मत्स्य महा पुराण
स्कन्दकी उत्पत्ति, उनका नामकरण, उनसे देवताओंकी प्रार्थना और उनके द्वारा देवताओंको आश्वासन, तारकके पास देवदूतद्वारा संदेश भेजा जाना और सिद्धोंद्वारा कुमारकी स्तुति
सूत उवाच
वाम विदार्य निष्कान्तः सुतो देव्याः पुनः शिशुः।
स्कन्दाच्च वदने वह्नः शुकात् सुवदनोऽरिहा॥१
कृत्तिकामेलनादेव शाखाभिः सविशेषतः।
शाखाभिधा: समाख्याता: षटसुवक्त्रेषु विस्तृताः॥ २
यतस्ततो विशाखोऽसौ ख्यातो लोकेषु षण्मुखः।
स्कन्दो विशाखः षड्वक्त्रः कार्तिकेयश्च विश्रुतः॥ ३
चैत्रस्य बहुले पक्षे पञ्चदश्यां महाबलौ।
सम्भूतावर्कसदृशौ विशाले शरकानने॥ ४
चैत्रस्यैव सिते पक्षे पञ्चम्यां पाकशासनः।
बालकाभ्यां चकारैकं मत्वा चामरभूतये॥ ५
तस्यामेव ततः षष्ठ्यामभिषिक्तो गुहः प्रभुः।
सर्वैरमरसंघातैर्ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रभास्करैः ॥ ६
गन्धमाल्यैः शुभैधूंपैस्तथा क्रीडनकैरपि।
छत्रैश्चामरजालैश्च भूषणैश्च विलेपनैः॥ ७
अभिषिक्तो विधानेन यथावत् षण्मुखः प्रभुः।
सुतामस्मै ददौ शक्रो देवसेनेति विश्रुताम्॥ ८
पल्यर्थं देवदेवस्य ददौ विष्णुस्तदायुधान्।
यक्षाणां दशलक्षाणि ददावस्मै धनाधिपः॥ ९
ददौ हुताशनस्तेजो ददौ वायुश्च वाहनम्।
ददौ क्रीडनकं त्वष्टा कुक्कुटं कामरूपिणम्।
एवं सुरास्तु ते सर्वे परिवारमनुत्तमम्॥१०
ददुर्मुदितचेतस्काः स्कन्दायादित्यवर्चसे॥११
जानुभ्यामवनी स्थित्वा सुरसंघास्तमस्तुवन्।
स्तोत्रेणानेन वरदं षण्मुखं मुख्यशः सुराः॥१२
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! पुनः पार्वती देवीकी बायीं कोखको फाड़कर दूसरा शिशु पुत्ररूपमें बाहर निकला। सर्वप्रथम अग्निके मुखमें वीर्यका क्षरण होनेके कारण वह बालक सुन्दर मुखवाला और शत्रुओंका विनाशक हुआ। उसके छः मुख हुए। चूँकि छहों मुखोंमें विस्तृत शाखा नामसे प्रसिद्ध कृतिकाओंकी शाखाओंका विशेषरूपसे मेल हुआ था, इसलिये वह बालक लोकोंमें 'विशाख' नामसे विख्यात हुआ। इस प्रकार वह स्कन्द, विशाख, षड्वक्त्र और कार्तिकेयके नामसे प्रख्यात हुआ। चैत्रमासके कृष्णपक्षकी पंद्रहवीं तिथि (अमावास्या)-को विशाल सरपतके वनमें सूर्यके समान तेजस्वी एवं महाबली ये दोनों शिशु उत्पन्न हुए थे। पुनः चैत्रमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको पाकशासन इन्द्रने देवताओंके लिये कल्याणकारी मानकर दोनों बालकोंको सम्मिलित करके एकीभूत कर दिया। उसी मासकी षष्ठी तिथिको ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, सूर्य आदि सभी देवसमूहोंद्वारा सामर्थ्यशाली गुह (देव-सेनापतिके पदपर) अभिषिक्त किये गये। उस समय चन्दन, पुष्पमाला, माङ्गलिक धूप, खिलौना, छत्र, चँवरसमूह, आभूषण और अङ्गरागद्वारा भगवान् षण्मुखका विधिपूर्वक यथावत् अभिषेक किया गया था। इन्द्रने 'देवसेना' नामसे विख्यात कन्याको उन्हें पत्नीरूपमें प्रदान किया। भगवान् विष्णुने देवाधिदेव गुहको अनेकों आयुध समर्पित किया। कुबेर उन्हें दस लाख यक्ष प्रदान किये। अग्निने तेज दिया। वायुने वाहन समर्पित किया। त्वष्टाने खिलौना तथा स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाला एक मुर्गा प्रदान किया। इस प्रकार उन सभी देवताओंने प्रसन्न मनसे सूर्यके समान तेजस्वी स्कन्दको सर्वश्रेष्ठ परिवार प्रदान किया। तत्पश्चात् प्रधान-प्रधान देवताओंक समूह पृथ्वीपर घुटने टेककर उन वरदायक षण्मुखकी निम्नाङ्कित स्तोत्रद्वारा स्तुति करने लगे॥