ताराके गर्भसे बुधकी उत्पत्ति, पुरूरवाका जन्म, पुरुरवा और उर्वशीकी कथा, नहुष-पुत्रोंके वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिका वृत्तान्त

सूत उवाच

ततः संवत्सरस्यान्ते द्वादशादित्यसंनिभः।

दिव्यपीताम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः॥१

तारोदराद् विनिष्क्रान्तः कुमारश्चन्द्रसंनिभः।

सर्वार्थशास्त्रविद् धीमान् हस्तिशास्त्रप्रवर्तकः॥२

नाम यद्राजपुत्रीय विश्रुतं गजवैद्यकम्।

राज्ञः सोमस्य पुत्रत्वाद् राजपुत्रो बुधः स्मृतः॥३

जातमात्रः स तेजांसि सर्वाण्येवाजयद् बली।

ब्रह्माद्यास्तत्र चाजग्मुर्देवा देवर्षिभिः सह॥४

बृहस्पतिगृहे सर्वे जातकर्मोत्सवे तदा।

अपृच्छंस्ते सुरास्तारां केन जातः कुमारकः॥५

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! तदनन्तर एक व्यतीत होनेपर ताराके उदरसे एक कुमार प्रकट हुआ वह बारहों सूर्योंके समान तेजस्वी, दिव्य पीताम्बरधा दिव्य आभूषणोंसे विभूषित तथा चन्द्रमाके सदृश कान्तिम था। वह सम्पूर्ण अर्थशास्त्रका ज्ञाता, उत्कृष्ट बुद्धिसम तथा हस्तिशास्त्र (हाथीके गुण-दोष तथा चिकित्सा आ विवेचनापूर्ण शास्त्र)-का प्रवर्तक था। वही शास्त्र 'राजपुत्री (या 'पालकाप्य")-नामसे विख्यात है, इसमें गज चिकित्साका विशद वर्णन है। सोम राजाका पुत्र होने कारण वह राजकुमार राजपुत्रे तथा बुधके नामसे प्रसि हुआ। उस बलवान् राजकुमारने जन्म लेते ही सभी तेजस्वी पदार्थोंको अभिभूत कर दिया। उसके जातकम् संस्कारके उत्सवमें ब्रह्मा आदि सभी देवता देवर्षियों साथ बृहस्पतिके घर पधारे। चन्द्रमाने उस पुत्रको ग्रहण

१. यह ग्रन्थ बहुत बड़ा है। अग्निपुराण २८७-९१, बृहत्संहिता ६६, ९३, आकाशभैरवकल्प, शिवतत्त्वरत्नाकर, मानसोल्ल १।१०००-१४०० आदिमें इसका वर्णन है। वाल्मी० रामा० १।६। २४३० की तथा रघुवंश ५। ५० की टीकाओंमें भी इसके कुछ अंश निर्दिष्ट हैं।

