देवताओं और असुरोंकी सेनाओंमें अपनी-अपनी जोड़ीके साथ घमासान युद्ध, देवताओंके विकल  होनेपर भगवान् विष्णुका युद्धभूमिमें आगमन और कालनेमिको परास्त कर उसे जीवित छोड़ देना

सूत उवाच

अथ ग्रसनमालोक्य यमः क्रोधविमूर्छितः।

ववर्ष शरवर्षेण विशेषेणाग्निवर्चसाम्॥ १

स विद्धो बहुभिर्बाणैर्ग्रसनोऽतिपराक्रमः।

कृतप्रतिकृताकाङ्की धनुरानम्य भैरवम्॥ २

शतैः पञ्चभिरत्युग्रैः शराणां यममर्दयत्।

स विचिन्त्य यमो बाणान् ग्रसनस्यातिपौरुषम्॥ ३

बाणवृष्टिभिरुग्राभिर्यमो ग्रसनमर्दयत्।

कृतान्तशरवृष्टिं तां वियति प्रतिसर्पिणीम्॥ ४

चिच्छेद शरवर्षेण ग्रसनो दानवेश्वरः।

विफलां तां समालोक्य यमस्तां शरसंततिम्॥ ५

स विचिन्त्य शरतातं ग्रसनस्य रथं प्रति।

चिक्षेप मुद्गरं घोरं तरसा तस्य चान्तकः॥ ६

स तं मुद्गरमायान्तमुत्प्लुत्य गगनस्थितम्।

जग्राह वामहस्तेन याम्यं दानवनन्दनः॥ ७

तमेव मुद्गरं गृह्य यमस्य महिषं रुषा।

पातयामास वेगेन स पपात महीतले॥ ८

उत्प्लुत्याथ यमस्तस्मान्महिषान्निष्पतिष्यतः।

प्रासेन ताडयामास ग्रसनं वदने दृढम्॥ ९

स तु प्रासप्रहारेण मूर्छितो न्यपतद् भुवि।

ग्रसनं पतितं दृष्ट्वा जम्भो भीमपराक्रमाः॥१०

यमस्य भिन्दिपालेन प्रहारमकरोद्धृदि।

यमस्तेन प्रहारेण सुस्राव रुधिरं मुखात्।। ११

कृतान्तमर्दितं दृष्ट्वा गदापाणिर्धनाधिपः।

वृतो यक्षायुतशतैर्जम्भं प्रत्युद्ययौ रुषा॥१२

सूतजी कहते हैं-ऋषिगण ! तदनन्तर (रणभूमिमें असुर-सेनानी) ग्रसनको सम्मुख उपस्थित देखकर यमराज क्रोधसे क्षुब्ध हो उठे। उन्होंने ग्रसनके ऊपर अग्निके समान तेजस्वी बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। अत्यन्त पराक्रमी ग्रसन भी बहुसंख्यक बाणोंके प्रहारसे घायल होकर भयंकर धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ाकर अत्यन्त भीषण पाँच सौ बाणोंसे यमराजको बींध डाला। उन बाणोंके आघातसे ग्रसनके प्रबल पुरुषार्थका भलीभाँति विचार कर यमराज पुनः घोर बाणवृष्टिद्वारा ग्रसनको पीड़ा पहुँचाने लगे। तब दानवेश्वर ग्रसनने गगनमण्डलमें फैलती हुई यमराजकी उस बाणवृष्टिको अपने बाणोंकी वर्षासे छिन्न-भिन्न कर दिया। इस प्रकार अपनी उस बाणवृष्टिको विफल हुई देखकर यमराज अपने बाणसमूहोंके विषयमें विचार करने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने उस ग्रसनके रथपर बड़े वेगसे अपना भयंकर मुद्गर फेंका। उस मुद्गरको अपनी ओर आते देख दानवनन्दन ग्रसनने रथसे उछलकर ऊपर-ही-ऊपर यमराजके उस मुद्गरको बायें हाथसे पकड़ लिया और उसी मुद्गरको लेकर क्रोधपूर्वक बड़े वेगसे यमराजके भैंसेपर दे मारा, जिसके आघातसे वह धराशायी हो गया। तब यमराज उस गिरते हुए भैंसेकी पीठसे उछलकर अलग हो गये। फिर तो उन्होंने भालेसे ग्रसनके मुखपर गहरी चोट पहुँचायी। तब भालेके प्रहारसे मूछित होकर ग्रसन भूतलपर गिर पड़ा। ग्रसनको धराशायी हुआ देखकर भयंकर पराक्रमी जम्भने भिन्दिपाल (ढेलवाँस)-से यमराजके हृदयपर प्रहार किया। उस प्रहारसे घायल होकर यमराज मुखसे खून उगलने लगे॥१-११॥

इस प्रकार यमराजको घायल हुआ देखकर धनेश्वर कुबेरने हाथमें गदा लेकर दस लाख यक्षोंके साथ क्रोधपूर्वक जम्भपर धावा किया।

जम्भो रुषा तमायान्तं दानवानीकसंवृतः।

उवाच प्राज्ञो वाक्यं तु यथा स्निग्धेन भाषितम्॥१३

ग्रसनो लब्धसंज्ञोऽथ यमस्य प्राहिणोद् गदाम्।

मणिहेमपरिष्कारां गुर्वीमरिविमर्दिनीम्॥१४

तामप्रतां सम्प्रेक्ष्य गदां महिषवाहनः।

गदायाः प्रतिघातार्थं जगहलनभैरवम्॥ १५

दण्डं मुमोच कोपेन ज्वालामालासमाकुलम्।

स गदां वियति प्राप्य ररासाम्बुधरो यथा॥१६

संघट्टमभवत् ताभ्यां शैलाभ्यामिव दुःसहम्।

ताभ्यां निष्पेषनिहादजडीकृतदिगन्तरम्॥१७

जगद् व्याकुलतां यातं प्रलयागमशङ्कया।

क्षणात् प्रशान्तनिर्हादं ज्वलदुल्कासमाहितम्॥१८

निष्पेषेण तयोर्भीममभूद् गमनगोचरम्।

निहत्याथ गदां दण्डस्ततो ग्रसनमूर्धनि॥१९

हृत्वा श्रियमिवानर्थो दुर्वृत्तस्यापतद् दृढः ।

स तु तेन प्रहारेण दृष्ट्वा सतिमिरा दिशः॥२०

पपात भूमौ नि:संज्ञो भूमिरेणुविभूषितः ।

ततो हाहारवो घोरः सेनयोरुभयोरभूत्॥ २१

ततो मुहूर्तमात्रेण ग्रसनः प्राप्य चेतनाम्।

अपश्यत् स्वां तनुं ध्वस्तां विलोलाभरणाम्बराम्॥ २२

स चापि चिन्तयामास कृते प्रतिकृतिक्रियाम्।

मद्विधे वस्तुनि पुंसि प्रभोः परिभवोदयाः॥२३

मय्याश्रितानि सैन्यानि जिते मयि विनाशिता।

असम्भावित एवास्तु जनः स्वच्छन्दचेष्टितः ।। २४

तब क्रोधपूर्वक कुबेरको आक्रमण करते देखकर दानवोंकी सेनासे घिरा हुआ बुद्धिमान् जम्भ प्रेमीद्वारा कही गयी मधुर वाणीकी तरह वचन बोला। इतनेमें ही ग्रसनकी चेतना लौट आयी। फिर तो उसने यमराजपर ऐसी गदाका प्रहार किया, जो बड़ी वजनदार थी, जिसमें मणि और सुवर्ण जड़े हुए थे तथा जो शत्रुओंका विनाश करनेवाली थी। उस अप्रत्याशित गदाको अपनी ओर आती देखकर महिषवाहन यमराजने क्रोधपूर्वक उस गदाका प्रतिरोध करनेके लिये अपने उस दण्डको छोड़ दिया, जो संसारका विनाश करने में समर्थ और अत्यन्त भयंकर था तथा जिससे अग्निके समान लपटें निकल रही थीं। वह दण्ड आकाशमें गदासे टकराकर मेघकी-सी गर्जना करने लगा। फिर तो दण्ड और गदामें दो पर्वतोंकी भाँति दुःसह संघर्ष छिड़ गया। उन दोनों अस्त्रोंके टक्करसे उत्पन्न हुए शब्दसे सारी दिशाएँ जड़ हो गयीं और जगत् प्रलयके आगमनकी आशङ्कासे व्याकुल हो गया। क्षणमात्र पश्चात् शब्द शान्त हो गया और उन दोनोंके मध्य जलती हुई उल्काके समान प्रकाश होने लगा। उन दोनोंके संघर्षसे आकाशमण्डल अत्यन्त भयंकर दीख रहा था। तदनन्तर दण्डने गदाको तोड़-मरोड़कर ग्रसनके मस्तकपर ऐसा कठोर आघात किया, जैसे दुराचारीका अनिष्ट उसकी श्रीका नाश करके उसे समाप्त कर देता है। उस प्रहारसे व्याकुल हुए ग्रसनको सारी दिशाएँ अन्धकारमयी दिखायी देने लगीं अर्थात् उसकी आँखों-तले अँधेरा छा गया। वह चेतनारहित होकर भूतलपर गिर पड़ा और उसका शरीर पृथ्वीकी धूलसे धूसरित हो गया। तत्पश्चात् दोनों सेनाओंमें भयंकर हाहाकार मच गया ॥ १२-२१॥

तदनन्तर दो घड़ीके पश्चात् जब ग्रसनकी चेतना वापस लौटी तब उसने देखा कि उसका शरीर ध्वस्त हो गया है और उसके आभूषण तथा वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये हैं। फिर तो वह भी ऐसा करनेवालेसे बदला चुकानेका विचार करने लगा। वह मन-ही-मन सोचने लगा-मुझ-जैसे बली पुरुषके जीते-जी स्वामीके परिभवके लक्षण दिखायी पड़ रहे हैं। मेरे पराजित हो जानेपर मेरे आश्रित रहनेवाली सेनाएँ भी नष्ट हो जायँगी। अयोग्य पुरुष ही स्वछन्दाचारी हो सकता है,

न तु व्यर्थशतो ष्टसम्भावितधनो नरः।

एवं संचिन्त्य वेगेन समुत्तस्थौ महाबलः॥ २५

मुद्गरं कालदण्डाभं गृहीत्वा गिरिसंनिभः।

ग्रसनो घोरसंकल्प: संदष्टौष्ठपुटच्छदः॥ २६

रथेन त्वरितो गच्छन्नाससादान्तकं रणे।

समासाद्य यमं युद्धे ग्रसनो भ्राम्य मुद्गरम्॥ २७

वेगेन महता रौद्रं चिक्षेप यममूर्धनि।

विलोक्य मुद्गरं दीप्तं यमः सम्भ्रान्तलोचनः॥ २८

वञ्चयामास दुर्धर्षं मुद्गरं स महाबलः।

तस्मिन्नपसृते दूरं चण्डानां भीमकर्मणाम्॥ २९

याम्यानां किङ्कराणां तु सहस्त्रं निष्पिपेष ह।

ततस्तां निहतां दृष्ट्वा घोरां किङ्करवाहिनीम्॥ ३०

अगमत् परमं क्षोभं नानाप्रहरणोद्यतः।

ग्रसनस्तु समालोक्य तां किङ्करमयीं चमूम्॥३१

मेने यमसहस्राणि सृष्टानि यममायया।

निग्राह्य ग्रसनः सेनां विसृजन्नस्त्रवृष्टयः॥३२

कल्पान्तघोरसङ्काशो बभूव क्रोधमूर्छितः।

कांश्चिद् बिभेद शूलेन कांश्चिद् बाणैरजिह्मगैः॥३३

कांश्चित्पिपेष गदया कांश्चिन्मुद्गरवृष्टिभिः।

केचित्प्रासप्रहारैश्च दारुणैस्ताडितास्तदा ॥ ३४

अपरे बहुशस्तस्य ललम्बुर्बाहुमण्डले।

शिलाभिरपरे जघुर्दुमैरन्यैर्महोच्छ्रयैः॥ ३५

किंतु जो पुरुष सैकड़ों बार योग्य घोषित किया जा चुका है, वह स्वच्छन्द नहीं हो सकता। (अर्थात् जिसकी जगत्में कोई प्रतिष्ठा नहीं है, वह स्वेच्छानुसार कार्य कर सकता है, किंतु जो सैकड़ों बार लब्धप्रतिष्ठ हो चुका है, उसे स्वामीके अधीन रहकर ही कार्य करना चाहिये।) ऐसा विचारकर महाबली ग्रसन वेगपूर्वक उठ खड़ा हुआ। उसका शरीर पर्वतके समान विशाल था। वह भयंकर विचारसे युक्त था और क्रोधवश दाँतोंसे होंठको दवाये हुए था। इस प्रकार वह शीघ्रतापूर्वक रथपर सवार हो हाथमें कालदण्डके सदृश मुद्गर लेकर रणभूमिमें यमराजके निकट आ पहुँचा। युद्धस्थलमें यमराजके सम्मुख आकर ग्रसनने उस भयानक मुद्गरको बड़े वेगसे घुमाकर यमराजके मस्तकपर फेंक दिया। उस प्रकाशमान मुद्गरको आते हुए देखकर यमराजके नेत्र चकमका गये। तत्पश्चात् महाबली यमराजने अपने स्थानसे हटकर उस दुर्धर्ष मुद्गरको लक्ष्यसे वञ्चित कर दिया। यमराजके दूर हट जानेपर उस मुद्गरने यमराजके हजारों पराक्रमी एवं भयंकर कर्म करनेवाले किंकरोंको पीस डाला। तत्पश्चात् उस भयंकर किंकर-सेनाको मारी गयी देखकर यमराजको परम क्षोभ हुआ। तब वे नाना प्रकारके अस्त्रोंका प्रहार करनेके लिये उद्यत हो गये॥ २२३०३॥

