देवताओं और दैत्योंकी सेनाओंकी अद्धुत मुठभेड़ कालनेमिका भीषण पराक्रम और उसकी देवसेनापर विजय

मत्स्य उवाच

दानवानामनीकेषु कालनेमिर्महासुरः।

व्यवर्धत महातेजास्तपान्ते जलदो यथा॥१

तं त्रैलोक्यान्तरगतं दृष्ट्वा ते दानवेश्वराः।

उत्तस्थुरपरिश्रान्ताः पीत्वामृतमनुत्तमम्॥२

ते वीतभयसंत्रासा मयतारपुरोगमाः।

तारकामयसंग्रामे सततं जितकाशिनः॥३

मत्स्यभगवान्ने कहा-रविनन्दन! महान् तेजस्वी महासुर कालनेमि दानवोंकी सेनामें उसी प्रकार वृद्धिंगत होने लगा, जैसे ग्रीष्म ऋतुके अन्तमें बादल उमड़ पड़ते हैं। तब वे सभी दानव-यूथपति कालनेमिको त्रिलोकीमें व्याप्त देखकर श्रमरहित हो गये और सर्वोत्तम अमृतका पान कर उठ खड़े हुए। उनके भय और त्रास समाप्त हो चुके थे। वे तारकामय-संग्राममें मय और तारकको आगे रखकर सदा विजयी होते रहे हैं।

