मत्स्य महा पुराण
भगवान् वासुदेवद्वारा प्रयागके माहात्म्यका वर्णन
नन्दिकेश्वर उवाच
भ्रातृभिः सहितः सर्वैद्रौपद्या सह भार्यया।
ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य गुरून् देवानतर्पयत्॥१
वासुदेवोऽपि तत्रैव क्षणेनाभ्यागतस्तदा।
पाण्डवैः सहितैः सर्वैः पूज्यमानस्तु माधवः ॥२
कृष्णेन सहितैः सर्वैः पुनरेव महात्मभिः ।
अभिषिक्तः स्वराज्ये च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥३
एतस्मिन्नन्तरे चैव मार्कण्डेयो महामुनिः।
ततः स्वस्तीति चोक्त्वा तु क्षणादाश्रममागमत्॥४
युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितोऽवसत्।
महादानं ततो दत्त्वा धर्मपुत्रो महामनाः॥५
यस्त्विदं कल्य उत्थाय माहात्म्यं पठते नरः।
प्रयागं स्मरते नित्यं स याति परमं पदम्।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति॥६
नन्दिकेश्वर बोले-नारदजी! तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिरने अपने सभी भाइयों तथा पत्नी द्रौपदीके साथ ब्राह्मणोंको नमस्कार कर देवताओं एवं अपने गुरुजनोंको तर्पणद्वारा तृप्त किया। भगवान् वासुदेव भी अकस्मात् उसी क्षण वहीं आ पहुँचे। तब सभी पाण्डवोंने मिलकर भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की। तत्पश्चात् सभी महात्माओंके साथ-साथ भगवान् श्रीकृष्णने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको पुनः उनके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। इसी बीच महामुनि मार्कण्डेय 'स्वस्ति-तुम्हारा कल्याण हो'-यों कहकर क्षणमात्रमें अपने आश्रमको लौट गये। तदनन्तर महामना एवं धर्मात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिर भी बड़ा-बड़ा दान देकर भाइयोंके साथ वहाँ निवास करने लगे। जो मनुष्य प्रात:काल उठकर इस माहात्म्यका पाठ करता है तथा नित्य प्रयागका स्मरण करता है, वह परमपदको प्राप्त कर लेता है तथा समस्त पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकको चला जाता है॥१-६॥
वासुदेव उवाच
मम वाक्यं च कर्तव्यं महाराज ब्रवीम्यहम्।
नित्यं जपस्व जुह्वस्व प्रयागे विगतज्वरः॥ ७
प्रयागं स्मर वै नित्यं सहास्माभिर्युधिष्ठिर।
स्वयं प्राप्स्यति राजेन्द्र स्वर्गलोकं न संशयः॥ ८
प्रयागमनुगच्छेद् वा वसते वापि यो नरः।
सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ ९
प्रतिग्रहादुपावृत्तः संतुष्टो नियतः शुचिः।
अहङ्कारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते॥१०
अकोपनश्च सत्यश्च सत्यवादी दृढव्रतः।
आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते॥११
ऋषिभिः क्रतवः प्रोक्ता देवैश्चापि यथाक्रमम्।
न हि शक्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं महीपते॥१२
बहूपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तराः।
प्राप्यन्ते पार्थिवैरेतैः समृद्धैर्वा नरैः क्वचित्॥ १३
यो दरिद्रैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं नरेश्वर।
तुल्यो यज्ञफलैः पुण्यैस्तन्निबोध युधिष्ठिर ॥१४
ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम।
तीर्थानुगमनं पुण्यं यज्ञेभ्योऽपि विशिष्यते ॥१५
दश तीर्थसहस्त्राणि तिस्त्र: कोट्यस्तथाऽऽपगाः।
माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायां भरतर्षभ ।।१६
स्वस्थो भव महाराज भुक्ष्व राज्यमकण्टकम्।
पुनर्द्रक्ष्यसि राजेन्द्र यजमानो विशेषतः॥१७
नन्दिकेश्वर उवाच
इत्युक्त्वा स महाभागो वासुदेवो महातपाः।
युधिष्ठिरस्य नृपतेस्तत्रैवान्तरधीयत॥१८
ततस्तत्र समाप्लाव्य गात्राणि सगणो नृपः।
यथोक्तेनाथ विधिना परां निर्वृतिमागमत्॥१९
तथा त्वमपि देवर्षे प्रयागाभिमुखो भव।
अभिषेकं तु कृत्वाद्य कृतकृत्यो भविष्यसि ॥२०
सूत उवाच
एवमुक्त्वाथ नन्दीशस्तत्रैवान्तरधीयत।
