाथौ तु शशाङ्कवरुणावुभौ।

शमयामासतुर्मायां देवौ दैत्येन्द्रनिर्मिताम्॥१७

शीतांशुजालनिर्दग्धाः पाशैश्च स्पन्दिता रणे।

न शेकुश्चलितुं दैत्या विशिरस्का इवाद्रयः॥१८

शीतांशुनिहतास्ते तु दैत्यास्तोयहिमादिताः।

हिमाप्लावितसर्वाङ्गा निरुष्माण इवाग्नयः॥१९

तेषां तु दिवि दैत्यानां विपरीतप्रभाणि वै।

विमानानि विचित्राणि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च॥२०

तान् पाशहस्तग्रथितांश्छादिताशीतरश्मिभिः ।

मयो ददर्श मायावी दानवान् दिवि दानवः॥२१

स शिलाजालविततां खड्गचर्माट्टहासिनीम्।

पादपोत्कटकूटानां कन्दराकीर्णकाननाम्॥२२

सिंहव्याघ्रगणाकीर्णा नदद्भिर्गजयूथपैः ।

ईहामृगगणाकीर्णां पवनाघूर्णितद्रुमाम्॥२३

निर्मितां स्वेन यत्नेन कूजितां दिवि कामगाम्।

प्रथितां पार्वती मायामसृजत् स समन्ततः ॥ २४

सासिशब्दैः शिलावर्षेः सम्पतद्भिश्च पादपैः।

जघान देवसङ्यांश्च दानवांश्चाप्यजीवयत्॥ २५

आप इस भीषण युद्ध में मेरे द्वारा प्रयुक्त किये गये शीतमे जले हुए, हिमपरिवेष्टित, माया और गर्वसे रहित इन दैत्यसिंहोंको देखिये। फिर तो वरुणके पाशसहित चन्द्रमाद्वारा छोड़ी गयी हिमवृष्टिने उन भयंकर दैत्योंको मेघसमूहको तरह घेर लिया। वे दोनों महाबली पाशधारी वरुण और शीतांशु चन्द्रमा पाश और हिमके प्रहारसे दानवोंका संहार करने लगे। वे दोनों जलके स्वामी और समरमें* पाश एवं हिमके द्वारा युद्ध करनेवाले थे, अतः वे रणभूमिमें जलसे क्षुब्ध हुए दो महासागरकी भाँति विचरण करने लगे। उन दोनोंके द्वारा जलमग्न की गयी हुई दानवोंकी वह सेना उमड़े हुए संवर्तक नामक बादलोंसे आच्छादित जगत्की तरह दीख रही थी। इस प्रकार जलके स्वामी उन दोनों देवता चन्द्रमा और वरुणने दैत्येन्द्रद्वारा निर्मित मायाको शान्त कर दिया। रणभूमिमें शीतल किरणसमूहोंसे जले हुए तथा पाशोंसे जकड़े हुए दैत्यगण शिखररहित पर्वतोंकी तरह चलनेमें भी असमर्थ हो गये। शीतांशुके आघातसे उन दैत्योंके सर्वाङ्ग हिमसे आप्लावित हो गये और वे जलकी ठण्ढकसे ठिठुर गये। इस प्रकार वे गरमीरहित अग्निकी तरह दीख रहे थे। आकाशमण्डलमें विचरनेवाले उन दैत्योंके विचित्र विमानोंकी कान्ति विपरीत हो गयी और वे लड़खड़ाकर गिरने-पड़ने लगे॥ ११-२०॥

