मत्स्य महा पुराण
शिवलिङ्गके निर्माणकी विधि
सूत उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि लिङ्गलक्षणमुत्तमम्।
सुस्निग्धं च सुवर्णं च लिङ्गं कुर्याद् विचक्षणः॥ १
प्रासादस्य प्रमाणेन लिङ्गमानं विधीयते।
लिङ्गमानेन वा विद्यात् प्रासादं शुभलक्षणम्॥ २
चतुरस्र समे गर्ने ब्रह्मसूत्रं निपातयेत्।
वामेन ब्रह्मसूत्रस्य अर्चा वा लिङ्गमेव च॥ ३
प्रागुत्तरेण लीनं तु दक्षिणापरमाश्रितम्।
पुरस्यापरदिग्भागे पूर्वद्वारं प्रकल्पयेत्॥ ४
पूर्वेण चापरं द्वारं माहेन्द्रं दक्षिणोत्तरम्।
द्वारं विभज्य पूर्वं तु एकविंशतिभागिकम्॥ ५
ततो मध्यगतं ज्ञात्वा ब्रह्मसूत्रं प्रकल्पयेत्।
तस्यार्धं तु त्रिधा कृत्वा भागं चोत्तरतस्त्यजेत्॥ ६
एवं दक्षिणतस्त्यक्त्वा ब्रह्मस्थानं प्रकल्पयेत्।
भागार्धेन तु यल्लिङ्गं कार्यं तदिह शस्यते॥ ७
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! अब मैं लिङ्गके उत्तम लक्षणका वर्णन कर रहा हूँ। चतुर पुरुष अत्यन्त चिकने एवं श्रेष्ठ (श्वेत) रंगके शिवलिङ्गका निर्माण करे। मन्दिरके प्रमाणके अनुसार ही शिवलिङ्गका प्रमाण बतलाया गया है। अथवा शिवलिङ्गके प्रमाणानुसार शिव-मन्दिरका निर्माण शुभ जानना चाहिये। सर्वप्रथम चौकोर एवं समतल गर्तमें ब्रह्मसूत्र गिराना चाहिये। ब्रह्मसूत्रकी बायीं ओर अर्चा या लिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। वहाँ पूर्वोत्तर या दक्षिणपूर्वकी ओर पूर्वद्वार बनाना चाहिये। वह द्वार कुछ दक्षिणाश्रित या ईशानमें लीन रहना चाहिये। पूर्वका यह द्वार माहेन्द्रद्वार कहलाता है। प्रथमत: पूर्वद्वारको इक्कीस भागोंमें विभक्तकर मध्य भागमें ब्रह्मसूत्रकी कल्पना करनी चाहिये। इसके अर्धभागको तीन भागोंमें विभक्तकर उत्तरकी ओर तथा दक्षिणकी ओर एक-एक भाग छोड़कर ब्रह्मस्थानकी कल्पना करनी चाहिये। उस अर्धभागमें लिङ्गकी स्थापना प्रशस्त मानी गयी है।
पञ्चभागविभक्तेषु त्रिभागो ज्येष्ठ उच्यते।
भाजिते नवधा गर्भे मध्यमं पाञ्चभागिकम्॥ ८
एकस्मिन्नेव नवधा गर्भे लिङ्गानि कारयेत्।
समसूत्रं विभज्याथ नवधा गर्भभाजितम्॥ ९
ज्येष्ठमधु कनीयोऽर्धं तथा मध्यममध्यमम्।
एवं गर्भः समाख्यातस्त्रिभिर्भागैर्विभाजयेत्॥१०
ज्येष्ठं तु त्रिविधं ज्ञेयं मध्यमं त्रिविधं तथा।
कनीयस्त्रिविधं तद्वल्लिङ्गभेदा नवैव तु॥११
नाभ्यर्धमष्टभागेन विभज्याथ समं बुधैः।
भागत्रयं परित्यज्य विष्कम्भं चतुरस्रकम्॥१२
अष्टास्त्रं मध्यमं ज्ञेयं भाग लिङ्गस्य वै ध्रुवम्।
विकीर्णेचेत्ततो गृह्य कोणाभ्यां लाञ्छयेद्बुधः॥१३
अष्टास्त्रं कारयेत् तद्वदूर्ध्वमप्येवमेव तु।
षोडशास्त्रीकृतं पश्चाद् वर्तुलं कारयेत् ततः॥१४
उसे पाँच भागोंमें विभक्त कर उनमें तीन भागोंको ज्येष्ठ कहा जाता है। भीतरी मानको नौ भागोंमें विभक्त कर उसके पञ्चम भागको मध्यम कहते हैं। गर्भके एक ही भागको नौ भागमें विभक्तकर उनमें लिङ्गोंको स्थापित करे। इसी समसूत्रवाले गर्भ-भागको नौ भागमें विभक्त करे। उनमें आधा ज्येष्ठ, आधा कनिष्ठ और मध्यभाग मध्यम कहलाता है। इस प्रकार गर्भको तीन भागोंमें विभक्त करना चाहिये। फिर उनमें तीन ज्येष्ठ, तीन मध्यम और तीन कनिष्ठ भेद होते हैं, जिससे लिङ्गोंके कुल नौ भेद होते हैं * ॥१-११॥
बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि नाभिके आधे भागके बराबर आठ भाग करे, फिर उनमें तीन भागोंको छोड़कर चौकोर विष्कम्भ बनाये। लिङ्गके मध्यभागमें आठ कोण रहना चाहिये। तदनन्तर बुद्धिमानोंको बचे हुए भागको दो कोणोंसे लाञ्छित करना चाहिये। उसी प्रकार ऊपरका भाग भी आठ कोणोंवाला बनाये। सोलह कोणोंवाले भागको गोलाकारमें परिणत कर दे।
* श्रीविद्यार्णवतन्त्रके ११वें श्वासमें लिङ्ग-निर्माणको साधारण विधि इस प्रकार दी गयी है- अपनी रुचिके अनुसार लिङ्ग कल्पित करके उसके मस्तकका विस्तार उतना ही रखे, जितनी पूजित लिङ्गभागकी ऊँचाई हो। शैवागमका भी वचन है-'लिङ्गमस्तकविस्तारो लिङ्गोच्छ्रायसमो भवेत्।' लिङ्गके मस्तकका विस्तार जितना हो, उससे तिगुने सूत्रसे वेष्टित होने योग्य लिङ्गकी स्थूलता (मोटाई) रखे। शिवलिङ्गकी जो स्थूलता या मोटाई है, उसके सूत्रके बराबर पीठका विस्तार रखे। तत्पश्चात् पूज्य लिङ्गका जो उच्च अंश है, उससे दुगुनी ऊँचाईसे युक्त वृत्ताकार या चतुरस्र पीठ बनावे। पीठके मध्यभागमें लिङ्गके स्थूलतामात्रसूचक नाहसूत्रसे द्विगुण सूत्रसे वेष्टित होने योग्य स्थूल कण्ठका निर्माण करे। कण्ठके ऊपर और नीचे समभागसे तीन या दो मेखलाओंकी रचना करे। तदनन्तर लिङ्गके मस्तकका जो विस्तार है, उसको छ: भागोंमें विभक्त करे। उनमेंसे एक अंशके मानके अनुसार पीठके ऊपरी भागमें सबसे बाहरी अंशके द्वारा मेखला बनावे। उसके भीतर उसी मानके अनुसार उससे संलग्न अंशके द्वारा खात (गर्त)- की रचना करे। पीठसे बाह्यभागमें लिङ्गके समान ही बड़ी अथवा पीठमानके आधे मानके बराबर बड़ी, मूलदेशमें मानके समान विस्तारवाली और अग्रभागमें उसके आधे मानके तुल्य विस्तारवाली नाली बनावे। इसीको 'प्रणाल' कहते हैं। प्रणालके मध्यमें मूलसे अग्रभागपर्यन्त जलमार्ग बनावे। प्रणालका जो विस्तार है, उसके एक तिहाई विस्तारवाले खातरूप जलमार्गसे युक्त पीठसदृश मेखलायुक्त प्रणाल बनाना चाहिये। यह स्फटिक आदि रत्नविशेषों अथवा पाषाण आदिके द्वारा शिवलिङ्ग-निर्माणको साधारण विधि है। तथा-
लिङ्गमस्तकविस्तारं पूज्यभागसमं नयेत्। "लक्षणमाचरेत्॥ (१-८)
'समराङ्गणसूत्रधार' में कहा है कि दो-दो अंशकी वृद्धि करते हुए तीन हाथकी लंबाईतक पहुँचते-पहुँचते नौ लिङ्ग निर्मित हो सकते हैं-'व्यंशवृद्धा नवैवं स्युराहत्तत्रितयावधेः।' सूर्यप्रोक्त 'अंशुमद्भेदागम' तथा अग्निपुराण अध्याय ५४के २८वें श्लोकमें एवं विश्वकर्माके 'शिल्पप्रकाश' ग्रन्थमें लिङ्ग-भेदोंकी परिगणना की गयी है और सब मिलाकर चौदह हजार चौदह सौ भेद कहे गये हैं। विश्वकर्माके ही एक-दूसरे शास्त्र 'अपराजित-पृच्छा' के अवलोकनसे इन भेदोंपर विशेष प्रकाश पड़ता है। उसके अनुसार समस्त लिङ्गभेद १४४२० होते हैं। इसका प्रकार बताया जाता है-प्रस्तरमय लिङ्ग कम-से-कम एक हाथका होता है, उससे कम नहीं। उसका अन्तिम आयाम नौ हाथका बताया गया है। इस प्रकार एक हाथसे लेकर नौ हाथतकके बनाये जायँ तो उनकी संख्या नौ होती है। इनका प्रस्तार यों समझना चाहिये-
