ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद

अष्टक उवाच

चरन् गृहस्थः कथमेति देवान्

कथं भिक्षुः कथमाचार्यकर्मा।

वानप्रस्थः सत्पथे सन्निविष्टो

बहून्यस्मिन् सम्प्रति वेदयन्ति॥१

ययातिरुवाच

आहूताध्यायी गुरुकर्मसु चोद्यतः

पूर्वोत्थायी चरमं चाथ शायी।

मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्तः

स्वाध्यायशील: सिध्यति ब्रह्मचारी॥२

धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत

दद्यात् सदैवातिथीन् भोजयेच्च।

अनाददानश्च परैरदत्तं

सैषा गृहस्थोपनिषत् पुराणी॥३

स्ववीर्यजीवी वृजिनान्निवृत्तो

दाता परेभ्यो न परोपतापी।

तादृङ्मुनिः सिद्धिमुपैति मुख्यां

वसन्नरण्ये नियताहारचेष्टः॥४

अशिल्पजीवी विगृहश्च नित्यं

जितेन्द्रियः सर्वतो विप्रमुक्तः।

अनोकशायी लघु लिप्समान-

श्चरन् देशानेकाम्बरः स भिक्षुः॥५

रात्र्या यया चाभिरताश्च लोका

भवन्ति कामाभिजिताः सुखेन च।

तामेव रात्रिं प्रयतेत विद्वा-

नरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा॥६

दशैव पूर्वान् दशचापरांस्तु

ज्ञातींस्तथात्मानमथैकविंशम्।

अरण्यवासी सुकृतं दधाति

मुक्त्वा त्वरण्ये स्वशरीरधातॄन्॥७

अष्टकने पूछा-महाराज! वेदज्ञ विद्वान् इस धर्मके अन्तर्गत बहुत-से कर्मोको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका द्वार बताते हैं, अत: मैं आपसे पूछता हूँ कि आचार्यकी सेवा करनेवाला ब्रह्मचारी, गृहस्थ, सन्मार्गमें स्थित वानप्रस्थ और संन्यासी किस प्रकार धर्माचरण करके उत्तम लोकमें जाते हैं? ॥१॥

ययाति बोले-शिष्यको उचित है कि गुरुके बुलानेपर उसके समीप जाकर पढ़े, गुरुकी सेवामें बिना कहे लगा रहे, रातमें गुरुजीके सो जानेके बाद सोवे और सबेरे उनसे पहले ही उठ जाय। वह मृदुल (विनम्र), जितेन्द्रिय, धैर्यवान्, सावधान और स्वाध्यायशील हो। इस नियमसे रहनेवाला ब्रह्मचारी सिद्धिको पाता है। गृहस्थ पुरुष न्यायसे प्राप्त हुए धनको पाकर उससे यज्ञ करे, दान दे और सदा अतिथियोंको भोजन करावे। दूसरोंकी वस्तु उनके दिये बिना ग्रहण न करे। यह गृहस्थधर्मका प्राचीन एवं रहस्यमय स्वरूप है। वानप्रस्थ मुनि वनमें निवास करे। आहार और विहारको नियमित रखे। अपने ही पराक्रम एवं परिश्रमसे जीवन-निर्वाह करे, पापसे दूर रहे। दूसरोंको दान दे और किसीको कष्ट न पहुँचाये। ऐसा मुनि परम मोक्ष (सिद्धि)-को प्राप्त होता है। संन्यासी शिल्पकलासे जीवन-निर्वाह न करे। वह शम, दम आदि श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो, सदा अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखे, सबसे अलग रहे, गृहस्थके घरमें न सोये, परिग्रहका भार न लेकर अपनेको हलका रखे, थोड़ा-थोड़ा चले और अकेला ही अनेक स्थानोंमें भ्रमण करता रहे। ऐसा संन्यासी ही वास्तवमें भिक्षु कहलाने योग्य है। जिस समय रूप, रस आदि विषय तुच्छ प्रतीत होने लगें, इच्छानुसार जीत लिये जायें तथा उनके परित्यागमें ही सुख जान पड़े, उसी समय विद्वान् पुरुष मनको वशमें करके समस्त संग्रहोंका त्याग कर वनवासी होनेका प्रयत्न करे। जो वनवासी मुनि वनमें ही अपने पञ्चभूतात्मक शरीरका परित्याग करता है, वह दस पीढ़ी पूर्वके और दस पीढ़ी बादके जाति-भाइयोंको तथा इक्कीसवें अपनेको भी पुण्यलोकोंमें पहुँचा देता है॥२-७॥