रेजुरायोधनगता दानवा युद्धकाक्षिणः।

मन्त्रमभ्यसतां तेषां व्यूहं च परिधावताम्॥ ४

प्रेक्षतां चाभवत् प्रीतिर्दानवं कालनेमिनम्।

ये तु तत्र मयस्यासन् मुख्या युद्धपुरःसराः॥ ५

ते तु सर्वे भयं त्यक्त्वा हृष्टा योद्धमुपस्थिताः।

मयस्तारो वराहश्च हयग्रीवश्च वीर्यवान्॥ ६

विप्रचित्तिसुतः श्वेतः खरलम्बावुभावपि ।

अरिष्टो बलिपुत्रश्च किशोराख्यस्तथैव च॥ ७

स्वर्भानुश्चामरप्रख्यो वक्त्रयोधी महासुरः ।

एतेऽस्त्रवेदिन: सर्वे सर्वे तपसि सुस्थिताः॥ ८

दानवाः कृतिनो जग्मुः कालनेमिं तमुद्धतम्।

ते गदाभिर्भुशुण्डीभिश्च रथ परश्वधैः ॥ ९

कालकल्पैश्च मुसलैः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः।

अश्मभिश्चाद्रिसदृशैर्गण्डशैलैश्च दारुणैः॥१०

पट्टिशैभिन्दिपालैश्च परिघुश्चोत्तमायसैः।

घातनीभिः सुगुर्वीभिः शतघ्नीभिस्तथैव च॥११

युगैर्यन्त्रैश्च निर्मुक्तैर्मार्गणैरुग्रताडितैः।

दोभिश्चायतदीप्तैश्च प्रासैः पाशैश्च मूर्च्छनैः॥१२

भुजङ्गवक्त्रैर्लेलिहानैर्विसर्पद्भिश्च सायकैः।

वजैः प्रहरणीयैश्च दीप्यमानैश्च तोमरैः॥१३

विकोशैरसिभिस्तीक्ष्णैः शूलैश्च शितनिर्मलैः ।

दैत्याः संदीप्तमनसः प्रगृहीतशरासनाः॥१४

ततः पुरस्कृत्य तदा कालनेमिं महाहवे।

सा दीप्तशस्त्रप्रवरा दैत्यानां रुरुचे चमूः॥१५

द्यौनिमीलितसर्वाङ्गा घनानीलाम्बुदागमे।

देवतानामपि चमूर्मुमुदे शक्रपालिता॥ १६

उपेतसितकृष्णाभ्यां ताराभ्यां चन्द्रसूर्ययोः ।

वायुवेगवती सौम्या तारागणपताकिनी॥१७

तोयदाविद्धवसना ग्रहनक्षत्रहासिनी।

यमेन्द्रवरुणैर्गुप्ता धनदेन च धीमता॥१८

सम्प्रदीप्ताग्निनयना नारायणपरायणा।

सा समुद्रौघसदृशी दिव्या देवमहाचमूः ॥ १९

युद्धाभिलाषी वे दानव युद्धभूमिमें उपस्थित होकर शोभा पा रहे थे। उनमें कुछ परस्पर मन्त्रणा कर रहे थे, कुछ व्यूहकी रचना कर रहे थे और कुछ रक्षकके रूपमें थे। उन सबका कालनेमि दानवके प्रति प्रगाढ़ प्रेम हो गया। तत्पश्चात् वहाँ मयदानवके जितने मुख्य-मुख्य युद्धके अगुआ थे, वे सभी भय छोड़कर हर्षपूर्वक युद्ध करनेके लिये उपस्थित हुए। फिर मय, तारक, वराह, पराक्रमी हयग्रीव, विप्रचित्तिका पुत्र श्वेत, खर, लम्ब, बलिका पुत्र अरिष्ट, किशोर और देवरूपसे प्रसिद्ध मुखसे युद्ध करनेवाला महान् असुर स्वर्भानु-ये सभी अस्त्रवेत्ता थे और सभी तपोबलसे सम्पन्न थे। वे सभी सफल प्रयत्नवाले दानव उस उद्दण्ड कालनेमिके निकट गये। गदा, भुशुण्डि, चक्र, कुठार, काल-सदृश मुसल, क्षेपणीय (ढेलवाँस), मुद्गर, पर्वत-सदृश पत्थर, भीषण गण्डशैल, पट्टिश, भिन्दिपाल, उत्तम लोहेके बने हुए परिघ, संहारकारिणी बड़ी-बड़ी तोप, यन्त्र, हाथोंसे छूटनेपर भयानक चोट करनेवाले बाण, लम्बे चमकीले भाले, पाश, मूर्च्छन (बेहोश करनेका यन्त्र), रेंगते हुए जीभ लपलपानेवाले सर्पमुख बाण, फेंकने योग्य वज्र, चमचमाते हुए तोमर, म्यानसे बाहर निकली हुई तीखी तलवार और तीखे निर्मल शूलोंसे युक्त तथा धनुष धारण करनेवाले उन दैत्योंके मन उत्साहसे सम्पन्न थे, वे उस महासमरमें कालनेमिको आगे करके खड़े हो गये। उस समय देदीप्यमान शस्त्रोंसे युक्त दैत्योंकी वह सेना इस प्रकार शोभा पा रही थी मानो सघन नील बादलोंके छा जानेपर सर्वथा आच्छादित हुआ आकाशमण्डल हो॥१-१५३॥

दूसरी ओर इन्द्रद्वारा सुरक्षित देवताओंकी सेना भी अट्टहास कर रही थी। वह चन्द्रमा और सूर्यकी श्वेत और कृष्ण ताराओंसे युक्त, वायुकी-सी वेगशालिनी, सौम्य और तारागणको पताकारूपमें धारण करनेवाली थी। उसके वस्त्र बादलोंसे संयुक्त थे। वह ग्रहों और नक्षत्रोंका उपहास-सी कर रही थी। बुद्धिमान् कुबेर, यम, इन्द्र और वरुण उसकी रक्षा कर रहे थे। वह प्रज्वलित अग्निरूप नेत्रोंवाली और नारायणके आश्रित थी। इस प्रकार यक्षों एवं गन्धर्वांसे युक्त सागरसमूहकी तरह भयंकर देवताओंकी वह विशाल दिव्य सेना अस्त्र