उधर ग्रसनने उस सेनाको किकरोंसे व्याप्त देखकर ऐसा समझा कि यमराजकी मायाद्वारा रचे गये ये हजारों यमराज ही हैं। फिर तो ग्रसन सेनाको रोककर उसपर अस्त्रोंकी वृष्टि करने लगा। उस समय वह कल्पान्तके समय क्षुब्ध हुए भयंकर समुद्रकी भाँति क्रोधसे विह्वल  हो उठा था। उसने कुछ किंकरोंको त्रिशूलसे और कुछको सीधे जानेवाले बाणोंसे विदीर्ण कर दिया। कुछको गदाके प्रहारसे और कुछको मुद्गरोंकी वर्षासे पीस डाला। कुछ भयंकर भालोंके प्रहारसे घायल कर दिये गये। दूसरे बहुत-से उसकी बाहुओंपर लटके हुए थे। इधर किंकरोंमेंसे बहुत-से लोग शिलाओंद्वारा तथा अन्य कुछ लोग ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंद्वारा ग्रसनपर

तस्यापरे तु गात्रेषु दशनैरप्यदंशयन्।

अपरे मुष्टिभिः पृष्ठं किंकराः प्रहरन्ति च॥३६

अभिद्रुतस्तथा घोरैर्ग्रसनः क्रोधमूछितः।

उत्सृज्य गात्रं भूपृष्ठे निष्पिपेष सहस्रशः॥३७

कांश्चिदुत्थाय मुष्टीभिर्जने किङ्करसंश्रयान्।

स तु किङ्करयुद्धेन ग्रसनः श्रममाप्तवान्॥ ३८

तमालोक्य यमः श्रान्तं निहतां च स्ववाहिनीम्।

आजगाम समुद्यम्य दण्डं महिषवाहनः॥ ३९

ग्रसनस्तु समायान्तमाजघ्ने गदयोरसि।

अचिन्तयित्वा तत्कर्म ग्रसनस्यान्तकोऽरिहा॥४०

जघ्ने रथस्य मूर्धन्यान् व्याघ्रान् दण्डेन कोपनः।

स रथो दण्डमथितैर्व्याघेरधैर्विकृष्यते॥४१

संशयः पुरुषस्येव चित्तं दैत्यस्य तद्रथम्।

समुत्सृज्य रथं दैत्यः पदातिधरणीं गतः॥४२

यमं भुजाभ्यामादाय योधयामास दानवः ।

यमोऽपि शस्त्राण्युत्सृज्य बाहुयुद्धेष्ववर्तत॥ ४३

ग्रसनः कटिवस्त्रस्तु यमं गृह्य बलोद्धतः।

भ्रामयामास वेगेन प्रदीपमिव सम्भ्रमम्॥ ४४

यमोऽपि कण्ठेऽवष्टभ्य दैत्यं बाहुयुगेन तु।

वेगेन भ्रामयामास समुत्कृष्य महीतलात्॥ ४५

ततो मुष्टिभिराजघ्नुरर्दयन्तो परस्परम्। ।

दैत्येन्द्रस्यातिकायत्वात्ततः श्रान्तभुजो यमः॥४६

स्कन्धे निधाय दैत्यस्य मुखं विश्रान्तिमैच्छत।

तमालक्ष्य ततो दैत्यः श्रान्तमन्तकमोजसा॥४७

प्रहार कर रहे थे। कुछ उसके शरीराङ्गोंमें दाँतोंसे काट  रहे थे। दूसरे किंकर उसकी पीठपर मुक्केसे प्रहार कर रहे थे। इस प्रकार घोरकर्मा किंकरोंद्वारा पीछा किये जानेपर ग्रसन अत्यन्त क्रुद्ध हो गया। उसने अपने शरीरको भूतलपर गिराकर हजारों किंकरोंको उसके नीचे पीस डाला। फिर उठकर कुछ किंकरोंको मुक्केसे पीटकर मौतके घाट उतार दिया। इस प्रकार किंकरोंके साथ युद्ध करनेसे ग्रसन थकावटसे चूर हो गया था। तब आसनको थका हुआ तथा अपनी सेनाको मारी गयी देखकर महिषवाहन यमराज हाथमें दण्ड लेकर आ पहुँचे। ग्रसनने सम्मुख आये हुए यमराजके वक्षःस्थलपर गदासे प्रहार किया। तब शत्रुसूदन यमराजने ग्रसनके उस प्रहारकी कुछ भी परवाह न कर उसके रथके अग्रभागमें जुते हुए बाघोंपर क्रोधपूर्वक दण्डसे प्रहार किया। उस दण्डप्रहारसे आधे बाघोंके मारे जानेपर वह रथ आधे बाघोंद्वारा ही खींचा जा रहा था॥ ३१-४१॥

उस समय दैत्यराज ग्रसनका वह रथ पुरुषके संशयग्रस्त चित्तकी भाँति अस्थिर हो गया था। अत: दैत्यराज ग्रसन रथको छोड़कर भूतलपर आ गया और पैदल ही आगे बढ़कर यमराजको दोनों भुजाओंसे पकड़कर युद्ध करने लगा। तब यमराज भी शस्त्रोंको छोड़कर बाहुयुद्धमें प्रवृत्त हो गये। बलाभिमानी ग्रसन यमराजके कमरबंदको पकड़कर उन्हें घूमते हुए दीपककी भाँति वेगपूर्वक घुमाने लगा। तब यमराज भी अपनी दोनों भुजाओंसे दैत्यके गलेको पकड़कर उसे वेगपूर्वक भूतलसे ऊपर खींचकर बड़ी देरतक घुमाते रहे। तत्पश्चात् वे दोनों परस्पर एक-दूसरेको पीड़ित करते हुए मुक्कोंसे प्रहार करने लगे। उस समय दैत्येन्द्र ग्रसनके विशालकाय होनेके कारण यमराजकी भुजाएँ शिथिल हो गयीं। तब वे उस दैत्यके कंधेपर अपना मुख रखकर विश्राम करनेकी इच्छा करने लगे। यमराजको इस प्रकार थका हुआ देखकर

निष्पिपेष महीपृष्ठे बहुशः पाणिपाणिभिः।

यावद्यमस्य वदनात् सुस्राव रुधिरं बहु॥४८

निर्जीवितं यमं दृष्ट्वा ततः संत्यज्य दानवः ।

जयं प्राप्योद्धतं दैत्यो नादं मुक्त्वा महास्वनः॥ ४९

स्वीयं सैन्यं समासाद्य तस्थौ गिरिरिवाचलः।

धनाधिपस्य जम्भेन सायकैमर्मभेदिभिः॥५०

दिशोऽवरुद्धाः क्रुद्धेन सैन्यं चास्य निकृन्तितम्।

ततः क्रोधपरीतस्तु धनेशो जम्भदानवम्॥५१

हृदि विव्याध बाणानां सहस्त्रेणाग्निवर्चसाम्।

सारथिं च शतेनाजौ ध्वजं दशभिरेव च॥५२

हस्तौ च पञ्चसप्तत्या मार्गणैर्दशभिर्धनुः ।

मार्गणैर्बर्हिपत्राङ्गैस्तैलधौतैरजिह्मगैः ॥५३

सिंहमेकेन तं तीक्ष्णैर्विव्याध दशभिः शरैः।

जम्भस्तु कर्म तदृष्ट्वा धनेशस्यातिदुष्करम्॥५४

हृदि धैर्य समालम्ब्य किञ्चित्संत्रस्तमानसः।

जग्राह निशितान् बाणाञ्छत्रुमर्मविभेदिनः ॥ ५५

आकर्णाकृष्टचापस्तु जम्भः क्रोधपरिप्लुतः।

विव्याध धनदं तीक्ष्णैः शरैर्वक्षसि दानवः ॥५६

सारथिं चास्य बाणेन दृढेनाभ्यहनद्धृदि।

चिच्छेद ज्यामथैकेन तैलधौतेन दानवः॥५७

ततस्तु निशितैर्बाणैर्दारुणैर्मर्मभेदिभिः।

विव्याधोरसि वित्तेशं दशभिः क्रूरकर्मकृत्॥५८

मोहं परमतो गच्छन् दृढविद्धो हि वित्तपः।

स क्षणाद् धैर्यमालम्ब्य धनुराकृष्य भैरवम्॥५९

किरन् बाणसहस्राणि निशितानि धनाधिपः।

दिशः खं विदिशो भूमीरनीकान्यसुरस्य च॥६०

ग्रसन उन्हें बलपूर्वक पृथ्वीपर पटककर बारम्बार रगड़ने लगा और पैरोंकी ठोकरों और घूसोंसे तबतक मारता रहा, जबतक यमराजके मुखसे बहुत-सा रक्त बहने लगा। तत्पश्चात् दानवराजने यमराजको प्राणहीन देखकर उन्हें छोड़ दिया। फिर गम्भीर गर्जना करनेवाला दैत्यराज ग्रसन विजयी होकर सिंहनाद करता हुआ अपनी सेनामें पहुँचकर पर्वतकी भाँति अटल होकर खड़ा हो गया॥४२-४९३॥

उधर क्रोधसे भरे हुए जम्भने अपने मर्मभेदी बाणोंद्वारा कुबेरके सारे मार्ग (दिशाएँ) अवरुद्ध कर दिये और उनकी सेनाको काटना आरम्भ किया। यह देखकर धनेश क्रोधसे भर उठे। उन्होंने युद्धभूमिमें अग्निके समान वर्चस्वी एक हजार बाणोंसे दानवराज जम्भके हृदयको बींध दिया। फिर सौ बाणोंसे सारथिको, दस बाणोंसे ध्वजको, पचहत्तर बाणोंसे उसके दोनों हाथोंको, दस बाणोंसे धनुषको, एक बाणसे (उसके वाहन) सिंहको और दस तीखे बाणोंसे पुन: उस दानवराजको बींध दिया। इन सब बाणोंमें मोरके पंख लगे हुए थे तथा ये तेलमें डालकर साफ किये हुए और सीधे लक्ष्यवेध करनेवाले थे। धनेशके उस अत्यन्त दुष्कर कर्मको देखकर जम्भका मन कुछ भयभीत हो उठा। फिर उसने हृदयमें धैर्य धारण कर शत्रुओंके मर्मको विदीर्ण करनेवाले तीखे बाणोंको हाथमें लिया। उस समय दानवराज जम्भ क्रोधसे भरा हुआ था। उसने अपने धनुषको कानतक खींचकर तीखे बाणोंसे कुबेरके वक्षःस्थलको बींध दिया। फिर उनके सारथिके हृदयपर एक सुदृढ़ बाणसे आघात किया और तेलमें सफाये हुए एक बाणसे उनकी प्रत्यञ्चाको काट दिया। तदनन्तर क्रूरकर्मा दानवराज जम्भने तीखे एवं मर्मभेदी दस भयंकर बाणोंसे कुबेरके वक्षःस्थलको पुनः घायल कर दिया। तब बुरी तरह घायल हुए कुबेर मूर्छित हो गये। क्षणमात्रके बाद कुबेरकी मूर्छा भंग हुई, तब उन्होंने धैर्य धारणकर अपने भयंकर धनुषको वेगपूर्वक खींचकर हजारों तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए दिशाओं, विदिशाओं, आकाश, पृथ्वी और