२. इन्हींसे 'राजपूत' शब्द भी प्रचलित हुआ।

ततः सा लज्जिता तेषां न किंचिदवदत् तदा।

पुनः पुनस्तदा पृष्टा लज्जयन्ती वराङ्गना॥ ६

सोमस्येति चिरादाह ततोऽगृह्णाद् विधुः सुतम्।

बुध इत्यकरोन्नाम्ना प्रादाद् राज्यं च भूतले॥ ७

अभिषेकं ततः कृत्वा प्रधानमकरोद् विभुः ।

ग्रहसाम्यं प्रदायाथ ब्रह्मा ब्रह्मर्षिसंयुतः॥ ८

पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत।

इलोदरे च धर्मिष्ठं बुधः पुत्रमजीजनत्॥ ९

अश्वमेधशतं साग्रमकरोद् यः स्वतेजसा।

पुरूरवा इति ख्यातः सर्वलोकनमस्कृतः॥१०

हिमवच्छिखरे रम्ये समाराध्य जनार्दनम्।

लोकैश्वर्यमगाद् राजा सप्तद्वीपपतिस्तदा॥११

केशिप्रभृतयो दैत्याः कोटिशो येन दारिताः।

उर्वशी यस्य पत्नीत्वमगमद् रूपमोहिता ॥ १२

सप्तद्वीपा वसुमती सशैलवनकानना।

धर्मेण पालिता तेन सर्वलोकहितैषिणा॥१३

चामरग्राहिणी कीर्तिः सदा चैवाङ्गवाहिका।

विष्णोः प्रसादाद् देवेन्द्रो ददावर्धासनं तदा॥१४

धर्मार्थकामान् धर्मेण सममेवाभ्यपालयत्।

धर्मार्थकामा: संद्रष्टुमाजग्मुः कौतुकात् पुरा॥ १५

जिज्ञासवस्तच्चरितं कथं पश्यति नः समम्।

भक्त्या चक्रे ततस्तेषामर्घ्यपाद्यादिकं नृपः॥१६

आसनत्रयमानीय दिव्यं कनकभूषितम्।

निवेश्याथाकरोत् पूजामीषद्धर्मेऽधिकां पुनः॥१७

जग्मतुस्तेन कामार्थावतिकोपं नृपं प्रति।

अर्थः शापमदात् तस्मै लोभात् त्वं नाशमेष्यसि॥१८

कामोऽप्याह तवोन्मादो भविता गन्धमादने।

कुमारवनमाश्रित्य वियोगादुर्वशीभवात्॥१९

धर्मोऽप्याह चिरायुस्त्वं धार्मिकश्च भविष्यसि।

सन्ततिस्तव राजेन्द्र यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥ २०

शतशो वृद्धिमायातु न नाशं भुवि यास्यति।

इत्युक्त्वान्तर्दधुः सर्वे राजा राज्यं तदन्वभूत्॥२१

कर लिया और उसका नाम 'बुध' रखा। तत्पश्चात् सर्वव्यापी ब्रह्माने ब्रह्मर्षियोंके साथ उसे भूतलके राज्यपर अभिषिक्त कर सर्वप्रधान बना दिया और ग्रहोंकी समता प्रदान की। फिर सभी देवताओंके देखते-देखते ब्रह्मा वहीं अन्तर्हित हो गये। बुधने इलाके गर्भसे एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न किया। वह पुरूरवा नामसे विख्यात हुआ। वह सम्पूर्ण लोगोंद्वारा वन्दित हुआ। उन्होंने अपने प्रभावसे एक सौसे भी अधिक अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उस राजा पुरूरवाने हिमवान् पर्वतके रमणीय शिखरपर भगवान् विष्णुकी आराधना करके लोकोंका ऐश्वर्य प्राप्त किया तथा वे सातों द्वीपोंके अधिपति हुए। उन्होंने केशि आदि करोड़ों दैत्योंको विदीर्ण कर दिया। उनके रूपपर मुग्ध होकर उर्वशी उनकी पत्नी बन गयी। सम्पूर्ण लोकोंकी हित-कामनासे युक्त पुरूरवाने पर्वत, वन और काननोंसहित सातों द्वीपोंकी पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। कीर्ति तो (मानो) सदा उनकी चँवर धारण करनेवाली सेविका थी। भगवान् विष्णुकी कृपासे देवराज इन्द्रने उन्हें अपना अर्धासन प्रदान किया था॥१-१४॥

पुरूरवा धर्म, अर्थ और कामका समानरूपसे ही पालन करते थे। पूर्वकालमें एक बार धर्म, अर्थ और काम कुतूहलवश यह देखनेके लिये राजाके निकट आये कि यह हमलोगोंको समानरूपसे कैसे देखता है। उनके मनमें राजाके चरित्रको जाननेकी अभिलाषा थी। राजाने उन्हें भक्तिपूर्वक अर्ध्य-पाद्य आदि प्रदान किया। तत्पश्चात् स्वर्णजटित तीन दिव्य आसन लाकर उनपर उन्हें बैठाया और उनकी पूजा की । इसके बाद उन्होंने पुनः धर्मकी थोड़ी अधिक पूजा कर दी। इस कारण अर्थ और काम राजापर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। अर्थने राजाको शाप देते हुए कहा-'तुम लोभके कारण नष्ट हो जाओगे।' कामने भी कहा-'राजन्! गन्धमादन पर्वतपर स्थित कुमारवनमें तुम्हें उर्वशीजन्य वियोगसे उन्माद हो जायगा।' धर्मने कहा-'राजेन्द्र! तुम दीर्घायु और धार्मिक होगे। तुम्हारी संतति करोड़ों प्रकारसे वृद्धिको प्राप्त होती रहेगी और जबतक सूर्य, चन्द्रमा तथा तारागणकी सत्ता विद्यमान है, तबतक उनका भूतलपर विनाश नहीं होगा।' यों कहकर वे सभी अन्तर्हित हो गये और राजा राज्यका उपभोग करने लगे॥१५-२१ ॥