इस प्रकार जब मायावी मयदानवने आकाशमें उन दानवोंको वरुणके पाशद्वारा बँधे हुए तथा शीतल किरणोंद्वारा आच्छादित देखा, तब उसने चारों ओर सुप्रसिद्ध पार्वती मायाकी सृष्टि की, जो शिलासमूहसे व्याप्त तथा ढाल-तलवारसे युक्त हो अट्टहास करनेवाली थी, जिसका अग्रभाग घने वृक्षोंसे आच्छादित होनेके कारण भयंकर था, जो कन्दराओंसे व्याप्त काननोंसे युक्त, सिंहों, व्याघ्रों, चिग्घाड़ते हुए गजयूथों और भेड़ियोंसे परिपूर्ण थी, जिसके वृक्ष वायुके झकोरेसे चक्कर काट रहे थे, जो अपने ही प्रयत्नसे निर्मित, घोर शब्द करनेवाली और आकाशमें स्वेच्छानुसार गमन करनेवाली थी। वह पार्वती-माया तलवारोंकी खनखनाहट, शिलाओंकी वृष्टि और गिरते हुए वृक्षोंसे देवसमूहोंका संहार करने लगी। उधर उसने दानवोंको जीवित भी कर दिया।

नैशाकरी वारुणी च मायेऽन्तर्दधतुस्ततः।

असिभिश्चायसगणैः किरन् देवगणान् रणे॥२६

साश्मयन्त्रायुधघना द्रुमपर्वतसङ्कटा।

अभवद् घोरसंचारा पृथिवी पर्वतैरिव ॥ २७

अश्मना प्रहताः केचिच्छिलाभिः शकलीकृताः।

नानिरुद्धो द्रुमगणैर्देवोऽदृश्यत कश्चन ॥ २८

तदपध्वस्तधनुषं भग्नप्रहरणाविलम्।

निष्प्रयत्नं सुरानीकं वर्जयित्वा गदाधरम्॥ २९

स हि युद्धगतः श्रीमानीशो न स्म व्यकम्पत।

सहिष्णुत्वाज्जगत्स्वामी न चुक्रोध गदाधरः ॥ ३०

कालज्ञः कालमेघाभ: समीक्षन् कालमाहवे।

देवासुरविमर्द तु द्रष्टुकामस्तदा हरिः॥३१

ततो भगवता दृष्टो रणे पावकमारुतौ।

चोदितौ विष्णुवाक्येन तौ मायामपकर्षताम्॥३२

ताभ्यामुभ्रान्तवेगाभ्यां प्रवृद्धाभ्यां महाहवे।

दग्धा सा पार्वती माया भस्मीभूता ननाश ह॥ ३३

सोऽनिलोऽनलसंयुक्तः सोऽनलश्चानिलाकुलः।

दैत्यसेनां ददहतुर्युगान्तेष्विव मूछितौ॥ ३४

वायुः प्रधावितस्तत्र पश्चादग्निस्तु मारुतम्।

चेरतुर्दानवानीके क्रीडन्तावनिलानलौ॥३५

भस्मावयवभूतेषु प्रपतत्सूत्पतत्सु च।

दानवानां विमानेषु निपतत्सु समन्ततः ।। ३६

वातस्कन्धापविद्धेषु कृतकर्मणि पावके।

मायाबन्धे निवृत्ते तु स्तूयमाने गदाधरे॥ ३७

निष्प्रयत्नेषु दैत्येषु त्रैलोक्ये मुक्तबन्धने।

सम्प्रहृष्टेषु देवेषु साधु साध्विति सर्वशः॥३८

जये दशशताक्षस्य दैत्यानां च पराजये।

दिक्षु सर्वासु शुद्धासु प्रवृत्ते धर्मविस्तरे॥३९

अपावृते चन्द्रमसि स्वस्थानस्थे दिवाकरे।

प्रकृतिस्थेषु लोकेषु त्रिषु चारित्रबन्धुषु॥ ४०