१-१२॥
देवा ऊचुः
नमः कुमाराय महाप्रभाय
स्कन्दाय च स्कन्दितदानवाय।
नवार्कविद्युद्द्युतये नमोऽस्तु ते
नमोऽस्तु ते षण्मुख कामरूप॥१३
पिनद्धनानाभरणाय भत्रै
नमो रणे दारुणदारुणाय।
नमोऽस्तु तेऽर्कप्रतिमप्रभाय
नमोऽस्तु गुह्याय गुहाय तुभ्यम्॥१४
नमोऽस्तु त्रैलोक्यभयापहाय
नमोऽस्तु ते बालकृपापराय।
नमो विशालामललोचनाय
नमो विशाखाय महाव्रताय॥१५
नमो नमस्तेऽस्तु मनोहराय
नमो नमस्तेऽस्तु रणोत्कटाय।
नमो मयूरोज्वलवाहनाय
नमोऽस्तु केयूरधराय तुभ्यम्॥१६
नमो धृतोदनपताकिने नमो
नमः प्रभावप्रणताय तेऽस्तु।
नमो नमस्ते वरवीर्यशालिने
कृपापरो नो भव भव्यमूर्ते ॥१७
क्रियापरा यज्ञपतिं च स्तुत्वा
विरेमुरेवं त्वमराधिपाद्याः।
एवं तदा षड्वदनं तु सेन्द्रा
मुदा सुतुष्टश्च गुहस्ततस्तान्।
निरीक्ष्य नेत्रैरमलैः सुरेशान्
शत्रून् हनिष्यामि गतज्वराः स्थ॥१८
कुमार उवाच
कं वः कामं प्रयच्छामि देवता ब्रूत निर्वृताः।
यद्यप्यसाध्यं हृद्यं वो हृदये चिन्तितं परम्॥१९
इत्युक्तास्तु सुरास्तेन प्रोचुः प्रणतमौलयः।
सर्व एव महात्मानं गुहं तद्गतमानसाः॥२०
दैत्येन्द्रस्तारको नाम सर्वामरकुलान्तकृत्।
बलवान् दुर्जयो दुष्टो दुराचारोऽतिकोपनः ।
तमेव जहि हृद्योऽर्थ एषोऽस्माकं भयापह॥२१
देवताओंने कहा-कामरूप षण्मुख! आप कुमार, महान् तेजस्वी, शिवतेजसे उत्पन्न और दानवोंका कचूमर निकालनेवाले हैं। आपकी शरीर-कान्ति उदयकालीन सूर्य एवं बिजलीकी-सी है। आपको हमारा बारंबार नमस्कार प्राप्त हो। आप नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित, जगत्के पालनकर्ता और रणभूमिमें भीषण दानवोंके लिये अत्यन्त भयंकर हैं, आपको प्रणाम है। सूर्य-सरीखे प्रतिभाशाली आपको अभिवादन है। गुह्य रूपवाले आप गुहको हमारा नमस्कार है। त्रिलोकीके भयको दूर करनेवाले आपको प्रणाम है। कृपा करने में तत्पर रहनेवाले बालरूप आपको अभिवादन है। विशाल एवं निर्मल नेत्रोंवाले आपको नमस्कार है। महान् व्रतका पालन करनेवाले आप विशाखको प्रणाम है। सामान्यतया मनोहर रूपधारी तथा रणभूमिमें भयानक रूपसे युक्त आपको बारंबार अभिवादन है। उज्ज्वल मयूरपर सवार होनेवाले आपको नमस्कार है। आप केयूरधारीको प्रणाम है। अत्यन्त ऊँचाईपर फहरानेवाली पताकाको धारण करनेवाले आपको अभिवादन है। प्रणतजनोंपर प्रभाव डालनेवाले आपको नमस्कार है। आप सर्वश्रेष्ठ पराक्रमसे सम्पन्न हैं। आपको बारंबार प्रणाम है। मनोहर रूपधारिन्! हमलोगोंपर कृपा कीजिये। इस प्रकार देवराज इन्द्र आदि सभी क्रियापरायण देवगण जब हर्षपूर्वक यज्ञपति षडाननकी स्तुति करके चुप हो गये, तब परम प्रसन्न हुए गुह अपने निर्मल नेत्रोंसे उन सुरेश्वरोंकी ओर निहारकर बोले-'देवगण ! मैं आपलोगोंके शत्रुओंका संहार करूँगा, अब आपलोग शोकरहित हो जायँ'॥ १३-१८॥
