मत्स्य महा पुराण
विभूतिद्वादशी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
नन्दिकेश्वर उवाच
शृणु नारद वक्ष्यामि विष्णोद्वतमनुत्तमम्।
विभूतिद्वादशीनाम सर्वदेवनमस्कृतम्॥१
नन्दिकेश्वर बोले-नारदजी! सुनिये, अब मैं भगवान् विष्णुके विभूतिद्वादशी नामक सर्वोत्तम व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो सम्पूर्ण देवगणोंद्वारा अभिवन्दित है।
कार्तिके चैत्रवैशाखे मार्गशीर्षे च फाल्गुने।
आषाढे वा दशम्यां तु शुक्लायां लघुभुङ्नरः।
कृत्वा सायन्तनीं संध्यां गृह्णीयान्नियमं बुधः॥ २
एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्।
द्वादश्यां द्विजसंयुक्तः करिष्ये भोजनं विभो॥ ३
तदविघ्नेन मे यातु सफलं स्याच्च केशव।
नमो नारायणायेति वाच्यं च स्वपता निशि॥ ४
ततः प्रभात उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः।
पूजयेत् पुण्डरीकाक्षं शुक्लमाल्यानुलेपनैः॥ ५
विभूतये नमः पादावशोकाय च जानुनी।
नमः शिवायेत्यूरू च विश्वमूर्ते नमः कटिम्॥ ६
कंदर्पाय नमो मेह्रमादित्याय नमः करौ।
दामोदरायेत्युदरं वासुदेवाय च स्तनौ ॥ ७
माधवायेत्युरो विष्णो: कण्ठमुत्कण्ठिने नमः ।
श्रीधराय मुखं केशान् केशवायेति नारद ॥ ८
पृष्ठं शार्ङ्गधरायेति श्रवणौ वरदाय वै।
स्वनामा शङ्खचक्रासिंगदाजलजपाणये।
शिरः सर्वात्मने ब्रह्मन् नम इत्यभिपूजयेत्॥ ९
मत्स्यमुत्पलसंयुक्तं हैमं कृत्वा तु शक्तितः।
उदकुम्भसमायुक्तमग्रतः स्थापयेद् बुधः॥१०
गुडपात्रं तिलैर्युक्तं सितवस्त्राभिवेष्टितम्।
रात्रौ जागरणं कुर्यादितिहासकथादिना ।।११
प्रभातायां तु शर्वर्यां ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।
सकाञ्चनोत्पलं देवं सोदकुम्भं निवेदयेत्॥१२
यथा न मुच्यसे देव सदा सर्वविभूतिभिः।
मामुद्धराशेषदुःखसंसारकर्दमात्॥१३
दशावताररूपाणि प्रतिमासं क्रमान्मुने।
दत्तात्रेयं तथा व्यासमुत्पलेन समन्वितम्।
दद्यादेवं समा यावत् पाषण्डानभिवर्जयेत्॥१४
बुद्धिमान् मनुष्य कार्तिक, चैत्र, वैशाख, मार्गशीर्ष, फाल्गुन अथवा आषाढ़मासमें शुक्लपक्षकी दशमी तिथिको स्वल्पाहार कर सायंकालिक संध्योपासनासे निवृत्त होकर इस प्रकारका नियम ग्रहण करे-'प्रभो! मैं एकादशीको निराहार रहकर भगवान् जनार्दनकी भलीभाँति अर्चना करूँगा और द्वादशीके दिन ब्राह्मणके साथ बैठकर भोजन करूँगा। केशव! मेरा यह नियम निर्विघ्नतापूर्वक निभ जाय और फलदायक हो।' फिर रातमें 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्रका जप करते सो जाय। प्रात:काल उठकर स्नान-जप आदि करके पवित्र हो जाय और श्वेत पुष्पोंकी माला एवं चन्दन आदिसे भगवान् पुण्डरीकाक्षका पूजन करे। (पूजनके मन्त्र इस प्रकार हैं-)'विभूतये नमः' से दोनों चरणोंकी, अशोकाय नमः' से जानुओंकी, 'शिवाय नमः' से ऊरुओंकी, 'विश्वमूर्ते नमः' से कटिकी, 'कंदर्पाय नमः' से जननेन्द्रियकी, 'आदित्याय नमः' से हाथोंकी, 'दामोदराय नमः' से उदरकी, 'वासुदेवाय नमः' से दोनों स्तनोंकी, 'माधवाय नमः' से विष्णुके वक्षःस्थलकी, 'उत्कण्ठिने नमः' से कण्ठकी, 'श्रीधराय नमः' से मुखकी, 'केशवाय नमः' से केशोंकी, 'शार्ङ्गधराय नमः' से पीठकी, 'वरदाय नमः' से दोनों कानोंकी और 'सर्वात्मने नमः' से सिरकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मण देवता नारदजी!' तत्पथात् 'शङ्खचक्रासिगदाजलजपाणये नमः' कहकर अपने नामका उच्चारण करते हुए चरणोंमें प्रणिपात करे। तदुपरान्त बुद्धिमान् व्रती मूर्तिके अग्रभागमें एक जलपूर्ण कलश स्थापित करे। उसपर तिलसे युक्त गुड़से भरा हुआ पात्र, जो श्वेत वस्त्रसे परिवेष्टित हो, रख दे। उसके ऊपर अपनी शक्तिके अनुसार सोनेका कमलसहित मत्स्य बनवाकर स्थापित करे और रात्रिमें इतिहास-पुराण आदिकी कथाओंको सुनते हुए जागरण करे॥१-११ ।।
