मत्स्य महा पुराण
187.
अनौपम्योवाच
भगवन् मानुषे लोके केन तुष्यति केशवः।
व्रतेन नियमेनाथ दानेन तपसापि वा॥२६
नारद उवाच
तिलधेनुं च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे।
ससागरवनद्वीपा दत्ता भवति मेदिनी॥ २७
सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सार्वकामिकैः।
मोदते चाक्षयं कालं यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥२८
आम्रामलकपित्थानि बदराणि तथैव च।
कदम्बचम्पकाशोकपुन्नागविविधद्रुमान् ॥२९
अश्वत्थपिप्पलांश्चैव कदलीवटदाडिमान्।
पिचुमन्दं मधूकं च उपोष्य स्त्री ददाति या॥ ३०
स्तनौ कपित्थसदृशावूरू च कदलीसमौ।
अश्वत्थे वन्दनीया च पिचुमन्दे सुगन्धिनी॥३१
चम्पके चम्पकाभा स्यादशोके शोकवर्जिता।
मधूके मधुरं वक्ति वटे च मृद्गात्रिका॥ ३२
बदरी सर्वदा स्त्रीणां महासौभाग्यदायिनी।
कुक्कुटी कर्कटी चैव द्रव्यषष्ठी न शस्यते॥३३
कदम्बमिश्रकनकमञ्जरीपूजनं
अनग्निपक्वमन्नं च पक्वान्नानामभक्षणम्॥ ३४
फलानां च परित्याग: संध्यामौनं तथैव च।
प्रथमं क्षेत्रपालस्य पूजा कार्या प्रयत्नतः॥ ३५
तस्या भवति वै भर्ता मुखप्रेक्षी सदानघे। ।
अष्टमी च चतुर्थी च पञ्चमी द्वादशी तथा॥३६
संक्रान्तिर्विषुवच्चैव दिनच्छिद्रमुखं तथा।
एतांस्तु दिवसान् दिव्यानुपवसन्ति याः स्त्रियः।
तासां तु धर्मयुक्तानां स्वर्गवासो न संशयः॥ ३७
कलिकालुष्यनिर्मुक्ताः सर्वपापविवर्जिताः।
उपवासरतां नारी नोपसर्पति तां यमः॥३८
अनौपम्योवाच
अस्मिन् कृतेन पुण्येन पुराजन्मकृतेन वा।
भवदागमनं भूतं किंचित् पृच्छाम्यहं व्रतम्॥ ३९
अनौपम्याने पूछा-भगवन्! मनुष्यलोकमें केशव व्रत, नियम, दान अथवा तपस्या-इनमें किससे प्रसन्न होते हैं ? ॥२६॥
नारदजीने कहा-जो मनुष्य वेदमें पारङ्गत ब्राह्मणको तिलधेनुका दान करता है, उसके द्वारा समुद्र, वन और द्वीपोंसहित पृथ्वीका दान सम्पन्न हुआ समझना चाहिये। वह दाता करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान एवं सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंद्वारा सूर्य, चन्द्र और तारोंकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्द मनाता है। जो स्त्री उपवास करके आम, आँवला, कैथ, बेर, कदम्ब, चम्पक, अशोक, पुनाग, जायफल, पीपल, केला, वट, अनार, नीम, महुआ आदि अनेक प्रकारके वृक्षोंका दान करती है, उसके दोनों स्तन कैथके समान और दोनों जंघाएँ केलेके सदृश सुन्दर होती हैं। वह अश्वत्थके दानसे वन्दनीय और नीमके दानसे सुगन्धयुक्त होती है। वह चम्पाके दानसे चम्पाकी-सी कान्तिवाली और अशोकके दानसे शोकरहित होती है। महुआके दानसे वह मधुरभाषिणी होती है और वटके दानसे उसका शरीर कोमल होता है। बेर स्त्रियोंके लिये सदा महान् सौभाग्यदायी होता है। ककड़ी, जटाधारी और द्रव्यषष्ठीका दान, कदम्बसे मिश्रित धतूरेकी मंजरीसे पूजन, बिना अग्निसे पकाया हुआ अन्न एवं पके हुए अन्नोंका अभक्षण, फलोंका परित्याग तथा संध्याकालमें मौनधारण-ये स्त्रियोंके लिये प्रशस्त नहीं हैं। सर्वप्रथम प्रयत्नपूर्वक क्षेत्रपालकी पूजा करनी चाहिये। पापशून्ये! उस स्त्रीका