नारदोऽपि जगामाशु प्रयागाभिमुखस्तथा ॥२१
भगवान् वासुदेवने कहा-महाराज युधिष्ठिर! मैं जैसा कह रहा हूँ, मेरे उस वचनका पालन कीजिये। आप प्रयागमें जाकर संतापरहित हो नित्य भगवन्नामका जप और हवन कीजिये तथा हमलोगोंके साथ नित्य प्रयागका स्मरण कीजिये। राजेन्द्र! ऐसा करनेसे आप स्वयं स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। जो मनुष्य प्रयागकी यात्रा करता है अथवा वहाँ निवास करता है, उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और वह रुद्रलोकको चला जाता है। जो प्रतिग्रह (दान लेने)-से विमुख, संतुष्ट, जितेन्द्रिय, पवित्र और अहंकारसे दूर रहता है, उसे तीर्थफलकी प्राप्ति होती है। जो क्रोधरहित, ईमानदार, सत्यवादी, दृढ़व्रत और समस्त प्राणियोंके प्रति अपने समान ही व्यवहार करता है, वह तीर्थफलका भागी होता है। महीपते! ऋषियों तथा देवताओंने क्रमश: जिन यज्ञोंका विधान बतलाया है, उन यज्ञोंका अनुष्ठान निर्धन मनुष्य नहीं कर सकता; क्योंकि उन यज्ञोंमें बहुत-से उपकरणों तथा नाना प्रकारकी सामग्रियोंकी आवश्यकता पड़ती है। इनका अनुष्ठान तो राजा अथवा कहीं-कहीं कुछ समृद्धिशाली मनुष्य ही कर सकते हैं। नरेश्वर युधिष्ठिर! निर्धन मनुष्योंद्वारा भी जिस विधिका पालन किया जा सकता है और जो पुण्यमें यज्ञफलके समान है, उसे मैं बतला रहा हूँ, सुनो! भरतसत्तम! यह पुण्यमयी तीर्थयात्रा ऋषियोंके लिये भी परम गोपनीय है तथा यज्ञोंसे भी बढ़कर फलदायक है। भरतर्षभ! दस हजार तीर्थ तथा तीन करोड़ नदियाँ माघमासमें गङ्गामें आकर निवास करती हैं। महाराज! आप स्वस्थ हो जायँ और निष्कण्टक राज्यका उपभोग करें। राजेन्द्र! पुनः कभी विशेषरूपसे यज्ञ करते समय आप मुझे देख सकेंगे॥७-१७॥
नन्दिकेश्वर बोले-नारदजी! महान् भाग्यशाली एवं महान् तपस्वी वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्ण महाराज युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर वहीं अन्तर्हित हो गये। तदनन्तर महाराज युधिष्ठिरने सकुटुम्ब प्रयागमें जाकर यथोक्त विधिके अनुसार स्नान किया, जिससे उन्हें परम शान्ति प्राप्त हुई। देवर्षे! इसलिये आप भी प्रयागकी ओर पधारिये और वहाँ स्नान कर आज ही कृतकृत्य हो जाइये॥१८-२०॥
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! तदनन्तर नन्दिकेश्वर ऐसा कहकर वहीं अन्तर्हित हो गये तथा नारदजी भी शीघ्र ही प्रयागकी ओर चल दिये।
तत्र स्नात्वा च जप्त्वा च विधिदृष्टेन कर्मणा।
दानं दत्त्वा द्विजाग्रयेभ्यो गतः स्वभवनं तदा ॥२२
वहाँ पहुँचकर उन्होंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार स्नान एवं जप आदि कार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान देकर वे अपने आश्रमकी ओर चले गये॥ २१-२२ ।।
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्यं नाम द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रयागमाहात्म्य नामक एक सौ बारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ।॥११२॥
Summary of chapter 112 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya describes the various elevated spiritual realms attained by devotees according to their level of devotional absorption and righteous deeds performed at Prayāga. Bhagavān Matsya details how those who perform regular worship and charity attain the realm of the Vasus, Rudras, or Ādityas, while those who maintain lifelong devotion and die within Prayāga achieve Sālokya liberation, residing in the divine realm of Bhagavān Vishṇu. The text emphasizes that the spiritual rewards earned at Prayāga are permanent and imperishable, elevating the soul above the transient cycles of material existence.