मत्स्य महा पुराण
तालाब, बगीचा, कुआँ, बावली, पुष्करिणी तथा देवमन्दिरकी प्रतिष्ठा आदिका विधान
सूत उवाच
जलाशयगतं विष्णुमुवाच रविनन्दनः।
तडागारामकूपानां वापीषु नलिनीषु च॥१
विधिं पृच्छामि देवेश देवतायतनेषु च।
के तत्र चत्विजो नाथ वेदी वा कीदृशी भवेत्।। २
दक्षिणावलयः कालः स्थानमाचार्य एव च।
द्रव्याणि कानि शस्तानि सर्वमाचक्ष्व तत्त्वतः॥३
मत्स्य उवाच
शृणु राजन् महाबाहो तडागादिषु यो विधिः।
पुराणेष्वितिहासोऽयं पठ्यते वेदवादिभिः॥ ४
प्राप्य पक्षं शुभं शुक्लं सम्प्राप्ते चोत्तरायणे।
पुण्येऽह्नि विप्रकथिते कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्॥ ५
प्रागुदक्प्रवणे देशे तडागस्य समीपतः।
चतुर्हस्तां शुभां वेदी चतुरस्रां चतुर्मुखाम्॥ ६
तथा षोडशहस्त: स्यान्मण्डपश्च चतुर्मुखः।
वेद्याश्च परितो गर्ता रत्निमात्रास्त्रिमेखलाः॥ ७
नव सप्ताथ वा पञ्च नातिरिक्ता नृपात्मज।
वितस्तिमात्रा योनिः स्यात् षट्सप्ताङ्गुलिविस्तृता॥ ८
गर्ताश्च हस्तमात्राः स्युस्त्रिपर्वोच्छ्रितमेखलाः।
सर्वतस्तु सवर्णाः स्युः पताकाध्वजसंयुताः॥ ९
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! सूर्यपुत्र मनुने जलाशयके भीतर अवस्थित मत्स्यरूपधारी भगवान् विष्णुसे पूछा- 'देवेश! अब मैं आपसे तालाब, बगीचा, कुआँ, बावली, पुष्करिणी तथा देवमन्दिरकी प्रतिष्ठा आदिकी विधि पूछ रहा हूँ। नाथ! इन कार्यों में ऋत्विज् कैसे होने चाहिये? वेदी किस प्रकारकी बनती है? दक्षिणाका प्रमाण कितना होता है? समय कौन-सा उत्तम होता है? स्थान कैसा होना चाहिये? आचार्य किन-किन गुणोंसे युक्त हों तथा कौन-से पदार्थ प्रशस्त माने गये हैं-यह सब हमें यथार्थरूपसे बतलाइये॥१-३॥
मत्स्यभगवान्ने कहा-महाबाहु राजन्! सुनो; तालाब आदिकी प्रतिष्ठाका जो विधान है, उसका वेदवक्ताओंने पुराणोंमें इस रूपमें वर्णन किया है। उत्तरायण आनेपर शुभ शुक्लपक्षमें ब्राह्मणद्वारा कोई पवित्र दिन निश्चित करा ले। उस दिन ब्राह्मणोंका वरण करे और तालाबके समीप, जहाँकी भूमि पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू हो, चार हाथ लम्बी और उतनी ही चौड़ी चौकोर सुन्दर वेदी बनाये। वेदी सब ओर समतल हो और उसका मुख चारों दिशाओंमें हो। फिर सोलह हाथका मण्डप तैयारकराये, जिसके चारों ओर एक-एक दरवाजा हो। वेदीके सब ओर कुण्डोंका निर्माण कराये। नृप-नन्दन! कुण्डोंकी संख्या नौ, सात या पाँच होनी चाहिये, इससे कम-बेशी नहीं। कुण्डोंकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक अरनि की हो तथा वे सभी तीन-तीन मेखलाओंसे सुशोभित हों। उनमें यथास्थान योनि और मुख भी बने होने चाहिये। योनिकी लम्बाई एक बित्ता और चौड़ाई छ:-सात अङ्गुलकी हो तथा कुण्डकी गहराई एक हाथ, मेखलाएँ तीन पर्व ऊँची होनी चाहिये। ये चारों ओरसे एक समान-एक रंगकी बनी हों। सबके समीप ध्वजा और पताकाएँ लगायी जायें।
