रत्नाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाच

 अतः परं प्रवक्ष्यामि रत्नाचलमनुत्तमम्।

मुक्ताफलसहस्रेण पर्वतः स्यादनुत्तमः॥१

मध्यमः पञ्चशतिकस्त्रिशतेनाधमः स्मृतः।

चतुर्थांशेन विष्कम्भपर्वताः स्युः समंततः॥२||

पूर्वेण वज्रगोमेदैर्दक्षिणेनेन्द्रनीलकैः।

पद्मरागयुतः कार्यों विद्वद्भिर्गन्धमादनः॥३

वैदूर्यविद्रुमैः पश्चात् सम्मिश्री विपुलाचलः।

पुष्परागैः ससौपर्णैरुत्तरेण च विन्यसेत्॥४

धान्यपर्वतवत् सर्वमत्रापि परिकल्पयेत्।

तद्वदावाहनं कुर्याद् वृक्षान् देवांश्च काननान्॥५

ईश्वरने कहा-नारद! इसके पश्चात् मैं श्रेष्ठ रत्नाचलका वर्णन कर रहा हूँ। एक हजार मुक्ताफल (मोतियों)-द्वारा बना हुआ पर्वत उत्तम, पाँच सौसे बना हुआ मध्यम और तीन सौसे बना हुआ अधम (साधारण) माना गया है। कल्पित पर्वतके चतुर्थांशसे उसके चारों दिशाओंमें विष्कम्भपर्वतोंको स्थापित करना चाहिये। विद्वानोंको पूर्व दिशामें हीरा और गोमेदसे मन्दराचलकी, दक्षिणमें पद्मराग (माणिक्य) और इन्द्रनील (नीलम) मणिके संयोगसे गन्धमादनकी, पश्चिममें वैदूर्य और मूंगेके सम्मिश्रणसे विपुलाचलकी और उत्तरमें गारुत्मतमणिसहित पुष्पराग (पोखराज) मणिसे सुपार्श्व पर्वतकी स्थापना करनी चाहिये।* इस दानमें भी धान्यपर्वतकी तरह सारे उपकरणोंकी कल्पना करे। उसी प्रकार स्वर्णमय देवताओं, वनों और वृक्षोंका स्थापन एवं आवाहन करे

*इन रत्नोंकी स्थापनामें नारदपुराण १।५६ । २८२, शुक्रनी०४।२ आदिमें निर्दिष्ट दिक्पालों तथा दिगीश ग्रहोंके प्रिय रत्नोंका भी ध्यान रखा गया है।

पूजयेत् पुष्पगन्धाद्यैः प्रभाते च विमत्सरः ।

पूर्ववद् गुरुऋत्विग्भ्य इमान् मन्त्रानुदीरयेत्॥६

यदा देवगणाः सर्वे सर्वरत्नेष्ववस्थिताः ।

त्वं च रत्नमयो नित्यं नमस्तेऽस्तु सदाचल ।। ७

यस्माद् रत्नप्रदानेन तुष्टिं प्रकुरुते हरिः।

सदा रत्नप्रदानेन तस्मान्नः पाहि पर्वत॥८

अनेन विधिना यस्तु दद्याद् रत्नमयं गिरिम्।

याति विष्णुसालोक्यममरेश्वरपूजितः॥९

यावत्कल्पशतं साग्रं वसेच्चेह नराधिप।

रूपारोग्यगुणोपेतः सप्तद्वीपाधिपो भवेत्॥१०

ब्रह्महत्यादिकं किंचिद् यदत्रामुत्र वा कृतम्।

तत् सर्वं नाशमायाति गिरिर्वज्रहतो यथा ॥११

तथा पुष्प, गन्ध आदिसे उनका पूजन करे। प्रात:काल मत्सररहित होकर वह सारा सामान गुरु और ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय इन मन्त्रोंका उच्चारण करे- अचल! जब सभी देवगण सम्पूर्ण रत्नोंमें निवास करते हैं, तब तुम तो नित्य रत्नमय ही हो; अतः तुम्हें सदा हमारा नमस्कार प्राप्त हो। पर्वत! चूँकि सदा रत्नका दान करनेसे श्रीहरि संतुष्ट हो जाते हैं, अतः तुम हमारी रक्षा करो।' नराधिप! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे रत्नमय पर्वतका दान करता है, वह इन्द्रसे सत्कृत हो विष्णु-सालोक्यको प्राप्त कर लेता है और वहाँ सौ कल्पोंसे भी अधिक कालतक निवास करता है। पुनः इस लोकमें जन्म लेनेपर वह सौन्दर्य, नीरोगता और सगुणोंसे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। साथ ही उसके द्वारा इहलोक अथवा परलोकमें जो कुछ भी ब्रह्महत्या आदि पाप किये गये होते हैं, वे सभी उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे वज्रद्वारा प्रहार किया गया हुआ पर्वत ॥ १-११॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे रत्नाचलकर्तनं नाम नवतितमोऽध्यायः॥९०॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें रत्नाचलकीर्तन नामक नब्बेवा अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ९० ॥