रराजास्त्रवती भीमा यक्षगन्धर्वशालिनी।

तयोश्चम्वोस्तदानीं तु बभूव स समागमः ॥२०

द्यावापृथिव्योः संयोगो यथा स्याद् युगपर्यये।

तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्॥ २१

क्षमापराक्रमपरं दर्पस्य विनयस्य च।

निश्चक्रमुर्बलाभ्यां तु भीमास्तत्र सुरासुराः॥२२

पूर्वापराभ्यां संरब्धाः सागराभ्यामिवाम्बुदाः।

ताभ्यां बलाभ्यां संहृष्टाश्चेरुस्ते देवदानवाः॥२३

वनाभ्यां पार्वतीयाभ्यां पुष्पिताभ्यां यथा गजाः ।

समाज स्ततो भेरीः शङ्खान् दध्मुरनेकशः॥ २४

स शब्दो द्यां भुवं खं च दिशश्च समपूरयत्।

ज्याघाततलनि?षो धनुषां कूजितानि च॥ २५

दुन्दुभीनां च निनदो दैत्यमन्तर्दधुः स्वनम्।

तेऽन्योन्यमभिसम्पेतुः पातयन्तः परस्परम् ।। २६

बभञ्जुर्बाहुभिर्बाहून् द्वन्द्वमन्ये युयुत्सवः ।

देवास्तु चाशनिं घोरं परिघांश्चोत्तमायसान्॥ २७

निस्त्रिंशान् ससृजुः संख्ये गदा गुर्वीश्च दानवाः।

गदानिपातैर्भग्नाङ्गा बाणैश्च शकलीकृताः॥ २८

परिपेतुर्भृशं केचित् पुनः केचित् तु जनिरे।

ततो रथैः सतुरगैर्विमानैश्चाशुगामिभिः॥२९

समीयुस्ते सुसंरब्धा रोषादन्योन्यमाहवे।

संवर्तमाना: समरे संदष्टौष्ठपुटाननाः॥३०

रथा रथैर्निरुद्धयन्ते पादाताश्च पदातिभिः ।

तेषां रथानां तुमुलः स शब्दः शब्दवाहिनाम्॥३१

नभोनभश्च हि यथा नभस्यैर्जलदस्वनैः।

बभञ्जुस्तु रथान् केचित् केचित् सम्मर्दिता रथैः ॥ ३२

सम्बाधमन्ये सम्प्राप्य न शेकुश्चलितुं रथाः ।

अन्योन्यमन्ये समरे दोामुत्क्षिप्य दंशिताः ॥ ३३

संहादमानाभरणा जघ्नुस्तत्रापि चर्मिणः।

धारण किये हुए शोभा पा रही थी। उस समय उन दोनों सेनाओंका ऐसा समागम हुआ जैसे प्रलयकालमें पृथ्वी और आकाशमण्डलका संयोग होता है। देवताओं और दानवोंसे व्याप्त तथा दर्प और विनयकी क्षमा और पराक्रमसे युक्त वह युद्ध अत्यन्त भयंकर हो गया। वहाँ दोनों सेनाओंमेंसे कुछ ऐसे भयंकर देवता और राक्षस निकल रहे थे, जो पूर्वी एवं पश्चिमी सागरोंसे निकलते हुए संक्षुब्ध बादलों-जैसे प्रतीत हो रहे थे। उन दोनों सेनाओंसे निकले वे देवता और दानव इस प्रकार हर्षपूर्वक विचरण कर रहे थे, मानो खिले हुए पुष्पोंसे युक्त पर्वतीय वनोंसे गजराज निकल रहे हों॥१६-२३।।

