मत्स्य महा पुराण
देव-गृहों तथा सूर्य-चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
ऋषय ऊचुः
यदेतद् भवता प्रोक्तं श्रुतं सर्वमशेषतः।
कथं देवगृहाणि स्युः कथं ज्योतींषि वर्णय॥१
सूत उवाच
एतत् सर्वं प्रवक्ष्यामि सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम्।
यथा देवगृहाणि स्युः सूर्याचन्द्रमसोस्तथा॥२
अग्नेर्युष्टौ रजन्यां वै ब्रह्मणाव्यक्तयोनिना।
अव्याकृतमिदं त्वासीनैशेन तमसाऽऽवृतम् ॥ ३
चतुर्भूतावशिष्टेऽस्मिन् ब्रह्मणा समधिष्ठिते।
स्वयम्भूर्भगवांस्तत्र लोकतत्त्वार्थसाधकः॥ ४
खद्योतरूपी विचरन्नाविर्भावं व्यचिन्तयत्।
ज्ञात्वाग्निं कल्पकालादावप: पृथ्वी च संश्रिताः॥५
स सम्भृत्य प्रकाशार्थं त्रिधा तुल्योऽभवत् पुनः।
पाचको यस्तु लोकेऽस्मिन् पार्थिवः सोऽग्निरुच्यते॥६
ऋषियोंने पूछा-सूतजी! आपने जो यह सारा विषय पूर्णरूपसे वर्णन किया है, उसे तो हमलोगोंने सुना, परंतु देव-गृह कैसे होते हैं? (यह जाननेकी विशेष उत्कण्ठा हो रही है।) अत: आप पुनः (पूर्वकथित) ज्योतिश्चक्रका कुछ और विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥१॥
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! अब मैं जिस प्रकार देव-गृह एवं सूर्य, चन्द्रमा और अग्निके गृह होते हैं तथा जैसी सूर्य और चन्द्रमाकी गति होती है, वह सब बतला रहा हूँ। (ब्रह्माकी) रात्रि व्यतीत होनेपर प्रातःकाल अव्यक्तयोनि ब्रह्माने देखा कि जगत्की कोई वस्तु दीख नहीं रही है। सारा जगत् रात्रिके अन्धकारसे आच्छन्न है। (कहीं प्रकाशका चिह्नमात्र भी अवशेष नहीं है।) ब्रह्माद्वारा अधिष्ठित इस जगत्में केवल चार पदार्थ अवशिष्ट थे, तब लोकोंके तत्त्वार्थको सिद्ध करनेवाले स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा खद्योत (जुगनू)-के रूपमें विचरण करते हुए प्रकाशको आविर्भूत करनेके लिये विचार करने लगे। (उस समय उन्हें स्मरण हुआ कि) कल्पकालके आदिमें अग्नि-तत्त्व जल और पृथ्वीमें सम्मिलित हो गया था। यह जानकर उन्होंने तीनोंको एकत्र कर प्रकाश करनेके लिये तीन भागोंमें विभक्त कर दिया। इस प्रकार इस लोकमें जो पाचक नामक अग्नि है,
यश्चासौ तपते सूर्ये शुचिरग्निश्च स स्मृतः।
वैद्युतो जाठरः सौम्यो वैद्युतश्चाप्यनिन्धनः॥ ७
तेजोभिश्चाप्यते कश्चित् कश्चिदेवाप्यनिन्धनः ।
काष्ठेम्धनस्तु निर्मथ्यः सोऽद्भिः शाम्यति पावकः॥ ८
अर्चिष्मयान्पचनोऽग्निस्तुनिष्प्रभः सौम्यलक्षणः।
यश्चासौ मण्डले शुक्ले निरूष्मा न प्रकाशते॥९
प्रभा सौरी तु पादेन अस्तं याति दिवाकरे।
अग्निमाविशते रात्रौ तस्मादग्निः प्रकाशते॥१०
उदिते तु पुनः सूर्ये ऊष्माग्नेस्तु समाविशत्।
पादेन तेजसश्चाग्नेस्तस्मात् संतपते दिवा ॥११
प्राकाश्यं च तथौष्ण्यं च सौर्याग्नेये तु तेजसी।
परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम्॥१२
उत्तरे चैव भूम्यर्धे तथा ह्यस्मिंस्तु दक्षिणे।
उत्तिष्ठति पुनः सूर्ये रात्रिराविशते ह्यपः॥१३
तस्मात् ताम्रा भवन्त्यापो दिवारात्रिप्रवेशनात्।
अस्तं गते पुनः सूर्ये अहो वै प्रविशत्यपः॥१४
तस्मान्नक्तं पुनः शुक्ला ह्यापो दृश्यन्ति भासुराः ।
