मत्स्य महा पुराण
देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरे को शाप देना
शौनक उवाच
समापितव्रतं तं तु विसृष्टं गुरुणा तदा।
प्रस्थितं त्रिदशावास देवयानीदमब्रवीत्॥१
शौनकजी कहते हैं-जब कचका व्रत समाप्त हो गया और गुरु (शुक्राचार्य)-ने उसे जानेकी आज्ञा दे दी, तब वह देवलोक जानेको उद्यत हुआ। उस समय देवयानीने उससे इस प्रकार कहा-॥१॥
देवयान्युवाच
ऋषेरङ्गिरसः पौत्र वृत्तेनाभिजनेन च।
भाजसे विद्यया चैव तपसा च दमेन च॥ २
ऋषिर्यथाङ्गिरा मान्यः पितुर्मम महायशाः।
तथा मान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पतिः॥ ३
एवं ज्ञात्वा विजानीहि यद् ब्रवीमि तपोधन।
व्रतस्थे नियमोपेते यथा वर्ताम्यहं त्वयि॥ ४
स समापितविद्यो मां भक्तां न त्यक्तुमर्हसि।
गृहाण पाणिं विधिवन्मम मन्त्रपुरस्कृतम्॥ ५
कच उवाच
पूज्यो मान्यश्च भगवान् यथा मम पिता तव।
तथा त्वमनवद्याङ्गि पूजनीयतमा मता॥ ६
आत्मप्राणैः प्रियतमा भार्गवस्य महात्मनः।
त्वं भद्रे धर्मतः पूज्या गुरुपुत्री सदा मम॥ ७
यथा मम गुरुर्नित्यं मान्यः शुक्रः पिता तव।
देवयानि तथैव त्वं नैवं मां वक्तुमर्हसि॥८
देवयान्युवाच
गुरुपुत्रस्य पुत्रो मे न तु त्वमसि मे पितुः।
तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च ममापि त्वं द्विजोत्तम॥ ९
असुरैर्हन्यमाने तु कच त्वयि पुनः पुनः।
तदाप्रभृति या प्रीतिस्तां त्वमेव स्मरस्व मे॥१०
सौहार्द्ध चानुरागे च वेत्थ मे भक्तिमुत्तमाम्।
न मामर्हसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसाम्॥११
कच उवाच
अनियोज्ये नियोगे मां नियुनक्षि शुभवते।
प्रसीद सुभ्र मह्यं त्वं गुरोर्गुरुतरा शुभे॥१२
यत्रोषितं विशालाक्षि त्वया चन्द्रनिभानने।
तत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भामिनि॥१३
भगिनी धर्मतो मे त्वं मैवं वोचः शुभानने।
सुखेनाध्युषितो भद्रे न मन्युर्विद्यते मम॥१४
देवयानी बोली-महर्षि अङ्गिराके पौत्र! तुम सदाचार, उत्तम कुल, विद्या, तपस्या तथा इन्द्रियसंयम आदिसे बड़ी शोभा पा रहे हो। महायशस्वी महर्षि अङ्गिरा जिस प्रकार मेरे पिताजीके लिये माननीय हैं, उसी प्रकार तुम्हारे पिता बृहस्पतिजी मेरे लिये आदरणीय तथा पूज्य हैं। तपोधन! ऐसा जानकर मैं जो कहती हूँ, उसपर विचार करो। तुम जब व्रत और नियमों के पालनमें लगे थे, उन दिनों मैंने तुम्हारे साथ जो बर्ताव किया है, (आशा है,) उसे तुम भूले नहीं होगे। अब तुम व्रत समाप्त करके अपनी अभीष्ट विद्या प्राप्त कर चुके हो। मैं तुमसे प्रेम करती हूँ; तुम मुझे स्वीकार करो; अतः वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक विधिवत् मेरा पाणिग्रहण करो॥२-५॥
कचने कहा-निर्दोष अङ्गोंवाली देवयानी! जैसे तुम्हारे पिता शुक्राचार्य मेरे लिये पूजनीय और माननीय हैं, वैसे ही तुम हो; बल्कि उनसे भी बढ़कर मेरी पूजनीया हो। भद्रे! महात्मा भार्गवको तुम प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो। गुरुपुत्री होनेके कारण धर्मकी दृष्टिसे मेरी सदा पूजनीया हो। देवयानी! जैसे मेरे गुरुदेव तुम्हारे पिता शुक्राचार्य सदा मेरे माननीय हैं, उसी प्रकार तुम हो; अतः तुम्हें मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये॥ ६-८॥