अहन्यहनि देवेन्द्रं द्रष्टुं याति स राजराट्।

कदाचिदारुह्य रथं दक्षिणाम्बरचारिणम्॥ २२

सार्धमर्केण सोऽपश्यन्नीयमानामथाम्बरे।

केशिना दानवेन्द्रेण चित्रलेखामथोर्वशीम्॥ २३

तं विनिर्जित्य समरे विविधायुधपाणिना।

बुधपुत्रेण वायव्यमस्त्रं मुक्त्वा यशोऽर्थिना ॥ २४

तथा शक्रोऽपि समरे येन चैवं विनिर्जितः।

मित्रत्वमगमद् देवैर्ददाविन्द्राय चोर्वशीम्॥ २५

ततः प्रभृति मित्रत्वमगमत् पाकशासनः।

सर्वलोकातिशायित्वं बलमू| यशः श्रियम्॥२६

प्रादाद् वज्रीति संतुष्टो गेयतां भरतेन च।

सा पुरूरवस: प्रीत्या गायन्ती चरितं महत्॥२७

लक्ष्मीस्वयंवरं नाम भरतेन प्रवर्तितम्।

मेनकामुर्वशी रम्भां नृत्यतेति तदादिशत्॥ २८

ननर्त सलयं तत्र लक्ष्मीरूपेण चोर्वशी।

सा पुरूरवसं दृष्ट्वा नृत्यन्ती कामपीडिता॥२९

विस्मृताभिनयं सर्वं यत् पुरा भरतोदितम्।

शशाप भरतः क्रोधाद् वियोगादस्य भूतले॥३०

पञ्चपञ्चाशदब्दानि लता सूक्ष्मा भविष्यसि।

पुरूरवाः पिशाचत्वं तत्रैवानुभविष्यति ॥ ३१

ततस्तमुर्वशी गत्वा भर्तारमकरोच्चिरम्।

शापान्ते भरतस्याथ उर्वशी बुधसूनुतः॥ ३२

अजीजनत् सुतानष्टौ नामतस्तान् निबोधत।

आयुर्दृढायुरश्वायुर्धनायुधृतिमान् वसुः॥३३

शुचिविद्यः शतायुश्च सर्वे दिव्यबलौजसः।

आयुषो नहुषः पुत्रो वृद्धशर्मा तथैव च॥३४

रजिर्दम्भो विपाप्मा च वीराः पञ्च महारथाः।

रजेः पुत्रशतं जज्ञे राजेयमिति विश्रुतम्॥ ३५

रजिराराधयामास नारायणमकल्मषम्।

तपसा तोषितो विष्णुर्वरान् प्रादान्महीपतेः॥३६

राजराजेश्वर पुरूरवा प्रतिदिन देवराज इन्द्रको देखनेके लिये (अमरावतीपुरी) जाया करते थे। एक बार वे सूर्यके साथ रथपर चढ़कर गगनतलके दक्षिण भागमें विचरण कर रहे थे, उसी समय उन्होंने दानवराज केशिद्वारा चित्रलेखा और उर्वशी नाम्नी अप्सराओंको आकाशमार्गसे ले जायी जाती हुई देखा।