एतेन क्रमयोगेन भूम्यर्धे दक्षिणोत्तरे॥१५
उदयास्तमये चात्र ह्यहोरात्रं विशत्यपः।
यश्चासौ तपते सूर्यः सोऽपः पिबति रश्मिभिः ॥१६
सहस्रपादस्त्वेषोऽग्नी रक्तकुम्भनिभस्तु सः।
आदत्ते स तु नाडीनां सहस्त्रेण समन्ततः॥१७
अपो नदीसमुद्रेभ्यो ह्रदकूपेभ्य एव च।
तस्य रश्मिसहस्त्रेण शीतवर्षोष्णनिःस्रवः॥१८
तासां चतुःशतं नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः।
उसे पार्थिव अग्नि कहते हैं। जो अग्नि सूर्यमें स्थित होकर ताप पैदा करती है, वह शुचि अग्नि कहलाती है। उदरमें स्थित अग्नि विद्युत्से उत्पन्न हुई मानी जाती है। उसे सौम्य कहते हैं। इस वैद्युताग्निका इन्धन जल है। कोई अग्नि अपने तेजसे ही बढ़ती है और कोई बिना इन्धनके भी उद्दीप्त होती है। काष्ठरूपी इन्धनसे जलनेवाली अग्निका नाम निर्मन है। यह अग्नि जलके संयोगसे शान्त हो जाती है। पचमान अग्नि ज्वालाओंसे संयुक्त रहता है और प्रभाहीन रहना सौम्य अग्निका लक्षण है। जो श्वेत मण्डलमें स्थित रहकर ऊष्मारहित हो प्रकाशित नहीं होती, सूर्यकी वह कान्ति सूर्यके अस्त हो जानेपर अपने चतुर्थांशसे अग्निमें प्रवेश कर जाती है, इसी कारण रातमें अग्निका प्रकाश अधिक होता है॥२-१०॥
पुनः सूर्योदय होनेपर अग्निकी ऊष्मा अपने तेजके चतुर्थांशसे सूर्यमें प्रविष्ट हो जाती है, इस कारण दिनमें सूर्य पूर्णरूपसे तपते हैं। प्रकाशता, उष्णता, सूर्य और अग्निका तेज-इन सबके परस्पर अनुप्रवेश करनेके कारण दिन-रातकी पूर्ति होती है। पृथ्वीके उत्तरवर्ती तथा दक्षिणवर्ती अर्धभागमें सूर्यके उदय होनेपर रात्रि पुनः जलमें प्रवेश कर जाती है। इस प्रकार दिनके समय रात्रिके जलमें प्रवेश करनेके कारण दिनमें जल लाल रंगका दीख पड़ता है। पुनः सूर्यके अस्त हो जानेपर दिन जलमें प्रवेश करता है। इसी कारण जल रातमें उज्ज्वल और चमकीला दिखायी पड़ता है। इसी क्रमसे भूमिके दक्षिणोत्तर अर्धभागमें सूर्यके उदय एवं अस्तके समय दिन और रात क्रमश: जलमें प्रवेश करते हैं। जो ये सूर्य तप रहे हैं, वे अपनी किरणोंद्वारा जलको सोखते हैं। सूर्यमें स्थित अग्निका रंग लाल रंगके घड़ेके समान है। उसमें हजारों किरणें हैं। वह अपनी सहस्रों नाडियोंसे नदी, समुद्र, हृद और कुएँसे जलको ग्रहण करता है। सूर्यकी उन्हीं हजारों किरणोंसे शीत, वर्षा और गरमीका प्रादुर्भाव होता है॥११-१८॥
उन सहस्रों किरणोंमें विचित्र आकृतिवाली चार सौ नाडियाँ जलकी वर्षा करनेवाली हैं। उनमें
*प्रकारान्तरसे इन अग्नियोंका बहुत कुछ उल्लेख अ० ५१ में भी हो चुका है। यहाँ १२६-२८तकके तीन अध्यायोंमें ग्रहोंके स्वरूप तथा उनके रथ, आयुध आदिका परिचय बहुत सुन्दर रूपमें कराया गया है। पहले ९४वें अध्यायमें भी इन ग्रहोंका स्वरूपनिरूपण हुआ है।
चन्दनाश्चैव मेध्याश्च केतनाश्चेतनास्तथा॥१९
अमृता जीवनाः सर्वा रश्मयो वृष्टिसर्जनाः।
हिमोद्भवाश्च ताभ्योऽन्या रश्मयस्त्रिंशतः स्मृताः।।
चन्द्रताराग्रहैः सर्वैः पीता भानोर्गभस्तयः ।। २०
एता मध्यास्तथान्याश्च ह्लादिन्यो हिमसर्जनाः।
शुक्लाश्च ककुभश्चैव गावो विश्वभृतश्च याः॥२१
शुक्लास्ता नामतः सर्वास्त्रिंशत्या घर्मसर्जनाः।
