मत्स्य महा पुराण
ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना
इन्द्र उवाच
सर्वाणि कार्याणि समाप्य राजन्
गृहान् परित्यज्य वनं गतोऽसि।
तत् त्वां पृच्छामि नहुषस्य पुत्र
केनासि तुल्यस्तपसा ययाते॥१
ययातिरुवाच
नाहं देवमनुष्येषु न गन्धर्वमहर्षिषु।
आत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित् पश्यामि वासव॥२
इन्द्र उवाच
यदावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च
पापीयसश्चाविदितप्रभावः ।
तस्माल्लोका हन्तवन्तस्तवेमे
क्षीणे पुण्ये पतितोऽस्यद्य राजन्॥३
ययातिरुवाच
सुरर्षिगन्धर्वनरावमानात्
क्षयं गता मे यदि शक्र लोकाः।
इच्छाम्यहं सुरलोकाद् विहीनः
सतां मध्ये पतितुं देवराज॥४
इन्द्र उवाच
सतां सकाशे पतितोऽसि राजं-
श्च्युतः प्रतिष्ठां यत्र लब्धासि भूयः।
एवं विदित्वा तु पुनर्ययाते
न तेऽवमान्याः सदृशः श्रेयसे च॥५
शौनक उवाच
ततः पपातामरराजजुष्टात्
पुण्याल्लोकात् पतमानं ययातिम्।
सम्प्रेक्ष्य राजर्षिवरोऽष्टकस्त- मुवाच
मुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता ॥६
अष्टक उवाच
कस्त्वं युवा वासवतुल्यरूपः
स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्निः।
पतस्युदीर्णाम्बुधरप्रकाशः
खे खेचराणां प्रवरो यथार्कः॥७
इन्द्रने कहा-राजन् ! आप सम्पूर्ण कर्मोको समाप्त करके घर छोड़कर वनमें चले गये थे; अत: नहुषपुत्र ययाते! मैं आपसे पूछता हूँ कि आप तपस्यामें किसके समान हैं?॥ १॥
ययातिने कहा-इन्द्र! मैं न तो देवताओं एवं मनुष्योंमें तथा न गन्धर्वो और महर्षियोंमें ही किसीको ऐसा देख रहा हूँ जो तपस्यामें मेरे समान हो (अर्थात् मैं तपमें अद्वितीय हूँ) ॥ २॥
इन्द्र बोले-राजन् ! आपने अपने समान, अपने- से बड़े और छोटे लोगोंका प्रभाव न जानकर सबका तिरस्कार किया है, अत: आपके इन पुण्यलोकोंमें रहनेकी अवधि समाप्त हो गयी; क्योंकि (दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण) आपका पुण्य क्षीण हो गया, इसलिये अब आप यहाँसे नीचे गिरेंगे॥ ३॥
ययातिने कहा-देवराज इन्द्र! देवता, ऋषि, गन्धर्व और मनुष्य आदिका अपमान करनेके कारण यदि मेरे पुण्यलोक क्षीण हो गये हैं तो इन्द्रलोकसे भ्रष्ट होकर मैं साधु पुरुषोंके बीचमें गिरनेकी इच्छा करता हूँ॥४॥
इन्द्र बोले-राजन् ययाति! आप यहाँसे च्युत होकर साधु पुरुषोंके ही समीप गिरेंगे और वहाँ अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर लेंगे; किंतु यह सब जानकर आप फिर (आगे) कभी अपनी बराबरीवाले तथा अपनेसे बड़े लोगोंका अपमान मत कीजियेगा॥ ५॥
शौनकजी कहते हैं-शतानीक! तदनन्तर देवराज इन्द्रके सेवन करनेयोग्य पुण्यलोकोंका परित्याग कर राजा ययाति नीचे गिरने लगे। उस समय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ एवं उत्तम धर्मविधिके पालक अष्टकने उन्हें गिरते देखा। (तब) उन्होंने उन (ययाति)-से (इस प्रकार) कहा॥ ६॥
अष्टकने पूछा- 'इन्द्रके समान सुन्दर रूपवाले तरुण पुरुष आप कौन हैं? आप अपने तेजसे अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हैं। मेघरूपी घने अन्धकारवाले आकाशसे आकाशचारी ग्रहोंमें श्रेष्ठ सूर्यके समान आप कैसे गिर रहे हैं?
दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात् पतन्तं
वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेयम्।
किं नु स्विदेतत् पततीव सर्वे
वितर्कयन्तः परिमोहिताः स्मः॥ ८
दृष्ट्वा त्वाधिष्ठितं देवमार्गे
शक्रार्कविष्णुप्रतिमप्रभावम्
प्रत्युद्गतास्त्वां वयमद्य सर्वे
तस्मात् पाते तव जिज्ञासमानाः॥ ९
न चापि त्वां धृष्णवः प्रष्टुमग्रे
न चत्वमस्मान् पृच्छसिके वयंस्म।
तत् त्वां पृच्छामि स्पृहणीयरूप
कस्य त्वं वा किं निमित्तं त्वमागाः॥१०
भयं तु ते व्येतु विषादमोहौ
त्यजाशु देवेन्द्रसमानरूप।
त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे
शक्रो न सोढुं बलहापि शक्तः ।।११
सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां
सतां सदैवामरराजकल्प।
ते सङ्गताः स्थावरजङ्गमेशाः
प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु॥१२
प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः।
प्रभुः सूर्यः प्रकाशाच्च सतां चाभ्यागतः प्रभुः॥१३
आपका तेज सूर्य और अग्निके सदृश है। आप अप्रमेय शक्तिशाली जान पड़ते हैं। आपको सूर्यके मार्गसे गिरते देख हम सब लोग मोहित (आश्चर्यचकित) होकर इस तर्क-वितर्कमें पड़े हैं कि यह क्या गिर रहा है? आप इन्द्र, सूर्य और विष्णुके समान प्रभावशाली हैं। आपको आकाशमें स्थित देखकर हम सब लोग अब यह जाननेके लिये आपके निकट आये हैं कि आपके पतनका यथार्थ कारण क्या है। हम पहले आपसे कुछ पूछनेका साहस नहीं कर सकते और आप भी हमसे हमारा परिचय नहीं पूछते कि हम कौन हैं। इसलिये मैं ही आपसे पूछता हूँ। मनोरम रूपवाले महापुरुष! आप किसके पुत्र हैं और किसलिये यहाँ आये हैं? इन्द्रके तुल्य शक्तिशाली पुरुष! आपका भय दूर हो जाना चाहिये। अब आपको (स्वर्गसे गिरनेका) विषाद और मोह भी तुरंत त्याग देना चाहिये। इस समय आप संतोंके समीप विद्यमान हैं। बल दानवका नाश करनेवाले इन्द्र भी अब आपका तेज सहन करने में असमर्थ हैं। देवेश्वर इन्द्रके समान तेजस्वी महानुभाव! सुखसे वञ्चित होनेवाले साधु पुरुषोंके लिये सदा संत ही परम आश्रय हैं। वे स्थावर और जङ्गम-सभी प्राणियोंपर शासन करनेवाले सत्पुरुष यहाँ एकत्र हुए हैं। आप अपने समान पुण्यात्मा संतोंके बीचमें स्थित हैं। जैसे तपनेकी शक्ति अग्निमें है, बोये हुए बीजको धारण करनेकी शक्ति पृथ्वीमें है, प्रकाशित होनेकी शक्ति सूर्यमें है, उसी प्रकार संतोंका स्वामित्व-उनपर शासन करनेकी शक्ति केवल अतिथिको ही प्राप्त है'॥७-१३॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते ययातिपतनं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ।। ३७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३७॥
Summary of chapter 37 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya relates the historical event surrounding King Yayāti's residence in Svarga and his subsequent temporary fall. Having accumulated immense merit through sacrifices and penance, King Yayāti lived among the Devas for thousands of years. One day, Indra questioned King Yayāti regarding the extent of his spiritual penance and asked if anyone on earth or in heaven equaled his ascetic merit. Overcome by a subtle trace of spiritual pride, King Yayāti remarked that he knew of no king, sage, or celestial being whose penance equaled his own. The instant he uttered these vanity-filled words, his merit was diminished, and Indra informed him that his residence in Svarga was ended, causing King Yayāti to descend from the celestial realm toward the middle world.