मत्स्य महा पुराण
माहेश्वर-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
नारद उवाच
भगवन् भूतभव्येश तथान्यदपि यच्छुतम्।
भुक्तिमुक्तिफलायालं तत् पुनर्वक्तुमर्हसि॥ १
एवमुक्तोऽब्रवीच्छम्भुरयं वाङ्मयपारगः।
मत्समस्तपसा ब्रह्मन् पुराणश्रुतिविस्तरैः॥ २
धर्मोऽयं वृषरूपेण नन्दी नाम गणाधिपः।
धर्मान् माहेश्वरान् वक्ष्यत्यतः प्रभृति नारद॥ ३
मत्स्य उवाच
इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तत्रैवान्तरधीयत ।
नारदोऽपि हि शुश्रूषुरपृच्छन्नन्दिकेश्वरम्।
आदिष्टस्त्वं शिवेनेह वद माहेश्वरं व्रतम्॥ ४
नन्दिकेश्वर उवाच
शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् वक्ष्ये माहेश्वरं व्रतम्।
त्रिषु लोकेषु विख्याता नाना शिवचतुर्दशी॥ ५
मार्गशीर्षत्रयोदश्यां सितायामेकभोजनः।
प्रार्थयेद् देवदेवेशं त्वामहं शरणं गतः॥ ६
चतुर्दश्यां निराहारः सम्यगभ्यर्च्य शंकरम्।
सुवर्णवृषभं दत्त्वा भोक्ष्यामि च परेऽहनि॥ ७
एवं नियमकृत् सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः।
कृतस्नानजपः पश्चादुमया सह शंकरम्।
पूजयेत् कमलैः शुभैर्गन्धमाल्यानुलेपनैः॥ ८
पादौ नमः शिवायेति शिरः सर्वात्मने नमः।
त्रिनेत्रायेति नेत्राणि ललाटं हरये नमः॥ ९
मुखमिन्दुमुखायेति श्रीकण्ठायेति कन्धराम्।
सद्योजाताय की तु वामदेवाय वै भुजौ॥१०
अघोरहृदयायेति हृदयं चाभिपूजयेत्।
स्तनौ तत्पुरुषायेति तथेशानाय चोदरम्॥११
नारदजीने पूछा-भूत और भविष्यके स्वामी भगवन्! इनके अतिरिक्त भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करने में समर्थ यदि कोई अन्य व्रत सुना गया हो तो उसे पुनः कहनेकी कृपा करें। ऐसा पूछे जानेपर भगवान् शम्भुने कहा-'ब्रह्मन्! यह नन्दी शब्दशास्त्रका पारगामी विद्वान् और तपस्या तथा पुराणों एवं श्रुतियोंकी विस्तृत जानकारीमें मेरे समान है। यह वृषरूपसे साक्षात् धर्म और गणका अधीश्वर है। नारद! अब यही इससे आगे माहेश्वर-धर्मोंका वर्णन करेगा॥'१-३॥
मत्स्यभगवान्ने कहा-ऐसा कहकर देवाधिदेव शम्भु वहीं अन्तर्हित हो गये। तब श्रवण करनेकी उत्कट इच्छावाले नारदने नन्दिकेश्वरसे पूछा-'नन्दी! शिवजीने आपको इसके लिये जैसा आदेश दिया है, आप उस प्रकार माहेश्वर-व्रतका वर्णन कीजिये'॥ ४॥
नन्दिकेश्वर बोले-ब्रह्मन्! मैं माहेश्वर-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, आप समाहितचित्तसे श्रवण कीजिये। वह व्रत तीनों लोकोंमें शिवचतुर्दशीके नामसे विख्यात है। (इस व्रतके आरम्भमें) व्रती मानव मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षको त्रयोदशी तिथिको एक बार भोजन कर देवाधिदेव शंकरजीसे इस प्रकार प्रार्थना करे-'भगवन्! मैं आपके शरणागत हूँ। मैं चतुर्दशी तिथिको निराहार रहकर भगवान् शंकरकी भलीभाँति अर्चना करनेके पश्चात् स्वर्ण-निर्मित वृषभका दान करके दूसरे दिन भोजन करूँगा।' इस प्रकारका नियम ग्रहण कर रात्रिमें शयन करे। प्रात:काल उठकर स्नान-जप आदि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर सुन्दर कमल-पुष्पों, सुगन्धित पुष्पमालाओं और चन्दन आदिसे पार्वतीसहित शंकरजीकी वक्ष्यमाण रीतिसे पूजा करे-'शिवाय नमः' से दोनों चरणोंका, 'सर्वात्मने नमः' से सिरका, 'त्रिनेत्राय नमः' से नेत्रोंका, 'हरये नमः' से ललाटका, 'इन्दुमुखाय नमः' से मुखका, 'श्रीकण्ठाय नमः' से कंधोंका, 'सद्योजाताय नमः' से कानोंका, 'वामदेवाय नमः' से भुजाओंका और 'अघोरहृदयाय नमः' से हृदयका पूजन करे। 'तत्पुरुषाय नमः' से स्तनोंकी, 'ईशानाय नमः' से उदरकी,