सम्बिभ्रति हि ताः सर्वा मनुष्यान् देवताः पितॄन्॥ २२
मनुष्यानौषधीभिश्च स्वधया च पितॄनपि।
अमृतेन सुरान् सर्वान् सततं परितर्पयन्॥ २३
वसन्ते चैव ग्रीष्मे च शनैः संतपते त्रिभिः।
वर्षासु च शरद्येवं चतुर्भिः सम्प्रवर्षति॥२४
हेमन्ते शिशिरे चैव हिमोत्सर्गस्त्रिभिः पुनः।
औषधीषु बलं धत्ते सुधां च स्वधया पुनः॥२५
सूर्योऽमरत्वममृते त्रयस्त्रिषु नियच्छति।
एवं रश्मिसहस्रं तु सौरं लोकार्थसाधकम्॥२६
भिद्यते ऋतुमासाद्य जलशीतोष्णनिःस्रवम्।
इत्येवं मण्डलं शुक्लं भास्वरं लोकसंज्ञितम्॥ २७
नक्षत्रग्रहसोमानां प्रतिष्ठा योनिरेव च।
ऋक्षचन्द्रग्रहाः सर्वे विज्ञेयाः सूर्यसम्भवाः॥२८
सुषुम्रा सूर्यरश्मिर्या क्षीणं शशिनमेधते।
हरिकेशः पुरस्तात्तु यो वै नक्षत्रयोनिकृत्॥२९
दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिराप्याययद् बुधम्।
विश्वावसुश्च यः पश्चाच्छुक्रयोनिश्च स स्मृतः॥ ३०
संवर्धनस्तु यो रश्मिः स योनिलॊहितस्य च।
षष्ठस्तु ह्यश्वभू रश्मिर्योनिः सा हि बृहस्पतेः॥३१
शनैश्चरं पुनश्चापि रश्मिराप्यायते सुराट्।
न क्षीयन्ते यतस्तानि तस्मान्नक्षत्रता स्मृता॥ ३२
क्षेत्राण्येतानि वै सूर्यमापतन्ति गभस्तिभिः।
क्षेत्राणि तेषामादत्ते सूर्यो नक्षत्रता ततः॥३३
चन्दना, मेध्या, केतना, चेतना, अमृता और जीवना-ये सभी किरणें विशेषरूपसे वृष्टि करनेवाली हैं। सूर्यकी तीन सौ किरणें हिमसे उत्पन्न हुई कही जाती हैं। उन्हें चन्द्रमा, तारा और सभी ग्रह पीते रहते हैं। ये मध्य नाडियाँ कहलाती हैं। इनके अतिरिक्त अन्य ह्लादिनी आदि नाडियाँ हिमकी सृष्टि करनेवाली हैं। शुक्ला, ककुभ, गौ और विश्वभृत् नामकी जो नाडियाँ हैं, वे सभी शुक्ला नामसे कही जाती हैं। इनकी भी संख्या तीन सौ हैं। ये धूपको उत्पन्न करनेवाली हैं। वे सभी मनुष्यों, देवताओं और पितरोंका भरण-पोषण करती हैं। ये किरणें ओषधियों (एवं अन्नों) द्वारा सभी मनुष्योंको, स्वधाद्वारा पितरोंको और अमृतके माध्यमसे देवताओंको सदा तृप्त करती रहती हैं। सूर्य वसन्त और ग्रीष्म-ऋतुमें शनैः-शनैः अपनी तीन सौ किरणोंसे ताप उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार वर्षा और शरद्-ऋतुमें चार सौ किरणोंके माध्यमसे वर्षा करते हैं। पुनः हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें तीन सौ किरणोंद्वारा बर्फ गिराते हैं। यही सूर्य ओषधियोंमें बल, स्वधामें सुधा और अमृतमें अमरत्वका आधान करते हैं अर्थात् तीनों पदार्थों में तीन तरहके गुण उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार सूर्यकी ये हजारों किरणें लोगोंका प्रयोजन सिद्ध करनेवाली हैं। ऋतुओंके क्रमानुसार जलकी शीतलता और उष्णतामें परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार उद्दीप्त एवं श्वेत वर्णवाला वह लोकसंज्ञक मण्डल नक्षत्र, ग्रह और सोमकी प्रतिष्ठा एवं योनि है। इन सभी चन्द्र, नक्षत्र और ग्रहोंको सूर्यसे उत्पन्न हुआ जानना चाहिये॥ १९-२८॥