* तब विविधास्त्रधारी यशोऽभिलाषी बुध-नन्दन पुरूरवाने समरभूमिमें वायव्यास्त्रका प्रयोग करके उस दानवराज केशिको पराजित कर दिया, जिसने संग्राममें इन्द्रको भी परास्त कर दिया था। तत्पश्चात् राजाने उर्वशीको ले जाकर इन्द्रको समर्पित कर दिया, जिससे उनकी देवोंके साथ प्रगाढ़ मैत्री हो गयी। तभीसे इन्द्र भी राजाके मित्र हो गये। फिर इन्द्रने प्रसन्न होकर राजाको समस्त लोकोंमें श्रेष्ठता, अत्यधिक बल, पराक्रम, यश और सम्पत्ति प्रदान की। साथ ही भरत मुनिद्वारा उनके यशका गान भी कराया गया। उर्वशी पुरूरवाके प्रेमसे उनके महान् चरित्रका गान करती रहती थी। एक बार भरत मुनिद्वारा प्रवर्तित 'लक्ष्मीस्वयंवर' नाटकका अभिनय हुआ। उसमें इन्द्रने मेनका, उर्वशी और रम्भा- तीनोंको नाचनेका आदेश दिया। उनमें उर्वशी लक्ष्मीका रूप धारण करके लयपूर्वक नृत्य कर रही थी। (पर) नृत्यकालमें पुरूरवाको देखकर अनुरागसे सुधबुध खो जानेके कारण भरत मुनिने उसे पहले जो कुछ अभिनयका नियम बतलाया था, वह सारा-का-सारा उसे विस्मृत हो गया। तब भरत मुनिने क्रोधके वशीभूत हो उसे शाप देते हुए कहा-'तुम इसके वियोगसे भूतलपर पचपन वर्षतक सूक्ष्मलताके रूपमें उत्पन्न होकर रहोगी और पुरूरवा वहीं पिशाच-योनिका अनुभव करेगा ॥ २२-३१॥

तत्पश्चात् उर्वशीने पुरूरवाके पास जाकर चिरकालके लिये उनका पतिरूपमें वरण कर लिया। भरत मुनिद्वारा दिये गये शापकी निवृत्तिके पश्चात् उर्वशीने बुधपुत्र पुरूरवाके संयोगसे आठ पुत्रोंको जन्म दिया। उनके नाम थे-आयु, दृढायु, अश्वायु, धनायु, धृतिमान्, वसु, शुचिविद्य और शतायु। ये सभी दिव्य बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। इनमें आयुके नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, दम्भ और विपाप्मा नामक पाँच महारथी वीर पुत्र उत्पन्न हुए। रजिके सौ पुत्र पैदा हुए, जो राजेय नामसे विख्यात हुए। रजिने पापरहित भगवान् नारायणकी आराधना की। उनकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान् विष्णुने राजाको अनेकों वर

*कालिदासके विक्रमोर्वशीय नाटकका यही कथानक आधार है। यह पद्मपुराणमें भी है। वैसे पुरूरवावृत्त वेदोंसे लेकर प्रायः सभी पुराणोंमें चर्चित है, पर वह थोड़ा भिन्नरूपमें है।