पति सदा उसका मुख ही देखा करता है। जो स्त्रियाँ अष्टमी, चतुर्थी, पञ्चमी और द्वादशी तिथि, संक्रान्ति, विषुवयोग और दिनच्छिद्रमुख (दोपहरमें चन्द्रमाका नये मासकी तिथिमें प्रवेश करना)-इन दिव्य दिनोंमें उपवास करती हैं, उस धर्मयुक्त स्त्रियोंका स्वर्गमें निवास होता है-इसमें संदेह नहीं है। वे कलियुगके पापोंसे रहित और सभी पापोंसे शून्य हो जाती हैं। इस प्रकार जो स्त्री उपवासमें तत्पर रहती है, उसके समीप यम भी नहीं आते॥२७-३८॥
अनौपम्या बोली-नारदजी! पता नहीं, इस जन्ममें या पूर्व जन्ममें किये हुए पुण्यसे ही आपका यहाँ आगमन हुआ है। अब मैं आपसे कतिपय व्रतोंके विषयमें पूछती
अस्ति विन्ध्यावलि म बलिपत्नी यशस्विनी।
श्वश्रूर्ममापि विप्रेन्द्र न तुष्यति कदाचन॥४०
श्वशुरोऽपि सर्वकालं दृष्ट्वा चापि न पश्यति।
अस्ति कुम्भीनसी नाम ननान्दा पापकारिणी॥४१
दृष्ट्वा चैवाङ्गुलीभङ्गं सदा कालं करोति माम्।
दिव्येन तु पथा याति मम सौख्यं कथं वद॥४२
ऊषरे न प्ररोहन्ति बीजाकुराः कथञ्चन।
येन व्रतेन चीर्णेन भवन्ति वशगा मम।
तव्रतं ब्रूहि विपेन्द्र दासभावं व्रजामि ते॥४३
नारद उवाच
यदेतत् ते मया पूर्वं व्रतमुक्तं शुभानने।
अनेन पार्वती देवी चीर्णेन वरवर्णिनि॥४४
शंकरस्य शरीरस्था विष्णोर्लक्ष्मीस्तथैव च।
सावित्री ब्रह्मणश्चैव वसिष्ठस्याप्यरुन्धती॥४५
एतेनोपोषितेनेह भर्ता स्थास्यति ते वशे।
श्वश्रूश्वशुरयोश्चैव मुखबन्धो भविष्यति॥४६
एवं श्रुत्वा तु शुश्रोणि यथेष्टं कर्तुमर्हसि।
नारदस्य वचः श्रुत्वा राजी वचनमब्रवीत्॥ ४७
प्रसादं कुरु विपेन्द्र दानं ग्राह्यं यथेप्सितम्।
सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राण्याभरणानि च॥४८
तव दास्याम्यहं विप्र यच्चान्यदपि दुर्लभम्।
प्रगृहाण द्विजश्रेष्ठ प्रीयेतां हरिशंकरौ॥४९
नारद उवाच
अन्यस्मै दीयतां भद्रे क्षीणवृत्तिस्तु यो द्विजः ।
अहं तु सर्वसम्पन्नो मद्भक्तिः क्रियतामिति ॥५०
एवं तासां मनो हृत्वा सर्वासां तु पतिव्रतात्।
जगाम भरतश्रेष्ठ स्वकीयं स्थानकं पुनः॥५१
ततो ह्यष्टहृदया अन्यतोगतमानसाः।
पतिव्रतात्वमुत्सृज्य तासां तेजो गतं ततः।
पुरे छिद्रं समुत्पन्नं बाणस्य तु महात्मनः ॥५२
हूँ। विप्रवर! जो बलिकी पत्नी यशस्विनी विन्ध्यावलि हैं, वे मेरी भी सास हैं। वे मुझसे कभी भी प्रसन्न नहीं रहतीं। मेरे श्वशुर भी मुझे सभी समय देखते हुए भी अनदेखी करते हैं। पापाचरणमें रत रहनेवाली कुम्भीनसी नामकी मेरी ननद है। वह सभी समय मुझे देखकर अङ्गुली तोड़ती रहती है। वह दिव्य मार्गसे कैसे चले और मुझे सुखकी प्राप्ति कैसे हो-यह बतानेकी कृपा करें। (यह सत्य है कि) ऊषर भूमिमें डाले हुए बीजसे किसी नहीं उत्पन्न होते, फिर भी जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे ये मेरे वशमें आ जायँ, वह व्रत मुझे बतलाइये। विप्रेन्द्र! मैं आपकी दासी हूँ॥ ३९-४३॥