सूर्यकी जो सुषुम्ना नामकी किरण है, वह क्षीण हुए चन्द्रमाको पुनः बढ़ाती है। पूर्वदिशामें जो हरिकेश नामकी किरण है, वह नक्षत्रोंकी जननी है। दक्षिण दिशामें स्थित विश्वकर्मा नामकी किरण बुधको तृप्त करती है। पश्चिम दिशामें जो विश्वावसु नामक किरण है, उसे शुक्रकी योनि (उत्पत्तिस्थान) कहा जाता है। जो संवर्धन किरण है, वह लोहित (मंगल)-की योनि है। छठी किरणको अश्वभू कहते हैं, वह बृहस्पतिकी योनि है। पुनः सुराट् नामक किरण शनैश्चरकी वृद्धि करती है। चूँकि ये (चन्द्र, नक्षत्र और ग्रह) कभी नष्ट नहीं होते, इसीलिये इनकी नक्षत्रता मानी गयी है। उपर्युक्त नक्षत्रोंके क्षेत्र सूर्यपर आकर गिरते हैं और सूर्य अपनी किरणोंद्वारा उन क्षेत्रोंको ग्रहण करते हैं, इसीसे उनकी नक्षत्रता सिद्ध होती
अस्माल्लोकादमुंलोकं तीर्णानां सुकृतात्मनाम्।
तारणात्तारका ह्येताः शुक्लत्वाच्चैव शुक्लिकाः॥३४
दिव्यानां पार्थिवानां च वंशानां चैव सर्वशः।
तपनस्तेजसो योगादादित्य इति गद्यते॥३५
सुवतिः स्पन्दनार्थे च धातुरेष निगद्यते।
सवनात्तेजसोऽपां च तेनासौ सविता स्मृतः॥३६
बह्वर्थश्चन्द्र इत्येष ह्लादने धातुरुच्यते।
शुक्लत्वे ह्यमृतत्वे च शीतत्वेऽपि विमान्यते॥३७
सूर्याचन्द्रमसोर्दिव्ये मण्डले भास्वरे खगे।
जलतेजोमये शुक्ले वृत्तकुम्भनिभे शुभे॥ ३८
वसन्ति कर्मदेवास्तु स्थानान्येतानि सर्वशः।
मन्वन्तरेषु सर्वेषु ऋषिसूर्यग्रहादयः॥३९
तानि देवगृहाणि स्युः स्थानाख्यानि भवन्ति हि।
सौरं सूर्योऽविशत्स्थानं सौम्यं सोमस्तथैव च॥४०
शौक्रं शुक्रोऽविशत्स्थानं षोडशारं प्रभास्वरम्।
बृहस्पतिर्ब्रहत्त्वं च लोहितं चापि लोहितः॥ ४१
शनैश्चरोऽविशत् स्थानमेवं शानैश्चरं तथा।
बुधोऽपि वै बुधस्थानं भानुं स्वर्भानुरेव च॥४२
नक्षत्राणि च सर्वाणि नाक्षत्राण्याविशन्ति च।
ज्योतींषि सुकृतामेते ज्ञेया देवगृहास्तु वै॥४३
स्थानान्येतानि तिष्ठन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्।
मन्वन्तरेषु सर्वेषु देवस्थानानि तानि वै॥४४
अभिमाने न तिष्ठन्ति तानि देवाः पुनः पुनः।
अतीतास्तु सहातीतैर्भाव्या भाव्यैः सुरैः सह ॥४५
वर्तन्ते वर्तमानैश्च सुरैः सार्धं तु स्थानिनः।
सूर्यो देवो विवस्वांश्च अष्टमस्त्वदितेः सुतः॥ ४६
द्युतिमान् धर्मयुक्तश्च सोमो देवो वसुः स्मृतः।
शुक्रो दैत्यस्तु विज्ञेयो भार्गवोऽसुरयाजकः॥ ४७
है। इस लोकसे परलोकमें जानेवाले पुण्यात्माओंका उद्धार करनेके कारण ये किरणें तारका नामसे प्रसिद्ध हैं तथा शुक्ल-वर्णकी होनेके कारण शुक्ला भी कही जाती हैं। दिव्य (स्वर्गीय) एवं पार्थिव (भौमिक) सभी प्रकारके वंशोंके तेजके संयोगसे सम्पन्न होनेके कारण सूर्यको 'तपन' कहा जाता है। 'सवति (सूते) अर्थात् 'सु' धातु 'उत्पत्ति अथवा चेतनाभाव' के अर्थमें प्रयुक्त होती है। * इसलिये (भूमि-) जल-तेजके उत्पादक होनेके कारण सूर्य सविता कहलाते हैं। इसी प्रकार 'चदि आह्लादने' यह बह्वर्थक धातु आह्लादित करनेके अर्थमें भी प्रयुक्त होती है। इसका शुक्लत्व, अमृतत्व और शीतत्व आदि अन्य अनेकों अर्थों में प्रयोग किया जाता है। (इसी धातुसे चन्द्र या चन्द्रमा शब्द निष्पन्न हुआ है।) ॥ २९-३७ ॥