पूरयामास वेगेन संछाद्य रविमण्डलम्।

जम्भोऽपि परमेकैकं शरैर्बहुभिराहवे॥६१

चिच्छेद लघुसंधानो धनेशस्यातिपौरुषात्।

ततो धनेश: संक्रुद्धो दानवेन्द्रस्य कर्मणा॥६२

व्यधमत् तस्य सैन्यानि नानासायकवृष्टिभिः।

तद् दृष्ट्वा दुष्कृतं कर्म धनाध्यक्षस्य दानवः॥६३

गृहीत्वा मुद्गरं भीममायसं हेमभूषितम्।

धनदानुचरान् यक्षान् निष्पिपेष सहस्रशः॥६४

ते वध्यमाना दैत्येन मुञ्चन्तो भैरवान् रवान्।

रथं धनपतेः सर्वे परिवार्य व्यवस्थिताः॥६५

दृष्ट्वा तानर्दितान् देवः शूलं जग्राह दारुणम्।

तेन दैत्यसहस्राणि सूदयामास सत्वरः ।। ६६

क्षीयमाणेषु दैत्येषु दानवः क्रोधमूर्छितः।

जग्राह परशुं दैत्यो मर्दनं दैत्यविद्विषाम्।। ६७

स तेन शितधारेण धनभर्तुर्महारथम्।

चिच्छेद तिलशो दैत्यो ह्याखुः स्निग्धमिवाम्बरम्॥६८

पदातिरथ वित्तेशो गदामादाय भैरवीम्।

महाहवविमर्देषु दृप्तशत्रुविनाशिनीम्॥६९

अधृष्यां सर्वभूतानां बहुवर्षगणार्चिताम्।

नानाचन्दनदिग्धाङ्गां दिव्यपुष्पविवासिताम्॥७०

निर्मलायोमयीं गुर्वीममोघां हेमभूषणाम्।

चिक्षेप मूर्ध्नि संक्रुद्धो जम्भस्य तु धनाधिपः॥७१

आयान्तीं तां समालोक्य तडित्संघातमण्डिताम्।

दैत्यो गदाभिघातार्थं शस्त्रवृष्टिं मुमोच ह॥७२

चक्राणि कुणपान् प्रासान् भुशुण्डी: पट्टिशानपि।

हेमकेयूरनद्धाभ्यां बाहुभ्यां चण्डविक्रमः॥७३

असुरकी सेनाओंको ढक दिया। यहाँतक कि उस बाणवर्षासे सूर्यमण्डल भी आच्छादित हो गया॥ ५०-६०॥

तब शीघ्रतापूर्वक बाण संधान करनेवाले जम्भने भी युद्धस्थलमें परम पुरुषार्थ प्रकट करके कुबेरके एक-एक बाणको बहुसंख्यक बाणोंसे काट गिराया। दानवेन्द्रके उस कर्मको देखकर धनेश अत्यन्त कुपित हो उठे तब वे नाना प्रकारके बाणोंकी वृष्टि करके उसकी सेनाका विध्वंस करने लगे। कुबेरके दुष्कर कर्मको देखकर दानवराज जम्भने लौहनिर्मित एवं स्वर्णजटित भयंकर मुद्गरको लेकर कुबेरके अनुचर हजारों यक्षोंको चकनाचूर कर दिया। दैत्यद्वारा मारे जाते हुए वे सभी यक्ष भयंकर चीत्कार करते हुए कुबेरके रथको घेरकर खड़े हो गये। उन यक्षोंको दु:खी देखकर कुबेरने अपना भीषण त्रिशूल हाथमें लिया और उससे शीघ्र ही हजारों दैत्योंको मौतके हवाले कर दिया। इस प्रकार दैत्योंका विनाश होते देखकर दानवराज जम्भ क्रोधसे भर गया और उसने देवताओंका मर्दन करनेवाले तेज धारसे युक्त फरसेसे कुबेरके महान् रथको उसी प्रकार तिल-तिल करके काट डाला, जैसे चूहा रेशमी वस्त्रको कुतर डालता है। इससे कुबेर परम क्रुद्ध हो उठे, तब उन्होंने पैदल ही अपनी उस भयंकर गदाको, जो बड़े-बड़े युद्धोंमें गर्वीले शत्रुओंका विनाश करनेवाली, सभी प्राणियोंके लिये अधृष्य, बहुत वर्षों से पूजित, नाना प्रकारके चन्दनोंके अनुलेपसे युक्त, दिव्य पुष्पोंसे सुवासित, निर्मल लौहकी बनी हुई, वजनदार, अमोघ और स्वर्णभूषित थी, हाथमें लेकर जम्भके मस्तकको लक्ष्य बनाकर छोड़ दिया॥६१-७१ ॥

विद्युत्समूहसे विभूषित-जैसी उस गदाको अपनी ओर आती देखकर दैत्यराज जम्भ उसको नष्ट करनेके लिये बाणोंकी वृष्टि करने लगा। यद्यपि प्रचण्ड पराक्रमी जम्भ स्वर्णनिर्मित बाजूबन्दोंद्वारा विभूषित भुजाओंसे चक्रों, कुणपों, भालों, भुशुण्डियों और पट्टिशोंका प्रहार

व्यर्थीकृत्य तु तान् सर्वानायुधान् दैत्यवक्षसि।

प्रस्फुरन्ती पपातोग्रा महोल्केवाद्रिकन्दरे॥७४

स तयाभिहतो गाढं पपात रथकूबरे।

स्रोतोभिश्चास्य रुधिरं सुस्राव गतचेतसः॥७५

जम्भं तु निहतं मत्वा कुजम्भो भैरवस्वनः।

धनाधिपस्य संक्रुद्धो वाक्येनातीव कोपितः॥७६

चक्रे बाणमयं जालं दिक्षु यक्षाधिपस्य तु।

चिच्छेद बाणजालं तदर्धचन्द्रैः शितैस्ततः॥७७

मुमोच शरवृष्टिं तु तस्मै यक्षाधिपो बली।

स तं दैत्यः शरव्रातं चिच्छेद निशितैः शरैः॥७८

व्यर्थीकृतां तु तां दृष्ट्वा शरवृष्टिं धनाधिपः।

शक्तिं जग्राह दुर्द्धर्षां हेमघण्टाट्टहासिनीम्॥७९

बाहुना रत्नकेयूरकान्तिसन्नाहनासिना।

स तां निरूप्य वेगेन कुजम्भाय मुमोच ह॥८०

सा कुजम्भस्य हृदयं दारयामास दारुणम्।

वित्तेहा स्वल्पसत्त्वस्य पुरुषस्येव भाविता॥ ८१

अथास्य हृदयं भित्त्वा जगाम धरणीतलम्।

ततो मुहूर्तादस्वस्थो दानवो दारुणाकृतिः।। ८२

जग्राह पट्टिशं दैत्यः प्रांशुं शितशिलीमुखम्।

स तेन पट्टिशेनाजौ धनदस्य स्तनान्तरम्॥८३

वाक्येन तीक्ष्णरूपेण मर्मान्तरविसर्पिणा।

निर्बिभेदाभिजातस्य हृदयं दुर्जनो यथा ।। ८४

तेन पट्टिशघातेन धनेशः परिमूर्छितः।

निपपात रथोपस्थे जर्जरो धूर्वहो यथा॥८५

तथागतं तु तं दृष्ट्वा धनेशं नरवाहनम्।

खड्गास्त्रो निर्ऋतिर्देवो निशाचरबलानुगः॥८६

कर रहा था तथापि चमकती हुई वह भयंकर गदा उन सभी आयुधोंको विफल कर जम्भके वक्षःस्थलपर उसी प्रकार गिरी, मानो पर्वतकी कन्दरामें विशाल उल्का आ गिरी हो। उस गदाके आघातसे अत्यन्त घायल हुआ जम्भ रथके कूबरपर गिर पड़ा। उसके शरीरके छिद्रोंसे खूनकी धारा बहने लगी, जिससे वह चेतनारहित हो गया ॥७२-७५॥

जम्भको मरा हुआ समझकर भयंकर गर्जना करनेवाला क्रोधी कुजम्भ कुबेरके वाक्यसे अत्यन्त कुपित हो उठा। उसने यक्षराजके चारों ओर बाणोंका जाल बिछा दिया। तदनन्तर बलवान् यक्षराजने तीखे अर्धचन्द्र बाणोंके प्रहारसे उस बाणजालको छिन्न-भिन्न कर दिया और वे उस दैत्यपर बाणोंकी वृष्टि करने लगे; परन्तु दैत्यराज कुजम्भने अपने तीखे बाणोंसे उस बाणवृष्टिको काट दिया। उस बाणवृष्टिको विफल हुई देखकर धनेशने अपनी उस दुर्धर्ष शक्तिको हाथमें उठाया, जिसमें स्वर्णनिर्मित घंटियोंके शब्द हो रहे थे। उन्होंने अपने रत्ननिर्मित बाजूबंदके कान्तिसमूहसे सुशोभित हाथसे उस शक्तिको आजमाकर वेगपूर्वक कुजम्भके ऊपर छोड़ दिया। उस शक्तिने कुजम्भके दारुण हृदयको उसी प्रकार विदीर्ण कर दिया, जैसे निर्धन पुरुषकी अभिलषित धनाशा नष्ट हो जाती है। इस प्रकार वह शक्ति उसके हृदयको विदीर्ण करके भूतलपर जा गिरी, जिससे भयंकर आकृतिवाला वह दानव दो घड़ीतक मूर्छित पड़ा रहा। (मूर्छा भङ्ग होनेपर) उस दैत्यने एक लम्बे एवं तेज मुखवाले पट्टिशको हाथमें लिया। उसने उस पट्टिशसे कुबेरके स्तनोंके मध्यभागको इस प्रकार विदीर्ण कर दिया जैसे दुर्जन पुरुष अपने मर्मभेदी कठोर वाक्यसे सत्पुरुषके हृदयको विदीर्ण कर देता है। उस पट्टिशके आघातसे धनेश मूर्छित हो गये और रथके पिछले भागमें बूढ़े बैलकी तरह लुढ़क पड़े॥ ७६-८५॥

उन नरवाहन कुबेरको मूछित हुआ देखकर निर्ऋतिदेवने हाथमें तलवार लेकर निशाचरोंकी सेनाके साथ वेगपूर्वक भयंकर पराक्रमी कुजम्भपर आक्रमण

अभिदुद्राव वेगेन कुजम्भं भीमविक्रमम्।

अथ दृष्ट्वा तु दुर्धर्षं कुजम्भो राक्षसेश्वरम्॥८७

चोदयामास सैन्यानि राक्षसेन्द्रवधं प्रति।

स दृष्ट्वा चोदितां सेनां भल्लनानास्त्रभीषणाम्॥८८

रथादाप्लुत्य वेगेन भूषणद्युतिभास्वरः।

खड्गेन कमलानीव विकोशेनाम्बरत्विषा ।। ८९

चिच्छेद रिपुवक्त्राणि विचित्राणि समंततः।

तिर्यक्पृष्ठमधश्चोर्ध्वं दीर्घबाहुर्महासिना॥९०

संदष्टौष्ठपुटाटोपभ्रुकुटीविकटाननः

प्रचण्डकोपरक्ताक्षो न्यकृन्तद् दानवान् रणे॥९१

ततो निःशेषितप्रायां विलोक्य स्वामनीकिनीम्।

मुक्त्वा कुजम्भो धनदं राक्षसेन्द्रमभिद्रवत्।। ९२

लब्धसंज्ञोऽथ जम्भस्तु धनाध्यक्षपदानुगान्।

जीवनाहान् स जग्राह बध्वा पाशैः सहस्रशः॥ ९३

मूर्तिमन्ति तु रत्नानि विविधानि च दानवाः ।

वाहनानि च दिव्यानि विमानानि सहस्त्रशः॥९४

धनेशो लब्धसंज्ञोऽथ तामवस्थां विलोक्य तु।

निःश्वसन् दीर्घमुष्णं च रोषात् ताम्रविलोचनः ॥ ९५

ध्यात्वास्त्रं गारुडं दिव्यं बाणं संधाय कार्मुके।

मुमोच दानवानीके तं बाणं शत्रुदारणम्॥९६

प्रथमं कार्मुकात् तस्य निश्चेरुधूमराजयः।

अनन्तरं स्फुलिङ्गानां कोटयो दीप्तवर्चसाम्॥ ९७

ततो ज्वालाकुलं व्योम चकारास्त्रं समन्ततः ।

ततः क्रमेण दुर्वारं नानारूपं तदाभवत्॥९८

अमूर्तश्चाभवल्लोको ह्यन्धकारसमावृतः।

ततोऽन्तरिक्षे शंसन्ति तेजस्ते तु परिष्कृतम्॥९९

किया। तब दुर्धर्ष राक्षसेश्वर निर्ऋतिको आक्रमण करते देख कुजम्भने उन राक्षसेन्द्रका वध करनेके लिये अपनी सेनाओंको ललकारा। भल्ल आदि नाना प्रकारके अस्त्रोंको धारण करनेसे भयंकर रूपवाली उस सेनाको आगे बढ़ते देखकर आभूषणोंकी कान्तिसे उद्भासित होते हुए निर्ऋतिदेव रथसे वेगपूर्वक कूद पड़े और नीली कान्तिवाले म्यानसे तलवार खींचकर उससे शत्रुओंके विचित्र आकारवाले मुखोंको कमल-पुष्पकी तरह काटने लगे। उस समय दाँतोंसे होंठको चबाने एवं भौहें चढ़ी होनेके कारण उनका मुख भयंकर दीख रहा था और प्रचण्ड क्रोधके कारण उनके नेत्र लाल हो गये थे। इस प्रकार लम्बी भुजाओंवाले निर्ऋति रणभूमिमें आगे-पीछे, ऊपर-नीचे चारों ओर घूम-घूमकर उस विशाल तलवारसे दानवोंको टुकड़े-टुकड़े कर रहे थे। इस प्रकार अपनी सेनाको समाप्तप्राय देखकर कुजम्भने कुबेरको छोड़कर राक्षसेश्वर निर्ऋतिपर धावा बोल दिया।८६-९२ ॥