कुमारने पूछा-देवगण! आपलोग नि:संकोच बतलायें कि मैं आपलोगोंकी कौन-सी अभिलाषा पूर्ण करूँ? वह उत्तम अभिलाषा, जिसे आपलोगोंने अपने हृदयमें चिरकालसे सोच रखा है, यदि दुःसाध्य भी होगी तो भी मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगा। कुमारद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर सभी देवता उनके मनोऽनुकूल हो सिर झुकाकर महात्मा गुहसे बोले-'भय-विनाशक गुह! तारक नामवाले दैत्येन्द्रने सभी देवकुलोंका विनाश कर दिया है। वह बलवान्, दुर्जय, अत्यन्त दुष्ट, दुराचारी और अतिशय क्रोधी है, आप उसीका वध कीजिये। यही हमलोगोंकी हार्दिक अभिलाषा है।'
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सर्वामरपदानुगः।
जगाम जगतां नाथः स्तूयमानोऽमरेश्वरैः ॥ २२
तारकस्य वधार्थाय जगतः कण्टकस्य वै।
ततश्च प्रेषयामास शक्रो लब्धसमाश्रयः॥२३
दूतं दानवसिंहस्य परुषाक्षरवादिनम्।
स तु गत्वाब्रवीद् दैत्यं निर्भयो भीमदर्शनः ॥ २४
दूत उवाच
शक्रस्त्वामाह देवेशो दैत्यकेतो दिवस्पतिः।
तारकासुर तच्छ्रुत्वा घट शक्त्या यथेच्छया॥२५
यज्जगद्दलनादाप्तं किल्बिषं दानव त्वया।
तस्याहं शासकस्तेऽद्य राजास्मि भुवनत्रये ॥२६
श्रुत्वैतद् दूतवचनं कोपसंरक्तलोचनः ।
उवाच दूतं दुष्टात्मा नष्टप्रायविभूतिकः॥२७
तारक उवाच
दृष्टं ते पौरुषं शक्र रणेषु शतशो मया।
निस्त्रपत्वान्न ते लज्जा विद्यते शक्र दुर्मते॥२८
एवमुक्ते गते दूते चिन्तयामास दानवः ।
नालब्धसंश्रयः शक्रो वक्तुमेवं हि चार्हति॥२९
जितः स शक्रो नाकस्माज्जायते संश्रयाश्रयः।
निमित्तानि च दुष्टानि सोऽपश्यद् दुष्टचेष्टितः॥ ३०
पांशुवर्षमसृक्पातं गगनादवनीतले।
भुजनेत्रप्रकम्पं च वक्त्रशोषं मनोभ्रमम्॥३१
स्वकान्तावक्त्रपमानांम्लानतां च व्यलोकयत्।
दुष्टांश्च प्राणिनो रौद्रान्सोऽपन्यद् दुष्टवेदिनः॥ ३२
तदचिन्त्यैव दितिजो न्यस्तचिन्तोऽभवत् क्षणात्।
यावद्गजघटाघण्टारणत्काररवोत्कटाम् ॥३३
तद्वत्तुरगसङ्घातक्षुण्णभूरेणुपिञ्जराम्
चञ्चलस्यन्दनोदग्रध्वजराजिविराजिताम् ॥३४
देवताओंद्वारा ऐसा निवेदन किये जानेपर गुहने 'तथैति' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् वे जगन्नाथ गुह देवेश्वरोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए सम्पूर्ण देवगणोंके साथ जगत्के कण्टकस्वरूप तारकका वध करनेके लिये प्रस्थित हुए। तदुपरान्त सहायक उपलब्ध हो जानेपर इन्द्रने एक कठोर वचन बोलनेवाले दूतको दैत्यसिंह तारकके पास भेजा। वह भयंकर रूपधारी दूत दैत्यराजके पास जाकर निर्भय होकर बोला ॥१९-२४॥