उसके प्रभावसे चन्द्रमा और वरुणकी दोनों मायाएँ अन्तर्हित हो गयीं। वह दैत्य रणभूमिमें देवगणोंके ऊपर तलवारों और लोहनिर्मित अन्यान्य अस्त्रोंका प्रयोग कर रहा था। उसने रणभूमिको शिलाओं, यन्त्रों, अस्त्रों, वृक्षों और पर्वतोंसे ऐसा सघनरूपसे पाट दिया कि वहाँकी पृथ्वी पर्वतोंकी तरह चलने-फिरनेके लिये दुर्गम हो गयी। उस समय कुछ देवता पत्थरोंसे आहत कर दिये गये, कुछ शिलाओंकी मारसे खण्ड-खण्ड कर दिये गये तथा कोई भी देवता ऐसा नहीं दीख रहा था, जो वृक्षसमूहोंसे ढक न गया हो। इस प्रकार एकमात्र भगवान् गदाधरको छोड़कर देवताओंकी उस सेनाके धनुष छिन्न-भिन्न हो गये, अस्त्रसमूह नष्ट हो गये और वह प्रयत्नहीन हो गयी। शोभाशाली परमेश्वर गदाधर युद्धस्थलमें उपस्थित होनेपर भी विचलित नहीं हुए तथा सहनशील होनेके कारण उन जगदीश्वरको क्रोध भी नहीं आया। काले मेघकी-सी कान्तिवाले कालके ज्ञाता श्रीहरि रणभूमिमें देवताओं और असुरोंके युद्धको देखनेकी इच्छासे कालकी प्रतीक्षा करते हुए स्थित थे॥२१-३१॥

तदनन्तर रणभूमिमें भगवान्को अग्नि और वायु दीख पड़े। तब भगवान् विष्णुने उन्हें प्रेरित किया कि तुम दोनों इस मायाको नष्ट कर डालो। तब वृद्धिकी अन्तिम सीमापर पहुँचे हुए उन प्रचण्ड वेगशाली वायु और अग्निके प्रभावसे उस महासमरमें वह पार्वती माया जलकर भस्म हो गयी और सर्वथा नष्ट हो गयी। इसके बाद अग्निसे संयुक्त वायु और वायुसे संयुक्त अग्नि-दोनों पूरी शक्ति लगाकर युगान्तकी तरह दैत्यसेनाको भस्म करने लगे। आगे-आगे वायुदेव चलते थे, फिर वायुदेवके पीछे अग्निदेव चलते थे। इस प्रकार अग्नि और वायु उस दानव-सेनामें क्रीडा करते हुए विचरण कर रहे थे। दानवोंकी सेना जलती हुई इधर-उधर भागने लगी और विमान चारों ओर जलकर गिरने लगे। दानवोंके कंधे वायुसे अकड़ गये। इस प्रकार अग्निद्वारा अपना कर्म कर चुकनेपर मायाका बन्धन निवृत्त हो गया, भगवान् गदाधरकी स्तुति की जाने लगी, दैत्यगण प्रयत्नहीन हो गये, त्रिलोकी बन्धनसे मुक्त हो गयी, परम प्रसन्न हुए देवगण सब ओर 'ठीक है, ठीक है ऐसा शब्द बोलने लगे। इन्द्रकी विजय और दैत्योंकी पराजय हो गयी, सभी दिशाएँ शुद्ध हो गयीं, धर्मका विस्तार होने लगा।' चन्द्रमाका आवरण हट गया, सूर्य अपने स्थानपर स्थित हो गये, तीनों लोक निश्चिन्त हो गये, लोगोंमें