देवयानी बोली-द्विजोत्तम! तुम मेरे गुरुके पुत्र हो, मेरे पिताके नहीं; (अतः मेरे भाई नहीं लगते, पर) मेरे पूजनीय और माननीय हो। कच! जब असुर तुम्हें बार-बार मार डालते थे, तबसे लेकर आजतक तुम्हारे प्रति मेरा जो प्रेम रहा है, उसे तुम्ही स्मरण करो। तुम्हें मेरे सौहार्द और अनुराग तथा मेरी उत्तम भक्तिका परिचय मिल चुका है। तुम धर्मके ज्ञाता भी हो। मैं तुम्हारे प्रति भक्ति रखनेवाली निरपराध अबला हूँ। तुम्हें मेरा त्याग करना (कदापि) उचित नहीं है॥९-११॥
कचने कहा-उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सुन्दरि ! तुम मुझे ऐसे कार्यमें प्रवृत्त कर रही हो, जो कदापि उचित नहीं है। शुभे! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। तुम मेरे लिये गुरुसे भी बढ़कर श्रेष्ठ हो। विशाल नेत्र तथा चन्द्रमाके समान मुखवाली भामिनि! शुक्राचार्यके जिस उदरमें तुम रह चुकी हो, उसीमें मैं भी रहा हूँ। इसलिये भद्रे! धर्मकी दृष्टिसे तुम मेरी बहन हो; अतः शुभानने! मुझसे ऐसी बात न कहो। कल्याणि! मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी रोष नहीं है।
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमस्त्वथ मे पथि।
अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे॥१५
अप्रमत्तोद्यता नित्यमाराधय गुरुं मम।
देवयान्युवाच
दैत्यैर्हतस्त्वं यद्भर्तृबुद्ध्या त्वं रक्षितो मया॥१६
यदि मां धर्मकामार्था प्रत्याख्यास्यसि धर्मतः।
तत: कच न ते विद्या सिद्धिरेषा गमिष्यति ॥१७
कच उवाच
गुरुपुत्रीति कृत्वाहं प्रत्याख्यास्ये न दोषतः।
गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः काममेवं शपस्व माम्॥१८
आर्षं धर्मं ब्रुवाणोऽहं देवयानि यथा त्वया।
शप्तुं नार्होऽस्मि कल्याणि कामतोऽद्य च धर्मतः॥१९
तस्माद् भवत्या यः कामो न तथा सम्भविष्यति।
ऋषिपुत्रो न ते कश्चिज्जातु पाणिं ग्रहीष्यति॥२०
फलिष्यति न मे विद्या त्वद्वचश्चेति तत् तथा।
अध्यापयिष्यामि च यं तस्य विद्या फलिष्यति॥२१
शौनक उवाच
एवमुक्त्वा नृपश्रेष्ठ देवयानी कचस्तदा।
त्रिदशेशालयं शीघ्रं जगाम द्विजसत्तमः॥२२
तमागतमभिप्रेक्ष्य देवाः सेन्द्रपुरोगमाः।
बृहस्पतिं सभाज्येदं कचमाहुर्मुदान्विताः॥२३
देवा ऊचुः
त्वं कचास्मद्धितं कर्म कृतवान् महदद्भुतम्।
न ते यशः प्रणशिता भागभाक् च भविष्यसि ॥२४
अब मैं जाऊँगा, इसलिये तुम्हारी आज्ञा चाहता हूँ; आशीर्वाद दो कि मार्गमें मेरा मङ्गल हो। धर्मकी अनुकूलता रखते हुए बातचीतके प्रसङ्गमें कभी मेरा भी स्मरण कर लेना और सदा सावधान एवं सजग रहकर मेरे गुरुदेव (अपने पिता शुक्राचार्य) की सेवामें लगी रहना ॥१२–१५३॥