इधर जब जम्भकी मूर्छा भंग हुई, तब उसने कुबेरके अनुचर हजारों यक्षोंको जीते-जी पकड़कर पाशोंसे बाँध लिया तथा दानवोंने उनके अनेकों प्रकारके मूर्तिमान् रत्नों, वाहनों और हजारों दिव्य विमानोंको अपने अधीन कर लिया। उधर जब कुबेरकी चेतना लौटी, तब उस दशाको देखकर क्रोधवश उनके नेत्र लाल हो गये और वे लम्बी एवं गरम साँस लेने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने दिव्य गारुडास्त्रका ध्यान करके उस बाणका धनुषपर संधान किया और फिर उस शत्रुनाशक बाणको दानवोंकी सेनापर छोड़ दिया। पहले तो उनके धनुषसे धुएँको पङ्क्तियाँ प्रकट हुईं। तदनन्तर उससे जलती हुई करोड़ों चिनगारियाँ निकलने लगीं। तत्पश्चात् उस अस्त्रने आकाशको चारों ओरसे लपटोंसे व्याप्त कर दिया। फिर वह नाना प्रकारके रूपोंमें फैलकर दुर्निवार हो गया। उस समय अन्धकारसे आच्छादित होनेके कारण सारा जगत् रूपरहित-सा दिखायी पड़ने लगा। तब आकाशमण्डलमें स्थित देवगण उस उत्कृष्ट तेजकी प्रशंसा करने लगे। यह

कुजम्भस्तत्समालोच्य दानवोऽतिपराक्रमः ।

अभिदुद्राव वेगेन पदातिर्धनदं नदन्॥१००

अथाभिमुखमायान्तं दैत्यं दृष्ट्वा धनाधिपः।

बभूव सम्भ्रमाविष्टः पलायनपरायणः ॥ १०१

ततः पलायतस्तस्य मुकुटं रत्नमण्डितम्।

पपात भूतले दीप्तं रविबिम्बमिवाम्बरात्॥१०२

शूराणामभिजातानां भर्तर्युपसृते रणात्।

मर्तुं संग्रामशिरसि युक्तं तद्भूषणाग्रतः॥१०३

इति व्यवस्य दुर्धर्षा नानाशस्त्रास्त्रपाणयः।

युयुत्सवः स्थिता यक्षा मुकुटं परिवार्य तम्॥१०४

अभिमानधना वीरा धनदस्य पदानुगाः।

तानमर्षाच्च सम्प्रेक्ष्य दानवश्चण्डपौरुषः॥१०५

भुशुण्डी भैरवाकारां गृहीत्वा शैलगौरवाम्।

रक्षिणो मुकुटस्याथ निष्पिपेष निशाचरान्॥१०६

तान् प्रमथ्याथ दनुजो मुकुटं तत् स्वके रथे।

समारोप्यामररिपुर्जित्वा धनदमाहवे॥१०७

धनानि रत्नानि च मूर्तिमन्ति

तथा निधानानि शरीरिणश्च।

आदाय सर्वाणि जगाम दैत्यो

जम्भः स्वसैन्यं दनुजेन्द्रसिंहः

धनाधिपो वै विनिकीर्णमूर्धजो

जगाम दीनः सुरभरिन्तिकम्॥१०८

कुजम्भेनाथ संसक्तो रजनीचरनन्दनः ।

मायाममोघामाश्रित्य तामसी राक्षसेश्वरः॥१०९

मोहयामास दैत्येन्द्रं जगत् कृत्वा तमोमयम्।

ततो विफलनेत्राणि दानवानां बलानि तु॥११०

न शेकुश्चलितुं तत्र पदादपि पदं तदा।

ततो नानास्त्रवर्षेण दानवानां महाचमूम्॥१११

देखकर परम पराक्रमी दानवराज जम्भ सिंहनाद करता हुआ पैदल ही वेगपूर्वक कुबेरपर चढ़ दौड़ा ॥ ९३-१०० ॥

इस प्रकार उस दैत्यको अपनी ओर आता हुआ देखकर कुबेर घबरा उठे और रणभूमिसे भाग खड़े हुए। भागते समय उनका रत्नजटित उद्दीप्त मुकुट इस प्रकार भूतलपर गिर पड़ा मानो आकाशसे सूर्यका बिम्ब गिर पड़ा हो। रणभूमिसे स्वामीके पलायन कर जानेपर उनके आभूषणोंके समक्ष उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए वीरोंका संग्रामके मुहानेपर मर जाना उचित है।' ऐसा निश्चयकर दुर्धर्ष यक्ष हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र धारणकर युद्धकी अभिलाषासे युक्त हो उस मुकुटको घेरकर खड़े हो गये; क्योंकि कुबेरके अनुचर वे वीरवर यक्ष स्वाभिमानके धनी थे। तदनन्तर उन्हें इस प्रकार युद्धोन्मुख देखकर प्रचण्ड पुरुषार्थी दानवराज जम्भ अमर्षसे भर गया। तब उसने पर्वतकी-सी गम्भीर एवं भयंकर आकारवाली भुशुण्डि लेकर उससे मुकुटके रक्षक निशाचरोंको पीस डाला। इस प्रकार उनका संहार कर उस देवशत्रु दानवने उस मुकुटको अपने रथपर रख लिया। तत्पश्चात् सिंहके समान पराक्रमी दैत्येन्द्र जम्भ युद्धभूमिमें कुबेरको जीतकर सैनिकोंके सभी आभूषणों, सम्पत्तियों तथा मूर्तिमान् रत्नोंको लेकर अपनी सेनाकी ओर चला गया। इधर कुबेर बाल बिखेरे हुए दीनभावसे देवराज इन्द्रके निकट चले गये ॥ १०१-१०८॥

उधर असुरनन्दन राक्षसेश्वर निर्ऋति अपनी अमोघ राक्षसी मायाका आश्रय लेकर कुजम्भके साथ भिड़े हुए थे। उन्होंने जगत्को अन्धकारमय बनाकर दैत्यराज कुजम्भको मोहमें डाल दिया। उससे दानवोंकी सेनामें किसीको कुछ सूझ नहीं पड़ता था। वे एक पगसे दूसरे पगतक भी चलनेमें असमर्थ हो गये थे। तब उन्होंने अनेकों

जघान घननीहारतिमिरातुरवाहनाम्।

वध्यमानेषु दैत्येषु कुजम्भे मूढचेतसि॥११२

महिषो दानवेन्द्रस्तु कल्पान्ताम्भोदसंनिभः ।

अस्त्रं चकार सावित्रमुल्कासंघातमण्डितम्॥११३

विजृम्भत्यथ सावित्रे परमास्त्रे प्रतापिनि।

प्रणाशमगमत् तीव्र तमो घोरमनन्तरम्॥११४

ततोऽस्त्रं विस्फुलिङ्गाङ्कं तमः कृत्स्नं व्यनाशयत् ।

प्रफुल्लारुणपद्मोघं शरदीवामलं सरः॥ ११५

ततस्तमसि संशान्ते दैत्येन्द्राः प्राप्तचक्षुषः ।

चक्रुः क्रूरेण मनसा देवानीकैः सहाद्भुतम्॥११६

शस्त्रैरमर्षान्निर्मुक्तैर्भुजङ्गास्त्रं विनोदितम्।

अथादाय धनुर्घोरमिधूंश्चाशीविषोपमान्॥११७

कुजम्भोऽधावत क्षिप्रं रक्षोराजबलं प्रति।

राक्षसेन्द्रस्तमायान्तं विलोक्य सपदानुगः ॥११८

विव्याध निशितैर्बाणैः क्रूराशीविषभीषणैः।

तदादानं च संधानं न मोक्षश्चापि लक्ष्यते॥ ११९

चिच्छेदास्य शरवातान् स्वशरैरतिलाघवात्।

ध्वजं परमतीक्ष्णेन चित्रकर्मामरद्विषः॥१२०

सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत्।

कुजम्भः कर्म तद् दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य संयुगे॥१२१

रोषरक्तेक्षणयुतो रथादाप्लुत्य दानवः ।

खड्गं जग्राह वेगेन शरदम्बरनिर्मलम्॥१२२

चर्म चोदयखण्डेन्दुदशकेन विभूषितम्।

अभ्यद्रवद् रणे दैत्यो रक्षोऽधिपतिमोजसा॥१२३

तं रक्षोऽधिपतिः प्राप्तं मुद्गरेणाहनद्धृदि।

स तु तेन प्रहारेण क्षीण: सम्भ्रान्तमानसः॥१२४

तस्थावचेष्टो दनुजो यथा धीरो धराधरः।

स मुहूर्तं समाश्वस्तो दानवेन्द्रोऽतिदुर्जयः॥१२५

अस्त्रोंकी वर्षा करके घने कुहासेके अन्धकारसे व्याकुल हुए वाहनोंवाली दानवोंकी उस विशाल सेनाका संहार कर दिया। इस प्रकार दैत्योंके मारे जाने एवं कुजम्भके किंकर्तव्यविमूढ हो जानेपर प्रलयकालीन मेघके समान शरीरवाले दानवेन्द्र महिषने उल्कासमूहसे सुशोभित सावित्र नामक अस्त्रको प्रकट किया। उस प्रतापशाली सावित्र नामक परमास्त्रके प्रकट होते ही सारा निविड़ अन्धकार नष्ट हो गया। तत्पश्चात् उस अस्त्रसे चिनगारियाँ निकलने लगीं, जिन्होंने सम्पूर्ण अन्धकारको नष्ट कर दिया। उस समय सारा जगत् शरद्-ऋतुमें खिले हुए लाल कमलसमूहोंसे व्याप्त निर्मल सरोवरकी भाँति शोभा पाने लगा। इस प्रकार अन्धकारके नष्ट हो जानेपर जब दैत्येन्द्रोंको पुनः नेत्रज्योति प्राप्त हो गयी, तब वे क्रूर मनसे देवसेनाओंके साथ अद्भुत संग्राम करने लगे। क्रोधसे भरे हुए दैत्य शस्त्रोंका प्रहार तो कर ही रहे थे, साथ ही उन्होंने भुजंगास्त्रका भी प्रयोग किया ॥१०९-११६॥

तदनन्तर कुजम्भने अपना भयंकर धनुष और सर्प- विषके समान विषैले बाणोंको लेकर शीघ्र ही राक्षसराजकी सेनापर धावा किया। तब अनुचरोंसहित राक्षसेन्द्र निर्ऋतिने उस दैत्यको आक्रमण करते देखकर उसे विषैले सोके समान भीषण एवं तीखे बाणोंसे बींध दिया। उस समय वे इतनी फुर्तीसे बाण चला रहे थे कि बाणका लेना, संधान करना और छोड़ना दीख ही नहीं पड़ता था। विचित्र कर्म करनेवाले राक्षसेश्वरने बड़ी फुर्तीसे अपने बाणोंद्वारा उस देवद्रोही दैत्यके बाणसमूहोंको काट दिया और एक अत्यन्त तेज बाणसे उसके ध्वजको भी काट गिराया। साथ ही एक भाला मारकर उसके सारथिको भी रथपर बैठनेके स्थानसे नीचे गिरा दिया। युद्धस्थलमें राक्षसेश्वरके उस कर्मको देखकर कुजम्भके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये, तब उस दानवने वेगपूर्वक रथसे कूदकर शरत्कालीन आकाशकी भाँति निर्मल तलवार और उदयकालीन चन्द्रमाके समान दस चिह्नोंसे सुशोभित ढाल हाथमें उठा लिया। फिर तो वह दैत्य रणभूमिमें बड़े पराक्रमसे राक्षसेश्वरकी ओर झपटा। उसे निकट आया हुआ देखकर राक्षसेश्वरने उसके हृदयपर मुद्गरसे प्रहार किया। उस प्रहारसे कुजम्भ क्षतिग्रस्त होकर विक्षुब्ध हो उठा। उस समय वह धैर्यशाली दानव निश्चेष्ट होकर पर्वतकी तरह खड़ा रह गया। दो घड़ीके बाद आश्वस्त