तदनन्तर नगाड़ोंपर चोटें पड़ने लगीं और अनेकों शङ्ख बज उठे। वह शब्द अन्तरिक्ष, पृथ्वी, आकाश और दिशाओंमें व्याप्त हो गया। धनुषोंकी प्रत्यञ्चा चढ़ानेके शब्द तथा सैनिकोंके कोलाहल होने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियोंका निनाद दैत्योंके वाद्यशब्दको पराभूत कर दिया। फिर तो वे एक-दूसरेपर टूट पड़े और परस्पर एक-दूसरेको मारकर गिराने लगे। कुछ द्वन्द्व-युद्ध करनेवाले वीर अपनी भुजाओंसे शत्रुकी भुजाओंको मरोड़ दिये। । रणभूमिमें देवगण भयंकर अशनि और उत्तम लोहेके बने हुए परिघोंसे प्रहार कर रहे थे तो दानवगण भारी गदाओं और खड्गोंका प्रयोग कर रहे थे। गदाके आघातसे बहुतोंके अङ्ग चूर हो गये। कुछ लोग तो बाणोंकी चोटसे टुकड़े-टुकड़े हो गये। कुछ अत्यन्त घायल होकर धराशायी हो गये। कुछ पुनः उठकर प्रहार करने लगे। तदनन्तर वे क्रोधसे विक्षुब्ध हो रणभूमिमें घोड़े जुते रथों और शीघ्रगामी विमानोंद्वारा एक-दूसरेसे भिड़ गये। युद्ध करते समय वे क्रोधवश अपने होंठोंको दाँतों-तले दबाये हुए थे। इस प्रकार रथ रथोंके साथ तथा पैदल पैदलोंके साथ उलझ गये। शब्द करनेवाले उन रथोंका ऐसा भयंकर शब्द होने लगा मानो भाद्रपदमासमें बादल गरज रहे हों। कुछ लोग रथोंको तोड़ रहे थे और कुछ लोग रथोंके धक्केसे रौंदे जा चुके थे। दूसरे रथ मार्गके अवरुद्ध हो जानेके कारण आगे बढ़नेमें असमर्थ हो गये। कुछ कवचधारी वीर समरभूमिमें एक-दूसरेको दोनों हाथोंसे उठाकर भूतलपर पटक देते थे। उस समय उनके आभूषण खनखना रहे थे। वहाँ कुछ ढाल धारण करनेवाले दूसरे अस्त्रोंद्वारा भी विपक्षियोंपर प्रहार कर रहे थे॥२४-३३॥