देवासुरमनुष्याणामभूत् स विजयी तदा।

अथ देवासुरं युद्धमभूद् वर्षशतत्रयम्॥ ३७

प्रहादशक्रयोर्भीमं न कश्चिद् विजयी तयोः ।

ततो देवासुरैः पृष्टः प्राह देवश्चतुर्मुखः ।। ३८

अनयोर्विजयी कः स्याद्रजिर्यत्रेति सोऽब्रवीत्।

जयाय प्रार्थितो राजा सहायस्त्वं भवस्व नः॥३९

दैत्यैः प्राह यदि स्वामी वो भवामि ततस्त्वलम्।

नासुरैः प्रतिपन्नं तत् प्रतिपन्नं सुरैस्तथा॥४०

स्वामी भव त्वमस्माकं संग्रामे नाशय द्विषः ।

ततो विनाशिताः सर्वे येऽवध्या वज्रपाणिना॥४१

पुत्रत्वमगमत् तुष्टस्तस्येन्द्रः कर्मणा विभुः।

दत्त्वेन्द्राय तदा राज्यं जगाम तपसे रजिः॥४२

रजिपुत्रैस्तदाच्छिन्नं बलादिन्द्रस्य वैभवम्।

यज्ञभागं च राज्यं च तपोबलगुणान्वितैः॥ ४३

राज्याद् भ्रष्टस्तदा शक्रो रजिपुत्रैर्निपीडितः।

प्राह वाचस्पतिं दीन: पीडितोऽस्मि रजेः सुतैः॥ ४४

न यज्ञभागो राज्यं मे निर्जितश्च बृहस्पते।

राज्यलाभाय मे यत्नं विधत्स्व धिषणाधिप॥४५

ततो बृहस्पतिः शक्रमकरोद् बलदर्पितम्।

ग्रहशान्तिविधानेन पौष्टिकेन च कर्मणा॥४६

गत्वाथ मोहयामास रजिपुत्रान् बृहस्पतिः।

जिनधर्मे समास्थाय वेदबाह्यं स वेदवित्॥ ४७

वेदत्रयीपरिभ्रष्टांश्चकार धिषणाधिपः।

वेदबाह्यान् परिज्ञाय हेतुवादसमन्वितान्॥४८

जधान शक्रो वज्रेण सर्वान् धर्मबहिष्कृतान्।

नहुषस्य प्रवक्ष्यामि पुत्रान् सप्तैव धार्मिकान्॥४९

यतिर्ययाति: संयातिरुद्भवः पचिरेव च।

शर्यातिर्मेघजातिश्च सप्तैते वंशवर्धनाः॥५०

प्रदान किये, जिससे वे उस समय देवों, असुरों और मनुष्योंके विजेता हो गये। तदनन्तर प्रह्लाद और इन्द्रका भयंकर देवासुर-संग्राम छिड़ गया, जो तीन सौ वर्षोंतक चलता रहा; परंतु उन दोनोंमें कोई किसीपर विजय नहीं पा रहा था। तब देवताओं और असुरोंने मिलकर देवाधिदेव ब्रह्मासे पूछा-'ब्रह्मन्! इन दोनोंमें कौन (पक्ष) विजयी होगा?' यह सुनकर ब्रह्माने उत्तर दिया-"जिस पक्षमें राजा रजि रहेंगे (वही विजयी होगा)।' तब दैत्योंने राजाके पास जाकर अपनी विजयके लिये उनसे प्रार्थना की कि 'आप हमारे सहायक हो जायँ।' उनकी प्रार्थना सुनकर रजिने कहा-'यदि मैं आप लोगोंका स्वामी हो जाऊँ तभी उपयुक्त सहायता हो सकेगी।' परंतु असुरोंने उस प्रस्तावको स्वीकार नहीं किया, किंतु देवताओंने उसे स्वीकार करते हुए कहा-'राजन् ! आप हमलोगोंके स्वामी हो जायँ और संग्राममें शत्रुओंका संहार करें।' तदनन्तर राजा रजिने उन सभी असुरोंको मौतके घाट उतार दिया, जो इन्द्रद्वारा अवध्य थे। इस कर्मसे प्रसन्न होकर देवराज इन्द्र राजाके पुत्र बन गये। तब राजा रजि इन्द्रको राज्य समर्पित कर स्वयं तपस्या करनेके लिये चले गये॥३२-४२॥

तत्पश्चात् तपस्या, बल और गुणोंसे सम्पन्न रजिपुत्रोंने इन्द्रके वैभव, यज्ञभाग और राज्यको बलपूर्वक छीन लिया। इस प्रकार रजि-पुत्रोंद्वारा सताये गये एवं राज्यसे भ्रष्ट हुए दीन-दुःखी इन्द्र बृहस्पतिके पास जाकर बोले-'गुरुदेव! मैं रजिके पुत्रोंद्वारा सताया जा रहा हूँ, मुझे अब यज्ञमें भाग नहीं मिलता तथा मेरा राज्य जीत लिया गया, अत: धिषणाधिप! (बृहस्पते) पुनः मेरी राज्य-प्राप्तिके लिये किसी उपायका विधान कीजिये।' तब बृहस्पतिने ग्रह-शान्तिके विधानसे तथा पौष्टिक कर्मद्वारा इन्द्रको बलसम्पन्न बना दिया और रजि-पुत्रोंके पास जाकर उन्हें मोहमें डाल दिया। उन वेदज्ञ बृहस्पतिने वेदोंद्वारा बहिष्कृत जिनधर्मका आश्रय लेकर उन्हें वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद)-से परिभ्रष्ट कर दिया। तदुपरान्त इन्द्रने उन्हें हेतुवाद (तर्कवाद-नास्तिक्य)-से समन्वित और वेदबाह्य जानकर अपने वज्रसे उन सभी धर्मबहिष्कृत रजि-पुत्रोंका संहार कर डाला। अब मैं नहुषके सात धार्मिक पुत्रोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनके नाम हैं-यति, ययाति, संयाति, उद्भव, पाचि, शर्याति और मेघजाति। ये सातों वंश-विस्तारक थे॥४३-५० ॥