रथमारुह्य जग्राह रक्षो वामकरेण तु।

केशेषु निर्ऋतिं दैत्यो जानुनाक्रम्य धिष्ठितम्॥१२६

ततः खड्गेन च शिरश्छेत्तुमैच्छदमर्षणः।

तस्मिस्तदन्तरे देवो वरुणोऽपाम्पतिर्दृतम्॥१२७

पाशेन दानवेन्द्रस्य बबन्ध च भुजद्वयम्।

ततो बद्धभुजं दैत्यं विफलीकृतपौरुषम्॥१२८

ताडयामास गदया दयामुत्सृज्य पाशधृक्।

स तु तेन प्रहारेण स्रोतोभिः क्षतजं वमन्॥१२९

दधार रूपं मेघस्य विद्युन्मालालतावृतम्।

तदवस्थागतं दृष्ट्वा कुजम्भं महिषासुरः॥१३०

व्यावृत्तवदनेऽगाधे ग्रस्तुमैच्छत् सुरावुभौ।

निर्ऋतिं वरुणं चैव तीक्ष्णदंष्ट्रोत्कटाननः॥१३१

तावभिप्रायमालक्ष्य तस्य दैत्यस्य दूषितम्।

त्यक्त्वा रथपथं भीतौ महिषस्यातिरंहसा ॥ १३२

भृशं द्रुतौ जवाद्दिग्भ्यामुभाभ्यां भयविह्वलौ।

जगाम निर्ऋतिः क्षिप्रं शरणं पाकशासनम्॥ १३३

क्रुद्धस्तु महिषो दैत्यो वरुणं समभिद्रुतः।

तमन्तकमुखासक्तमालोक्य हिमवद्युतिः॥१३४

चक्रे सोमास्त्रनिःसृष्टं हिमसंघातकण्टकम्।

वायव्यं चास्त्रमतुलं चन्द्रश्चक्रे द्वितीयकम्॥१३५

वायुना तेन चन्द्रेण संशुष्केण हिमेन च।

व्यथिता दानवाः सर्वे शीतोच्छिन्ना विपौरुषाः॥१३६

न शेकुश्चलितुं पद्भ्यां नास्त्राण्यादातुमेव च।

महाहिमनिपातेन शस्त्रैश्चन्द्रप्रचोदितैः॥१३७

गात्राण्यसुरसैन्यानामदह्यन्त समंततः।

महिषो निष्प्रयत्नस्तु शीतेनाकम्पिताननः॥१३८

कक्षावालम्ब्य पाणिभ्यामुपविष्टो ह्यधोमुखः।

सर्वे ते निष्प्रतीकारा दैत्याश्चन्द्रमसा जिताः॥१३९

होनेपर अत्यन्त दुर्जय दानवेश्वरने रथपर आरूढ़ हो बायें हाथसे राक्षसेश्वरको पकड़ लिया। तब क्रोधसे भरा हुआ दैत्य कुजम्भ निर्ऋतिके बालोंको पकड़कर और घुटनोंसे दबाकर खड़ा हो गया तथा तलवारसे उनका सिर काट लेनेके लिये उद्यत हो गया। इसी बीच जलेश वरुणदेवने शीघ्र ही अपने पाशसे दानवेन्द्रकी दोनों भुजाओंको बाँध दिया। इस प्रकार दोनों भुजाओंके बँध जानेपर दैत्यका पुरुषार्थ विफल कर दिया गया ॥११७-१२८॥

तदनन्तर पाशधारी वरुणने दयाको तिलाञ्जलि देकर उस दैत्यपर गदासे प्रहार किया। उस गदाघातसे घायल होकर कुजम्भ (मुख, नाक, कान आदि) छिद्रोंसे रक्त वमन करने लगा। उस समय उसका रूप ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो विद्युत्समूहोंसे आच्छादित मेघ हो। कुजम्भको ऐसी दशामें पड़ा देखकर तीक्ष्ण दाढ़ोंसे युक्त एवं विकराल मुखवाला महिषासुर अपने गहरे मुखको फैलाकर वरुण और निर्ऋतिइन दोनों देवताओंको निगल जानेका प्रयास करने लगा। तब वे दोनों देव उस दैत्यके क्रूर अभिप्रायको समझकर भयभीत हो गये और बड़ी शीघ्रतासे महिषासुरके रथ-मार्गको छोड़कर हट गये। फिर भयसे व्याकुल होकर दोनों बड़े वेगसे दो भिन्न दिशाओंकी ओर भाग चले। उनमें निर्ऋतिने तो तुरंत ही भागकर इन्द्रकी शरण ग्रहण की। उधर कुपित महिषासुरने वरुणका पीछा किया। इस प्रकार वरुणको मौतके मुख में पड़ा हुआ देखकर शीतरश्मि चन्द्रमाने अपने सोमास्त्रको प्रकट किया, जो हिमसमूहसे व्याप्त होनेके कारण अत्यन्त दुःसह था। उसी समय चन्द्रमाने अपने दूसरे अनुपम अस्त्र वायव्यास्त्रका भी प्रादुर्भाव किया। चन्द्रमाद्वारा छोड़े गये उस वायव्यास्त्र एवं सूखे हिमास्त्रसे सभी दानव व्यथित हो उठे। वे शीतसे जर्जर हो गये और उनका पुरुषार्थ जाता रहा। चन्द्रमाद्वारा चलाये गये अस्त्रोंसे महान् हिमराशिक गिरनेसे समस्त दानव न तो एक पग चल सकते थे और न अस्त्र ही उठाने में समर्थ थे॥१२९-१३७॥

इस प्रकार चारों ओर असुर-सैनिकोंके शरीर शीतसे ठिठुर गये। शीतसे काँपते हुए मुखवाला महिष भी प्रयत्नहीन हो गया। वह अपने दोनों हाथोंसे दोनों काँखोंको दबाकर नीचे मुख किये हुए बैठ गया। इस प्रकार चन्द्रमासे पराजित हुए वे सभी दैत्य बदला चुकानेमें असमर्थ हो गये।

रणेच्छां दूरतस्त्यक्त्वा तस्थुस्ते जीवितार्थिनः ।

तत्राब्रवीत् कालनेमिर्दैत्यान् कोपेन दीपितः॥१४०

भो भोः शृङ्गारिणः शूराः सर्वे शस्त्रास्त्रपारगाः ।

एकैकोऽपि जगत्सर्वं शक्तस्तूलयितुं भुजैः॥१४१

एकैकोऽपि क्षमो ग्रस्तुं जगत्सर्वं चराचरम्।

एकैकस्यापि पर्याप्ता न सर्वेऽपि दिवौकसः॥१४२

कलां पूरयितुं यत्नात् षोडशीमतिविक्रमाः।

किं प्रयाताश्च तिष्ठध्वं समरेऽमरनिर्जिताः॥१४३

न युक्तमेतच्छूराणां विशेषाद् दैत्यजन्मनाम्।

राजा चान्तरितोऽस्माकं तारको लोकमारकः॥१४४

विरतानां रणादस्मात् क्रुद्धः प्राणान् हरिष्यति।

शीतेन नष्टश्रुतयो भ्रष्टवाक्पाटवास्तथा ॥१४५

मूकास्तदाभवन् दैत्या रणद्दशनपङ्क्तयः।

तान् दृष्ट्वा नष्टचेतस्कान् दैत्याञ्छीतेन सादितान्॥१४६

मत्वा कालक्षमं कार्यं कालनेमिर्महासुरः।

आश्रित्य दानवीं मायां वितत्य स्वं महावपुः॥१४७

पूरयामास गगनं दिशो विदिश एव च।

निर्ममे दानवेन्द्रेशः शरीरे भास्करायुतम्॥१४८

दिशश्च मायया चण्डैः पूरयामास पावकैः।

ततो ज्वालाकुलं सर्वं त्रैलोक्यमभवत् क्षणात्॥१४९

तेन ज्वालासमूहेन हिमांशुरगमच्छमम्।

ततः क्रमेण विभ्रष्टशीतदुर्दिनमाबभौ॥ १५०

तद् बलं दानवेन्द्राणां मायया कालनेमिनः ।

तं दृष्ट्वा दानवानीकं लब्धसंज्ञं दिवाकरः।

उवाचारुणमुद्घान्त: कोपाल्लोकैकलोचनः॥१५१

दिवाकर उवाच

नयारुण रथं शीघ्रं कालनेमिरथो यतः।

विमर्दस्तत्र विषमो भविता शूरसंक्षयः॥१५२

जित एष शशाङ्कोऽत्र तद्वलं बलमाश्रितम्।

इत्युक्तश्चोदयामास रथं गरुडपूर्वजः॥१५३

तब वे युद्धकी अभिलाषाको दूर छोड़कर जीवनकी रक्षाके लिये खड़े रहे। इसी बीच क्रोधसे उद्दीप्त हुए कालनेमिने दैत्योंको ललकारते हुए कहा-'भो भो शृङ्गारसे सुसज्जित शूरवीरो! तुम सभी शस्त्रास्त्रके पारगामी विद्वान् हो। तुमलोगोंमेंसे एक-एक भी अपनी भुजाओंसे सारे जगत्को तौल सकता है तथा प्रत्येक व्यक्ति सम्पूर्ण चराचर जगत्को निगल जानेमें समर्थ है। सब-के-सब प्रबल पराक्रमी देवता एक साथ मिलकर भी यत्नपूर्वक तुमलोगोंमेंसे किसी एककी सोलहवीं कलाकी समता नहीं कर सकते। फिर भी तुमलोग समरभूमिमें देवताओंसे पराजित होकर क्यों भागे जा रहे हो? ठहरो! ऐसा करना शूरवीरोंके लिये, विशेषतया दैत्यवंशियोंके लिये उचित नहीं है। सारे संसारका संहार करने में समर्थ हमलोगोंका राजा तारकासुर यहाँ उपस्थित नहीं है। वह क्रुद्ध होकर इस युद्धसे भागे हुए लोगोंके प्राणोंका हरण कर लेगा'॥ १३८१४४३॥

उस समय शीतके प्रभावसे उन दैत्योंकी श्रवणशक्ति और वाक्-चातुरी नष्ट हो गयी थी, वे मूक हो गये थे तथा उनके दाँत कटकटा रहे थे। महासुर कालनेमिने उन दैत्योंको इस प्रकार शीतद्वारा व्यथित और चेतनारहित देखकर इस कार्यको कालद्वारा प्रेरित माना। फिर तो उसने आसुरी मायाका आश्रय लेकर अपने विशाल शरीरका विस्तार किया और उससे आकाशमण्डल, दिशाओं और विदिशाओंको व्याप्त कर लिया। फिर उस दानवेन्द्रने अपने शरीरमें दस हजार सूर्योका निर्माण किया। उसने मायाके बलसे दसों दिशाओंको प्रचण्ड अग्निसे पूर्ण कर दिया, जिससे क्षणमात्रमें सारी त्रिलोकी अग्निकी लपटोंसे व्याप्त हो गयी। उस ज्वालासमूहसे चन्द्रमा शान्त हो गये। तदनन्तर कालनेमिकी मायासे दानवेन्द्रोंकी वह सेना क्रमशः शीतरूपी दुर्दिनके नष्ट हो जानेपर शोभा पाने लगी। इस प्रकार दानवोंकी सेनाको चेतनायुक्त देखकर जगत्के एकमात्र नेत्रस्वरूप सूर्य क्रोधसे तिलमिला उठे, तब उन्होंने अरुणसे कहा ॥ १४५-१५१॥

सूर्य बोले-अरुण! मेरे रथको शीघ्र वहाँ ले चलो जहाँ कालनेमिका रथ खड़ा है। वहाँ (मेरा उसके साथ) शूरवीरोंका विनाश करनेवाला भीषण संग्राम होगा। जिनके बलपर हमलोग निर्भर थे, वे चन्द्रदेव तो इस युद्ध में परास्त हो गये। इस प्रकार कहे जानेपर गरुडके अग्रज