अस्त्रैरन्ये विनिर्भिन्ना वेमू रक्तं हता युधि॥३४

क्षरज्जलानां सदृशा जलदानां समागमे।

तैरस्त्रशस्त्रग्रथितं क्षिप्तोत्क्षिप्तगदाविलम्॥ ३५

देवदानवसंक्षुब्धं संकुलं युद्धमाबभौ।

तहानवमहामेघं देवायुधविराजितम्॥३६

अन्योन्यबाणवर्षेण युद्धदुर्दिनमाबभौ।

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धः कालनेमी स दानवः ॥ ३७

व्यवर्धत समुद्रौघैः पूर्यमाण इवाम्बुदः।

तस्य विद्युच्चलापीडैः प्रदीप्ताशनिवर्षिणः॥३८

गात्रै गगिरिप्रख्या विनिपेतुर्बलाहकाः।

क्रोधान्निःश्वसतस्तस्य भ्रूभेदस्वेदवर्षिणः॥३९

साग्निस्फुलिङ्गप्रतता मुखान्निष्पेतुरर्चिषः।

तिर्यगूर्ध्वं च गगने ववृधुस्तस्य बाहवः॥ ४०

पर्वतादिव निष्क्रान्ताः पञ्चास्या इव पन्नगाः।

सोऽस्त्रजालैर्बहुविधैर्धनुर्भिः परिधैरपि॥४१

दिव्यमाकाशमावतें पर्वतैरुच्छ्रितैरिव।

सोऽनिलोद्भूतवसनस्तस्थौ संग्रामलालसः॥ ४२

संध्यातपग्रस्तशिल: साक्षान्मेरुरिवाचलः ।

ऊरुवेगप्रमथितैः शैलशृङ्गाग्रपादपैः॥ ४३

अपातयद् देवगणान् वज्रेणेव महागिरीन् ।

बहुभिः शस्त्रनिस्त्रिंशैश्छिन्नभिन्नशिरोरुहाः॥ ४४

न शेकुश्चलितुं देवाः कालनेमिहता युधि।

मुष्टिभिनिहताः केचित् केचित् तु विदलीकृताः॥ ४५

यक्षगन्धर्वपतयः पेतुः सह महोरगैः।

तेन वित्रासिता देवाः समरे कालनेमिना॥४६

इसी प्रकार अन्य वीर युद्धस्थलमें अस्त्रोंद्वारा घायल होकर रक्त वमन करते हुए जलकी वृष्टि करनेवाले बादलोंकी तरह प्रतीत हो रहे थे। उस समय वह युद्ध अस्त्रों एवं शस्त्रोंसे परिपूर्ण, फेंकी गयी एवं फेंकनेके लिये उठायी हुई गदाओंसे युक्त और देवताओं एवं दानवोंसे व्याप्त और संक्षुब्ध होकर शोभा पा रहा था। दानवरूपी महामेघसे युक्त और देवताओंके हथियारोंसे विभूषित वह युद्ध परस्परकी बाणवर्षासे मेघाच्छन्न दुर्दिन-सा लग रहा था। इसी बीच क्रोधसे भरा हुआ कालनेमि नामक दानव रणभूमिमें आगे बढ़ा। वह समुद्रकी लहरोंसे पूर्ण होते हुए बादलकी तरह शोभा पा रहा था। प्रज्वलित वज्रोंकी वर्षा करनेवाले उस दानवके बिजलीके समान चञ्चल मस्तकोंसे युक्त शरीरावयवोंसे टकराकर हाथी और पर्वत -सदृश विशाल बादल तितर-बितर होकर बिखर रहे थे। क्रोधवश निःश्वास लेते हुए उसकी टेढ़ी भौंहोंसे पसीनेकी बूंदें टपक रही थीं और मुखसे अग्निकी चिनगारियोंसे व्याप्त लपटें निकल रही थीं। उसकी भुजाएँ आकाशमें तिरछी होकर ऊपरकी ओर बढ़ रही थीं, जो पर्वतसे निकले हुए पाँच मुखवाले नागकी तरह लग रही थीं। उसने ऊँचे-ऊँचे पर्वतों-सरीखे अनेक प्रकारके अस्त्रसमूहों, धनुषों और परिघोंसे दिव्य आकाशको आच्छादित कर दिया। वायुद्वारा उड़ाये जाते हुए वस्त्रोंवाला वह दानव संग्रामकी लालसासे डटकर खड़ा हुआ। उस समय वह संध्याकालीन धूपसे ग्रस्त हुई शिलासे युक्त साक्षात् मेरुपर्वतकी तरह दीख रहा था। उसने अपनी जंघाओंके वेगसे उखाड़े गये पर्वतशिखरके अग्रवर्ती वृक्षोंके प्रहारसे देवगणोंको उसी प्रकार धराशायी कर दिया, जैसे वज्रके आघातसे विशाल पर्वत ढाह दिये गये थे॥३४-४३॥

इस प्रकार रणभूमिमें कालनेमिद्वारा आहत हुए देवगण चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गये। बहुत-से शस्त्रों तथा खड्गोंकी चोटसे कुछ लोगोंके सिरके बालतक छिन्न-भिन्न हो गये थे। कुछ मुक्कोंकी मारसे मार डाले गये और कुछके टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। यक्षों और गन्धर्वोके नायक बड़े-बड़े नागोंके साथ पृथ्वीकी गोदमें पड़ गये। समरभूमिमें उस कालनेमिद्वारा भयभीत किये गये देवगण