अष्टक उवाच

कतिस्विद् देव मुनयो मौनानि कति चाप्युत।

भवन्तीति तदाचक्ष्व श्रोतुमिच्छामहे वयम्॥ ८

ययातिरुवाच

अरण्ये वसतो यस्य ग्रामो भवति पृष्ठतः।

ग्रामे वा वसतोऽरण्यं स मुनिः स्याज्जनाधिप॥ ९

अष्टक उवाच

कथंस्विद् वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः।

ग्रामे वा वसतोऽरण्यं कथं भवति पृष्ठतः॥१०

ययातिरुवाच

न ग्राम्यमुपयुञ्जीत य आरण्यो मुनिर्भवेत्।

तथास्य वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः॥११

अनग्निरनिकेतश्चाप्यगोत्रचरणो मुनिः।

कौपीनाच्छादनं यावत् तावदिच्छेच्च चीवरम्॥१२

यावत् प्राणाभिसंधानं तावदिच्छेच्च भोजनम्।

तदास्य वसतो ग्रामेऽरण्यं भवति पृष्ठतः॥१३

यस्तु कामान् परित्यज्य त्यक्तकर्मा जितेन्द्रियः।

आतिष्ठेत मुनिर्मीनं स लोके सिद्धिमाप्नुयात्।। १४

धौतदन्तं कृत्तनखं सदा स्नातमलङ्कृतम्।

असितं सितकर्मस्थं कस्तं नार्चितुमर्हति॥१५

तपसा कर्शितः क्षामः क्षीणमांसास्थिशोणितः।

यदा भवति निर्द्वन्द्वो मुनिमौनं समास्थितः॥१६

अथ लोकमिमं जित्वा लोकं चापि जयेत् परम्।

आस्येन तु यथाहारं गोवन्मृगयते मुनिः ।

अथास्य लोकः सर्वो यः सोऽमृतत्वाय कल्पते॥१७

अष्टकने पूछा-राजन्! मुनि कितने हैं? और मौन कितने प्रकारके हैं! यह बताइये, हम इसे सुनना चाहते हैं॥८॥

ययातिने कहा-जनेश्वर! अरण्यमें निवास करते समय जिसके लिये ग्राम पीछे होता है और ग्राममें वास करते समय जिसके लिये अरण्य पीछे होता है, वह मुनि कहलाता है ॥९॥

अष्टकने पूछा-अरण्यवासीके लिये ग्राम और ग्राममें निवास करनेवालेके लिये अरण्य पीछे कैसे है? ॥१०॥

ययातिने कहा-जो मुनि वनमें निवास करता है और गाँवोंमें प्राप्त होनेवाली वस्तुओंका उपयोग नहीं करता, इस प्रकार वनमें निवास करनेवाले उस (वानप्रस्थ) मुनिके लिये गाँव पीछे समझा जाता है। जो अग्नि और गृहको त्याग चुका है, जिसका गोत्र और चरण (वेदकी शाखा एवं जाति)-से भी सम्बन्ध नहीं रह गया है, जो मौन रहता और उतने ही वस्त्रकी इच्छा रखता है, जितनेसे लँगोटी और ओढ़नेका काम चल जायः इसी प्रकार जितनेसे प्राणोंकी रक्षा हो सके उतना ही भोजन चाहता है, इस नियमसे गाँवमें निवास करनेवाले उस (संन्यासी) मुनिके लिये अरण्य पीछे समझा जाता है। जो मुनि सम्पूर्ण कामनाओंको छोड़कर कर्मोको त्याग चुका है और इन्द्रिय-संयमपूर्वक सदा मौनमें स्थित है, ऐसा संन्यासी लोकमें परम सिद्धिको प्राप्त होता है। जिसके दाँत शुद्ध और साफ हैं, जिसके नख (और केश) कटे हुए हैं, जो सदा स्नान करता है तथा यम-नियमादिसे अलंकृत (उन्हें धारण किये हुए) है, शीतोष्णको सहनेसे जिसका शरीर श्याम पड़ गया है, जिसके आचरण उत्तम हैं-ऐसा संन्यासी किसके लिये पूजनीय नहीं है। तपस्यासे मांस, हड्डी तथा रक्तके क्षीण हो जानेपर जिसका शरीर कृश और दुर्बल हो गया है तथा जो सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंसे रहित एवं भलीभाँति मौनावलम्बी हो चुका है, वह इस लोकको जीतकर परलोकपर भी विजय पाता है। जब संन्यासी मुनि गाय- बैलोंकी तरह मुखसे ही आहार ग्रहण करता है, हाथ आदिका भी सहारा नहीं लेता, तब उसके द्वारा ये सब लोक जीत लिये गये समझे जाते हैं और वह मोक्षकी प्राप्तिके लिये समर्थ समझा जाता है॥११-१७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे यातिचरिते चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंशवर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक चालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