नारदजीने कहा-सुन्दर मुखवाली! जो व्रत मैंने पूर्वमें तुमसे कहा है, उस व्रतका अनुष्ठान करनेसे पार्वतीदेवी शंकरके, लक्ष्मी विष्णुके, सावित्री ब्रह्माके, अरुन्धती वसिष्ठके शरीरमें विराजमान रहती हैं। इस उपवास-व्रतसे तुम्हारा पति भी तुम्हारे अधीन रहेगा तथा सास और श्वशुरका भी मुख बंद हो जायगा अर्थात् वे तुमसे प्रेम करने लगेंगे। सुश्रोणि! ऐसा सुनकर तुम जैसा चाहो वैसा कर सकती हो। नारदजीके वचनको सुनकर रानीने इस प्रकार कहा-'विप्रवर! मुझपर कृपा कीजिये और यथाभिलषित दान स्वीकार कीजिये। विप्र! सुवर्ण, मणि, रत्न, वस्त्र, आभूषण एवं अन्य जो भी दुर्लभ पदार्थ हैं, वह सब मैं आपको दूंगी। द्विजश्रेष्ठ! आप उसे ग्रहण करें, जिससे विष्णु और शंकर मुझपर प्रसन्न हो जायँ ॥ ४४-४९॥
नारदजी बोले-कल्याणि! जो ब्राह्मण जीविकारहित हो, उसे ही यह दान दो। मैं तो सर्वसम्पन्न हूँ। तुम मेरे प्रति भक्ति-भाव रखो। भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उन सभी स्त्रियोंके मनको पातिव्रतसे विचलित कर नारदजी पुनः अपने स्थानपर चले गये। तभीसे उन स्त्रियोंका हृदय उदास रहने लगा और उनका मन दूसरी ओर लग गया। इस प्रकार पातिव्रत्यके त्यागसे उनका तेज नष्ट हो गया तथा महान् आत्मबलसे सम्पन्न बाणके नगरमें छिद्र (दोष) उत्पन्न हो गया । ५०-५२॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ सतासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८७॥
अनौपम्योवाच
भगवन् मानुषे लोके केन तुष्यति केशवः ।
व्रतेन नियमेनाथ दानेन तपसापि वा॥२६
नारद उवाच
तिलधेनुं च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे।
ससागरवनद्वीपा दत्ता भवति मेदिनी ॥ २७
सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सार्वकामिकैः।
मोदते चाक्षयं कालं यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥२८
आम्रामलकपित्थानि बदराणि तथैव च।
कदम्बचम्पकाशोकपुन्नागविविधद्रुमान् ॥२९
अश्वत्थपिप्पलांश्चैव कदलीवटदाडिमान्।
पिचुमन्दं मधूकं च उपोष्य स्त्री ददाति या॥३०
स्तनौ कपित्थसदृशावूरू च कदलीसमौ।
अश्वत्थे वन्दनीया च पिचुमन्दे सुगन्धिनी॥३१
चम्पके चम्पकाभा स्यादशोके शोकवर्जिता।
मधूके मधुरं वक्ति वटे च मृदुगात्रिका॥ ३२
बदरी सर्वदा स्त्रीणां महासौभाग्यदायिनी।
कुक्कुटी कर्कटी चैव द्रव्यषष्ठी न शस्यते॥ ३३
कदम्बमिश्रकनकमञ्जरीपूजनं तथा।
अनग्निपक्वमन्नं च पक्वान्नानामभक्षणम्॥३४
फलानां च परित्यागः संध्यामौनं तथैव च।
प्रथमं क्षेत्रपालस्य पूजा कार्या प्रयत्नतः॥३५
तस्या भवति वै भर्ता मुखप्रेक्षी सदानघे।
अष्टमी च चतुर्थी च पञ्चमी द्वादशी तथा॥३६
संक्रान्तिर्विषुवच्चैव दिनच्छिद्रमुखं तथा।
एतांस्तु दिवसान् दिव्यानुपवसन्ति याः स्त्रियः।
तासां तु धर्मयुक्तानां स्वर्गवासो न संशयः॥ ३७
कलिकालुष्यनिर्मुक्ताः सर्वपापविवर्जिताः।
उपवासरतां नारी नोपसर्पति तां यमः॥३८
अनौपम्योवाच
अस्मिन् कृतेन पुण्येन पुराजन्मकृतेन वा।
भवदागमनं भूतं किंचित् पृच्छाम्यहं व्रतम्॥ ३९
अनौपम्याने पूछा-भगवन्! मनुष्यलोकमें केशव व्रत, नियम, दान अथवा तपस्या-इनमें किससे प्रसन्न होते हैं? ॥२६॥