यतिः कुमारभावेऽपि योगी वैखानसोऽभवत्।

ययातिश्चाकरोद् राज्यं धर्मैकशरण: सदा॥५१

शर्मिष्ठा तस्य भार्याभूद् दुहिता वृषपर्वणः ।

भार्गवस्यात्मजा तद्वदेवयानी च सुव्रता॥५२

ययाते: पञ्च दायादास्तान् प्रवक्ष्यामि नामतः।

देवयानी यदुं पुत्रं तुर्वसुं चाप्यजीजनत्॥५३

तथा द्रुह्युमनुं पूरुं शर्मिष्ठाजनयत् सुतान्।

यदुः पूरुश्चाभवतां तेषां वंशविवर्धनौ॥५४

ययाति हुषश्चासीद् राजा सत्यपराक्रमः ।

पालयामास स महीभीजे च विधिवन्मखैः॥५५

अतिभक्त्या पितॄनर्च्य देवांश्च प्रयतः सदा।

अथाजयत् प्रजाः सर्वा ययातिरपराजितः॥५६

स शाश्वती: समा राजा प्रजा धर्मेण पालयन्।

जरामार्छन्महाघोरां नाहुषो रूपनाशिनीम्॥५७

जराभिभूतः पुत्रान् स राजा वचनमब्रवीत्।

यदुं पूरुं तुर्वसुं च द्रुह्यं चानुं च पार्थिवः ।। ५८

यौवनेन चलान् कामान् युवा युवतिभिः सह।

विहर्तुमहमिच्छामि सहायं कुरुतात्मजाः॥५९

तं पुत्रो देवयानेयः पूर्वजो यदुरब्रवीत्।

साहाय्यं भवतः कार्यमस्माभियौवनेन किम्॥६०

ययातिरब्रवीत् पुत्रा जरा मे प्रतिगृह्यताम्।

यौवनेनाथ भवतां चरेयं विषयानहम्॥६१

यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्चोशनसो मुनेः ।

कामार्थः परिहीनो मेऽतृप्तोऽहं तेन पुत्रकाः॥६२

स्वकीयेन शरीरेण जरामेनां प्रशास्तु वः।

अहं तन्वाभिनवया युवा कामानवाप्नुयाम्॥६३

न तेऽस्य प्रत्यगृह्णन्त यदुप्रभृतयो जराम्।

चतुरस्तान् स राजर्षिरशपच्चेति नः श्रुतम्॥६४

तमब्रवीत् ततः पूरुः कनीयान् सत्यविक्रमः।

जरां मां देहि नवया तन्वा मे यौवनात् सुखी।। ६५

 (इनमें सबसे) ज्येष्ठ यति जब अपनी कुमारावस्थामें ही वैखानसका रूप धारण करके योगी हो गये, तब दूसरे पुत्र ययाति सदा एकमात्र धर्मका ही आश्रय लेकर राज्यभार संभालने लगे। उस समय दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा तथा शुक्राचार्यकी कन्या व्रतपरायणा देवयानी- ये दोनों ययातिकी पत्नियाँ हुईं। इनके गर्भसे राजा ययातिके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए थे, जिनका मैं नाम-निर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ। देवयानीने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया तथा शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु और पूरु नामक तीन पुत्रोंको पैदा किया। इनमें यदु और पूरु-ये दोनों वंशका विस्तार करनेवाले हुए। नहुषनन्दन राजा ययाति सत्यपराक्रमी एवं अजेय थे। उन्होंने (धर्मपूर्वक) पृथ्वीका पालन किया और विधिपूर्वक अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान किया तथा जितेन्द्रिय होकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक देवों और पितरोंकी अर्चना करके सारी प्रजाओंपर अधिकार जमा लिया। इस प्रकार नहुष-पुत्र राजा ययाति अनेकों वर्षोंतक धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते रहे। इसी बीच वे रूपको विकृत कर देनेवाली महान् भयंकर वृद्धावस्थासे ग्रस्त हो गये। बुढ़ापाके वशीभूत हुए राजा ययातिने अपने यदु, पूरु, तुर्वसु, द्रुघु और अनु नामक पुत्रोंसे ऐसी बात कही-'पुत्रो! यद्यपि युवावस्थाके साथ-साथ मेरी कामनाएँ भी चली गयीं, तथापि मैं पुनः युवा होकर युवतियोंके साथ विहार करना चाहता हूँ, इस विषयमें तुमलोग मेरी सहायता करो॥५१-५९ ॥