१. इसकी पूरी विस्तृत विधि भविष्यपुराण, मध्यमपर्व भाग ३, अध्याय २०, (अग्निपुराण ६४) एवं प्रतिष्ठामहोदधि, प्रतिष्ठाकल्पलता, प्रतिष्ठातत्त्वादर्श आदिमें है। पद्म सृष्टिखं० २७ की विधि तो ठीक इसी प्रकार है। भविष्यपुराणमें प्रायः १ हजार श्लोक हैं। इस अध्यायमें कुण्ड-मण्डप-वेदी-निर्माणसहित यज्ञकी भी संक्षिप्त विधि आ गयी है। इसकी विस्तृत जानकारीके लिये कुण्ड-मण्डप-सिद्धि तथा आह्निकसूत्रावली आदि द्रष्टव्य हैं।
२. कोहनीसे लेकर मुट्ठी बँधे हुए हाथतककी लम्बाईको 'रलि' या अरनि कहते हैं।
३. अङ्गुलियोंके पोरको 'पर्व' कहते हैं।
अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षवटशाखाकृतानि तु।
मण्डपस्य प्रतिदिशं द्वाराण्येतानि कारयेत्॥१०
शुभास्तत्राष्ट होतारो द्वारपालास्तथाष्ट वै।
अष्टौ तु जापकाः कार्या ब्राह्मणा वेदपारगाः॥११
सर्वलक्षणसम्पूर्णो मन्त्रविद् विजितेन्द्रियः।
कुलशीलसमायुक्तः पुरोधाः स्याद् द्विजोत्तमः ॥१२
प्रतिगर्तेषु कलशा यज्ञोपकरणानि च।
व्यजनं चामरे शुभ्रे ताम्रपात्रे सुविस्तृते॥१३
ततस्त्वनेकवर्णाः स्युश्चरवः प्रतिदैवतम्।
आचार्यः प्रक्षिपेद् भूमावनुमन्त्र्य विचक्षणः॥१४
त्र्यरत्निमात्रो यूपः स्यात् क्षीरवृक्षविनिर्मितः ।
यजमानप्रमाणो वा संस्थाप्यो भूतिमिच्छता॥१५
हेमालङ्कारिण: कार्याः पञ्चविंशति ऋत्विजः ।
कुण्डलानि च हैमानि केयूरकटकानि च॥१६
तथाङ्गुल्यः पवित्राणि वासांसि विविधानि च।
पूजयेत् तु समं सर्वानाचार्यों द्विगुणं पुनः।
दद्याच्छयनसंयुक्तमात्मनश्चापि यत् प्रियम्॥१७
सौवर्णी कूर्ममकरौ राजतौ मत्स्यदुण्डुभौ।
ताम्रौ कुलीरमण्डूका वायसः शिशुमारकः।
एवमासाद्य तत् सर्वमादावेव विशाम्पते॥१८
शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः ।
सर्वोषध्युदकैस्तत्र स्नापितो वेदपारगैः॥१९
यजमानः सपत्नीकः पुत्रपौत्रसमन्वितः।
पश्चिमं द्वारमासाद्य प्रविशेद् यागमण्डपम्॥२०
ततो मङ्गलशब्देन भेरीणां निःस्वनेन च।
चूर्णेन मण्डलं कुर्यात् पञ्चवर्णेन तत्त्ववित्॥२१
मण्डपके चारों ओर क्रमशः पीपल, गूलर, पाकड़ और बरगदकी शाखाओंके दरवाजे बनाये जायें। वहाँ आठ होता, आठ द्वारपाल तथा आठ जप करनेवाले ब्राह्मणोंका वरण किया जाय। वे सभी ब्राह्मण वेदोंके पारगामी विद्वान् होने चाहिये। सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे सम्पत्र, मन्त्रोंके ज्ञाता, जितेन्द्रिय, कुलीन, शीलवान् एवं श्रेष्ठ ब्राह्मणको ही इस कार्यमें पुरोहित-पदपर नियुक्त करना चाहिये। प्रत्येक कुण्डके पास कलश, यज्ञ-सामग्री, पंखा, दो चँवर और दो दिव्य एवं विस्तृत ताम्रपात्र प्रस्तुत रहें॥४-१३॥