नारदजीने कहा-जो मनुष्य वेदमें पारङ्गत ब्राह्मणको तिलधेनुका दान करता है, उसके द्वारा समुद्र, वन और द्वीपोंसहित पृथ्वीका दान सम्पन्न हुआ समझना चाहिये। वह दाता करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान एवं सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंद्वारा सूर्य, चन्द्र और तारोंकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्द मनाता है। जो स्त्री उपवास करके आम, आँवला, कैथ, बेर, कदम्ब, चम्पक, अशोक, पुनाग, जायफल, पीपल, केला, वट, अनार, नीम, महुआ आदि अनेक प्रकारके वृक्षोंका दान करती है, उसके दोनों स्तन कैथके समान और दोनों जंघाएँ केलेके सदृश सुन्दर होती हैं। वह अश्वत्थके दानसे वन्दनीय और नीमके दानसे सुगन्धयुक्त होती है। वह चम्पाके दानसे चम्पाकी-सी कान्तिवाली और अशोकके दानसे शोकरहित होती है। महुआके दानसे वह मधुरभाषिणी होती है और वटके दानसे उसका शरीर कोमल होता है। बेर स्त्रियोंके लिये सदा महान् सौभाग्यदायी होता है। ककड़ी, जटाधारी और द्रव्यषष्ठीका दान, कदम्बसे मिश्रित धतूरेकी मंजरीसे पूजन, बिना अग्निसे पकाया हुआ अन्न एवं पके हुए अन्नोंका अभक्षण, फलोंका परित्याग तथा संध्याकालमें मौनधारण-ये स्त्रियोंके लिये प्रशस्त नहीं हैं। सर्वप्रथम प्रयत्नपूर्वक क्षेत्रपालकी पूजा करनी चाहिये। पापशून्ये! उस स्त्रीका पति सदा उसका मुख ही देखा करता है। जो स्त्रियाँ अष्टमी, चतुर्थी, पञ्चमी और द्वादशी तिथि, संक्रान्ति, विषुवयोग और दिनच्छिद्रमुख (दोपहरमें चन्द्रमाका नये मासकी तिथिमें प्रवेश करना)-इन दिव्य दिनोंमें उपवास करती हैं, उस धर्मयुक्त स्त्रियोंका स्वर्गमें निवास होता है-इसमें संदेह नहीं है। वे कलियुगके पापोंसे रहित और सभी पापोंसे शून्य हो जाती हैं। इस प्रकार जो स्त्री उपवासमें तत्पर रहती है, उसके समीप यम भी नहीं आते॥२७-३८॥
अनौपम्या बोली-नारदजी! पता नहीं, इस जन्ममें या पूर्व जन्ममें किये हुए पुण्यसे ही आपका यहाँ आगमन हुआ है। अब मैं आपसे कतिपय व्रतोंके विषयमें पूछती
अस्ति विन्ध्यावलि म बलिपत्नी यशस्विनी।
श्वश्रूर्ममापि विप्रेन्द्र न तुष्यति कदाचन ॥४०
श्वशुरोऽपि सर्वकालं दृष्ट्वा चापि न पश्यति।
अस्ति कुम्भीनसी नाम ननान्दा पापकारिणी॥४१
दृष्ट्वा चैवाङ्गुलीभङ्गं सदा कालं करोति माम्।
दिव्येन तु पथा याति मम सौख्यं कथं वद॥४२
ऊषरे न प्ररोहन्ति बीजाकुराः कथञ्चन।
येन व्रतेन चीर्णेन भवन्ति वशगा मम।
तव्रतं ब्रूहि विपेन्द्र दासभावं व्रजामि ते॥४३
नारद उवाच
यदेतत् ते मया पूर्वं व्रतमुक्तं शुभानने।
अनेन पार्वती देवी चीर्णेन वरवर्णिनि॥४४
शंकरस्य शरीरस्था विष्णोर्लक्ष्मीस्तथैव च।
सावित्री ब्रह्मणश्चैव वसिष्ठस्याप्यरुन्धती॥४५
एतेनोपोषितेनेह भर्ता स्थास्यति ते वशे।
श्वश्रूश्वशुरयोश्चैव मुखबन्धो भविष्यति॥४६
एवं श्रुत्वा तु शुश्रोणि यथेष्टं कर्तुमर्हसि।
नारदस्य वचः श्रुत्वा राज्ञी वचनमब्रवीत्॥ ४७
प्रसादं कुरु विपेन्द्र दानं ग्राह्यं यथेप्सितम्।
सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राण्याभरणानि च॥४८
तव दास्याम्यहं विप्र यच्चान्यदपि दुर्लभम्।
प्रगृहाण द्विजश्रेष्ठ प्रीयेतां हरिशंकरौ॥४९
नारद उवाच