दूतने कहा-दैत्यकेतु तारकासुर! स्वर्गके अधीश्वर देवराज इन्द्रने तुम्हें कुछ संदेश कहला भेजा है, उसे सुनकर तुम शक्तिपूर्वक स्वेच्छानुसार प्रयत्न करो। (उन्होंने कहलाया है कि) 'दानव! जगत्का विनाश करके तुमने जो पाप कमाया है, तुम्हारे उस पापका शासन करनेके लिये मैं प्रस्तुत हूँ। इस समय मैं त्रिभुवनका राजा हूँ।' दूतकी ऐसी बात सुनकर तारकके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उसकी विभूति प्राय: नष्ट हो चुकी थी। तब उस दुष्टात्माने दूतसे कहा ॥२५-२७॥
तारक बोला-इन्द्र! मैंने रणभूमिमें सैकड़ों बार तुम्हारे पुरुषार्थको देख लिया है। दुर्बुद्धि इन्द्र! निर्लज होनेके कारण तुम्हें ऐसा कहते हुए लज्जा नहीं आती। ऐसा उत्तर पाकर दूतके चले जानेपर दानवराज तारक विचार करने लगा कि किसी विशिष्टकी सहायता प्राप्त हुए बिना इन्द्र इस तरहकी बातें नहीं कह सकते; क्योंकि वे हमसे पराजित हो चुके हैं। पता नहीं, अकस्मात् उन्हें कहाँसे सहायता उपलब्ध हो गयी है। इसी बीच उस दुष्ट चेष्टावाले दानवको अनर्थसूचक निमित्त दीख पड़े। उसी समय आकाशसे भूतलपर धूलकी वर्षा होने लगी तथा रक्तपात होने लगा। उसकी भुजाएँ और नेत्र काँपने लगे। उसका मुख सूख गया और उसके मनमें घबराहट उत्पन्न हो गयी। उसे अपनी पत्नियोंके मुखकमल मलिन दीख पड़ने लगे तथा अनर्थकी सूचना देनेवाले भयंकर दुष्ट प्राणियोंके दर्शन हुए, किंतु इन सबका कुछ भी विचार न कर दैत्य तारक क्षणभरमें ही चिन्तारहित हो गया। इतनेमें ही अट्टालिकापर बैठे हुए दैत्यने आती हुई देवताओंकी सेनाको देखा जिसमें गजयूथोंके बजते हुए घंटोंका उत्कट शब्द हो रहा था। उसी प्रकार जो घोड़ोंकी टापोंसे पिसी हुई धूलसे आच्छादित होनेके कारण पीली दीख रही थी तथा चलते हुए रथोंके ऊपर फहराते हुए ध्वजसमूहों,
विमानैश्चाद्भुताकारैश्चलितामरचामरैः
तां भूषणनिबद्धां च किंनरोद्गीतनादिताम्॥ ३५
नानानाकतरूत्फुल्लकुसुमापीडधारिणीम् ।
विकोशास्त्रपरिष्कारां वर्मनिर्मलदर्शनाम्॥३६
बन्धुघुष्टस्तुतिरवां नानावाद्यनिनादिताम्।
सेनां नाकसदां दैत्यः प्रासादस्थो व्यलोकयत्॥३७
चिन्तयामास स तदा किंचिदुद्भ्रान्तमानसः।
अपूर्वः को भवेद् योद्धा यो मया न विनिर्जितः॥३८
ततश्चिन्ताकुलो दैत्यः शुश्राव कटुकाक्षरम्।
सिद्धवन्दिभिरुश्रुष्टमिदं हृदयदारणम्॥३९
अथ गाथा
जयातुलशक्तिदीधितिपिञ्जर
भुजदण्डचण्डरणरभस
सुखद कुमुदकाननविकासनेन्दो कुमार
जय दितिजकुलमहोदधिवडवानल॥४०
षण्मुख मधुररवमयूररथ
सुरमुकुटकोटिघट्टितचरणनखाङ्कुरमहासन।
जय ललितचूडाकलापनवविमलदल-
कमलकान्त दैत्यवंशदुःसहदावानल॥ ४१
जय विशाख विभो जय
सकललोकतारक जय देवसेनानायक।
स्कन्द जय गौरीनन्दन घण्टाप्रिय
प्रिय विशाख विभो धृतपताकप्रकीर्णपटल।
कनकभूषण भासुरदिनकरच्छाय॥४२
जय जनितसम्भ्रम लीलालूनाखिलाराते
जय सकललोकतारक दितिजा सुरवर तारकान्तक।
स्कन्द जय बाल सप्तवासर
जय भुवनावलिशोकविनाशन॥४३
डुलाये जाते हुए देवताओंके चँवरों और अद्भुत आकारवाले विमानोंसे सुशोभित थी। जो आभूषणोंसे विभूषित, किन्नरोंके गानसे निनादित, नाना प्रकारके स्वर्गीय वृक्षोंके खिले हुए पुष्पोंको मस्तकपर धारण करनेवाले सैनिकोंसे युक्त, म्यानरहित शस्त्रास्त्रोंसे परिष्कृत और निर्मल कवचोंसे युक्त थी, जिसमें वन्दियोंद्वारा गायी जाती हुई स्तुतियोंके शब्द सुनायी पड़ रहे थे और जो नाना प्रकारके बाजोंसे निनादित हो रही थी॥२८-३७॥