पाचौं चानन्तधर्माय ज्ञानभूताय वै कटिम्।
ऊरु चानन्तवैराग्यसिंहायेत्यभिपूजयेत्॥१२
अनन्तैश्वर्यनाथाय जानुनी चार्चयेद् बुधः।
प्रधानाय नमो जङ्के गुल्फो व्योमात्मने नमः ॥१३
व्योमकेशात्मरूपाय केशान् पृष्ठं च पूजयेत्।
नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्टयै पार्वतीं चापि पूजयेत्॥१४
ततस्तु वृषभं हैममुदकुम्भसमन्वितम्।
शुक्लमाल्याम्बरधरं पञ्चरत्नसमन्वितम्।
भक्ष्यैर्नानाविधैर्युक्तं ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥१५
प्रीयतां देवदेवोऽत्र सद्योजातः पिनाकधृक् ।
ततो विप्रान् समाहूय तर्पयेद् भक्तित: शुभान्।
पृषदाज्यं च सम्प्राश्य स्वपेद् भूमावुदमुखः ॥१६
पञ्चदश्यां च सम्पूज्य विप्रान् भुञ्जीत वाग्यतः।
तद्वत् कृष्णचतुर्दश्यामेतत् सर्वं समाचरेत् ॥ १७
चतुर्दशीषु सर्वासु कुर्यात् पूर्ववदर्चनम्।
ये तु मासे विशेषाः स्युस्तान् निबोध क्रमादिह॥१८
मार्गशीर्षादिमासेषु क्रमादेतदुदीरयेत्।
शंकराय नमस्तेऽस्तु नमस्ते करवीरक॥१९
त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु महेश्वरमतः परम्।
नमस्तेऽस्तु महादेव स्थाणवे च ततः परम्॥२०
नमः पशुपते नाथ नमस्ते शम्भवे पुनः ।
नमस्ते परमानन्द नमः सोमार्धधारिणे ॥ २१
नमो भीमाय इत्येवं त्वामहं शरणं गतः।
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्॥ २२
पञ्चगव्यं ततो बिल्वं कर्पूरचागुरुं यवाः ।
तिला: कृष्णाश्च विधिवत् प्राशनं क्रमशः स्मृतम्।
प्रतिमासं चतुर्दश्योरेकैकं प्राशनं स्मृतम्॥२३
'अनन्तधर्माय नमः' से दोनों पार्श्वभागोंकी, 'ज्ञानभूताय नमः' से कटिकी और 'अनन्तवैराग्यसिंहाय नमः' से ऊरुओंकी अर्चना करे। बुद्धिमान् व्रतीको 'अनन्तैश्वर्यनाथाय नमः' से जानुओंका, 'प्रधानाय नमः' से जङ्घाओंका और 'व्योमात्मने नमः' से गुल्फोंका पूजन करना चाहिये। फिर 'व्योमकेशात्मरूपाय नमः' से बालों और पीठकी अर्चना करे। 'पुष्टयै नमः' एवं 'तुष्ट्यै नमः' से पार्वतीका भी पूजन करे। तत्पश्चात् जलपूर्ण कलशसहित, श्वेत पुष्पमाला और वस्त्रसे सुशोभित, पञ्चरत्नयुक्त स्वर्णमय वृषभको नाना प्रकारके खाद्य पदार्थोके साथ ब्राह्मणको दान कर दे और यों प्रार्थना करे-'पिनाकधारी देवाधिदेव सद्योजात मेरे व्रतमें प्रसन्न हों।' तदनन्तर माङ्गलिक ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें भक्तिपूर्वक भोजन एवं दक्षिणा आदि देकर तृप्त करे और स्वयं दधिमिश्रित घी खाकर रात्रिमें उत्तराभिमुख हो भूमिपर शयन करे। पूर्णिमा तिथिको प्रात:काल उठकर ब्राह्मणोंकी पूजा करनेके पश्चात् मौन होकर भोजन करे। उसी प्रकार कृष्णपक्षकी चतुर्दशीमें भी यह सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये ॥५-१७॥
इसी प्रकार सभी चतुर्दशी तिथियोंमें पूर्ववत् शिवपार्वतीका पूजन करना चाहिये। अब प्रत्येक मासमें जो विशेषताएँ हैं, उन्हें क्रमशः (बतला रहा हूँ,) सुनिये। मार्गशीर्ष आदि प्रत्येक मासमें क्रमश: इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये-'शंकराय नमस्तेऽस्तु'- आप शंकरक