रात्रि व्यतीत होनेपर प्रात:काल स्वर्णमय कमल और कलशके साथ वह देव-मूर्ति कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर देनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करे-)'देव! जिस प्रकार आप सदा सम्पूर्ण विभूतियोंसे वियुक्त नहीं होते, उसी प्रकार इस निखिल कष्टोंसे परिपूर्ण संसाररूपी कीचड़से मेरा उद्धार कीजिये।' मुने! इस प्रकार एक वर्षतक प्रतिमास क्रमश: भगवान्के दस अवतारों तथा दत्तात्रेय और व्यासको स्वर्णमयी प्रतिमा स्वर्णनिर्मित कमलके साथ दान करनी चाहिये। उस समय छल, कपट, पाखण्ड आदिसे दूर रहना चाहिये।
समाप्यैवं यथाशक्त्या द्वादश द्वादशीः पुनः।
संवत्सरान्ते लवणपर्वतेन समन्वितम्।
शय्यां दद्यान्मुनिश्रेष्ठ गुरवे धेनुसंयुताम्॥१५
ग्रामंच शक्तिमान् दद्यात् क्षेत्रं वा भवनान्वितम्।
गुरुं सम्पूज्य विधिवद् वस्त्रालङ्कारभूषणैः॥ १६
अन्यानपि यथाशक्त्या भोजयित्वा द्विजोत्तमान्।
तर्पयेद् वस्त्रगोदानै रत्नौघधनसंचयैः।
अल्पवित्तो यथाशक्त्या स्तोकं स्तोकं समाचरेत्॥१७
यश्चाप्यतीव निःस्वः स्याद्भक्तिमान्माधवं प्रति।
पुष्पार्चनविधानेन स कुर्याद् वत्सरद्वयम्॥१८
अनेन विधिना यस्तु विभूतिद्वादशीव्रतम्।
कुर्यात् पापविनिर्मुक्तः पितृणां तारयेच्छतम्॥१९
जन्मनां शतसाहस्रं न शोकफलभाग् भवेत्।
न च व्याधिर्भवेत् तस्य न दारिद्रयं न बन्धनम्।
वैष्णवो वाथ शैवो वा भजेज्जन्मनि जन्मनि ॥२०
यावद् युगसहस्राणां शतमष्टोत्तरं भवेत्।
तावत् स्वर्गे वसेद् ब्रह्मन् भूपतिश्च पुनर्भवेत्॥ २१
मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार यथाशक्ति बारहों द्वादशी-व्रतोंको समाप्त कर वर्षके अन्तमें गुरुको लवणपर्वतके साथ-साथ गौसहित शय्या दान करनी चाहिये। व्रती यदि सम्पत्तिशाली हो तो उसे वस्त्र, शृङ्गार-सामग्री और आभूषण आदिसे गुरुकी विधिपूर्वक पूजा कर ग्राम अथवा गृहके साथ-साथ खेतका दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार अन्यान्य ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर उन्हें वस्त्र, गोदान, रत्नसमूह और धनराशियोंद्वारा संतुष्ट करनेका विधान है। स्वल्प धनवाला व्रती अपनी सामर्थ्यके अनुकूल थोड़ा-थोड़ा ही दान कर सकता है तथा जो व्रती परम निर्धन हो, किंतु भगवान् माधवके प्रति उसकी प्रगाढ़ निष्ठा हो तो उसे दो वर्षतक पुष्पार्चनकी विधिसे इस व्रतका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे विभूतिद्वादशी- व्रतका अनुष्ठान करता है, वह स्वयं पापसे मुक्त होकर अपने सौ पीढ़ियोंतकके पितरोंको तार देता है। उसे एक लाख जन्मोंतक न तो शोकरूप फलका भागी होना पड़ता है, न व्याधि और दरिद्रता ही घेरती है तथा न बन्धनमें ही पड़ना पड़ता है। वह प्रत्येक जन्ममें विष्णु अथवा शिवका भक्त होता है। ब्रह्मन्! जबतक एक सौ आठ सहस्त्र युग नहीं बीत जाते, तबतक वह स्वर्गलोकमें निवास करता है और पुण्य क्षीण होनेपर पुनः भूतलपर राजा होता है॥१२-२१॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विष्णुव्रतं नाम नवनवतितमोऽध्यायः॥९९।।
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विभूतिद्वादशी-सम्बन्धी विष्णु-व्रत नामक निन्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥९९ ॥
Summary of chapter 99 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya expounds upon the Vibhūti-Dvādaśī-Vrata, observed on the twelfth lunar day of the bright fortnight across six key months including Kārtika, Chaitra, Vaiśākha, Mārgaśīrsha, Phālguna, and Āshāḍha. The practitioner worships Bhagavān Nārāyaṇa alongside Goddess Lakshmī, offering fragrant flowers, tulasi leaves, incense, camphor, and elaborate food preparations free from salt. The devotee spends the day and night in spiritual vigil, meditating upon the cosmic glories and Vibhūtis of the Supreme Lord as described in sacred scriptures. The Lord promises that performing this vow bestows supreme spiritual majesty, fulfills all noble desires, frees the family from poverty, and ensures ultimate absorption into the supreme form of Bhagavān Nārāyaṇa.