उसे देखकर तारकका मन कुछ उद्भ्रान्त हो उठा। तब वह विचार करने लगा कि यह कौन अपूर्व योद्धा हो सकता है, जिसे मैंने पराजित नहीं किया है। इस प्रकार वह दैत्य जब चिन्तासे व्याकुल हो रहा था, उसी समय उसने सिद्ध-वन्दियोंद्वारा गायी जाती हुई यह कठोर अक्षरोंवाली एवं हृदयविदारिणी गाथा सुनी॥३८-३९॥
कुमार! अप्रमेय शक्तिकी किरणोंसे आपका वर्ण पीला हो गया है। आप अपने भुजदण्डोंसे प्रचण्ड युद्धका दृश्य उत्पन्न कर देनेवाले, भक्तोंके लिये सुखदायक, कुमुदिनीके वनको विकसित करनेके लिये चन्द्रमा और दैत्यकुलरूप महासागरके लिये बडवानलके समान हैं, आपकी जय हो, जय हो। षण्मुख! मधुर शब्द करनेवाला मयूर आपका वाहन है, आपका सिंहासन देवताओंके मुकुटोंकी कोरसे संघट्टित चरणनखोंके अङ्कुरसे सुशोभित होता है, आपका रुचिर चूडासमूह नूतन एवं निर्मल कमलदलके सम्मेलनसे सुशोभित होता है, आप दैत्यवंशके लिये दु:सह दावानलके समान हैं, आपकी जय हो। ऐश्वर्यशाली विशाख! आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण लोकोंका उद्धार करनेवाले हैं, आपकी जय हो। देवसेनाके नायककी जय हो। स्कन्द! आप गौरीनन्दन और घंटाके प्रेमी हैं। ऐश्वर्यशाली प्रिय विशाख! आप हाथमें पताकासमूह धारण करनेवाले हैं और आपकी छवि स्वर्णमय आभूषण धारण करनेसे सूर्यके समान चमकीली है, आपकी जय हो। आप भय उत्पन्न करनेवाले और लीलापूर्वक सम्पूर्ण शत्रुओंके विनाशकर्ता हैं, आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण लोकोंके उद्धारक तथा असुरवर दैत्य तारकके विनाशकारक हैं, आपकी जय हो। सप्तदिवसीय बालक स्कन्द। आप समस्त भुवनोंके शोकका विनाश करनेवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो॥४०-४३॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे देवासुरसंग्रामे रणोद्योगो नामैकोनषष्ठयधिकशततमोऽध्यायः॥१५९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके देवासुरसंग्राममें रणोद्योग नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५९॥
Summary of chapter 161 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the historical advent of Bhagavān Vishṇu in His fierce man-lion manifestation, Bhagavān Narasimha, to protect the child-devotee Prahlāda and destroy the tyrant Hiraṇyakashipu. The Supreme Lord emerged from a stone pillar in the royal assembly hall with a terrifying roar that shattered the cosmos, possessing sharp claws, a mane shining like a thousand suns, and eyes blazing with divine wrath. This divine manifestation demonstrated that Bhagavān Vishṇu appears instantly to validate the truth of His pure devotees and uphold cosmic justice.