तदनन्तर प्रत्येक देवताके लिये नाना प्रकारकी चरू (पुरोडास, खीर, दही, अक्षत आदि उत्तम भक्ष्य पदार्थ) उपस्थित करे। विद्वान् आचार्य मन्त्र पढ़कर उन सामग्रियोंको पृथ्वीपर सब देवताओंको समर्पित करे। तीन अरनिके बराबर एक यूप (यज्ञस्तम्भ) स्थापित किया जाय, जो किसी दूधवाले वृक्ष (वट, पाकड़ आदि)-की शाखाका बना हुआ हो। ऐश्वर्य चाहनेवाले पुरुषको यजमानके शरीरके बराबर ऊँचा यूप स्थापित करना चाहिये। उसके बाद पचीस ऋत्विजोंका वरण करके उन्हें सोनेके आभूषणोंसे विभूषित करे। सोनेके बने कुण्डल, बाजूबंद, कड़े, अङ्गुठी, पवित्री तथा नाना प्रकारके वस्त्र-ये सभी आभूषणादि प्रत्येक ऋत्विको बराबर-बराबर दे और आचार्यको दूना अर्पण करे। इसके सिवा उन्हें शय्या तथा अपनेको प्रिय लगनेवाली अन्यान्य वस्तुएँ भी प्रदान करे। सोनेका बना हुआ कछुआ और मगर, चाँदीके मत्स्य और दुण्डुभ (गिरगिट), ताँबेके केंकड़ा और मेढक तथा लोहेके दो सैंस बनवाये (और सबको सोनेके पात्रमें रखे)। राजन्! इन सभी वस्तुओंको पहलेसे ही बनवाकर ठीक रखना चाहिये। इसके बाद यजमान वेदज्ञ विद्वानोंकी बतायी हुई विधिके अनुसार सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान करके श्वेत वस्त्र और श्वेत माला धारण करे। फिर श्वेत चन्दन लगाकर पत्नी और पुत्र-पौत्रोंके साथ पश्चिम द्वारसे यज्ञमण्डपमें प्रवेश करे। उस समय माङ्गलिक शब्द होने चाहिये और भेरी आदि बाजे बजने चाहिये॥१४-२०३॥
तदनन्तर विद्वान् पुरुष पाँच रंगके चूर्णांसे मण्डल बनाये
षोडशारं ततश्चक्रं पद्मगर्भं चतुर्मुखम्।
चतुरग्रं च परितो वृत्तं मध्ये सुशोभनम् ॥ २२
वेद्याश्चोपरि तत् कृत्वा ग्रहाँल्लोकपतींस्ततः।
संन्यसेन्मन्त्रतः सर्वान् प्रतिदिक्षु विचक्षणः॥२३
कलशं स्थापयेन्मध्ये वारुण्यां मन्त्रमाश्रितः।
ब्रह्माणं च शिवं विष्णुं तत्रैव स्थापयेद् बुधः॥ २४
विनायकं च विन्यस्य कमलामम्बिकां तथा।
शान्त्यर्थं सर्वलोकानां भूतग्रामं न्यसेत् ततः॥ २५
पुष्पभक्ष्यफलैर्युक्तमेवं कृत्वाधिवासनम्।
कुम्भान् सजलग स्तान् वासोभिः परिवेष्टयेत्॥ २६
पुष्पगन्धैरलङ्कृत्य द्वारपालान् समन्ततः ।
पठध्वमिति तान् ब्रूयादाचार्यस्त्वभिपूजयेत्॥ २७
बढची पूर्वतः स्थाप्यौ दक्षिणेन यजुर्विदौ।
सामगौ पश्चिमे तद्वदुत्तरेण त्वथर्वणौ॥ २८
उदङ्मुखो दक्षिणतो यजमान उपाविशेत्।
यजध्वमिति तान् ब्रूयाद्धौ त्रिकान् पुनरेव तु॥२९
उत्कृष्टमन्त्रजापेन तिष्ठध्वमिति जापकान्।
एवमादिश्य तान् सर्वान् पर्युक्ष्याग्निं स मन्त्रवित्॥३०
जुहुयाद् वारुणैर्मन्त्रैराज्यं च समिधस्तथा।
ऋत्विग्भिश्चाथ होतव्यं वारुणैरेव सर्वतः॥३१
ग्रहेभ्यो विधिवद्धुत्वा तथेन्द्रायेश्वराय च।
मरुद्भयो लोकपालेभ्यो विधिवद् विश्वकर्मणे॥३२
शान्तिसूक्तं च रौद्रं च पावमानं च मङ्गलम्।
जपेयुः पौरुषं सूक्तं पूर्वतो बढ्चः पृथक् ॥३३
शानं रौद्रं च सौम्यं च कुष्माण्डं जातवेदसम्।
सौरं सूक्तं जपेयुस्ते दक्षिणेन यजुर्विदः॥३४