यजमानेषु भूतेषु प्रशान्तेषु च पाप्मसु ।

अभिन्नबन्धने मृत्यौ हूयमाने हुताशने ॥४१

यज्ञशोभिषु देवेषु स्वर्गार्थं दर्शयत्सु च।

लोकपालेषु सर्वेषु दिक्षु संयानवर्तिषु ॥ ४२

भावे तपसि सिद्धानामभावे पापकर्मणाम्।

देवपक्षे प्रमुदिते दैत्यपक्षे विषीदति ।। ४३

त्रिपादविग्रहे धर्मे अधर्मे पादविग्रहे।

अपावृत्ते महाद्वारे वर्तमाने च सत्पथे॥४४

लोके प्रवृत्ते धर्मेषु सुधर्मेष्वाश्रमेषु च।

प्रजारक्षणयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु॥४५

प्रशान्तकल्मषे लोके शान्ते तमसि दानवे।

अग्निमारुतयोस्तत्र वृत्ते संग्रामकर्मणि॥४६

तन्मया विपुला लोकास्ताभ्यां कृतजयक्रिया।

पूर्वं दैत्यभयं श्रुत्वा मारुताग्निकृतं महत्॥ ४७ ||

कालनेमीति विख्यातो दानवः प्रत्यदृश्यत।

भास्कराकारमुकुटः शिञ्जिताभरणाङ्गदः॥ ४८

मन्दराद्रिप्रतीकाशो महारजतपर्वतः ।

शतप्रहरणोदनः शतबाहुः शताननः॥४९

शतशीर्षः स्थितः श्रीमाञ्छतशृङ्ग इवाचलः ।

पक्षे महति संवृद्धो निदाघ इव पावकः॥५०

धूम्रकेशो हरिच्छ्मश्रुः संदष्टौष्ठपुटाननः ।

त्रैलोक्यान्तरविस्तारि धारयन् विपुलं वपुः ॥५१

बाहुभिस्तुलयन् व्योम क्षिपन् पट्यां महीधरान्।

ईरयन् मुखनिःश्वासैर्वृष्टियुक्तान् बलाहकान्॥५२

तिर्यगायतरक्ताक्षं मन्दरोदग्रवर्चसम्।

दिधक्षन्तमिवायान्तं सर्वान् देवगणान् मृधे॥५३

तर्जयन्तं सुरगणांश्छादयन्तं दिशो दश।

संवर्तकाले तृषितं दृष्टं मृत्युमिवोत्थितम्॥५४

चरित्रबल और बन्धुत्वकी भावना जाग्रत् हो गयी, सभी प्राणी यज्ञकी भावनासे पूर्ण हो गये, पापोंका प्रशमन हो गया, मृत्युका बन्धन सुदृढ़ हो गया, अग्निमें आहुतियाँ पड़ने लगीं, यज्ञोंमें शोभा पानेवाले देवगण स्वर्गकी प्राप्तिके हेतु मार्गदर्शन करने लगे, लोकपालगण सभी दिशाओंके लिये प्रस्थित हो गये, सिद्धोंकी भावना तपस्यामें संलग्न हो गयी, पापकर्मोका अभाव हो गया, देवपक्षमें आनन्द मनाया जाने लगा। दैत्यपक्षमें उदासी छा गयी, धर्म तीन चरणोंसे स्थित हुआ और अधर्मका एक चरण रह गया, महाद्वार (यममार्ग) बंद हो गया और सन्मार्गका प्रचार होने लगा। सभी लोग अपने-अपने वर्णधर्म एवं आश्रमधर्ममें प्रवृत्त हो गये, राजाओंका दल प्रजाकी रक्षामें तत्पर होकर सुशोभित होने लगा, दानवरूपी तमोगुणके शान्त हो जानेपर जगत्में पापका विनाश हो गया। इस प्रकार अग्नि और वायुद्वारा युद्धकर्म किये जानेपर सभी विशाल लोक उन्हींसे युक्त हो गये और उन्हींके द्वारा यह विजयकी क्रिया सम्पन्न हुई ॥३२-४६३॥