न शेकुर्यनवन्तोऽपि यत्नं कर्तुं विचेतसः।

तेन शक्रः सहस्राक्षः स्पन्दितः शरबन्धनैः॥ ४७

ऐरावतगतः संख्ये चलितुं न शशाक ह।

निर्जलाम्भोदसदृशो निर्जलार्णवसप्रभः॥४८

निर्व्यापारः कृतस्तेन विपाशो वरुणो मृधे।

रणे वैश्रवणस्तेन परिघैः कामरूपिणा॥४९

वित्तदोऽपि कृतः संख्ये निर्जित: कालनेमिना।

यमः सर्वहरस्तेन मृत्युप्रहरणे रणे॥५०

याम्यामवस्थां संत्यज्य भीत: स्वां दिशमाविशत्।

स लोकपालानुत्सार्य कृत्वा तेषां च कर्म तत्॥५१

दिक्षु सर्वासु देहं स्वं चतुर्धा विदधे तदा।

स नक्षत्रपथं गत्वा दिव्यं स्वर्भानुदर्शनम्॥५२

जहार लक्ष्मी सोमस्य तं चास्य विषयं महत्।

चालयामास दीप्तांशुं स्वर्गद्वारात् सभास्करम्॥५३

सायनं चास्य विषयं जहार दिनकर्म च।

सोऽग्निं देवमुखं दृष्ट्वा चकारात्ममुखाश्रयम्॥५४

वायुं च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम्।

स समुद्रान् समानीय सर्वांश्च सरितो बलात्॥५५

चकारात्ममुखे वीर्याद् देहभूताश्च सिन्धवः ।

अप: स्ववशगाः कृत्वा दिविजा याश्च भूमिजाः॥५६

स स्वयम्भूरिवाभाति महाभूतपतिर्यथा ।

सर्वलोकमयो दैत्यः सर्वभूतभयावहः ।।५७

स लोकपालैकवपुश्चन्द्रादित्यग्रहात्मवान्।

स्थापयामास जगतीं सुगुप्तां धरणीधरैः॥५८

पावकानिलसम्पातो रराज युधि दानवः ।

पारमेष्ठये स्थित: स्थाने लोकानां प्रभवोपमे।

तं तुष्टुवुर्दैत्यगणा देवा इव पितामहम्॥५९

प्रयत्न करनेके लिये उद्यत होनेपर भी कोई उपाय न कर सके; क्योंकि उनका मन भ्रमित हो उठा था। उसने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रको भी बाणोंके बन्धनसे इस प्रकार जकड़ दिया था कि वे युद्धस्थलमें ऐरावतपर बैठे हुए भी चलने में समर्थ न हो सके। उसने समर-भूमिमें वरुणको जलहीन बादल और निर्जल महासागरकी भाँति कान्तिहीन, व्यापाररहित और पाशसे शून्य कर दिया। स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उस दानवने रणभूमिमें परिघोंकी मारसे वैश्रवण कुबेरको भी जीत लिया। मृत्यु-सदृश प्रहार होनेवाले उस युद्धमें कालनेमिने सबके प्राणहर्ता यमको पराजित कर दिया। वे डरकर युद्धका परित्याग कर अपनी दक्षिण दिशाकी ओर चले गये। इस प्रकार उसने चारों लोकपालोंको पराजित कर दिया और अपने शरीरको चार भागोंमें विभक्त कर वह सभी दिशाओंमें उनका कार्य स्वयं सँभालने लगा। फिर जहाँ ग्रहणके समय राहुका दर्शन होता है, उस दिव्य नक्षत्रमार्गमें जाकर चन्द्रमाकी लक्ष्मी तथा उनके विशाल साम्राज्यका अपहरण कर लिया॥ ४४-५२॥

उसने प्रदीप्त किरणोंवाले सूर्यको स्वर्गद्वारसे खदेड़ दिया और उनके सायन नामक साम्राज्य और दिनकी सृष्टि करनेकी शक्तिको छीन लिया। उसने देवताओंके मुखस्वरूप अग्निको सम्मुख देखकर उन्हें अपने मुख में निगल लिया तथा वायुको वेगपूर्वक जीतकर उन्हें अपना वशवर्ती बना लिया। उसने अपने पराक्रमसे बलपूर्वक समुद्रोंको वशमें करके सभी नदियोंको अपने मुखमें डाल लिया और सागरोंको शरीरका अङ्ग बना लिया। इस प्रकार स्वर्ग अथवा भूतलपर जितने जल थे, उन सबको उसने अपने अधीन कर लिया। उस समय समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला वह दैत्य सम्पूर्ण लोकोंसे युक्त होकर महाभूतपति ब्रह्माकी तरह सुशोभित हो रहा था। सम्पूर्ण लोकपालोंके एकमात्र मूर्तस्वरूप तथा चन्द्र, सूर्य आदि ग्रहोंसे युक्त उस दानवने पर्वतोंद्वारा सुरक्षित पृथ्वीको स्थापित किया। इस प्रकार अग्नि और वायुके समान वेगशाली दानवराज कालनेमि युद्धस्थलमें लोकोंकी उत्पत्तिके स्थानभूत ब्रह्माके पदपर स्थित होकर शोभा पा रहा था। उस समय दैत्यगण उसकी उसी प्रकार स्तुति कर रहे थे, जैसे देवगण ब्रह्माकी किया करते हैं। ५३-५९ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकामययुद्धं नाम सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७७॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तारकामय-युद्ध नामक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७७ ॥