और उसमें सोलह अरोंसे युक्त चक्र चिह्नित करे। उसके गर्भमें कमलका आकार बनाये। चक्र देखनेमें सुन्दर और चौकोर हो। चारों ओरसे गोल होनेके साथ ही मध्यभागमें अधिक शोभायमान दीख पड़ता हो। बुद्धिमान् पुरुष उस चक्रको वेदीके ऊपर स्थापित कर उसके चारों ओर प्रत्येक दिशामें मन्त्रपाठपूर्वक ग्रहों और लोकपालोंकी स्थापना करे। फिर मध्यभागमें वरुण-सम्बन्धी मन्त्रका उच्चारण करते हुए एक कलश स्थापित करे और उसीके ऊपर ब्रह्मा, शिव, विष्णु, गणेश, लक्ष्मी तथा पार्वतीकी भी स्थापना करे। इसके पश्चात् सम्पूर्ण लोकोंकी शान्तिके लिये भूतसमुदायको स्थापित करे। इस प्रकार पुष्प, नैवेद्य और फलोंके द्वारा सबकी स्थापना करके उन सभी जलपूर्ण कलशोंको वस्त्रोंसे आवेष्टित कर दे। फिर पुष्प और चन्दनके द्वारा उन्हें अलंकृत कर द्वार-रक्षाके लिये नियुक्त ब्राह्मणोंसे स्वयं आचार्य वेदपाठ करनेके लिये प्रेमसे कहे। पूर्व दिशाकी ओर दो ऋग्वेदी, दक्षिणद्वारपर दो यजुर्वेदी, पश्चिमद्वारपर दो सामवेदी तथा उत्तरद्वारपर दो अथर्ववेदी विद्वानोंको रखना चाहिये। यजमान मण्डलके दक्षिणभागमें उत्तराभिमुख होकर बैठे और ऋत्विजोंसे पुनः आचार्य कहें-'आप यज्ञ प्रारम्भ करें।' तत्पश्चात् वे जप करनेवाले ब्राह्मणोंसे कहें-'आपलोग उत्तम मन्त्रका जप करते रहें।' इस प्रकार सबको प्रेरित करके मन्त्रज्ञ पुरुष अग्निका पर्युक्षण (चारों ओर जल छिड़क) कर वरुण- सम्बन्धी मन्त्रोंका उच्चारण कर घी और समिधाओंकी आहुति दे। ऋत्विजोंको भी वरुण-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा सब ओरसे हवन करना चाहिये। ग्रहोंके निमित्त विधिवत् आहुति देकर उस यज्ञ-कर्ममें इन्द्र, शिव, मरुद्गण, लोकपाल और विश्वकर्माके निमित्त भी विधिपूर्वक होम करे॥ २१-३२॥
पूर्वद्वारपर नियुक्त ऋग्वेदी ब्राह्मण शान्तिसूक्त, रुद्रसूक्त, पवमानसूक्त (ऋग्वेद ३। ४।५ आदि), सुमङ्गलसूक्त (ऋ० २।४।२१) तथा पुरुषसूक्त (१०।९०) का पृथक्- पृथक् जप करें। दक्षिणद्वारपर स्थित यजुर्वेदी विद्वान् इन्द्र (अ०१६), रुद्र, सोम, कूष्माण्ड (२०।१४-१६), अग्नि (अ०२) तथा सूर्य-सम्बन्धी (अ० ३५) सूक्तोंका जप करें।
* यहाँ वेद-निर्देश महत्त्वपूर्ण है, किंतु अन्यत्र पद्म, भविष्यादि पुराणोंमें ऋग्वेदीय ७। ३५ के मत्स्य-पाठ रात्रिसूक्तकी जगह 'शान्तिसूक्त के सर्वप्रथम पाठका ही निर्देश है, जिसका सर्वारम्भमें होना विशेष उचित अँचता है। तीनों वेदके शान्तिसूक्त तो प्रसिद्ध हैं। अथर्ववेदके शान्तिसूक्तका नाम शंतातीयसूक्त है। पवमानसूक्तके बहिष्, माध्यंदिन, तृतीय और अर्यव-ये चार भेद हैं। यजुर्वेदमें कूष्माण्डसूक्त भी उपरिनिर्दिष्टके अतिरिक्त ४ हैं, जो तै० ब्रा० २।४।४।६।६।१, ३।७।२ और तै० आरण्यक २।३।६ में प्राप्त होते हैं।
वैराजं पौरुषं सूक्तं सौपर्णं रुद्रसंहिताम्।
शैशवं पञ्चनिधनं गायत्रं ज्येष्ठसाम च॥३५
वामदेव्यं बृहत्साम रौरवं च रथन्तरम्।
गवां व्रतं च काण्वं च रक्षोघ्नं च यमं तथा।