सूर्य और चन्द्रमाके दिव्य मण्डल गगनतलमें उद्भासित होते हैं। वे सुन्दर श्वेत रंगवाले, जल और तेजसे सम्पन्न एवं कुम्भ-सदृश गोलाकार हैं। उनमें सभी मन्वन्तरोंके ऋषि एवं सूर्यादि ग्रह कर्मदेवताके रूपसे निवास करते हैं। ये ही उनके स्थान हैं, इसीसे उन्हें देव-गृह कहा जाता है। वे देव-गृह उन्हीं देवोंके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। सूर्य सौर नामक स्थानमें तथा चन्द्रमा सौम्य स्थानमें प्रवेश करते हैं। शुक्र शौक्र स्थानमें प्रवेश करते हैं, जो सोलह अरोंसे युक्त और अत्यन्त कान्तिमान् है। इसी प्रकार बृहस्पति बृहत्त्व स्थानमें, मंगललोहित स्थानमें, शनैश्चर शानैश्चर स्थानमें, बुध बुधस्थानमें और राहु भानुस्थानमें प्रवेश करते हैं। सभी नक्षत्र नाक्षत्र स्थानमें प्रवेश करते हैं। इस प्रकार इन सभी ज्योतियोंको उन पुण्यात्माओंके देव-गृह जानने चाहिये। ये सभी स्थान प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। सभी मन्वन्तरोंमें वे ही देवस्थान होते हैं। सभी देवता पुनः-पुनः उन्हीं अपने-अपने स्थानोंमें निवास करते हैं। अतीतकालीन स्थानीय देवता अतीतोंके साथ, भविष्यत्कालीन स्थानीय देवता भावी देवताओंके साथ और वर्तमानकालीन स्थानीय देवता वर्तमान देवताओंके साथ वर्तमान रहते हैं॥३८-४५ ३॥
अदितिके आठवें पुत्र विवस्वान् सूर्य देवता माने गये हैं। प्रभाशाली एवं धर्मात्मा चन्द्रदेव वसु कहे गये हैं। भृगुनन्दन शुक्रको, जो असुरोंके पुरोहित हैं, कर्मानुसार दैत्य समझना चाहिये।
* निरुक्त, अमरटीका, धातुवृति, उणादिकोश आदिके अनुसार भी 'पूङ् प्राणि-प्रसवे' धातुसे 'सविता' शब्द बनता है, जिसका अर्थ है-जगत्को उत्पन्न करनेवाला।
बृहस्पतिर्ब्रहत्तेजा देवाचार्योऽङ्गिरःसुतः।
बुधो मनोहरश्चैव शशिपुत्रस्तु स स्मृतः॥४८
शनैश्चरो विरूपश्च संज्ञापुत्रो विवस्वतः।
अग्निर्विकेश्यां जज्ञे तु युवासौ लोहिताधिपः॥४९
नक्षत्रनाम्यः क्षेत्रेषु दाक्षायण्याः सुताः स्मृताः।
स्वर्भानुः सिंहिकापुत्रो भूतसंतापनोऽसुरः॥५०
चन्द्रार्कग्रहनक्षत्रेष्वभिमानी प्रकीर्तितः।
स्थानान्येतानि चोक्तानि स्थानिन्यश्चैव देवताः॥५१
शुक्लमग्निसमं दिव्यं सहस्रांशोर्विवस्वतः।
सहस्रांशुत्विषः स्थानमम्मयं तैजसं तथा॥५२
आप्यस्थानं मनोज्ञस्य रविरश्मिगृहे स्थितम्।
शुक्रः षोडशरश्मिस्तु यस्तु देवो ह्यपोमयः॥५३
लोहितो नवरश्मिस्तु स्थानमाप्यं तु तस्य वै।
बृहद्वादशरश्मीकं हरिद्राभं तु वेधसः॥५४
अष्टरश्मिः शनेस्तत्तु कृष्णं वृद्धमयस्मयम्।
स्वर्भानोस्त्वायसं स्थानं भूतसंतापनालयम्॥५५
सुकृतामाश्रयास्तारा रश्मयस्तु हिरण्मयाः।
तारणात्तारकाः ह्येताः शुक्लत्वाच्चैव तारकाः॥५६
नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।
मण्डलं त्रिगुणं चास्य विस्तारो भास्करस्य तु॥५७
द्विगुणः सूर्यविस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः ।
त्रिगुणं मण्डलं चास्य वैपुल्याच्छशिनः स्मृतम्॥५८
सर्वोपरि निसृष्टानि मण्डलानि तु तारकाः।
योजनार्धप्रमाणानि ताभ्योऽन्यानि गणानि तु॥५९
तुल्यो भूत्वा तु स्वर्भानुस्तदधस्तात् प्रसर्पति।
उद्धृत्य पार्थिवीं छायां निर्मितां मण्डलाकृतिम्॥६०
ब्रह्मणा निर्मितं स्थानं तृतीयं तु तमोमयम्।
आदित्यात् स तु निष्क्रम्य सोमं गच्छति पर्वसु॥६१
आदित्यमेति सोमाच्च पुनः सौरेषु पर्वसु।