यह सुनकर देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुने राजासे कहा-'पिताजी! हमलोगोंको अपनी युवावस्थाद्वारा आपकी कौन-सी सहायता करनी है।' तब ययातिने अपने पुत्रोंसे कहा- 'तुमलोग मेरा बुढ़ापाले लेना, तत्पश्चात् मैं तुमलोगोंकी जवानीसे विषयोंका उपभोग करूँगा। पुत्रो! दीर्घकालव्यापी अनेकों यज्ञोंके अनुष्ठान तथा महर्षि शुक्राचार्यके शापसे मेरे काम और अर्थ नष्ट हो गये हैं, इसी कारण मैं उनसे तृप्त नहीं हो सका हूँ। इसलिये तुमलोगोंमेंसे कोई अपने शरीरद्वारा इस बुढ़ापेको स्वीकार करे और मैं उसके अभिनव शरीरकी प्राप्तिसे युवा होकर विषयोंका उपभोग करूँ।' परंतु जब यदु आदि चार पुत्रोंने पिताकी वृद्धावस्थाको ग्रहण करना स्वीकार नहीं किया, तब राजर्षि ययातिने उन्हें शाप दे दिया ऐसा हमलोगोंने सुन रखा है। तत्पश्चात् सबसे कनिष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी पूरुने राजासे कहा-'पिताजी! आप अपना बुढ़ापा मुझे दे दीजिये और मेरे नूतन शरीरकी प्राप्तिसे युवा होकर सुखोंका उपभोग कीजिये।

अहं जरां तवादाय राज्ये स्थास्यामि चाज्ञया।

एवमुक्तः स राजर्षिस्तपोवीर्यसमाश्रयात्॥६६

संस्थापयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि।

पौरवेणाथ वयसा राजा यौवनमास्थितः ।। ६७

ययातेश्चाथ वयसा राज्यं पूरुरकारयत्।

ततो वर्षसहस्त्रान्ते ययातिरपराजितः॥६८

अतृप्त इव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह।

त्वया दायादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः॥६९

पौरवो वंश इत्येष ख्यातिं लोके गमिष्यति।

तत: स नृपशार्दूल: पूरुं राज्येऽभिषिच्य च॥७०

कालेन महता पश्चात् कालधर्ममुपेयिवान्।

पूरुवंशं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः।

यत्र ते भारता जाता भरतान्वयवर्धनाः॥७१

मैं आपकी वृद्धावस्था स्वीकार करके आपके आज्ञानुसार राजकार्य सँभालूँगा।' पूरुके यों कहनेपर राजर्षि ययातिने अपने तपोबलका आश्रय लेकर उस महात्मा पुत्र पूरुके शरीरमें अपने बुढ़ापेको स्थापित किया और वे स्वयं पूरुकी युवावस्थाको लेकर तरुण हो गये। तदनन्तर ययातिकी वृद्धावस्थासे युक्त हुए पूरु राजकाजका संचालन करने लगे। इस प्रकार एक सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर भी अजेय ययाति कामोपभोगसे अतृप्त-से ही बने रहे। तब उन्होंने अपने पुत्र पूरुसे कहा-'बेटा! अकेले तुम्हींसेमैं पुत्रवान् हूँ और तुम्हीं मेरे वंशविस्तारक पुत्र हो। आजसे यह वंश पूरुवंशके नामसे लोकमें विख्यात होगा। तदनन्तर राजसिंह ययाति पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वयं उससे उपराम हो गये और बहुत समय बीतनेके पश्चात् कालधर्म-मृत्युको प्राप्त हो गये। श्रेष्ठ ऋषियो! अब मैं जिस वंशमें भरत-वंशकी वृद्धि करनेवाले भारत नामसे प्रसिद्ध नरेश हो चुके हैं, उस पूरुवंशका वर्णन करने जा रहा हूँ, आपलोग समाहितचित्त होकर श्रवण कीजिये॥६०-७१॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२४॥