गायेयुः सामगा राजन् पश्चिमं द्वारमाश्रिताः॥३६
आथर्वणश्चोत्तरतः शान्तिकं पौष्टिकं तथा।
जपेयुर्मनसा देवमाश्रित्य वरुणं प्रभुम्॥ ३७
पूर्वेधुरभितो रात्रावेवं कृत्वाधिवासनम्।
गजाश्वरथ्यावल्मीकात् संगमाद्धगोकुलात्।
मृदमादाय कुम्भेषु प्रक्षिपेच्चत्वरात् तथा॥ ३८
रोचनां च ससिद्धार्थां गन्धं गुग्गुलमेव च।
स्नपनं तस्य कर्तव्यं पञ्चगव्यसमन्वितम्॥३९
प्रत्येकं तु महामन्त्रैरेवं कृत्वा विधानतः।
एवं क्षपातिवाह्याथ विधियुक्तेन कर्मणा॥४०
ततः प्रभाते विमले संजातेऽथ शतं गवाम्।
ब्राह्मणेभ्यः प्रदातव्यमष्टषष्टिश्च वा पुनः।
पञ्चाशद् वाथ षट्त्रिंशत् पञ्चविंशतिरप्यथ॥४१
ततः सांवत्सरप्रोक्ते शुभे लग्ने सुशोभने।
वेदशब्दैश्च गान्धर्वर्वाद्यैश्च विविधैः पुनः॥४२
कनकालङ्कृतां कृत्वा जले गामवतारयेत् ।
सामगाय च सा देया ब्राह्मणाय विशाम्पते॥४३
पात्रीमादाय सौवर्णी पञ्चरत्नसमन्विताम्।
ततो निक्षिप्य मकरमत्स्यादींश्चैव सर्वशः।
धृतां चतुर्विधैर्विप्रैर्वेदवेदाङ्गपारगैः॥ ४४
महानदीजलोपेतां दध्यक्षतसमन्विताम्।
उत्तराभिमुखीं धेनुं जलमध्ये तु कारयेत्॥ ४५
राजन्! पश्चिमद्वारपर रहनेवाले सामवेदी ब्राह्मण वैराजसाम (२। २९। ८०), पुरुषसूक्त (६१३-३१), सुपर्णसूक्त (साम० ३। २। १-३), रुद्रसंहिता, शिशुसूक्त, पचनिधनसूक्त, गायत्रसाम, ज्येष्ठसाम (१। २। २९), वामदेव्यसाम (५।६। २५), बृहत्साम (१ । २२ । ३४), रौरवसाम, रथन्तरसाम (१। २२३), गोव्रत, काण्व, सूक्तसाम, रक्षोन (३। १२। ३९) और यमसम्बन्धी सूक्तोंका गान करें। उत्तरद्वारके अथर्ववेदी विद्वान् मन- ही-मन भगवान् वरुणदेवकी शरण ले शान्ति और पुष्टि- सम्बन्धी मन्त्रोंका जप करें। इस प्रकार पहले दिन मन्त्रोंद्वारा देवताओंकी स्थापना करके हाथी और घोड़ेके पैरोंके नीचेकी, जिसपर रथ चलता हो-ऐसी सड़ककी, बाँबीकी, दो नदियोंके संगमकी, गोशालाकी, साक्षात् गौओंके पैरके नीचेकी तथा चौराहेकी मिट्टी (सप्तमृत्तिका) लेकर कलशोंमें छोड़ दे। उसके बाद सौषधि, गोरोचन, सरसोंके दाने, चन्दन और गूगल भी छोड़े। फिर पञ्चगव्य (दधि, दूध, घी, गोबर और गोमूत्र) मिलाकर उन कलशोंके जलसे यजमानका विधिपूर्वक अभिषेक करे। इस प्रकार प्रत्येक कार्य महामन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक विधिसहित करना चाहिये॥ ३३-३९॥
श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार शास्त्रविहित कर्मद्वारा रात्रि व्यतीत करके निर्मल प्रभातका उदय होनेपर व्रती हवनके अन्तमें ब्राह्मणोंको सौ, अड़सठ, पचास, छत्तीस अथवा पचीस गौ दान करे। राजन् ! तदनन्तर ज्योतिषीद्वारा बतलाये गये शुद्ध एवं सुन्दर लग्न आनेपर वेदपाठ, संगीत तथा नाना प्रकारके बाजोंकी मनोहर ध्वनिके साथ एक गौको सुवर्णसे अलंकृत करके तालाबके जलमें उतारे और उसे सामगान करनेवाले ब्राह्मणको दान कर दे। तत्पश्चात् पञ्चरत्नोंसे युक्त सोनेका पात्र लेकर उसमें पूर्वोक्त मगर और मछली आदिको रखे और उसे किसी बड़ी नदीसे मँगाये हुए जलसे भर दे। फिर उस पात्रको दही-अक्षतसे विभूषितकर वेद और वेदाङ्गोंके विद्वान् चार ब्राह्मण हाथसे पकड़ें और अथर्ववेदके मन्त्रोंसे उसे स्नान कराये, फिर यजमानकी प्रेरणासे उसे उत्तराभिमुख उलटकर तालाबके जलमें डाल दें। इस प्रकार