स्वभासा तुदते यस्मात्स्वर्भानुरिति स स्मृतः॥६२
महर्षि अङ्गिराके पुत्र परम तेजस्वी बृहस्पति देवोंके आचार्य हैं। मनोहर रूपवाले बुध चन्द्रमाके पुत्र हैं। शनैश्चर कुरूप कहे गये हैं। ये सूर्यके संयोगसे उत्पन्न हुए संज्ञाके पुत्र हैं। लाल रंगके अधिपति मंगल नवयुवक (माने गये) हैं। स्वयं अग्निदेव ही रूपमें विकेशी (भूमि) के* गर्भसे उत्पन्न हुए थे। नक्षत्र नामवाली सत्ताईस नक्षत्राभिमानी देवियाँ दाक्षायणीकी कन्या मानी गयी हैं। राहु सिंहिकाका पुत्र है। यह सभी प्राणियोंको कष्ट देनेवाला राक्षस है। इस प्रकार सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रोंके अभिमानी देवताओंका वर्णन किया गया। साथ ही उनके स्थान तथा स्थानी देवता भी बतलाये गये। सहस्र किरणधारी सूर्यका स्थान दिव्य, श्वेत वर्णवाला तथा अग्निके समान तेजस्वी है। चन्द्रमाका स्थान तैजस एवं जलमय है। बुधका स्थान जलमय है और वह सूर्यकी किरणरूपी गृहमें स्थित है। शुक्रदेवका स्थान सोलह किरणोंसे युक्त एवं जलमय है। मंगल नौ किरणोंसे युक्त हैं, उनका स्थान जलमय है। बृहस्पतिका स्थान बारह किरणोंसे युक्त है और उसकी कान्ति हल्दीके समान पीली है। शनैश्चरका स्थान आठ किरणोंसे युक्त, प्राचीन, लौहमय एवं काले रंगका है। राहुका स्थान लोहेका बना है, वह प्राणियोंको कष्ट देनेवाला है। ताराएँ सुकृतीजनोंका आश्रय स्थान हैं। इनकी किरणें स्वर्णमयी हैं। जीवोंका निस्तार करनेके कारण ये तारका कहलाती हैं और शुक्लवर्ण होनेके कारण इनका शुक्ला भी नाम है॥४६-५६॥
सूर्यके व्यासका विस्तार नौ हजार योजन है और इनका सम्पूर्ण मण्डल इस (व्यास) से तिगुना अर्थात् सत्ताईस हजार योजन है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना बतलाया जाता है। चन्द्रमाका सम्पूर्ण मण्डल विपुलतामें सूर्य-मण्डलसे तिगुना है। सबके ऊपर तारकाओंके मण्डल हैं। उनका विस्तार आधे योजनका बतलाया जाता है। उनसे नीचे अन्य गणोंके स्थान हैं। राहु उनकी तुलनामें समान होते हुए भी उनके नीचेसे भ्रमण करता है। ब्रह्माद्वारा निर्मित वह तीसरा स्थान तमोमय है। उसे पृथ्वीकी छायाको ऊपर उठाकर मण्डलाकार बनाया गया है। राहु पूर्णिमा आदि पर्तमें सूर्यमण्डलसे निकलकर चन्द्रमण्डलमें चला जाता है और सूर्य-सम्बन्धी अमावास्या आदि पर्वोमें पुनः चन्द्रमण्डलसे निकलकर सूर्यमण्डलमें चला आता है। वह अपनी कान्तिसे प्राणियोंको कष्ट पहुँचाता है, इसीलिये उसे स्वर्भानु कहते हैं।
* सभी पुराणों तथा मूर्त्यष्टक शिवव्याख्यानोंमें विकेशीको भूमि कहा गया है। उनके पुत्र होनेसे ही मङ्गलको भौम कहा जाता है।
चन्द्रतः षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।
विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव योजनानां तु स स्मृतः॥६३
भार्गवात्पादहीनश्च विज्ञेयो वै बृहस्पतिः।
बृहस्पतेः पादहीनौ कुंजसौरावुभौ स्मृतौ॥६४
विस्तारमण्डलाभ्यां तु पादहीनस्तयोर्बुधः ।
तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै॥६५
बुधेन समरूपाणि विस्तारान्मण्डलात्तु वै।
तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम्॥ ६६
शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैकमेव च।
सर्वोपरि विसृष्टानि मण्डलानि तु तारकाः॥६७
योजनार्धप्रमाणानि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते।
उपरिष्टात्तु ये तेषां ग्रहा ये क्रूरसात्त्विकाः॥६८
सौरश्चाङ्गिरसो वक्रो विज्ञेया मन्दचारिणः।
तेभ्योऽधस्तात्तु चत्वारः पुनश्चान्ये महाग्रहाः॥६९
सोमः सूर्यो बुधश्चैव भार्गवश्चेति शीघ्रगाः।
यावन्ति चैव ऋक्षाणि कोट्यस्तावन्ति तारकाः॥७०
सर्वेषां तु ग्रहाणां वै सूर्योऽधस्तात् प्रसर्पति।
विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी॥७१
नक्षत्रमण्डलं चापि सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति।
नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधाच्चोर्ध्वं तु भार्गवः॥७२
वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः।
तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं देवाचार्योपरि स्थितः॥७३
शनैश्चरात्तथा चोर्ध्वं ज्ञेयं सप्तर्षिमण्डलम्।
सप्तर्षिभ्यो ध्रुवश्चोर्ध्वं समस्तं त्रिदिवं ध्रुवे॥७४
द्विगुणेषु सहस्त्रेषु योजनानां शतेषु च।
ग्रहान्तरमथैकैकमूर्ध्वं नक्षत्रमण्डलात्॥७५
ताराग्रहान्तराणि स्युरुपर्युपर्यधिष्ठितम्।
ग्रहाश्च चन्द्रसूर्यौ च दिवि दिव्येन तेजसा॥७६
नक्षत्रेषु च युज्यन्ते गच्छन्तो नियतक्रमात्।
चन्द्रार्कग्रहनक्षत्रा नीचोच्चगृहमाश्रिताः॥७७
समागमे च भेदे च पश्यन्ति युगपत्प्रजाः।
परस्परं स्थिता ह्येवं युज्यन्ते च परस्परम्॥७८
व्यास और बाह्यवृत्त-दोनोंके योजन-परिमाणमें शुक्रका परिमाण चन्द्रमाके सोलहवें भागके बराबर बतलाया जाता है। बृहस्पतिका परिमाण शुक्रके परिमाणसे एक चतुर्थांश कम जानना चाहिये। शनि और मंगल-ये दोनों प्रमाणमें बृहस्पतिसे चतुर्थांश कम बतलाये गये हैं। बुध इन दोनों ग्रहोंसे विस्तार और मण्डलमें चौथाई कम हैं। आकाशमण्डलमें तारा, नक्षत्र आदि जितने शरीरधारी हैं, वे सभी विस्तार और मण्डलके हिसाबसे बुधके समकक्ष हैं। तारा और नक्षत्र परस्पर एक-दूसरेसे कम हैं ॥५७-६६ ॥
इस प्रकार उन सभी ज्योतिर्गणोंका मण्डल पाँच, चार, तीन, दो अथवा एक योजनमें विस्तृत है। तारकाओंके मण्डल सबसे ऊपर हैं। उनका प्रमाण आधा योजन है। इनसे कम विस्तारवाला अन्य कोई नहीं है। इनके ऊपर और सात्त्विक ग्रह स्थित हैं, उन्हें शनैश्चर, बृहस्पति और मंगल समझना चाहिये। ये सभी मन्द गतिवाले हैं। इनके नीचे चन्द्र, सूर्य, बुध और शुक्र-ये चार अन्य महान् ग्रह विचरण करते हैं। ये सभी शीघ्रगामी हैं। जितने नक्षत्र हैं, उतने ही करोड़ तारकाएँ हैं। सूर्य सभी ग्रहोंके निचले भागमें गमन करते हैं। सूर्यके ऊपरी भागमें चन्द्रमा अपने मण्डलको विस्तृत करके चलते हैं। नक्षत्रमण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है। इसी प्रकार नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल, मंगलसे ऊपर बृहस्पति और देवाचार्य बृहस्पतिके ऊपर शनैश्चर स्थित हैं। शनैश्चरसे ऊपर सप्तर्षि-मण्डलको जानना चाहिये। सप्तर्षियोंसे ऊपर ध्रुव हैं और ध्रुवसे ऊपर सारा आकाशमण्डल है। नक्षत्रमण्डलसे ऊपर प्रत्येक ग्रह दो लाख योजनोंके अन्तरपर स्थित है। ताराओं और ग्रहोंके अन्तर परस्पर एक-दूसरेके ऊपर स्थित हैं। आकाशमण्डलमें सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहगण दिव्य तेजसे युक्त हो निश्चित क्रमानुसार चलते हुए नक्षत्रोंसे मिलते हैं॥६७-७६३ ॥
चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह और नक्षत्र अपने-अपने नीचे-ऊँचे गृहोंमें स्थित होते हैं। इसी क्रमसे इनका समागम और वियोग भी होता है। उस अवसरपर सभी प्राणी इन्हें एक साथ देखते हैं। इस प्रकार स्थित रहकर ये
असंकरेण विज्ञेयस्तेषां योगस्तु वै बुधैः।
इत्येवं संनिवेशो वै पृथिव्या ज्योतिषां च यः॥७९
द्वीपानामुदधीनां च पर्वतानां तथैव च।
वर्षाणां च नदीनां च ये च तेषु वसन्ति वै॥८०
इत्येषोऽर्कवशेनैव संनिवेशस्तु ज्योतिषाम्।
आवर्तः सान्तरो मध्ये संक्षिप्तश्च ध्रुवात्तु सः॥८१
सर्वतस्तेषु विस्तीर्णो वृत्ताकार इवोच्छ्रितः।
लोकसंव्यवहारार्थमीश्वरेण विनिर्मितः॥८२
कल्पादौ बुद्धिपूर्वं तु स्थापितोऽसौ स्वयम्भुवा।
इत्येष संनिवेशो वै सर्वस्य ज्योतिरात्मकः॥८३
विश्वरूपं प्रधानस्य परिणाहोऽस्य यः स्मृतः।
तेषां शक्यं न संख्यातुं याथातथ्येन केनचित्।
गतागतं मनुष्येण ज्योतिषां मांसचक्षुषा॥८४
परस्पर संयुक्त होते हैं। विद्वान्लोग इनके इस सम्बन्धको अमिश्रित ही मानते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी, ज्योतिर्गणों, द्वीप, समुद्र, पर्वत, वर्ष, नदी तथा उनमें निवास करनेवाले प्राणियोंकी स्थिति है। ज्योतिर्गणोंका यह स्थितिक्रम सूर्यके कारण ही है। (मण्डलाकार घूमते समय) उन गणोंके मध्यमें आवर्त-सा दीख पड़ता है। वह बीचमें ध्रुवके आ जानेसे संक्षिप्त हो जाता है। वह चारों ओर ऊँचाईपर गोलाकार फैला रहता है। परमेश्वरने लोकोंकी प्रयोजन-सिद्धिके लिये उसे बनाया है। ब्रह्माने कल्पके आदिमें बहुत सोच-विचारकर इसे स्थापित किया है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डलकी स्थिति है। प्रधान (प्रकृति)-का यह विश्वरूप परिणाम अत्यन्त अद्भुत है। कोई भी इसकी यथार्थ गणना नहीं कर सकता। मनुष्य अपने चर्मचक्षुओंसे इन ज्योतिर्गणोंके गमनागमनको नहीं देख सकता॥७७-८४॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे देवगृहवर्णनं नामाष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१२८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें देवगृहवर्णन नामक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२८॥
Summary of chapter 129 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya expounds upon the ultimate glories of Sūrya Deva as the primary source of all life, light, and rain in the material world. Bhagavān Matsya describes the natural process whereby solar rays draw moisture from oceans and water bodies during eight months, converting it into atmospheric clouds known as Saṁvarta and Āvarta, which subsequently shower life-giving rain during the monsoon season, sustaining agriculture and nourishing all living entities.