अन्यस्मै दीयतां भद्रे क्षीणवृत्तिस्तु यो द्विजः।
अहं तु सर्वसम्पन्नो मद्भक्तिः क्रियतामिति ॥५०
एवं तासां मनो हृत्वा सर्वासां तु पतिव्रतात्।
जगाम भरतश्रेष्ठ स्वकीयं स्थानकं पुनः॥५१
ततो ह्यष्टहृदया अन्यतोगतमानसाः।
पतिव्रतात्वमुत्सृज्य तासां तेजो गतं ततः।
पुरे छिद्रं समुत्पन्नं बाणस्य तु महात्मनः॥५२
हूँ। विप्रवर! जो बलिकी पत्नी यशस्विनी विन्ध्यावलि हैं, वे मेरी भी सास हैं। वे मुझसे कभी भी प्रसन्न नहीं रहती। मेरे श्वशुर भी मुझे सभी समय देखते हुए भी अनदेखी करते हैं। पापाचरणमें रत रहनेवाली कुम्भीनसी नामकी मेरी ननद है। वह सभी समय मुझे देखकर अङ्गुली तोड़ती रहती है। वह दिव्य मार्गसे कैसे चले और मुझे सुखकी प्राप्ति कैसे हो-यह बतानेकी कृपा करें। (यह सत्य है कि) ऊषर भूमिमें डाले हुए बीजसे किसी प्रकार भी अङ्कुर नहीं उत्पन्न होते, फिर भी जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे ये मेरे वशमें आ जायँ, वह व्रत मुझे बतलाइये। विप्रेन्द्र! मैं आपकी दासी हूँ॥ ३९-४३॥
नारदजीने कहा-सुन्दर मुखवाली! जो व्रत मैंने पूर्व में तुमसे कहा है, उस व्रतका अनुष्ठान करनेसे पार्वतीदेवी शंकरके, लक्ष्मी विष्णुके, सावित्री ब्रह्माके, अरुन्धती वसिष्ठके शरीरमें विराजमान रहती हैं। इस उपवास-व्रतसे तुम्हारा पति भी तुम्हारे अधीन रहेगा तथा सास और श्वशुरका भी मुख बंद हो जायगा अर्थात् वे तुमसे प्रेम करने लगेंगे। सुश्रोणि! ऐसा सुनकर तुम जैसा चाहो वैसा कर सकती हो। नारदजीके वचनको सुनकर रानीने इस प्रकार कहा-'विप्रवर! मुझपर कृपा कीजिये और यथाभिलषित दान स्वीकार कीजिये। विप्र! सुवर्ण, मणि, रत्न, वस्त्र, आभूषण एवं अन्य जो भी दुर्लभ पदार्थ हैं, वह सब मैं आपको दूंगी। द्विजश्रेष्ठ! आप उसे ग्रहण करें, जिससे विष्णु और शंकर मुझपर प्रसन्न हो जायें ॥ ४४-४९ ॥
नारदजी बोले-कल्याणि! जो ब्राह्मण जीविकारहित हो, उसे ही यह दान दो। मैं तो सर्वसम्पन्न हूँ। तुम मेरे प्रति भक्ति-भाव रखो। भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उन सभी स्त्रियोंके मनको पातिव्रतसे विचलित कर नारदजी पुनः अपने स्थानपर चले गये। तभीसे उन स्त्रियोंका हृदय उदास रहने लगा और उनका मन दूसरी ओर लग गया। इस प्रकार पातिव्रत्यके त्यागसे उनका तेज नष्ट हो गया तथा महान् आत्मबलसे सम्पन्न बाणके नगरमें छिद्र (दोष) उत्पन्न हो गया ॥ ५०-५२॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ सतासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८७॥
Summary of chapter 189 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the vast spiritual merit earned by performing ritual baths, observing vows of purity, and executing ancestral Śrāddha along the banks of river Narmadā. Bhagavān Matsya declares that oblations of water mixed with sesame seeds offered to Pitṛs at Narmadā-tīrtha liberate ancestors from hellish realms and bestow health, righteous progeny, and unshakeable wealth upon the performer's family.