प्रयत्नविधृतैरश्वैः सितचामरमालिभिः।

जगद्दीपोऽथ भगवान् जग्राह विततं धनुः॥१५४

शरौ च द्वौ महाभागो दिव्यावाशीविषद्युती।

संचारास्त्रेण संधाय बाणमेकं ससर्ज सः॥१५५

द्वितीयमिन्द्रजालेन योजितं प्रमुमोच ह।

संचारास्त्रेण रूपाणां क्षणाच्चक्रे विपर्ययम्॥१५६

देवानां दानवं रूपं दानवानां च दैविकम्।

मत्वासुरान् स्वकानेव जघ्ने घोरास्त्रलाघवात्।। १५७

कालनेमी रुषाविष्टः कृतान्त इव संक्षये।

कांश्चित् खड्गेन तीक्ष्णेन कांश्चिन्नाराचवृष्टिभिः ।। १५८

कांश्चिद्गदाभिर्घोराभि: कांश्चिद् घोरैः परश्वधैः ॥१५९

शिरांसि केषांचिदपातयच्च

भुजान् रथान् सारथींश्चोग्रवेगः ।

कांश्चित्पिपेषाथ रथस्य वेगात्

कांश्चित् क्रुधा चोद्धतमुष्टिपातैः॥ १६०

रणे विनिहतान् दृष्ट्वा नेमिः स्वान् दानवाधिपः।

रूपं स्वं तु प्रपद्यन्त ह्यसुरा: सुरधर्षिताः ॥ १६१

कालनेमी रुषाविष्टस्तेषां रूपं न बुद्धवान्।

नेमिदैत्यस्तु तान् दृष्ट्वा कालनेमिमुवाच ह॥१६२

अहं नेमिः सुरो नैव कालनेमे विदस्व माम्।

भवता मोहितेनाजौ निहता भूरिविक्रमाः॥१६३

दैत्यानां दशलक्षाणि दुर्जयानां सुरैरिह।

सर्वास्त्रवारणं मुञ्च ब्राह्ममस्त्रं त्वरान्वितः॥ १६४

स तेन बोधितो दैत्यः सम्भ्रमाकुलचेतनः।

योजयामास बाणं हि ब्रह्मास्त्रविहितेन तु॥१६५

मुमोच चापि दैत्येन्द्रः स स्वयं सुरकण्टकः।

ततोऽस्त्रतेजसा व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ १६६

देवानां चाभवत् सैन्यं सर्वमेव भयान्वितम्।

संचारास्त्रं च संशान्तं स्वयमायोधने बभौ॥१६७

तस्मिन् प्रतिहते ह्यस्त्रे भ्रष्टतेजा दिवाकरः।

महेन्द्रजालमाश्रित्य चक्रे स्वां कोटिशस्तनुम्॥१६८

अरुणने श्वेत कलंगियोंसे विभूषित एवं प्रयत्नपूर्वक वशमें किये गये अश्वोंसे जुते हुए रथको आगे बढ़ाया। तत्पश्चात् जगत्को उद्भासित करनेवाले महाभाग भगवान् सूर्यने अपना विशाल धनुष तथा सर्पकी-सी कान्तिवाले दो दिव्य बाणोंको हाथमें लिया। उनमेंसे एक बाणको संचारास्त्रसे संयुक्त करके चलाया तथा दूसरेको इन्द्रजालसे युक्त करके छोड़ दिया। संचारास्त्रके प्रयोगसे क्षणमात्रमें ही लोगोंके रूपोंका परिवर्तन हो गया। देवता दानवोंके और दानव देवताओंके रूपमें बदल गये। फिर तो दानव देवताओंको आत्मीय मानकर दैत्योंपर ही फुर्तीसे प्रहार करने लगे। प्रलयकालमें कृतान्तके समान क्रोधसे भरा हुआ कालनेमि किन्हींको तीखी तलवारसे, किन्हींको बाणोंकी वृष्टिसे, किन्हींको भयंकर गदाओंसे और किन्हींको भीषण कुठारोंसे मार गिराया तथा किन्हींके मस्तकों, भुजाओं और सारथिसहित रथोंको धराशायी कर दिया। उस प्रचण्ड वेगशाली दैत्यने किन्हींको रथके वेगपूर्वक धक्केसे पीस दिया तथा किन्हींको क्रोधपूर्वक कठोर मुक्केके प्रहारसे यमलोकका पथिक बना दिया॥ १५२-१६०॥

उस समय देवताओंसे पराजित हुए बहुत-से दैत्योंको अपने रूपकी प्राप्ति हो चुकी थी, परंतु क्रोधसे भरा हुआ कालनेमि उनके रूपको नहीं जानता था। इस प्रकार रणभूमिमें अपने पक्षके उन दैत्योंको मारा गया देखकर दानवराज नेमि दैत्यने कालनेमिसे कहा-'कालनेमि! मैं नेमि नामक असुर हूँ, देवता नहीं हूँ। तुम मुझे पहचानो। मायासे मोहित होनेके कारण तुमने युद्धस्थलमें बहुत- से प्रचण्ड पराक्रमी दैत्योंका सफाया कर दिया है। देवताओंने इस युद्धमें दस लाख दुर्जय दैत्योंको मौतके घाट उतार दिया है। इसलिये अब तुम शीघ्रतापूर्वक सभी अस्त्रोंके निवारण करनेवाले ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करो।' इस प्रकार नेमिद्वारा समझाये जानेपर दैत्यराज कालनेमिका चित्त सम्भ्रमके कारण व्याकुल हो गया, तब उसने बाणको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके धनुषपर संधान किया तथा उस सुरकण्टक दैत्येन्द्रने स्वयं उसे छोड़ भी दिया। फिर तो उस अस्त्रके तेजसे चराचरसहित त्रिलोकी व्याप्त हो गयी। देवताओंकी सारी सेना भयभीत हो गयी तथा युद्धभूमिमें संचारास्त्र स्वयं शान्त हो गया। उस अस्त्रके विफल हो जानेपर सूर्यका तेज नष्ट हो गया, तब उन्होंने महेन्द्रजालका आश्रय लेकर अपने शरीरको करोड़ों रूपोंमें प्रकट किया॥ १६१-१६८॥

विस्फूर्जत्करसम्पातसमाक्रान्तजगत्त्रयम् ।

तताप दानवानीकं गतमज्जौघशोणितम्॥१६९

ततश्चावर्षदनलं समन्तादतिसंहतम्।

चढूंषि दानवेन्द्राणां चकारान्धानि च प्रभुः ॥१७०

गजानामगलन्मेदः पेतुश्चाप्यरवा भुवि।

तुरगा निःश्वसन्तश्च घर्मार्ता रथिनोऽपि च॥१७१

इतश्चेतश्च सलिलं प्रार्थयन्तस्तृषातुराः।

प्रच्छायविटपांश्चैव गिरीणां गहराणि च॥१७२

दावाग्निः प्रज्वलंश्चैव घोराचिर्दग्धपादपः ।

तोयार्थिनः पुरो दृष्ट्वा तोयं कल्लोलमालिनम्॥१७३

पुरःस्थितमपि प्राप्तं न शेकुरवमर्दिताः।

अप्राप्य सलिलं भूमौ व्यात्तास्या गतचेतसः॥ १७४

तत्र तत्र व्यदृश्यन्त मृता दैत्येश्वरा भुवि।

रथा गजाश्च पतितास्तुरगाश्च समापिताः ।। १७५

स्थिता वमन्तो धावन्तो गलद्रक्तवसासृजः ।

दानवानां सहस्राणि व्यदृश्यन्त मृतानि तु॥१७६

संक्षये दानवेन्द्राणां तस्मिन् महति वर्तिते।

प्रकोपोद्भूतताम्राक्षः कालनेमी रुषातुरः॥१७७

अभवत् कल्पमेघाभः स्फुरद्भरिशतह्रदः।

गम्भीरास्फोटनिर्हादजगद्धृदयघट्टकः ॥१७८

प्रच्छाद्य गगनाभोगं रविमायां व्यनाशयत्।

शीतं ववर्ष सलिलं दानवेन्द्रबलं प्रति ॥ १७९

दैत्यास्तां वृष्टिमासाद्य समाश्वस्तास्ततः क्रमात्।

बीजाङ्कुरा इवाम्लानाः प्राप्य वृष्टिं धरातले॥१८०

ततः स मेघरूपी तु कालनेमिर्महासुरः।

शस्त्रवृष्टिं ववर्षोग्रां देवानीकेषु दुर्जयः॥१८१

तया वृष्टया बाध्यमाना दैत्येन्द्राणां महौजसाम्।

गतिं कांचन पश्यन्तो गावः शीतार्दिता इव ॥१८२

उन रूपोंसे निकलती हुई किरणोंके गिरनेसे तीनों लोक आक्रान्त हो गये। उससे मज्जा और रक्तसे रहित दानवोंकी सेना संतप्त हो उठी। तत्पश्चात् सामर्थ्यशाली सूर्यदेवने चारों ओर अग्निकी अत्यन्त घोर वृष्टि की और दानवेन्द्रोंके नेत्रोंको अंधा कर दिया। हाथियोंकी मज्जाएँ गल गयीं और वे चुपचाप धराशायी हो गये। धूपसे पीड़ित हुए घोड़े लम्बी साँस खींचने लगे। प्याससे व्याकुल हुए रथी भी इधर-उधर पानीकी खोज करते हुए छायादार वृक्षों और पर्वतोंकी गुफाओंकी शरण लेने लगे। उस समय दावाग्नि प्रज्वलित हो उठी, जिसकी भयंकर ज्वालाने वृक्षोंको जलाकर भस्म कर दिया। जलाभिलाषी लोग सामने ही हिलोरें लेते हुए जलसे भरे हुए जलाशयको देखकर सामने स्थित रहनेपर भी दावाग्निसे पीड़ित होनेके कारण प्राप्त नहीं कर सकते थे, अत: जल न पाकर मुख फैलाये हुए भूतलपर  गिरकर चेतनारहित हो जाते थे। भूतलपर जगह-जगह मरे हुए दैत्येश्वर दिखायी पड़ते थे। कहीं-कहीं टूटे हुए रथ तथा मरे हुए हाथी और घोड़े पड़े हुए थे। कहीं कुछ लोग बैठकर रक्त उगल रहे थे और कुछ दौड़ लगा रहे थे, जिनके शरीरसे रक्त, मज्जा और चर्बी टपक रही थी। कहीं हजारोंकी संख्यामें मरे हुए दानव दीख रहे थे। दानवेन्द्रोंके उस महान् विनाशके उपस्थित होनेपर कालनेमि क्रोधसे विह्वल हो उठा। प्रचण्ड क्रोधके कारण उसके नेत्र लाल हो गये। उसकी शरीरकान्ति प्रलयकालीन मेघके समान हो गयी। वह उमड़ते हुए सैकड़ों जलाशयोंके सदृश उछल पड़ा और गम्भीररूपसे ताल ठोंककर एवं सिंहनाद करके जगत्के प्राणियोंके हृदयोंको कम्पित कर दिया। फिर उसने आकाशमण्डलको आच्छादित कर सूर्यकी मायाको नष्ट कर दिया। तदनन्तर दानवेन्द्रकी सेनापर शीतल जलकी वर्षा होने लगी। दैत्यगण उस वृष्टिका अनुभव कर क्रमशः उसी प्रकार समाश्वस्त हो गये, जैसे भूतलपर सूखते हुए बीजाङ्कुर जलकी वृष्टिसे हरे-भरे हो जाते हैं ॥१६९-१८०॥

तत्पश्चात् दुर्जय एवं महान् असुर कालनेमि मेघरूप होकर देवताओंकी सेनाओंपर भीषण शस्त्रवृष्टि करने लगा। प्रचण्ड पराक्रमी दैत्येन्द्रोंकी उस बाणवर्षासे पीड़ित हुए देवगणोंको शीतसे पीड़ित गौओंकी तरह कोई आश्रयस्थान नहीं दीख रहा था।