लिये मेरा नमस्कार प्राप्त हो।'नमस्तेकरवीरक'-करवीरक! आपको नमस्कार है। 'त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु'-आप त्र्यम्बकके लिये प्रणाम है। इसके बाद महेश्वराय नमः'- महेश्वरको अभिवादन है। 'महादेव नमस्तेऽस्तु'-महादेव! आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। उसके बाद 'स्थाणवे नमः'-स्थाणुको प्रणाम है। पशुपतये नमः'–पशुपतिको अभिवादन है। 'नाथ नमस्ते'-नाथ! आपको नमस्कार है। पुन: 'शम्भवे नमः'-शम्भुको प्रणाम है। परमानन्द नमस्ते'-परमानन्द!आपको अभिवादन है। सोमार्धधारिणे नमः'-ललाटमें अर्धचन्द्र धारण करनेवालेको नमस्कार है।'भीमाय नमः'-भयंकर रूपधारीको प्रणाम है। ऐसा कहकर अन्तमें कहे कि 'मैं आपके शरणागत हूँ।' प्रत्येक मासकी दोनों चतुर्दशी तिथियोंमें गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी, कुशोदक, पञ्चगव्य, बेल, कर्पूर, अगुरु, यव और काला तिल-इनमेंसे क्रमशः एक-एक पदार्थका प्राशन बतलाया गया है। इसी प्रकार प्रत्येक मासकी दोनों
मन्दारमालतीभिश्च तथा धत्तूरकैरपि।
सिन्धुवारैरशोकैश्च मल्लिकाभिश्च पाटलैः॥२४
अर्कपुष्पैः कदम्बैश्च शतपत्र्या तथोत्पलैः।
एकैकेन चतुर्दश्योरर्चयेत् पार्वतीपतिम् ॥ २५
पुनश्च कार्तिके मासे प्राप्ते संतर्पयेद् द्विजान्।
अन्नैर्नानाविधैर्भक्ष्यैर्वस्त्रमाल्यविभूषणैः ॥२६
कृत्वा नीलवृषोत्सर्गं श्रुत्युक्तविधिना नरः ।
उमामहेश्वरं हैमं वृषभं च गवा सह ॥ २७
मुक्ताफलाष्टकयुतं सितनेत्रपटावृताम्।
सर्वोपस्करसंयुक्तां शय्यां दद्यात् सकुम्भकाम्॥ २८
ताम्रपात्रोपरि पुनः शालितण्डुलसंयुतम्।
स्थाप्य विप्राय शान्ताय वेदव्रतपराय च ॥ २९
ज्येष्ठसामविदे देयं न वकवतिने वचित्।
गुणज्ञे श्रोत्रिये दद्यादाचार्ये तत्त्ववेदिनि ॥३०
अव्यङ्गाङ्गाय सौम्याय सदा कल्याणकारिणे।
सपत्नीकाय सम्पूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः ।। ३१
गुरौ सति गुरोर्देयं तदभावे द्विजातये।
न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन् दोषात् पतत्यधः ।। ३२
अनेन विधिना यस्तु कुर्याच्छिवचतुर्दशीम्।
सोऽश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥३३
ब्रह्महत्यादिकं किंचिद् यदत्रामुत्र वा कृतम्।
पितृभिर्धातृभिर्वापि तत् सर्वं नाशमाप्नुयात्॥ ३४
दीर्घायुरारोग्यकुलान्नवृद्धि-
रत्राक्षयामुत्र चतुर्भुजत्वम्।
गणाधिपत्यं दिवि कल्पकोटि-
शतान्युषित्वा पदमेति शम्भोः ।। ३५
चतुर्दशी तिथियोंमें मन्दार (पारिभद्र), मालती, धतूरा, सिन्दुवार, अशोक, मल्लिका, पाटल (पाँढर पुष्प या लाल गुलाब), मन्दार-पुष्प (सूर्यमुखी), कदम्ब, शतपत्री (श्वेत कमल या गुलाब) और कमल-इनमेंसे क्रमशः एक-एकके द्वारा पार्वतीपति शंकरकी अर्चना करनी चाहिये॥ १८-२५॥
पुनः कार्तिकमास आनेपर अन्न, नाना प्रकारके खाद्य पदार्थ, वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषणोंसे ब्राह्मणोंको पूर्णरूपसे तृप्त करे। व्रती मनुष्यको वेदोक्त विधिके अनुसार नील वृषका भी उत्सर्ग करनेका विधान है। तत्पश्चात् अगहनीके चावलसे परिपूर्ण ताँबेके पात्रपर स्वर्णनिर्मित उमा, महेश्वर और वृषभकी मूर्तिको स्थापित कर दे और उसके निकट आठ मोती रख दे, फिर उसे गौके साथ ब्राह्मणको दान कर दे। साथ ही दो श्वेत चादरोंसे आच्छादित तथा समस्त उपकरणोंसे युक्त घटसहित एक शय्या भी दान करनी चाहिये। यह दान ऐसे ब्राह्मणको देना चाहिये, जो शान्तस्वभाव, वेदव्रत-परायण और ज्येष्ठसामका ज्ञाता हो। बगुलाव्रती (कपटी) ब्राह्मणको कभी भी दान नहीं देना चाहिये। वस्तुतस्तु गुणज्ञ, वेदपाठी, तत्त्ववेत्ता, सुडौल अङ्गोंवाले, सौम्यस्वभाव, कल्याणकारक एवं सपत्नीक आचार्यकी वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषण आदिसे भलीभाँति पूजा करके यह दान उन्हींको देना चाहिये। यदि गुरु (आचार्य) उस समय उपस्थित हों तो उन्हींको दान देनेका विधान है। उनकी अनुपस्थितिमें अन्य ब्राह्मणको दान दिया जा सकता है। इस दानमें कृपणता नहीं करनी चाहिये। यदि करता है तो उसके दोषसे कर्ताका अध:पतन हो जाता है ॥ २६-३२॥