आथर्वणेन संस्नातां पुनर्मामेत्यथेति च।
आपो हि ष्ठेति मन्त्रेण क्षिप्त्वाऽऽगत्य च मण्डपम्॥ ४६
पूजयित्वा सदस्यांस्तु बलिं दद्यात् समन्ततः।
पुनर्दिनानि होतव्यं चत्वारि मुनिसत्तमाः॥ ४७
चतुर्थीकर्म कर्तव्यं देया तत्रापि शक्तितः।
दक्षिणा राजशार्दूल वरुणक्षमापणं ततः॥४८
कृत्वा तु यज्ञपात्राणि यज्ञोपकरणानि च।
ऋत्विग्भ्यस्तु समं दत्त्वा मण्डपं विभजेत् पुनः ।
हेमपात्री च शय्यां च स्थापकाय निवेदयेत्॥ ४९
ततः सहस्त्रं विप्राणामथवाष्टशतं तथा।
भोजनीयं यथाशक्ति पञ्चाशद् वाथ विंशतिः।
एवमेष पुराणेषु तडागविधिरुच्यते॥५०
कूपवापीषु सर्वासु तथा पुष्करिणीषु च।
एष एव विधिदृष्टः प्रतिष्ठासु तथैव च॥५१
मन्त्रतस्तु विशेष: स्यात् प्रासादोद्यानभूमिषु।
अयं त्वशक्तावर्धेन विधिदृष्टः स्वयम्भुवा।
अल्पे त्वेकाग्निवत् कृत्वा वित्तशाठ्यादृते नृणाम्॥५२
प्रावृट्काले स्थिते तोये ह्यग्निष्टोमफलं स्मृतम्।
शरत्काले स्थितं यत् स्यात्तदुक्तफलदायकम्।
वाजपेयातिरात्राभ्यां हेमन्ते शिशिरे स्थितम्॥५३
अश्वमेधसमं प्राह वसन्तसमये स्थितम्।
ग्रीष्मेऽपि तत्स्थितं तोयं राजसूयाद् विशिष्यते॥५४
एतान् महाराज विशेषधर्मान्
करोति योऽप्यागमशुद्धबुद्धिः।
स याति रुद्रालयमाशु पूतः
कल्पाननेकान् दिवि मोदते च॥५५
'पुनर्मामेति०' तथा 'आपो हि ष्ठा मयो०' इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा उसे जलमें डालकर पुनः सब लोग यज्ञमण्डपमें आ जायँ और यजमान सदस्योंकी पूजा कर सब ओर देवताओंके उद्देश्यसे बलि अर्पण करे। इसके बाद लगातार चार दिनोंतक हवन होना चाहिये। राजसिंह! चौथे दिन चतुर्थी-कर्म करना उचित है। उसमें भी यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। तदनन्तर वरुणसे क्षमा-प्रार्थना करके यज्ञ-सम्बन्धी जितने पात्र और सामग्री हों, उन्हें ऋत्विजोंमें बराबर बाँट देना चाहिये। फिर मण्डपको भी विभाजित करे। सुवर्णपात्र और शय्या व्रतारम्भ करानेवाले ब्राह्मणको दान कर दे। इसके बाद अपनी शक्तिके अनुसार एक हजार, एक सौ आठ, पचास अथवा बीस ब्राह्मणोंको भोजन कराये। पुराणों (एवं कल्पसूत्रों)-में तालाबकी प्रतिष्ठाके लिये यही विधि बतलायी गयी है। सभी कुआँ, बावली और पुष्करिणीके लिये भी यही विधि है। देवताओंकी प्रतिष्ठामें भी ऐसा ही विधान समझना चाहिये। प्रासाद (महल अथवा मन्दिर) और बगीचे आदिके प्रतिष्ठा- कार्यमें केवल (कुछ) मन्त्रोंका ही भेद है। विधि- विधान प्रायः एक-से ही हैं। उपर्युक्त विधिका यदि पूर्णतया पालन करनेकी शक्ति न हो तो आधे व्ययसे भी यह कार्य सम्पन्न हो सकता है। यह बात ब्रह्माजीने कही है। किंतु इस अल्प विधानमें भी मनुष्यको कृपणताका त्याग कर एकाग्नि ब्राह्मणकी भाँति दान आदि करना चाहिये॥ ४०-५२॥