एक हाथसे तीन हाथतकके शिवलिङ्ग 'कनिष्ठ' कहे गये हैं। चारसे छः हाथतकके 'मध्यम' माने गये हैं और सातसे नौ हाथतकके 'उत्तम' या 'ज्येष्ठ' कहे गये हैं। इन तीनोंके प्रमाणमें पादवृद्धि करनेसे कुल ३३ शिवलिङ्ग होते हैं। यथा- एक हाथ', सवा हाथ, डेढ़ हाथ', पौने दो हाथ', दो हाथ', सवा दो हाथ', ढाई हाथ', पौने तीन हाथ', तीन हाथी, सवा तीन
आयामं तस्य देवस्य नाभ्यां वै कुण्डलीकृतम्।
माहेश्वरं त्रिभागं तु ऊर्ध्ववृत्तं त्ववस्थितम्॥१५
अधस्ताद् ब्रह्मभागस्तु चतुरस्रो विधीयते।
अष्टाग्रो वैष्णवो भागो मध्यस्तस्य उदाहृतः॥१६
एवं प्रमाणसंयुक्तं लिङ्गं वृद्धिप्रदं भवेत्।
तथान्यदपि वक्ष्यामि गर्भमानं प्रमाणतः॥१७
गर्भमानप्रमाणेन यल्लिङ्गमुचितं भवेत्।
चतुर्धा तद् विभज्याथ विष्कम्भं तु प्रकल्पयेत्॥१८
देवतायतनं सूत्रं भागत्रयविकल्पितम्।
अधस्ताच्चतुरस्त्रं तु अष्टास्त्रं मध्यभागतः॥१९
पूज्यभागस्ततोऽर्धं तु नाभिभागस्तथोच्यते।
आयामे यद् भवेत् सूत्रं नाहस्य चतुरस्रके॥२०
चतुरस्त्रं परित्यज्य अष्टास्त्रस्य तु यद् भवेत्।
तस्याप्यर्धं परित्यज्य ततो वृत्तं तु कारयेत्॥२१
शिरः प्रदक्षिणं तस्य संक्षिप्तं मूलतो न्यसेत्।
भ्रष्ठपूजं भवेल्लिङ्गमधस्ताद् विपुलं च यत्॥ २२
उस देवताकी नाभिमें लम्बाई कुण्डलीकृत माहेश्वर भागका होगी। लिङ्गमें भाग ऊर्ध्व-वृत्तरूपसे स्थित त्रिभाग होगा। उसके नीचे ब्रह्मभाग होगा, जो चौकोर बनाया जाता है। मध्यभाग, जो आठ कोणोंवाला होता है, वैष्णवभाग कहा जाता है। इन प्रमाणोंसे निर्मित लिङ्ग समृद्धि देनेवाला होता है। अब गर्भामानके प्रमाणसे बननेवाले लिङ्गका वर्णन कर रहा हूँ। जो लिङ्ग गर्भमानके प्रमाणसे निर्मित होता है, वह उचित होता है। उसे चार भागोंमें विभक्तकर विष्कम्भकी कल्पना करे। देवायतनको सूत्रद्वारा नापकर उसे तीन भागोंमें विभक्त करे। जिसमें नीचेका भाग चार कोणवाला और मध्यभाग आठ कोणवाला हो। इसके ऊपर पूज्यभाग और नाभिभाग कहा जाता है। लम्बाईका विस्तार चौकोर प्रमाणका होना चाहिये। उस चौकोर भागको छोड़कर आठ कोणवाला जो भाग हो, उसके आधे भागको छोड़कर वृत्ताकार बनाना चाहिये॥१२-२१ ॥
उसके मङ्गलमय सिरको मूलदेशसे बिलकुल सीधे रूपमें स्थापित करे। जिस लिङ्गके नीचेका भाग बहुत
*हाथ', साढ़े तीन हाथ", पौने चार हाथार, चार हाथ", सवा चार हाथ", साढ़े चार हाथ५, पौने पाँच हाथण, पाँच हाथ, सवा पाँच हाथा, साढ़े पाँच हाथ, पौने छ: हाथ, छ: हाथ", सवा छ: हाथ, साढ़े छः हाथ", पौने सात हाथ", सात हाथ, सवा सात हाथरे, साढ़े सात हाथ, पौने आठ हाथ', आठ हाथ, सवा आठ हाथ", साढ़े आठ हाथ", पौने नौ हाथ, नौ हाथ"। इन तैंतीसोंके नाम विश्वकर्माने क्रमशः इस प्रकार बताये हैं-१. भव, २. भवोद्भव, ३. भाव, ४. संसारभयनाशन, ५. पाशयुक्त, ६. महातेज, ७. महादेव, ८. परात्पर, ९. ईश्वर, १०. शेखर, ११. शिव, १२. शान्त, १३. मनोहादक, १४. रुद्रतेज, १५. सदात्मक (सद्योजात), १६. वामदेव, १७. अघोर, १८. तत्पुरुष, १९. ईशान, २०. मृत्युंजय, २१. विजय, २२. किरणाक्ष, २३. अघोरास्त्र, २४. श्रीकण्ठ, २५. पुण्यवर्धन, २६. पुण्डरीक, २७. सुवक्त्र, २८. उमातेजः, २९. विश्वेश्वर, ३०. त्रिनेत्र, ३१. त्र्यम्बक, ३२. घोर, ३३. महाकाल।