जो मानव उपर्युक्त विधिके अनुसार इस शिवचतुर्दशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, उसे एक हजार अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। उसके द्वारा अथवा उसके पिता या भाईद्वारा इस जन्ममें अथवा जन्मान्तरमें जो कुछ ब्रह्महत्या आदि पाप घटित हुए रहते हैं, वे सभी नष्ट हो जाते हैं। इस लोकमें वह दीर्घायु, नीरोगता, कुल और अन्नकी समृद्धिसे युक्त होता है और मरणोपरान्त स्वर्गलोकमें चार भुजाधारी होकर गणाधिप हो जाता है। वहाँ सौ करोड़ कल्पोंतक निवास कर शम्भु-पद-शिवलोकको चला जाता है।
न बृहस्पतिरप्यनन्तमस्याः
फलमिन्द्रो न पितामहोऽपि वक्तुम्।
न च सिद्धगणोऽप्यलं न चाहं
यदि जिह्वायुतकोटयोऽपि वक्त्रे॥३६
भवत्यमरवल्लभः पठति यः स्मरेद् वा सदा
शृणोत्यपि विमत्सरः सकलपापनिर्मोचनीम्।
इमां शिवचतुर्दशीममरकामिनीकोटयः
स्तुवन्ति तमनिन्दितं किमु समाचरेद् यः सदा॥३७
या वाथ नारी कुरुतेऽतिभक्त्या
भर्तारमापृच्छय सुतान् गुरून् वा।
सापि प्रसादात् परमेश्वरस्य
परं पदं याति पिनाकपाणेः॥३८
यदि मुखमें दस हजार करोड़ जिह्वाएँ हो जायँ तो भी इस चतुर्दशीके अनन्त फलका वर्णन करने में न तो बृहस्पति समर्थ हैं न इन्द्र, न ब्रह्मा समर्थ हैं न सिद्धगण तथा मैं भी इसका वर्णन नहीं कर सकता। जो मनुष्य मत्सररहित हो सम्पूर्ण पापोंसे विमुक्त करनेवाली इस शिवचतुर्दशीके माहात्म्यको सदा पढ़ता, स्मरण करता अथवा श्रवण करता है, उस पुण्यात्माका करोड़ों देवाङ्गनाएँ स्तवन करती हैं, फिर जो सदा इसका अनुष्ठान करता है, उसकी तो बात ही क्या है? स्त्री भी यदि अपने पति, पुत्र और गुरुजनोंकी आज्ञा लेकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी परमेश्वरकी कृपासे पिनाकपाणि भगवान् शंकरके परमपदको प्राप्त हो जाती है* ॥ ३३-३८॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शिवचतुर्दशीव्रतं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः॥९५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शिवचतुर्दशी-व्रत नामक पंचानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥९५॥
Summary of chapter 95 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the ritual procedures and immense spiritual benefits of the Śivachaturdaśī-Vrata, observed on the fourteenth lunar day of the dark fortnight in every month, with special emphasis on the month of Māgha. The practitioner maintains a strict fast, stays awake through the four watches of the night, and worships the Śivalinga with holy water, milk, curd, ghee, honey, sugar, bilva leaves, and lotus flowers. During each watch of the night, the devotee performs specific ablutions and offers distinct food preparations, chanting the sacred Pañchākshara Mantra with focused devotion. The Lord declares that observing this vow purifies the soul from even the gravest transgressions, grants liberation from the cycle of rebirth, and bestows eternal residency in Kailāsa.