जिस पोखरेमें केवल वर्षाकालमें ही जल रहता है, वह अग्निष्टोम-यज्ञके बराबर फल देनेवाला होता है। जिसमें शरत्कालतक जल रहता हो, उसका भी यही फल है। हेमन्त और शिशिरकालतक रहनेवाला जल क्रमश: वाजपेय और अतिरात्र नामक यज्ञका फल देता है। वसन्तकालतक टिकनेवाले जलको अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायक बतलाया गया है तथा जो जल ग्रीष्मकालतक वर्तमान रहता है, वह राजसूय- -यज्ञसे भी अधिक फल देनेवाला होता है॥५३-५४॥
महाराज! जो मनुष्य पृथ्वीपर इन विशेष धर्मोंका पालन करता है, वह शुद्धचित्त होकर शिवजीके लोकमें जाता है और वहाँ अनेक कल्पोंतक दिव्य आनन्दका अनुभव करता है।
अनेकलोकान् स महत्तमादीन्
भुक्त्वा परार्धद्वयमङ्गनाभिः।
सहैव विष्णोः परमं पदं यत्
प्राप्नोति तद्योगबलेन भूयः॥५६
वह पुनः परार्ध (ब्रह्माजीकी पिछली आधी आयु)-तक देवाङ्गनाओंके साथ अनेक महत्तम लोकोंका सुख भोगनेके पश्चात् ब्रह्माजीके साथ ही योगबलसे श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होता है॥ ५५-५६॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तडागविधिर्नामाष्टपञ्चाशोऽध्यायः॥५८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तडागविधि नामक अट्ठावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥५८॥
Summary of chapter 58 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya delivers a profound discourse on the supreme spiritual merit earned by excavating public water reservoirs, constructing tanks, wells, and ponds, and planting sacred botanical groves for the benefit of all living beings. The Lord details the Vedic consecration ceremony for new water bodies, including the installation of a central wooden post known as Yūpa, the offering of Varuna oblations into the sacred fire, and the symbolic releasing of aquatic creatures into the sanctified waters. Furthermore, the text outlines the precise rituals for planting and consecrating sacred trees such as Ashvattha, Vaṭa, Nimba, Āmalakī, Bilva, and Bakula, declaring the famed Purāṇic dictum that planting a single sacred tree yields spiritual merit equivalent to producing ten righteous sons. The Lord asserts that whoever provides cool shade, clean water, and fruit to travelers and animals ensures that their own ancestors remain perpetually satisfied in heaven.