परस्परं व्यलीयन्त पृष्ठेषु व्यस्त्रपाणयः।

स्वेषु बाधे व्यलीयन्त गजेषु तुरगेषु च॥१८३

रथेषु त्वमरास्त्रस्तास्तत्र तत्र निलिल्यिरे।

अपरे कुञ्चितैर्गात्रैः स्वहस्तपिहिताननाः ॥१८४

इतश्चेतश्च सम्भ्रान्ता बभ्रमुर्वै दिशो दश।

एवंविधे तु संग्रामे तुमुले देवसंक्षये॥१८५

दृश्यन्ते पतिता भूमौ शस्त्रभिन्नाङ्गसंधयः।

विभुजा भिन्नमूर्धानस्तथा छिन्नोरुजानवः ॥ १८६

विपर्यस्तरथासङ्गा निष्पिष्टध्वजपङ्क्तयः।

निर्भिन्नाङ्गैस्तुरङ्गैस्तु गजैश्चाचलसन्निभैः ॥ १८७

स्रुतरक्तहदैर्भूमिविकृताविकृता बभौ।

एवमाजौ बली दैत्यः कालनेमिर्महासुरः॥१८८

जघ्ने मुहूर्तमात्रेण गन्धर्वाणां दशायुतम्।

यक्षाणां पञ्चलक्षाणि रक्षसामयुतानि षट् ॥ १८९

त्रीणि लक्षाणि जम्ने स किन्नराणां तरस्विनाम्।

जम्ने पिशाचमुख्यानां सप्तलक्षाणि निर्भयः॥१९०

इतरेषामसंख्याता: सुरजातिनिकायिनाम्।

जघ्ने स कोटी: संक्रुद्धश्चित्रास्त्रैरस्त्रकोविदः ।। १९१

एवं परिभवे भीमे तदा त्वमरसंक्षये।

संक्रुद्धावश्विनौ देवौ चित्रास्त्रकवचोज्वलौ॥१९२

जघ्नतुः समरे दैत्यं कृतान्तानलसंनिभम्।

तमासाद्य रणे घोरमेकैकः षष्टिभिः शरैः॥१९३

जने मर्मसु तीक्ष्णागैरसुरं भीमदर्शनम्।

ताभ्यां बाणप्रहारैः स किंचिदायस्तचेतनः ॥१९४

जग्राह चक्रमष्टारं तैलधौतं रणान्तकम्।

तेन चक्रेण सोऽश्विभ्यां चिच्छेद रथकूबरम्॥१९५

जग्राहाथ धनुर्दैत्यः शरांश्चाशीविषोपमान्।

ववर्ष भिषजो मूर्ध्नि संछाद्याकाशगोचरम्॥१९६

वे अस्त्र छोड़कर अपने-अपने हाथियों और घोड़ोंकी पीठोंपर चिपककर छिप गये। कहीं-कहीं भयभीत हुए देवगण रथोंमें लुक-छिप रहे थे। कुछ अन्य देवताओंके शरीर भयसे सिकुड़ गये थे, वे भयवश अपने हाथसे मुखको ढके हुए दसों दिशाओंमें इधर-उधर भाग-दौड़ कर रहे थे। इस प्रकार उस देव-विनाशक भीषण संग्राममें शस्त्रोंके आघातसे जिनकी अङ्गसंधियाँ छिन्न-भिन्न होगयी थीं, भुजाएँ कट गयी थीं, मस्तक विदीर्ण हो गये थे तथा जंघा और जानु कट गये थे, ऐसे सैनिक, टूटे हुए हरसेवाले रथ और चूर-चूर हुए ध्वजाओंकी कतारें भूतलपर पड़ी हुई दीख रही थीं। जिनके शरीरोंसे बहते हुए रक्तसे गड्ढे भर जाते थे, ऐसे विदीर्ण अङ्गोंवाले घोड़ों और पर्वत-सदृश विशालकाय गजराजोंसे पटी हुई वह रणभूमि विकृत और बीभत्स दिखायी पड़ रही थी। इस प्रकार उस युद्ध में महाबली महासुर कालनेमि दैत्यने दोही घड़ी में एक लाख गन्धर्वो, पाँच लाख यक्षों, साठ हजार राक्षसों, तीन लाख वेगशाली किंनरों और सात लाख प्रधान-प्रधान पिशाचोंको कालके हवाले कर दिया। इनके अतिरिक्त उसने निर्भय होकर अन्य देवजातियोंके असंख्य वीरोंका संहार किया तथा अस्त्रविद्यानिपुण कालनेमिने विचित्र ढंगसे अस्त्रोंके प्रहारसे करोड़ों देवताओंको यमलोकका पथिक बना दिया ॥ १८१-१९१॥

उस समय इस प्रकारकी भयंकर पराजय और देवताओंका संहार उपस्थित होनेपर चित्र-विचित्र अस्त्र और उज्ज्वल कवचसे सुसज्जित हो दोनों देवता अश्विनीकुमार क्रोधमें भरे हुए समरभूमिमें आगे बढ़े और कृत्तान्त एवं अग्निके समान पराक्रमी उस दैत्यपर प्रहार करने लगे। उस भयावनी आकृतिवाले भयंकर असुरको रणभूमिमें सम्मुख पाकर एक-एकने तीखे अग्रभागवाले साठ-साठ बाणोंसे उसके मर्मस्थानोंपर आघात किया। उन दोनों अश्विनीकुमारोंके बाण-प्रहारसे उसका चित्त कुछ दुःखी हो गया। फिर उसने आठ अरोंवाले चक्रको हाथमें लिया, जो तेलसे सफाया हुआ तथा रणमें अन्तकके समान विकराल था। उसने उस चक्रसे अश्विनीकुमारोंके रथके कूबरको काट गिराया। तत्पश्चात् उस दैत्यने धनुष और सर्पके समान जहरीले बाणोंको उठाया और आकाशमण्डलको बाणोंसे आच्छादित

तावप्यस्वैश्चिच्छिदतुः शितैस्तैर्दैत्यसायकान्।

तच्च कर्म तयोर्दृष्ट्वा विस्मित: कोपमाविशत्॥ १९७

महता स तु कोपेन सर्वायोमयसादनम्।

जग्राह मुद्गरं भीमं कालदण्डविभीषणम्॥१९८

स ततो भ्राम्य वेगेन चिक्षेपाश्विरथं प्रति।

तं तु मुद्गरमायान्तमालोक्याम्बरगोचरम्॥१९९

त्यक्त्वा रथौ तु तौ वेगादाप्लुतौ तरसाश्विनौ।

तौ रथौ स तु निष्पिष्य मुद्गरोऽचलसंनिभः॥२००

दारयामास धरणी हेमजालपरिष्कृतः।

तस्य कर्माश्विनौ दृष्ट्वा भिषजौ चित्रयोधिनौ॥ २०१

वज्रास्त्रं तु प्रकुर्वाते दानवेन्द्रनिवारणम्।

ततो वज्रमयं वर्षं प्रावर्तदतिदारुणम्।। २०२

घरवज्रप्रहारैस्तु दैत्येन्द्रः स परिष्कृतः।

रथो ध्वजो धनुश्चक्रं कवचं चापि काञ्चनम्।। २०३

क्षणेन तिलशो जातं सर्वसैन्यस्य पश्यतः ।

तद् दृष्ट्वा दुष्करं कर्म सोऽश्विभ्यां भीमविक्रमः॥२०४

नारायणास्त्रं बलवान् मुमोच रणमूर्धनि।

वज्रास्त्रं शमयामास दानवेन्द्रोऽस्त्रतेजसा॥२०५

तस्मिन् प्रशान्ते वज्रास्त्रे कालनेमिरनन्तरम्।

जीवग्राहं ग्राहयितुमश्विनौ तु प्रचक्रमे॥२०६

तावश्विनौ रणाद् भीतौ सहस्राक्षरथं प्रति।

प्रयातौ वेपमानौ तु पदा शस्त्रविवर्जितौ ॥ २०७

तयोरनुगतो दैत्यः कालनेमिर्महाबलः।

प्राप्येन्द्रस्य रथं क्रूरो दैत्यानीकपदानुगः ॥ २०८

तं दृष्ट्वा सर्वभूतानि वित्रेसुर्विह्वलानि तु।

दृष्ट्वा दैत्यस्य तत् क्रौर्यं सर्वभूतानि मेनिरे॥२०९

करके उन दोनों देववैद्योंके मस्तकोंपर बाणवृष्टि प्रारम्भ की। तब उन दोनों देवोंने भी अपने तीखे अस्त्रोंसे उस दैत्यके बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। उन दोनोंके उस कर्मको देखकर आश्चर्यचकित हुआ कालनेमि क्रुद्ध हो उठा। फिर तो उसने बड़े क्रोधसे अपने भयंकर मुद्गरको, जिसका सर्वाङ्गभाग लोहेका बना हुआ था तथा कालदण्डके समान अत्यन्त भीषण था, हाथमें लिया और बड़े वेगसे घुमाकर उसे अश्विनीकुमारोंके रथपर फेंक दिया। आकाशमार्गसे उस मुद्गरको अपनी ओर आते देखकर दोनों अश्विनीकुमार अपने-अपने रथको छोड़कर बड़े वेगसे भूतलपर कूद पड़े। तब स्वर्णसमूहसे सुसज्जित एवं पर्वतके समान विशाल उस मुद्गरने उन दोनों रथोंको चूर-चूर करके पृथ्वीको विदीर्ण कर दिया। उसके उस कर्मको देखकर विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले देववैद्य अश्विनीकुमारोंने दानवेन्द्रोंको विमुख करनेवाले वज्रास्त्रका प्रयोग किया। फिर तो अत्यन्त भीषण वज्रमयी वृष्टि होने लगी ॥१९२-२०२।।

उस समय दैत्येन्द्र कालनेमि भयंकर वज्र-प्रहारोंसे आच्छादित हो उठा। क्षणमात्र में ही सभी सैनिकोंके देखते-देखते उसके रथ, ध्वज, धनुष, चक्र और स्वर्णनिर्मित कवचके तिलके समान टुकड़े-टुकड़े हो गये। अश्विनीकुमारोंद्वारा किये गये उस दुष्कर कर्मको देखकर भयंकर पराक्रमी एवं महाबली दानवेन्द्र कालनेमिने उस युद्धके मुहानेपर नारायणास्त्रका प्रयोग किया और उस अस्त्रके तेजसे वज्रास्त्रको शान्त कर दिया। उस वज्रास्त्रके शान्त हो जानेके बाद कालनेमि दोनों अश्विनीकुमारोंको जीते-जी पकड़ लेनेका प्रयत्न करने लगा। तब वे दोनों अश्विनीकुमार भयभीत होकर पैदल ही रणभूमिसे भागकर इन्द्रके रथके निकट जा पहुंचे। उस समय उनके शरीर काँप रहे थे और उन्होंने अस्त्रका भी त्याग कर दिया था। उस समय महाबली एवं क्रूर स्वभाववाला दैत्यराज कालनेमि भी दैत्योंकी सेनाके साथ अश्विनीकुमारोंका पीछा करते हुए इन्द्रके रथके निकट पहुँचा। उसे देखकर सभी प्राणी विह्वल हो गये और सबके मनमें भय छा गया। दैत्यराज कालनेमिके उस क्रूर कर्मको देखकर सभी प्राणियोंने

पराजयं महेन्द्रस्य सर्वलोकक्षयावहम्।

चेलुः शिखरिणो मुख्या: पेतुरुल्का नभस्तलात्॥२१०

जगर्जुर्जलदा दिक्षु ह्यद्भूताश्च महार्णवाः।

तां भूतविकृतिं दृष्ट्वा भगवान् गरुडध्वजः ॥ २११

व्यबुद्ध्यताहिपर्यङ्के योगनिद्रां विहाय तु ।

लक्ष्मीकरयुगाजस्त्रलालितामिसरोरुहः ।। २१२

शरदम्बरनीलाब्जकान्तदेहच्छविर्विभुः

कौस्तुभोद्भासितोरस्को कान्तकेयूरभास्वरः ॥ २१३

विमृश्य सुरसंक्षोभं वैनतेयं समाह्वयत्।

आहूतेऽवस्थिते तस्मिन् नागावस्थितवमणि॥२१४

दिव्यनानास्त्रतीक्ष्णार्चिरारुह्यागात्सुरान् स्वयम्।

तत्रापश्यत देवेन्द्रमभिद्रुतमभिप्लुतैः ॥ २१५

दानवेन्द्रै वाम्भोदसच्छायैः पौरुषोत्कटैः।

यथा हि पुरुषं घोरैरभाग्यैर्वंशशालिभिः॥२१६

परित्राणायाशु कृतं सुक्षेत्रे कर्म निर्मलम्।

अथापश्यन्त दैतेया वियति ज्योतिर्मण्डलम्॥ २१७

स्फुरन्तमुदयाद्रिस्थं सूर्यमुष्णत्विषा इव।

प्रभावं ज्ञातुमिच्छन्तो दानवास्तस्य तेजसः॥ २१८

गरुत्मन्तमपश्यन्तः कल्पान्तानलसंनिभम्।

तमास्थितं च मेघौघद्युतिमक्षयमच्युतम्॥२१९

तमालोक्यासुरेन्द्रास्तु हर्षसम्पूर्णमानसाः।

अयं वै देवसर्वस्वं जितेऽस्मिन् निर्जिताः सुराः ।। २२०

अयं स दैत्यचक्राणां कृतान्तः केशवोऽरिहा।

एनमाश्रित्य लोकेषु यज्ञभागभुजोऽमराः॥२२१

इत्युक्त्वा दानवाः सर्वे परिवार्य समंततः।

निजघ्नुर्विविधैरस्वैस्ते तमायान्तमाहवे॥२२२

महेन्द्रकी पराजय मान ली, जो सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेवाली थी। उस समय प्रधान-प्रधान पर्वत विचलित हो उठे, आकाशमण्डलसे उल्काएँ गिरने लगीं, दसों दिशाओंमें बादल गरजने लगे और महासागरोंमें ज्वार उठने लगा॥२०३-२१०३ ॥