देवयानी बोली-कच! दैत्योंद्वारा बार-बार तुम्हारे मारे जानेपर मैंने पति-बुद्धिसे ही तुम्हारी रक्षा की है (अर्थात् पिताद्वारा जीवनदान दिलाया है, इसीलिये) मैंने धर्मानुकूल कामके लिये तुमसे प्रार्थना की है। यदि तुम मुझे ठुकरा दोगे तो यह संजीविनी-विद्या तुम्हारे कोई काम न आयेगी॥१६-१७॥
कचने कहा-देवयानी! गुरुपुत्री समझकर ही मैंने तुम्हारे अनुरोधको टाल दिया है, तुममें कोई दोष देखकर नहीं। गुरुजी भी इसे जानते-मानते हैं। स्वेच्छासे मुझे शाप भी दे दो। बहन! मैं आर्ष-धर्मकी बात कर रहा था। इस दशामें तुम्हारे द्वारा शाप पानेके योग्य नहीं था। तुमने मुझे धर्मके अनुसार नहीं, कामके वशीभूत होकर आज शाप दिया है, इसलिये तुम्हारे मनमें जो कामना है, वह पूरी नहीं होगी। कोई भी ऋषिपुत्र (ब्राह्मणकुमार) कभी तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं करेगा। तुमने जो मुझे यह कहा कि तुम्हारी विद्या सफल नहीं होगी, सो ठीक है; किंतु मैं जिसे यह पढ़ा दूंगा, उसकी विद्या तो सफल होगी ही ॥१८-२१॥
शौनकजी कहते हैं-नृपश्रेष्ठ शतानीक! द्विजश्रेष्ठ कच देवयानीसे ऐसा कहकर तत्काल बड़ी उतावलीके साथ इन्द्रलोकको चला गया। उसे आया देख इन्द्रादि देवता बृहस्पतिजीकी सेवामें उपस्थित हो उन्हें साथ ले आगे बढ़कर बड़ी प्रसन्नतासे कचसे इस प्रकार बोले ॥२२-२३॥
देवता बोले-कच! तुमने हमारे हितके लिये यह बड़ा अद्भुत कार्य किया है, अत: तुम्हारे यशका कभी लोप नहीं होगा और तुम यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी होओगे॥२४॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते षड्विंशोऽध्यायः॥२६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक छब्बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६ ॥
Summary of chapter 26 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya relates the historical encounter between Kacha, who was the son of Bṛhaspati, and Devayānī, who was the daughter of the Asura guru Śukrāchārya. During the perpetual war between Devas and Asuras, Śukrāchārya possessed the secret Sañjīvanī Vidyā, which was the divine knowledge that revived slain Asuras back to life. The Devas dispatched Kacha to become Śukrāchārya's disciple and acquire this lore; Kacha served the master with utmost devotion for a thousand years while gaining the deep affection of Devayānī. The Asuras, fearing Kacha's mission, killed him three times by feeding his body to wolves, grinding his bones into ocean foam, and incinerating his body to mix his ashes into Śukrāchārya's wine. Each time, Śukrāchārya revived him at Devayānī's pleading; on the third occasion, Śukrāchārya taught Kacha the Sañjīvanī Vidyā while inside his own stomach, so that when Kacha emerged by tearing open Śukrāchārya's abdomen, he immediately used the newly learned mantra to bring his guru back to life.