पूर्वोक्त क्रमसे पादार्धवृद्धि करनेपर
६५ तक संख्या पहुंचेगी।
" " दो अङ्गुल वृद्धि करनेपर
९७ " " "
" " एक " " "
१९३ " " "
" " अर्धाङ्गुल
३८५ " " "
" " अङ्गुलका चतुर्थांश बढ़ानेपर
७६९ " " "
" " एक-एक मूंगके मानकी वृद्धि करनेपर
१४४२ " " "
" " मुद्ग-प्रमाण लिङ्गोंमें प्रत्येकके दस भेद करनेपर
१४४२० पहुँचेगी।
'देवमूर्तिप्रकरणम्' नामक ग्रन्थके छठे अध्यायमें शिवजीकी चौबीस मूर्तियाँ बतायी गयी हैं। उनके लिङ्ग धातु, रत्ल, काष्ठ और शिलाके बनाये जाते हैं। इनमें नागरलिङ्ग, द्राविणलिङ्ग, वेशरलिङ्ग, स्फाटिकलिङ्ग तथा बाणलिङ्गका विशेष महत्त्व है। वहाँ इन लिङ्गोंके पृथक्-पृथक् नाम और निर्माणकी विधि दी गयी है। साथ ही प्रासाद, पीठिका और प्रणाल आदिका विशेषरूपसे निरूपण किया गया है। इस विषयपर सर्वाधिक विस्तार 'अंशुमद्भेदागम' (काश्यपशिल्प) तथा 'वीरमित्रोदय लक्षणप्रकाश' में है। विशेष जानकारीके लिये उन्हीं प्रकरणोंको देखना चाहिये।
शिरसा च सदा निम्नं मनोज्ञं लक्षणान्वितम्।
सौम्यं तु दृश्यते यत्तु लिङ्गं तद् वृद्धिदं भवेत्॥ २३
अथ मूले च मध्ये तु प्रमाणे सर्वतः समम्।
एवंविधं तु यल्लिङ्गं भवेत् तत् सार्वकामिकम्॥ २४
अन्यथा यद् भवेल्लिङ्गं तदसत् सम्प्रचक्षते।
एवं रत्नमयं कुर्यात् स्फाटिकं पार्थिवं तथा।
शुभं दारुमयं चापि यद् वा मनसि रोचते॥२५
चौड़ा होता है, वह पूजनीय नहीं रह जाता। जो लिङ्ग सिरकी ओरसे सदा निम्न, मनोहर, उत्तम लक्षणोंसे युक्त तथा सौम्य दिखायी पड़ता है, वह समृद्धिको देनेवाला होता है। जो लिङ्ग मूल तथा मध्यभागमें एक समान रहता है, वह सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला होता है। जो लिङ्ग इन उपर्युक्त लक्षणोंसे भिन्न होते हैं, वे असत् कहे जाते हैं अर्थात् वे अपूजनीय लिङ्ग हैं। इस प्रकार ऊपर बताये गये प्रमाणोंके अनुसार रत्न, स्फटिक, मिट्टी अथवा शुभ काष्ठका लिङ्ग अपनी रुचिके अनुकूल स्थापित करना चाहिये॥ २२-२५॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे देवतार्चानुकीर्तनं नाम त्रिषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवतार्चानुकीर्तन नामक दो सौ तिरसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६३ ।।
Summary of chapter 265 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the preliminary purification and consecration rites known as Adhivāsana performed for newly sculpted icons before permanent temple installation. Bhagavān Matsya outlines the sequence of immersing the divine image sequentially in water known as Jalādhivāsa, in grain heaps known as Dhānyādhivāsa, in aromatic herbs, ghee, milk, and on a decorated bed known as Śayyādhivāsa. These preliminary immersion rituals remove physical impurities accumulated during sculpting, soothe the material substance, and prepare the icon to receive subtle divine consciousness.