उस समय पञ्चभूतोंके उस विकारको देखकर शेषशय्यापर शयन करते हुए भगवान् गरुडध्वज योगनिद्राका त्याग कर सहसा जाग पड़े। लक्ष्मी अपने दोनों हाथोंसे जिनके चरणकमलोंकी निरन्तर सेवा करती रहती हैं, जिनके शरीरकी कान्ति शरत्कालीन आकाश एवं नीले कमल-सी सुन्दर है, जिनका वक्षःस्थल कौस्तुभ मणिसे उद्भासित होता रहता है, जो चमकीले बाजूबंदसे प्रकाशित होते रहते हैं, उन सर्वव्यापी भगवान्ने देवताओंकी अस्त-व्यस्तताका विचार कर गरुडका आह्वान किया। बुलाते ही हाथीके समान विशाल शरीरवाले गरुडके उपस्थित होनेपर भगवान् उनपर सवार होकर स्वयं देवताओंके निकट गये, उस समय उनके नाना प्रकारके दिव्यास्त्रोंका प्रचण्ड प्रकाश फैल रहा था। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि नूतन मेघकी-सी कान्तिवाले एवं उत्कट पुरुषार्थी दानवेन्द्रोंद्वारा खदेड़े जाते हुए देवराज इन्द्र उसी प्रकार भाग रहे हैं, जैसे भयंकर अभाग्यसे युक्त विस्तृत परिवारसे घिरा हुआ पुरुष कष्ट पाता है। फिर तो उस सुन्दर अवसरपर भगवान्ने तुरंत ही इन्द्रकी रक्षाके लिये निर्मल कर्म किया। उस समय दैत्योंको आकाशमें एक ज्योतिर्मण्डल दिखायी पड़ा, जो उदयाचलपर स्थित उष्ण कान्तिवाले सूर्यके समान चमक रहा था। तब दानवगण उस तेजके प्रभावको जाननेके इच्छुक हो उठे। इतने में ही उन्हें प्रलयकालीन अग्निकी भाँति भयंकर गरुड दीख पड़े। तत्पश्चात् गरुडपर बैठे हुए मेघसमूहकी-सी कान्तिवाले अविनाशी भगवान् अच्युतका दर्शन हुआ। उन्हें देखकर असुरेन्द्रोंका मन हर्षसे परिपूर्ण हो गया (और वे कहने लगे-) 'यही तो देवताओंका सर्वस्व है। इसे जीत लेनेपर देवताओंको पराजित हुआ ही समझना चाहिये। यही वह दैत्यसमूहोंका विनाश करनेवाला शत्रुसूदन केशव है। इसीका आश्रय ग्रहण कर देवगण लोकोंमें यज्ञ-भागके भोक्ता बने हुए हैं' ॥२११-२२१॥

ऐसा कहकर कालनेमि प्रभृति दस महारथी दैत्य तथा वे सभी दानव युद्धस्थलमें आते हुए भगवान् विष्णुको चारों ओरसे घेरकर उनपर विविध प्रकारके अस्त्रोंसे प्रहार करने लगे।

कालनेमिप्रभृतयो दश दैत्या महारथाः।

षष्ट्या विव्याध बाणानां कालनेमिर्जनार्दनम्॥ २२३

निमिः शतेन बाणानां मथनोऽशीतिभिः शरैः।

जम्भकश्चैव सप्तत्या शुम्भो दशभिरेव च ॥ २२४

शेषा दैत्येश्वराः सर्वे विष्णुमेकैकशः शरैः।

दशभिश्चैव यत्तास्ते जघ्नुः सगरुडं रणे॥ २२५

तेषाममृष्य तत् कर्म विष्णुर्दानवसूदनः।

एकैकं दानवं जघ्ने षड्भिः षड्भिरजिह्मगैः॥२२६

आकर्णकृष्टैर्भूयश्च कालनेमिस्त्रिभिः शरैः।

विष्णुं विव्याध हृदये क्रोधाद् रक्तविलोचनः ।। २२७

तस्याशोभन्त ते बाणा हृदये तप्तकाञ्चनाः।

मयूखानीव दीप्तानि कौस्तुभस्य स्फुटत्विषः ।। २२८

तैर्बाणैः किंचिदायस्तो हरिर्जग्राह मुद्गरम्।

सततं भ्राम्य वेगेन दानवाय व्यसर्जयत्॥ २२९

दानवेन्द्रस्तमप्राप्तं वियत्येव शतैः शरैः।

चिच्छेद तिलश: क्रुद्धो दर्शयन् पाणिलाघवम्॥ २३०

ततो विष्णुः प्रकुपितः प्रासं जग्राह भैरवम्।

तेन दैत्यस्य हृदयं ताडयामास गाढतः॥२३१

क्षणेन लब्धसंज्ञस्तु कालनेमिर्महासुरः

शक्तिं जग्राह तीक्ष्णाग्रां हेमघण्टाट्टहासिनीम्।। २३२

तया वामभुजं विष्णोर्बिभेद दितिनन्दनः।

भिन्नः शक्त्या भुजस्तस्य स्रुतशोणित आबभौ॥ २३३

पद्मरागमयेनेव केयूरेण विभूषितः।

ततो विष्णुः प्रकुपितो जग्राह विपुलं धनुः॥ २३४

सप्त दश च नाराचांस्तीक्ष्णान् मर्मबिभेदिनः।

दैत्यस्य हृदयं षड्भिर्विव्याध च त्रिभिः शरैः॥२३५

चतुर्भिः सारथिं चास्य ध्वजं चैकेन पत्रिणा।

द्वाभ्यां ज्याधनुषी चापि भुजं सव्यं च पत्रिणा ॥ २३६

स विद्धो हृदये गाढं दैत्यो हरिशिलीमुखैः।

उतरक्तारुणप्रांशुः पीडाकुलितमानसः॥ २३७

उस समय कालनेमिने भगवान् जनार्दनको साठ बाणोंसे, निमिने सौ बाणोंसे, मथनने असी बाणोंसे, जम्भकने सत्तर और शुम्भने दस बाणोंसे बींध दिया। शेष सभी प्रयत्नशील दैत्येश्वरोंमेंसे एक-एकने रणभूमिमें गरुडसहित भगवान् विष्णुको दस-दस बाणोंसे चोटें पहुँचायीं। तब उनके उस कर्मको सहन न कर दानवोंके विनाशक भगवान् विष्णुने एक-एक दानवको सीधे चोट करनेवाले छ:-छ: बाणोंसे घायल कर दिया। यह देखकर कालनेमिके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। तब उसने पुन: कानतक खींचकर छोड़े गये तीन बाणोंसे भगवान् विष्णुके हृदयपर चोट की। तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले कालनेमिके वे बाण विष्णुके हृदयपर उसी प्रकार शोभित हो रहे थे मानो फैलती हुई कान्तिवाले कौस्तुभ मणिकी उद्दीप्त किरणें हों। उन बाणोंके आघातसे कुछ कष्टका अनुभव कर श्रीहरिने अपना मुद्गर उठाया और उसे लगातार वेगपूर्वक घुमाकर उस दानवपर फेंक दिया। वह मुद्गर अभी उसके निकटतम पहुँचा भी न था कि क्रोधसे भरे हुए दानवराजने अपने हाथकी फुर्ती दिखलाते हुए आकाशमार्गमें ही सैकड़ों बाणोंके प्रहारसे उसे तिल-तिल करके काट डाला। यह देखकर विशेषरूपसे कुपित हुए भगवान् विष्णुने भयंकर भाला हाथमें लिया और उससे उस दैत्यके हृदयपर गहरी चोट पहुँचायी (जिसके आघातसे वह मूर्छित हो गया) ॥ २२२-२३१ ॥

क्षणभरके पश्चात् जब उसकी चेतना लौटी, तब महासुर कालनेमिने तीखे अग्रभागवाली शक्ति हाथमें ली, जिसमें स्वर्णनिर्मित क्षुद्र घंटिकाएँ बज रही थीं। उस शक्तिसे दैत्य कालनेमिने भगवान् विष्णुकी बायीं भुजाको विदीर्ण कर दिया। शक्तिके आघातसे घायलहुई भगवान् विष्णुकी भुजा रक्त बहाती हुई ऐसी शोभा पा रही थी। मानो पद्मरागमणिके बने हुए बाजूबंदसे विभूषित की गयी हो। तब कुपित हुए भगवान् विष्णुने विशाल धनुष और सतरह तीखे एवं मर्मभेदी बाणोंको हाथमें लिया। उनमेंसे उन्होंने नौ बाणोंसे उस दैत्यके हृदयको, चार बाणोंसे उसके सारथिको, एक बाणसे ध्वजको, दो बाणोंसे प्रत्यञ्चासहित धनुषको और एक बाणसे उसकी दाहिनी भुजाको बींध दिया। उस समय भगवान् विष्णुके बाणोंसे उस दैत्यका हृदय गम्भीररूपसे घायल हो गया था, उससे रक्तकी मोटी धाराएँ निकल रही थीं, उसका मन पीडासे व्याकुल हो गया था और

चकम्पे मारुतेनेव नोदितः किंशुकद्रुमः ।

तमाकम्पितमालक्ष्य गदां जग्राह केशवः ॥ २३८

तां च वेगेन चिक्षेप कालनेमिरथं प्रति।

सा पपात शिरस्युग्रा विपुला कालनेमिनः ॥२३९

स चूर्णितोत्तमाङ्गस्तु निष्पिष्टमुकुटोऽसुरः।

त्रुतरक्तौघरन्ध्रस्तु त्रुतधातुरिवाचलः ॥ २४०

प्रापतत् स्वे रथे भग्ने विसंज्ञः शिष्टजीवितः।

पतितस्य रथोपस्थे दानवस्याच्युतोऽरिहा ॥ २४१

स्मितपूर्वमुवाचेदं वाक्यं चक्रायुधः प्रभुः।

गच्छासुर विमुक्तोऽसि साम्प्रतं जीव निर्भयः॥ २४२

ततः स्वल्पेन कालेन अहमेव तवान्तकः।

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य सारथिः कालनेमिनः ।

अपवाह्य रथं दूरमनयत् कालनेमिनम्॥ २४३

वह झंझावातसे झकझोरे हुए पलाश-वृक्षकी भाँति काँप रहा था। उसे काँपता हुआ देखकर भगवान् केशवने गदा उठायी और उसे वेगपूर्वक कालनेमिके रथपर फेंक दिया। वह भयंकर एवं विशाल गदा कालनेमिके मस्तकपर जा गिरी। उसके आघातसे उस असुरका मस्तक चूर्ण हो गया, मुकुट पिस गया और शरीरके छिद्रोंसे रक्तकी धाराएँ बहने लगीं। उस समय वह ऐसा दीख रहा था मानो चूते हुए गेरु आदि धातुओंसे युक्त पर्वत हो। तत्पश्चात् वह मूछित होकर अपने टूटे हुए रथपर गिर पड़ा। उसके प्राणमात्र अवशेष थे। इस प्रकार रथके पिछले भागमें पड़े हुए उस दानवके प्रति चक्रायुधधारी एवं सामर्थ्यशाली शत्रुसूदन अच्युतने मुसकराते हुए यह बात कही-'असुर! जाओ, इस समय तुम छोड़ दिये गये हो, अत: निर्भय होकर जीवन धारण करो। फिर थोड़े ही समयके बाद मैं ही तुम्हारा विनाश करूँगा।' भगवान् विष्णुके उस वचनको सुनकर कालनेमिका सारथि रथको लौटाकर कालनेमिको रणभूमिसे दूर हटा ले गया॥ २३२-२४३॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे देवासुरसंग्रामे कालनेमिपराजयो नाम पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥१५०॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके देवासुरसंग्राममें कालनेमिपराजय नामक एक सौ पचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५०॥