तदनन्तर दैत्योंके लिये वायु और अग्निद्वारा उत्पन्न किये गये महान् भयको सुनकर सर्वप्रथम कालनेमि नामसे विख्यात दानव (युद्धभूमिमें) दिखायी पड़ा। वह सुवर्णसे युक्त मन्दराचलके समान विशालकाय था, उसके मस्तकपर सूर्य-सरीखा मुकुट चमक रहा था, वह मधुर शब्द करते हुए बाजूबंदसे विभूषित था, उसके सौ बाहु, सौ मुख और सौ मस्तक थे, वह परम भयानक सौ अस्त्रोंको एक साथ धारण किये हुए था, इस प्रकार वह सौ शिखरोंवाले पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था, दैत्यों के विशाल पक्षमें आगे बढ़ा हुआ वह दानव ग्रीष्मकालीन अग्निकी तरह दीख रहा था, उसके बाल धूमिल थे, उसकी दाढ़ी हरे रंगकी थी, वह दाँतोंसे होंठोंको दबाये हुए मुखसे युक्त था, इस प्रकार वह समूची त्रिलोकीमें विस्तृत विशाल शरीर धारण किये हुए था। वह भुजाओंसे आकाशको नापता हुआ, पैरोंसे पर्वतोंको फेंकता हुआ और मुखके नि:श्वाससे जलयुक्त बादलोंको तितर-बितर करता हुआ चल रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी लाल आँखें तिरछी मढ़ी हुई थीं। वह मन्दराचलके समान परम तेजस्वी था। वह युद्धस्थलमें समस्त देवगणोंको जलाते हुएकी तरह आ रहा था। वह देवगणोंको भयभीत कर रहा था, दसों दिशाओंको आच्छादित किये हुए था और प्रलयकालमें प्रकट हुए प्यासे मृत्युकी

सुतलेनोच्छ्यवता विपुलाङ्गुलिपर्वणा।

लम्बाभरणपूर्णेन किंचिच्चलितवर्मणा ॥५५

उच्छ्रितेनाग्रहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता।

दानवान् देवनिहतानुत्तिष्ठध्वमिति ब्रुवन्॥५६

तं कालनेमिं समरे द्विषतां कालचेष्टितम्।

वीक्षन्ते स्म सुराः सर्वे भयवित्रस्तलोचनाः॥५७

तं वीक्षन्ति स्म भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम्।

त्रिविक्रम विक्रमन्तं नारायणमिवापरम्॥५८

सोऽत्युच्छ्रयपुरःपादमारुतापूर्णिताम्बरः

प्रक्रामन्नसुरो युद्धे त्रासयामास देवताः ॥५९

स मयेनासुरेन्द्रेण परिष्वक्तस्ततो रणे।

कालनेमिर्बभौ दैत्यः सविष्णुरिव मन्दरः॥६०

अथ विव्यथिरे देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ।

कालनेमिं समायान्तं दृष्ट्वा कालमिवापरम्।। ६१

तरह दीख रहा था। जो सुतलसे निकला था, जिसकी अंगुलियोंके पर्व (पोरु) विशाल थे, जो आभरणोंसे युक्त था, जिसका कवच कुछ हिल रहा था और जिसके दाहिने हाथका अग्रभाग उठा हुआ था, ऐसे शरीरसे युक्त कालनेमिने देवताओंद्वारा मारे गये दानवोंसे कहा- अब तुमलोग उठकर खड़े हो जाओ' ॥ ४७५६॥

इस प्रकार समरभूमिमें शत्रुओंके प्रति कालकी-सी भीषण चेष्टा करनेवाले उस कालनेमिकी ओर सभी देवता एकटक निहारने लगे। उस समय उनके नेत्र भयसे कातर हो रहे थे। इस प्रकार चलते हुए उस कालनेमिको समस्त प्राणी ऐसे देख रहे थे मानो तीन पगसे त्रिलोकीको नापनेके लिये चलते हुए दूसरे नारायण हों। अत्यन्त विशाल शरीरवाले कालनेमिके चलते हुए पैरोंकी वायुसे आकाश चक्कर-सा काटने लगता था, इस प्रकार वह असुर युद्धभूमिमें विचरण करता हुआ देवताओंको भयभीत करने लगा। तदुपरान्त रणक्षेत्रमें असुरराज मयने कालनेमिका आलिङ्गन किया। उस समय वह दैत्य विष्णुसहित मन्दराचलके समान सुशोभित हो रहा था। तदनन्तर इन्द्र आदि सभी देवता दूसरे कालकी तरह कालनेमिको आया हुआ देखकर अत्यन्त व्यथित हो गये॥ ५७-६१ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकामययुद्धे षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७६ ॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामययुद्धमें एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७६ ॥